
रायपुर । लोकसभा के मानसून सत्र के पहले दिन बस्तर सांसद दीपक बैज ने बच्चों से जुड़ा बेहद संवेदनशील और गंभीर मामला उठाया. उन्होंने स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री से कुपोषित बच्चों को लेकर सवाल किया कि देश मे कुपोषित बच्चों की संख्या राज्य-संघ राज्य क्षेत्रवार कितनी है ? इसके साथ ही उन्होंने कुपोषित बच्चे के अस्थि संक्रमण के चपेट में आने से विकलांगता में वृद्धि की कोई डेटा क्यों नही है? देश मे NFHS-4 के वर्ष 2015-16 के अनुसार आदिवासी बच्चों में बौनेपन 43.5%, कम वजन 45.3% और कृशता 27.4% है क्यों ?? केंद्र सरकार के द्वारा वर्ष 2019-20 में 16,334.88 रु. करोड़ राशि देने के बाद भी पांच राज्यों में बच्चे कुपोषण के चपेट में क्यों ?? जिसमे पहले झारखंड फिर दूसरे में बिहार,तीसरे में मध्यप्रदेश व चौथे स्थान गुजरात और पांचवे स्थान में उत्तरप्रदेश है. इसके साथ ही उन्होंने सवाल किया कि कब तक कुपोषण को नियंत्रित करेंगे ।
जिसके जवाब में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ हर्षवर्धन लिखित उत्तर प्रस्तुत किये. प्रस्तुत किये गए लिखित उत्तर में उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-4) के अनुसार देशभर में पाँच वर्ष से कम आयु के 35.7% बच्चे कम वजन वाले, 21% निष्क्रिय और 38.4% बच्चे छोटे कद वाले हैं. राज्य / संघ राज्य क्षेत्र-वार विवरण अनुलग्नक-| पर है ।
यद्यपि कुपोषित बच्चे सामान्य बच्चों की तुलना में अल्प रोग प्रतिरक्षण के कारण अस्थि संक्रमण सहित किसी भी संक्रमण की चपेट में अधिक आते हैं, किंतु कुपोषित बच्चों में ऐसे अस्थि संक्रमण – जिसके कारण बच्चे विकलांगता की चपेट में आ रहे हैं, में वृद्धि को प्रमाणित करने वाला कोई डेटा नहीं है ।
यद्यपि कुपोषण के मुद्दे को समाप्त करने के लिए मुख्य कार्यक्रम एकीकृत बाल विकास योजना (आईसीडीएस) है, जिसे महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा कार्यान्वित किया जाता है, किंतु राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के अंतर्गत स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय स्वास्थ्य प्रणाली को सुदृढ़ कर रहा है, जिसमें जीवनभर वंचित जनसंख्या में अल्प-पोषण को कम करने के विभिन्न कार्यक्रम जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व संपूरण कार्यक्रम, स्वास्थ्य केंद्रों में अत्यधिक गंभीर कुपोषणग्रस्त रुग्ण बच्चों का प्रबंधन – उपयुक्त शिशु एवं युवा बाल फीडिंग प्रक्रियाओं में सुधार, विटामिन ए संपूरण, राष्ट्रीय कृमिनाशन दिवस आदि शामिल हैं. बाल्यावस्था रुग्णता जैसे डायरिया रोग की रोकथाम, जो बाल्यावस्था कुपोषण की अप्रत्यक्ष रूप में रोकथाम करती है. इस उद्देश्य के लिए गहन डायरिया नियंत्रण पखवाड़ा (आईडीसीएफ) कार्यान्वित किया जा रहा है. जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम (जेएसएसके) पोषण संबंधी सहायता देने वाली एक अन्य कार्यनीति है, जिसमें गर्भवती महिलाओं और शिशुओं को स्वास्थ्य केंद्र में रहने के दौरान निःशुल्क आहार देना शामिल है. अन्य कार्यक्रम जैसे रोग प्रतिरक्षण, गृह आधारित युवा बाल परिचर्या कार्यक्रम (एचबीवाईसी) जैसे रोगों के साथ-साथ कुपोषण को दूर करते हैं और पोषण संबंधी स्थिति में सुधार लाते हैं. राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण-1|| एवं IV के अनुसार, छोटे कद, कम वजन एवं खून की कमी हेतु बाल कुपोषण में कमी आई है ।
