
रायपुर । शासन व्दारा निराश्रित और मानसिक विक्षिप्त लोगों के लिए कई योजनायें बनाई गयी हैं, इसके बावजूद निराश्रित लोग सड़कों में जीवन यापन करने मजबूर हैं। हाट-बाजारों, सड़कों, गली मोहल्लों में भीख मांग कर जिंदगी काटने के लिए मजबूर है। संबंधित विभाग बैनर पोस्टर और स्लोगन से ही कर रहा है समाज कल्याण, हकीकत में वे सभी विक्षिप्त और निराश्रित भगवान भरोसे ही है।
सरकार का विभाग भी इस ओर चिंतन नहीं कर रहा है दिन-ब-दिन सड़कों पर भिक्षावृत्ति करने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है इस तरह जीवनयापन करने वाले लोग न किसी प्रकार से न कोई बुनियादी सुविधा का लाभ उठा रहे और न ही अपने लिए दो वक्त का भोजन की व्यवस्था कर पा रहे हैं। सड़कों के किनारे इनके रहने के ठीहे है, तो वही सामाजिक संस्था द्वारा भोजन इनका खाना पर इस तरह से इन सबका पूरी तरह से लाभ उठाने में असमर्थ हैं। शासन दवारा ऐसे लोगो के लिए साल दर साल योजनाएं बनती जा रही है । राजस्व से करोड़ों रूपए खर्च भी किये जा रहे हैं पर फिर भी सब ढर्रे में जा रहे हैं। राजधानी रायपुर शहर में ही लगभग 100 से ज्यादा निराश्रित और विक्षिप्त घुमन्तु लोग घूम रहे हैं इस पर ना शासन की नजर पड़ी, ना ही अधिकारियों की, दु:ख बात यह है कि जिम्मेदार प्रशासनिक विभाग एक दूसरे की जिम्मेदारी बताकर अपने काम से पल्ला झाडऩे की कोशिश कर रहे है। जिसमें शहर के इस छोर से उस छोर तक निराश्रित, मानसिक विक्षिप्त और घुमन्तू नजऱ आये। यह तस्वीर शहर के सबसे बड़े अस्पताल आंबेडकर अस्पताल के पार्किंग की हैं जहां यह निराश्रित महिला बैठी हुई है, तो वही ये तस्वीर है शहर के दूसरे कोने तेलीबांधा की हैं जहां बूढ़े काका लावारिसों की तरह सड़कों पर सोये है। वही मौदहापारा से निकले नए सड़क पर यह महिला बैठी हुई, इतना ही नहीं कॉलोनियों में दुकानों के बाहर इन्हें जहां जगह मिलती अपना बसेरा बना लेते है। दिन और रात वही बिताते हैं।
मुख्य पेशा भिक्षावृति : ऐसे घुमन्तु लोग भिक्षावृति करने के अलावा कोई काम नहीं करते है। मंदिरो के सामने ,सड़को के किनारे,सार्वजनिक स्थलों में या फिर कॉलोनियों अक्सर इन्हें देखा जा सकता है, ये वहां जा कर लोगों से भिक्षा मांगकर गुजर बसर करते हैं यहीं इनका मुख्य पेशा हैं।
बड़े गिरोह सक्रिय : भिक्षावृत्ति कानून रूप से प्रतिबधित होने के बाद भी भिक्षावृत्ति करने वाला गिरोह सक्रिय है जो झुंड में भिक्षावृत्ति करता है, और मिले पैसों को शराब में उड़ाता है। वहीं प्रशासन विक्षिप्त और भटकते निराश्रितों को पुनव्र्यवस्थापन नहीं करवा पाई है। जबकि समाज कल्याण विभाग को जिम्मेदारी दी गई है कि किसी भी शहर या गांव में भिक्षावृत्ति नहीं हो। लेकिन समाज कल्याण विभाग सफेद हाथी साबित हो रहा है। घुमन्तु और निराश्रितों को उनके हाल पर छोड़ दिया है। वे सार्वजनिक स्थलों में ये बड़ी तादाद में
रहते हैं।
संस्थाओं के भरोसे : इस तरह के लोगों को अक्सर बड़ी संस्थाओं दवारा सहानुभूति मिल जाता है और यही संस्था इन्हे रेस्क्यू कर बेहतर जीवन देने की कोशिश में लगे हुए रहते हैं। वही इस तरह के निराश्रित लोग इन संस्थाओं के भरोसे रहते हैं। लेकिन हर लोगों को इसका लाभ नहीं मिल पाता।
सरकारी विभाग बेखबर और लापरवाह
शासन की जिम्मेदारी है की समाज के हर आखिरी व्यक्ति तक योजना का लाभ पहुंचे फिर प्रशासनिक विभागों दवारा बड़े पैमाने में गड़बड़ी किया जा रहा है और आला अधिकारी की मनमानी से निराश्रित लोगों को शहर के सड़कों बनाना पड़ रहा हैं अपना घर तो वही संस्था को अपना भोजनालय। समाज कल्याणद विभाग और महिलाओं के लिए महिला बाल विकास विभाग मुख्य रूप से इस तरह के विक्षिप्त लोगों की जिम्मेदारी इनके कंधों पर हैं पर ये एक दूसरे पर ठीकरा फोड़ जिम्मेदारियों से बचने का हर सफल प्रयास करने में लगे हुए हैं।
ऐसे विक्षिप्त लोगों के लिए हम केवल इतना ही करते हैं कि उन्हें मेन्टल हॉस्पिटल भेजते हैं वो भी हमारी नहीं पुलिस की जिम्मेदारी है। प्रदेश में केवल एक ही मेन्टल हॉस्पिटल हैं और पुलिस की ऐसे लोगों को रेस्क्यू कर सीजीएम के सामने प्रस्तुत करती है और मेन्टल हॉस्पिटल के सर्टिफिकेट के बा उन्हें रीमस भेजा जाता है यही प्रक्रिया है और बाकि समाज कल्याण विभाग ,डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर और सामाजिक न्यायिक विभाग की जिम्मेदारी है उनसे बात करिये।
– एम गीता (सचिव महिला एवं बाल विकास विभाग )
हम 18 साल से नीचे जो आते है उनको रेस्क्यू करते हैं बाकी जिम्मेदारी महिला एवं बाल विकास विभाग की है। कोई भी विक्षिप्त जिम्मेदारी उनकी हैं ।
– एम एल पांडेय, सचिव, समाज कल्याण विभाग, आयोग