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Home » विकास का वास्ता विनाश का रास्ता ?
संपादकीय

विकास का वास्ता विनाश का रास्ता ?

adminBy adminJanuary 11, 2023No Comments5 Mins Read
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K.W.N.S.-निर्मल रानी –उत्तराखंड के सीमाँचलीय क़स्बे जोशीमठ में पहाड़ों के धंसने की सूचना मिलने के बाद ख़बर है कि प्रधानमंत्री कार्यालय स्वयं इस प्राकृतिक आपदा पर नज़र रख रहा है। पहाड़ों के धंसने का सिलसिला फ़िलहाल यहीं थम जायेगा या अभी इस तरह की और घटनाओं का सामना क्षेत्रवासियों को करना पड़ेगा इसके बारे में अभी तो निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता परन्तु इतना तो ज़रूर है कि पहाड़ों के धसान की इस घटना ने उत्तराखंड वासियों विशेषकर कुमाऊं,पौड़ी व गढ़वाल क्षेत्र के लोगों के माथे पर भय व चिंता की लकीरें ज़रूर खींच दी हैं । जोशीमठ में पहाड़ों का धंसना,इमारतों में दरार आना या कुछ इमारतों का तिरछा हो जाना भले ही यह ख़बरें टी वी पर समाचार प्रसारण की ‘विस्फ़ोटक शैली’ व समाचार के प्रस्तुतिकरण के चलते नई सी प्रतीत होती हों परन्तु यह इस इलाक़े में अत्यंत मद्धिम गति से चलने वाली निरंतर घटना का ही एक बड़ा रूप कहा जा सकता है। दशकों से इस इलाक़े में पहाड़ों के धसान का सिलसिला जारी है। परन्तु चूँकि इस बार यह विषय जोशीमठ जैसे पर्यटन व तीर्थ स्थलीय क़स्बे वाली घनी आबादी के इलाक़े से जुड़ा है इसलिये देश दुनिया की नज़रों में यह एक बड़ी ‘प्रकृतिक आपदा’ के नाम से ज़रूर सामने आया। 
जोशीमठ आपदा के बाद एक बार फिर यह बहस तेज़ हो गयी है कि क्या विकास के नाम पर प्रकृति के साथ लगातार हो रही छेड़छाड़ के परिणाम स्वरूप ही इस तरह की आपदाओं का सामना करना पड़ रहा है ? दशकों से छिड़ी इस बहस के बावजूद पृथ्वी के दोहन का सिलसिला, रुकना तो दूर क्या कम भी हुआ है ? या इसके ठीक विपरीत यह बढ़ता ही जा रहा है ? जहां तक जोशीमठ से जुड़ी पर्वत श्रृंख्लाओं का प्रश्न है तो उन्हें तो पिछले कई वर्षों से धार्मिक पर्यटन विकसित करने तथा देश की सुरक्षा के नाम पर लगातार ध्वस्त किया जा रहा है। उत्तराखंड के पहाड़ों में दूरस्थ स्थित केदार नाथ,बद्री नाथ,गंगोत्री व यमनोत्री जैसे चारों प्रमुख तीर्थ धाम को सड़क मार्ग से जोड़ने के लिये विशेष सर्किट तैय्यार किया जा रहा है। ग़ौर तलब है कि समुद्र तल से गंगोत्री की ऊंचाई 11,204 फ़िट बद्रीनाथ की 10,170 यमुनोत्री की 10,804 और केदारनाथ की ऊंचाई 11,755 फ़ीट है। हिमालय में स्थित इन चारों धामों में निरंतर बर्फ़बारी के कारण यहाँ मौसम ठंडा रहता है। दिसंबर 2016 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चार धाम परियोजना की आधारशिला रखी थी उस समय मीडिया द्वारा इसे प्रधान मंत्री का ‘मास्टर स्ट्रोक’ बताया गया था। उस समय यह भी बताया गया था कि लगभग 12000 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाली 900 किलोमीटर लंबी इस चार धाम सड़क परियोजना का उद्देश्य उत्तराखंड के चारों प्रमुख धामों के लिए तीर्थ यात्रियों को हर मौसम में सुलभ और सुविधाजनक रास्ता देना है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रोजेक्ट के तहत तीन डबल-लेन हाईवे का निर्माण करने की इजाज़त दी थी। हालांकि उसी समय ‘सिटीज़न्स फॉर ग्रीन दून’ नामक एक NGO ने पर्यावरण के प्रति गहन चिंता जताते हुए इस प्रोजेक्ट को चुनौती भी दी थी। परन्तु न्यायालय ने देश की रक्षा ज़रूरतों के आधार पर इसे सही ठहराया। केवल राजमार्ग निर्माण ही नहीं बल्कि इसी इलाक़े में रेलवे लाइन्स भी बिछाई जा रही हैं जिसके लिये अनेक छोटी बड़ी सुरंगें भी बनाई जा रही हैं। इसी राष्ट्रीय सुरक्षा,तीर्थ यात्रियों की सुविधा व विकास के नाम पर प्रकृति के साथ खिलवाड़ करने का नतीजा भी जोशीमठ पर्वत धंसान के रूप में हमारे सामने आता रहता है। 
इसी तरह भू गर्भ से कोयला निकालने की क़वायद जोकि भारत में सबसे पुराने कोयला क्षेत्र पश्चिम बंगाल के रानीगंज में 1774 में ईस्ट इण्डिया कंपनी द्वारा शुरू की गयी थी वह झारखण्ड,उड़ीसा,मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़,असम,मेघालय व अरुणाचल प्रदेश के कई इलाक़ों में अंधाधुंध कोयला दोहन के रूप में आज भी जारी है। दशकों पूर्व से ही इस बेतहाशा कोयला दोहन के दुष्परिणाम भी आने शुरू हो चुके हैं। झारखण्ड व छत्तीसगढ़ जैसे कई राज्यों से कोयला खनन क्षेत्रों से ज़मीन के धंसने,ज़मीन से धुंआ निकलने,कहीं धरती से पानी निकलने,मकान ढहने आदि की ख़बरें आती रहती हैं। परन्तु चूँकि इस इलाक़े के प्रभावित लोग प्रायः दो वक़्त की रोटी के लिए जूझने वाला ग़रीब मज़दूर वर्ग के व्यक्ति होते हैं इसलिये इनके भय व तबाही की ख़बरें स्थानीय समाचारपत्रों के भीतर के किसी कोने में प्रकाशित होकर रह जाती हैं। टी वी तो इन ख़बरों को दिखाना ही नहीं चाहता क्योंकि उसे इनमें कोई ‘मास्टर स्ट्रोक ‘ दिखाई नहीं देता। इसी तरह रेत खनन के धंधे से जुड़े लोगों को इसबात की फ़िक्र नहीं रहती कि उनके अवैध रेत या मिट्टी खनन के परिणाम स्वरूप बांध या तटबंध के किनारे टूट सकते हैं। जिससे गांव के गांव बाढ़ से तबाह होते हैं। बाढ़ का कारण भी इसी तरह का अवैध खनन बनता है। और पिछले दिनों बिहार के एक नव निर्मित पुल का खंबा तो कथित रूप से केवल इसलिये टूट गया क्योंकि भ्रष्टाचार के संरक्षण में उस खंबे की जड़ों में से भी रेत निकाली जा चुकी थी जिसके चलते वह खंबा टेढ़ा हो गया और सैकड़ों करोड़ की लागत से बना पुल ढह गया। 
 देश के तमाम क्षेत्रों में विकास के नाम पर चलने वाले इसी प्रकार के कोयला,रेत व मिटटी खनन,विध्वंस,वृक्ष कटाई,सुरंग निर्माण,बारूद ब्लास्ट,सड़क निर्माण के लिये होने वाली पहाड़ों की कटाई,बड़ी संख्या में इन्हीं कारणों से हो रहे वृक्षों के कटान आदि धरती को तबाही के द्वार तक पहुँचाने के पर्याप्त कारण हैं। बड़े पैमाने पर विकास के नाम पर होने वाली इन्हीं मानवीय ‘कारगुज़ारियों ‘ का नतीजा ही ग्लोबल वार्मिंग,ग्लेशियर्स के पिघलने,तापमान के गर्म होने व समुद्रतल के बढ़ने,भूस्खलन,पहाड़ धंसने जैसी आपदाओं के रूप में भी सामने आ रहा है। निश्चित रूप से यह भी दुनिया को विकास की चकाचौंध दिखाने वाले मानव को ही समय रहते यह सोचना होगा कि वह विकास का वास्ता देकर विनाश का रास्ता आख़िर कब तक अख़्तियार करता रहेगा।
 

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