panchayattantra24.-रायपुर। आदिवासी बहुल और वनांचल क्षेत्रों में जब कोई महिला अपने जज्बे से तकदीर बदलती है, तो उसकी गूंज दूर तक सुनाई देती है। नारायणपुर जिले के छोटे से गाँव एड़का की रहने वाली श्रीमती रुक्मणी नाग की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। आज वे सिर्फ एक किसान नहीं हैं, बल्कि पूरे इलाके के लिए आत्मनिर्भरता और आधुनिक खेती की एक नई मिसाल बन चुकी हैं।
परंपरा का गतिरोध और बदलाव की छटपटाहट
कुछ समय पहले तक रुक्मणी की जिंदगी भी गांव के आम किसानों जैसी ही थी। पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे ढर्रे पर वे हर साल अपने खेतों में धान बोती थीं। सुबह से शाम तक पसीना बहाने के बाद भी जब फसल कटकर घर आती, तो हाथ में इतनी रकम भी नहीं बचती थी कि अगली फसल की लागत आसानी से निकल सके। बढ़ती महंगाई, खाद-बीज के ऊंचे दाम और मौसम के बदलते मिजाज ने धान की खेती को घाटे का सौदा बना दिया था। रुक्मणी इस बात से परेशान थीं कि मेहनत के बावजूद परिवार की आर्थिक स्थिति जस की तस बनी हुई थी। वे इस ढर्रे को तोड़ना चाहती थीं, पर रास्ता नहीं सूझ रहा था।
एक मुलाकात और बदल गई राह
रुक्मणी के जीवन में नया मोड़ तब आया, जब उनकी मुलाकात उद्यानिकी विभाग के अधिकारियों से हुई। अधिकारियों ने उनकी समस्या को समझा और उन्हें एक नया नजरिया दिया फसल विविधीकरण। विभाग ने उन्हें सलाह दी कि वे केवल धान के भरोसे न रहें, बल्कि अपने खेत के एक हिस्से में नकदी फसलें यानी सब्जियां उगाना शुरू करें। शुरुआत में थोड़ी झिझक थी, क्योंकि नई पद्धति से खेती करने का कोई पुराना अनुभव नहीं था। लेकिन उद्यानिकी विभाग के तकनीकी मार्गदर्शन और अधिकारियों के भरोसे ने रुक्मणी के भीतर एक नया साहस फूंक दिया।
मेहनत रंग लाई- 15 हजार की लागत, दोगुना मुनाफा
विभागीय सलाह को अमली जामा पहनाते हुए रुक्मणी ने अपने खेत में वैज्ञानिक पद्धति से टमाटर, करेला और मिर्च की बुवाई कर दी। इस नई शुरुआत में उन्होंने तकरीबन 15 हजार रुपये की पूंजी लगाई। इसके बाद शुरू हुआ उनकी कड़ी मेहनत और विभाग की देखरेख का दौर। वे रोज सुबह अपने सपनों को खेतों में फलते-फूलते देखतीं।
जल्द ही उनकी यह मेहनत रंग लाई। खेतों में लाल टमाटर और हरे-भरे करेले लहलहाने लगे। जब वे इस उपज को लेकर स्थानीय बाजार में पहुंचीं, तो उन्हें अपनी उम्मीद से कहीं बेहतर दाम मिले। महज कुछ महीनों की इस फसल से रुक्मणी को 30 से 40 हजार रुपये की आमदनी हुई। यानी लागत निकालने के बाद भी मुनाफा दोगुने से ज्यादा था।
घर की दहलीज से निकलकर बनीं रोल मॉडल
इस मुनाफे ने न केवल रुक्मणी की जेब को मजबूती दी, बल्कि उनके आत्मसम्मान को भी सातवें आसमान पर पहुंचा दिया। परिवार की आर्थिक तंगी दूर हो गई और घर में खुशहाली ने दस्तक दी। रुक्मणी की इस चमत्कारी सफलता की महक धीरे-धीरे पूरे एड़का गांव और आसपास के इलाकों में फैल गई। जो किसान पहले सब्जियों की खेती को जोखिम भरा मानते थे, वे अब रुक्मणी के पास आकर उन्नत खेती के गुर सीख रहे हैं। वे आसपास के गांवों के लिए एक श्रोल मॉडलश् बन चुकी हैं।
किसान हितैषी मुख्यमंत्री विष्णु देव साय का दिल से आभार
अपनी इस कामयाबी पर चेहरे पर एक संतोषजनक मुस्कान लिए रुक्मणी नाग कहती हैं कि धान की पारंपरिक खेती से हमारी लागत भी नहीं निकल पा रही थी। लेकिन जब से मैंने उद्यानिकी फसलों को अपनाया, मेरी जिंदगी बदल गई। मैं किसानों के हित में सोचने वाली हमारी सरकार और किसान हितैषी मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय का दिल से आभार मानती हूँ, जिनकी योजनाओं और विभागीय सहयोग के कारण मुझ जैसी एक आम महिला आज अपने पैरों पर खड़ी हो सकी है। मेरा तो यही मानना है कि अगर हम अपनी सोच बदलें और नई तकनीक अपनाएं, तो हमारी धरती वाकई सोना उगल सकती है।
उद्यानिकी विभाग की इस मुहिम और रुक्मणी के अटूट जज्बे ने यह साबित कर दिया है कि बस्तर का किसान अब सिर्फ अन्नदाता नहीं, बल्कि नए दौर का आत्मनिर्भर और प्रगतिशील व्यवसाई भी बन रहा है।
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