रायपुर । छत्तीसगढ़ का महासमुंद लोकसभा सीट पर राज्य बनने के बाद हुए तीन आम चुनावों में से दो ने देश- विदेश में सुर्खियां बटोरी। राज्य बनने के बाद 2004 में हुए पहले आम चुनाव में इस सीट से दो कांग्रेसी दिग्गज आमने- सामने थे। कांग्रेस ने चार महीने पहले राज्य की सत्ता खोने वाले अजीत जोगी को यहां से प्रत्याशी बनाया तो भाजपा ने कांग्रेस के पूर्व केंद्रीय मंत्री पं. विद्याचरण शुक्ल को कमल निशान थमा दिया।
पूरे चुनाव अभियान के दौरान दोनों-तरफ से जोरदार प्रचार अभियान चला, लेकिन मतदान के ठीक दो दिन पहले जोगी सड़क दुर्घटना का शिकार हो गए। हादसा इतना भयानक था कि जोगी के बचने की उम्मीद नहीं थी। कहा जाता है कि इससे जोगी के पक्ष में सहानुभूति लहर चली। जोगी एक लाख से अधिक मतों से जीत गए, लेकिन हादसे के कारण जिंदगीभर के लिए चलने- फिरने में असमर्थ हो गए। 2014 में जोगी ने फिर इस सीट से भाग्य आजमाया। जोगी हार गए, लेकिन एक नाम के 10 से अधिक प्रत्याशियों की वजह से यह सीट चर्चा में आई।
इस वजह से वीआइपी
जोगी : इंजीनियरिंग कॉलेज के प्रोफेसर से पहले आईपीएस फिर आईएएस बने जोगी ने सरकारी नौकरी छोड़कर 1986 में कांग्रेस प्रवेश किया और राज्यसभा सदस्य बन गए। 1998 में रायगढ़ लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। लंबे समय तक कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता रहे और छत्तीसगढ़ बना तो वे राज्य के पहले मुख्यमंत्री बनाए गए।
टिकट की भूमिका- वर्ष 2000 में छत्तीसगढ़ अलग राज्य बना तो जोगी राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने। नवंबर 2003 में जोगी अपनी मरवाही सीट जीत गए, लेकिन सत्ता हाथ से निकल गई। पार्टी की हार के लिए जोगी को जिम्मेदार ठहराया गया। इस बीच मई 2004 के आम चुनाव में उन्होंने महासमुंद सीट से पार्टी का टिकट हासिल कर लिया।
कांग्रेस से अलग अपनी राह तलाश रहे- जोगी करीब दो वर्ष पहले कांग्रेस से अलग हो चुके हैं। उन्होंने अपनी अलग क्षेत्रीय पार्टी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जोगी) बनाई है। फिलहाल वे अपनी परंपरागत मरवाही सीट से विधायक हैं।
शुक्ल : अविभाजित मध्यप्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री पं. रविशंकर शुक्ल के पुत्र विद्याचरण शुक्ल की गिनती कद्दावर केंद्रीय नेताओं में होती है। शुक्ल लंबे समय तक केंद्र में मंत्री रहे। शुक्ल की गिनती संजय गांधी के बेहद करीबी नेताओं में होती थी। उनके बड़े भाई पं. श्यामाचरण शुक्ल मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे।
टिकट की भूमिका- वर्ष 2000 में राज्य बना तो मुख्यमंत्री पद के दावेदार कांग्रेसियों में शुक्ल सबसे ऊपर थे, लेकिन पार्टी ने उन्हें दरकिनार कर दिया। इसके बाद लगातार पार्टी में उनकी उपेक्षा होती रही। इस बीच 2002 में उन्होंने एनसीपी की यहां नींव रखी। पार्टी ने राज्य की सभी 90 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन केवल एक सीट पर जीत मिली, हालांकि कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने का श्रेय इन्हें भी मिला। शुक्ल ने भाजपा प्रवेश किया और महासमुंद लोकसभा सीट से टिकट मिल गई।
झीरम के शहीद : 2013 के विधानसभा चुनाव से पहले शुक्ल कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा में शामिल होने बस्तर गए थे। वहां झीरमघाटी में नक्सलियों ने कांग्रेस के काफिले पर हमला कर दिया। इसमें पार्टी के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल समेत कई नेताओं की मौत हो गई। शुक्ल भी घायल हो गए थे और उपचार के दौरान उनका निधन हो गया।
इस वजह से रही यादगार
मतदान के ठीक दो दिन पहले चुनाव प्रचार के दौरान जोगी सड़क हादसे का शिकार हो गए। लंबे उपचार के बाद उनकी जान तो बच गई, लेकिन जोगी चलने- फिरने में असमर्थ हो गए। तभी से वे व्हील चेयर पर हैं।
दूसरे चुनाव को भी जोगी ने बना दिया यादगार
जोगी ने 2014 में फिर महासमुंद सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ा। इस बार उनका मुकबाला भाजपा के सिटिंग एमपी चंदूलाल साहू से था। इस चुनाव में महासमुंद सीट से एक साथ 11 चंदूलालों ने नामांकन दाखिल किया और लड़ा भी। इसे जोगी की ही रणनीति माना जाता है। एक नाम वाले इतने लोगों के एक साथ चुनाव लड़ने यह सीट फिर चर्चा में आई। 2014 का चुनाव जोगी करीब 12 सौ वोट से हार गए।
इस बार- फिलहाल यह सीट भाजपा के कब्जे में है लेकिन पार्टी ने अपने मौजूदा सांसद चंदूलाल साहू का टिकट काट दिया है। पार्टी ने उनके स्थान पर चुन्नीलाल साहू के स्र्प में नए चेहरे को मैदान में उतारा है। वहीं, कांग्रेस ने अभनपुर विधानसभा सीट से लगातार दूसरी बार के विधायक धनेंद्र साहू को टिकट दिया। साहू पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष हैं।
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