
वे मुझे मार सकते हैं, लेकिन मेरे विचारों को नहीं मार सकते हैं। वे मेरे शरीर को कुचल सकते हैं, लेकिन वे मरी आत्मा को कुचल नहीं पाएंगे। यह विचार कहने वाले भारत माता के अमर सपूत शहीद भगत सिंह हमेशा देशवासियों के दिलों में जिंदा रहेंगे। 23 मार्च 1931 को हमारे देश के तीन नायकों भगत सिंह, शिवराम राजगुरु और सुखदेव थापर को अंग्रेजों ने फांसी दी थी। यह तीनों अमर वीर भारत के युवाओं के लिए हमेशा प्रेरणा स्रोत रहेंगे।
23 मार्च का दिन भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की शहादत के रूप में जाना जाता है। इस दिन भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने हंसकर फांसी के फंदे को अपने गले से लगा लिया था। 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग हत्याकांड ने भगत सिंह के मन पर गहरा प्रभाव डाला था। 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह के साथ सेंट्रल असेम्बली में हमला करने के दौरान राजगुरु भी मौजूद थे। इतिहासकार बताते हैं कि तीनों को फांसी देने के लिए 24 मार्च 1931 का दिन तय किया गया था, लेकिन अंग्रेजों ने तय तारीख से एक दिन पहले उन्हें फांसी दे दी। अंग्रेजों को डर था कि फांसी वाले दिन लोग उग्र न हो जाएं।
भगत सिंह का जन्म 27 सितंबर 1907 को लायलपुर जिले के बंगा में हुआ था। उनके पिता का नाम किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती था। सुखदेव का पूरा नाम सुखदेव थापर था। उनका जन्म 15 मई 1907 को लुधियाना में हुआ था। राजगुरु का पूरा नाम शिवराम हरि राजगुरु था। उनका जन्म 24 अगस्त 1908 को पुणे के खेड़ा गांव में हुआ था। राजगुरु 16 साल की उम्र में हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी में शामिल हो गए थे। भगत सिंह ने 23 साल की उम्र में देश की आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। फांसी के समय भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के चेहरे पर मुस्कान थी। उन्होंने अपने मुकदमे के समय बचाव के लिए कोई पेशकश नहीं की थी। 23 मार्च 1931 को लाहौर जेल में उन्हें फांसी दे दी गई। उनका अंतिम संस्कार सतलज के तट पर किया गया।
