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panchayattantra24.-सनातन धर्म में कई सारे व्रत त्योहार मनाए जाते हैं और सभी का अपना महत्व होता है लेकिन महाशिवरात्रि को बेहद ही खास माना गया है जो कि शिव को समर्पित दिन है इस दिन भक्त महादेव को प्रसन्न करने के लिए उनकी विधिवत पूजा करते हैं और उपवास आदि भी रखते हैं इस साल महाशिवरात्रि का त्योहार 26 फरवरी को मनाया जाएगा। इस दिन भगवान शिव का रुद्राभिषेक करने से सभी परेशानियां हल हो जाती हैं, तो आज हम आपको अपने इस लेख द्वारा रुद्राभिषेक की सरल और सही विधि बता रहे हैं तो आइए जानते हैं। 
 रुद्राभिषेक करने का सही तरीका और नियम— महाशिवरात्रि पर अगर आप घर में रुद्राभिषेक करते हैं तो सबसे पहले आप शिवलिंग को पूजा स्थल की उत्तर दिशा में रखें और भक्त का मुख पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। इसके बाद अभिषेक के लिए गंगाजल डालें और रुद्राभिषेक आरंभ करें। फिर आचमनी से गन्ने का रस, शहद, दही, दूध यानी पंचामृत समेत जितने भी तरह पदार्थ हैं, उनसे शिवलिंग का अभिषेक करें। भगवान भोलेनाथ का अभिषेक करते समय महामृत्युंजय मंत्र ओम नमः: शिवाय या रुद्राष्टकम मंत्र का जाप करते रहें। शिवलिंग पर चंदन का लेप लगाएं और फिर पान का पत्ता, बेलपत्र आदि सभी चीजें भगवान शिव को अर्पित करें। भगवान शिव के भोग के लिए व्यंजन बनाकर रखें और सभी को एक एक करके शिवलिंग पर अर्पित करें इसके बाद शिव के मंत्र का जाप 108 बार करें फिर पूरे परिवार के साथ महादेव की आरती करें।
 

 

panchayattantra24.-महाकुंभ : महाकुंभ मेला हर 12 साल में लगता है। नए साल में 13 जनवरी 2025 से संगम नगरी प्रयागराज में महाकुंभ मेला शुरू होने वाला है। हिंदू धर्म में इस महाकुंभ का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो व्यक्ति महाकुंभ मेले में स्नान करता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है और कई गुना बेहतर परिणाम प्राप्त करता है। इसलिए अगर आप महाकुंभ की यात्रा करने की योजना बना रहे हैं, तो इन चीजों को महाकुंभ से घर वापस लाना सुनिश्चित करें। ऐसा कहा जाता है कि इससे आपके घर में सौभाग्य, समृद्धि और खुशहाली आती है। यदि आपके पास वह है, तो भाग्य आपके साथ है। 
चूँकि प्रयागराज तीन पवित्र नदियों गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम है, इसलिए इसे संगम नगरी भी कहा जाता है। संगम नदी के तट पर लगने वाले महाकुंभ मेले का भी विशेष महत्व है। इसलिए अगर आप महाकुंभ मेले में जाएं तो यहां से संगम की मिट्टी जरूर लेकर आएं। यह भूमि अत्यंत पवित्र मानी जाती है। संगम की मिट्टी को पूजा स्थान पर या दरवाजे के सामने रखने से आपके घर में सकारात्मक ऊर्जा आती है। महाकुंभ मेले से शिवलिंग का वापस आना भी बहुत शुभ फलदायी होता है। इसके अलावा आप चाहें तो पारस पत्थर को वापस भी कर सकते हैं। अगर आप इसे पूजा स्थान पर रखते हैं तो इससे आपके घर में सुख-समृद्धि और खुशहाली आएगी।
अगर आप महाकोम्ब जाएं तो वहां से थोड़ा सा गंगा जल ले जाना न भूलें। गंगाजल को घर ले आएं और पूजा घर या किसी साफ जगह पर रखें। इससे आपका घर धनवान और समृद्ध बना रहेगा। साथ ही परिवार में सकारात्मक माहौल बना रहता है। आप महाकुंभ मेले से भी तुलसी घर ले जा सकते हैं. घर में तुलसी रखने से दरिद्रता दूर होगी और आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। नियमित रूप से शाम के समय तुलसी के पास दीपक जलाना और सुबह जल देना न भूलें। तुलसी की पूजा करने से आपके घर में सुख, शांति और समृद्धि आती है। धन-धान्य की भी बरकत होती है।
 

एकादशी व्रत भगवान विष्णु की पूजा और उनके आशीर्वाद की प्राप्ति के लिए रखते हैं। एकादशी व्रत करने से व्यक्ति के पाप मिट जाते हैं, जीवन के अंत में भगवान विष्णु की कृपा से उसे मोक्ष मिलता है। हर माह में दो एकादशी व्रत होते हैं। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, पहले माह चैत्र के कृष्ण पक्ष की एकादशी से इसका प्रारंभ होता है, इसे पापमोचिनी एकादशी कहते हैं। वहीं आमलकी एकादशी साल की अंतिम एकादशी होती है, जो फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को होती है। एकादशी व्रत के कुछ जरूरी नियम हैं, जिनका पालन करना आवश्यक है। इसके बिना व्रत पूरा नहीं होता है। ​यदि आपको एकादशी व्रत करना है तो इसके लिए भी एक शुभ दिन है। काशी के ज्योतिषाचार्य चक्रपाणि भट्ट से जानते हैं कि एकादशी व्रत कब से शुरू करना चाहिए? एकादशी व्रत के जरूरी नियम क्या हैं?
एकादशी व्रत कब शुरू करें?
एकादशी व्रत शुरू करने का सबसे उत्तम दिन मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी है। इसे उत्पन्ना एकादशी कहते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, उत्पन्ना एकादशी को ही देवी एकादशी की उत्पत्ति हुई थी, इसलिए एकादशी व्रत प्रारंभ करने के लिए यह दिन सबसे अच्छा माना जाता है। कथा के अनुसार, मुर राक्षस का वध करने के लिए देवी एकादशी प्रकट हुई थीं।
साल 2024 में एकादशी व्रत शुरू करने का दिन
इस साल उत्पन्ना एकादशी का व्रत 16 नवंबर दिन मंगलवार को है। जो लोग इस साल से एकादशी व्रत का प्रारंभ करना चाहते हैं, वे इस दिन से एकादशी व्रत कर सकते हैं। इस दिन 3 शुभ योग में उत्पन्ना एकादशी है।
उत्पन्ना एकादशी पर प्रीति योग, आयुष्मान योग और द्विपुष्कर योग होगा। उत्पन्ना एकादशी व्रत का पारण 27 नवंबर को दोपहर में 1:02 बजे से दोपहर 3:18 बजे तक है।
एकादशी व्रत के नियम
1. एकादशी व्रत से एक दिन पहले और एक दिन बाद तक व्यक्ति को सात्विक भोजन करना चाहिए। उसमें लहसुन, प्याज, मांस, शराब जैसी तामसिक वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए।
2. एकादशी व्रत में मसूर दाल, चावल, बैंगन, गाजर, शलगम, पालक, गोभी आदि का सेवन नहीं करना चाहिए। इनका खाना वर्जित है।
3. एकादशी व्रत में ब्रह्मचर्य के नियमों का पालन करना चाहिए। भोग, विलास आदि से दूर रहें। किसी भी प्रकार की हिंसा से दूर रहें। मन, वचन और कर्म से पवित्र होकर एकादशी व्रत का संकल्प करके व्रत शुरू करना चाहिए।
4. एकादशी व्रत के दिन आपको ओम नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करना चाहिए। पूजा के समय एकादशी व्रत कथा पढ़ें या सुनें। इससे पुण्य लाभ होगा और व्रत का महत्व पता चलेगा। कथा के बिना व्रत पूर्ण नहीं होता है। रात्रि के समय में भगवत जागरण करें। दोपहर में सोना वर्जित है।
5. एकादशी व्रत की पूजा के समय भगवान विष्णु को पंचामृत, तुलसी के पत्ते का भोग जरूर लगाएं। इसके साथ आप मौसमी फल, मिठाई आदि का भोग लगा सकते हैं। विष्णु सहस्रनाम, विष्णु चालीसा आदि का पाठ करें। अंतिम ​में विष्णु आरती करें।
6. एकादशी व्रत पारण के दिन स्नान बाद अपनी क्षमता के अनुसार गरीब ब्राह्मण को अन्न, वस्त्र, फल आदि का दान करें। उसके बाद पारण करके व्रत को पूरा करना चाहिए।
7. एकादशी व्रत करने वाले को असत्य, कटु वचन, काम, क्रोध, लोभ आदि से बचना चाहिए। दूसरे की निंदा, उससे छल आदि न करें।
पूरे साल के एकादशी व्रतों के नाम
एक साल में 24 एकादशी व्रत होते हैं, वहीं अधिकमास लगने पर एकादशी व्रतों की संख्या 24 से बढ़कर 26 तक हो सकती है। आइए जानते हैं एकादशी व्रतों के नाम।
1. उत्पन्ना एकादशी
2. मोक्षदा एकादशी
3. सफला एकादशी
4. पौष पुत्रदा एकादशी
5. षटतिला एकादशी
6. जया एकादशी
7. विजया एकादशी
8. आमलकी एकादशी
9. पापमोचिनी एकादशी
10. कामदा एकादशी
11. बरूथिनी एकादशी
12. मोहिनी एकादशी
13. अपरा एकादशी
14. निर्जला एकादशी
15. योगिनी एकादशी
16. देवशयनी एकादशी
17. कामिका एकादशी
18. श्रावण पुत्रदा एकादशी
19. अजा एकादशी
20. परिवर्तिनी एकादशी
21. इंदिरा एकादशी
22. पापांकुशा एकादशी
23. रमा एकादशी
24. देव उठनी एकादशी
 

 
panchayattantra24.- शिव चालीसा के फायदे: हिंदू धर्म में माना जाता है कि शिव चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति को कई लाभ मिलते हैं। इससे भगवान शिव की कृपा आप पर बनी रहेगी लेकिन साथ ही शिव चालीसा का पाठ करते समय कुछ नियमों का भी पालन करना चाहिए। इनका रखरखाव करना भी जरूरी है ताकि आपको सभी लाभ मिल सकें। तो आइये जानते हैं चालीसा से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण नियम।
आपको ये लाभ मिलेंगे
शिव चालीसा का जाप करने से व्यक्ति को किसी भी प्रकार का भय नहीं सताता। साथ ही व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता बनी रहती है। साथ ही बोलेनाथ जी की कृपा से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं भी पूरी हो जाती हैं।
समस्याएँ दूर हो जाती हैं
रोज सुबह स्नान आदि के बाद. एक आसन पर बैठकर 11 बार शिव चालीसा का पाठ करना चाहिए। इससे जीवन में आने वाली परेशानियां दूर हो सकती हैं। साथ ही रोजाना शिव चालीसा पढ़ने से व्यक्ति की आर्थिक स्थिति में भी सुधार देखने को मिलता है।
इन लोगों के लिए शिव चालीसा लाभकारी है।
ऐसा माना जाता है कि शिव चालीसा का पाठ करने से गर्भवती महिलाओं को आश्चर्यजनक लाभ मिल सकते हैं। इसके अलावा लंबे समय से बीमारी से जूझ रहे व्यक्ति को भी ऐसी स्थिति में शिव चालीसा का पाठ करने से स्वास्थ्य लाभ मिल सकता है।
शिव चालीसा पढ़ने के नियम
शिव चालीसा का पाठ लगातार 40 दिनों तक कम से कम 3, 5 या 11 बार करना चाहिए। इसके अलावा शिव चालीसा का पाठ करते समय शरीर और मन की स्वच्छता पर भी ध्यान देना चाहिए। शिव चालीसा का पाठ मधुर और लयबद्ध तरीके से करना चाहिए। इसके अलावा पढ़ते समय आपका मन एकाग्र रहना चाहिए और इस समय केवल भगवान का ही ध्यान करना चाहिए।

PT – सनातन धर्म में हर दिन देवी-देवताओं की पूजा के लिए समर्पित माने गए हैं। मंगलवार के दिन हनुमान जी का व्रत और पूजा करने की परंपरा है। इस दिन हनुमान जी की विधिवत पूजा करने से शुभ फलों की प्राप्ति होती है और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। माना जाता है कि मंगलवार के दिन हनुमान जी की पूजा करने से मंगल दोष से मुक्ति मिलती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, मंगलवार की पूजा के दौरान हनुमान चालीसा का पाठ करने या सुनने से साधक के सभी बिगड़े काम बनते हैं। हनुमान चालीसा का पाठ पूरे श्रद्धा-भाव के साथ करना चाहिए। ऐसा करने से हनुमान जी प्रसन्न होते हैं।

श्रीगुरु चरन सरोज रज, निजमन मुकुरु सुधारि। बरनउं रघुबर बिमल जसु, जो दायक फल चारि।।

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार। बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।

चौपाई

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुं लोक उजागर।।

राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।।

महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी।।

कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुण्डल कुँचित केसा।।

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजे। कांधे मूंज जनेउ साजे।।

शंकर सुवन केसरी नंदन। तेज प्रताप महा जग वंदन।।

बिद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर।।

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया।।

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा।।

भीम रूप धरि असुर संहारे। रामचन्द्र के काज संवारे।।

लाय सजीवन लखन जियाये। श्री रघुबीर हरषि उर लाये।।

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।।

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं।।

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा।।

जम कुबेर दिगपाल जहां ते। कबि कोबिद कहि सके कहां ते।।

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा।।

तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना। लंकेश्वर भए सब जग जाना।।

जुग सहस्र जोजन पर भानु। लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लांघि गये अचरज नाहीं।।

दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।।

राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।

सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रच्छक काहू को डर ना।।

आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हांक तें कांपै।।

भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै।।

नासै रोग हरे सब पीरा। जपत निरन्तर हनुमत बीरा।।

संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।।

सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा।।

और मनोरथ जो कोई लावै। सोई अमित जीवन फल पावै।।

चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा।।

साधु संत के तुम रखवारे।। असुर निकन्दन राम दुलारे।।

अष्टसिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता।।

राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा।।

तुह्मरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै।।

अंत काल रघुबर पुर जाई। जहां जन्म हरिभक्त कहाई।।

और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई।।

सङ्कट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।

जय जय जय हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।।

जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बन्दि महा सुख होई।।

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा।।

तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महं डेरा।।

दोहा

पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।

राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।

 
panchayattantra24.-बालों में छिपा डैंड्रफ न सिर्फ देखने में बुरा लगता है बल्कि बालों की जड़ों को भी कमजोर कर देता है और बालों के झड़ने का कारण बनता है। बालों पर डैंड्रफ आने के कई कारण हो सकते हैं। मुख्य कारण अनुचित बाल धोना और संक्रमण हैं। सर्दियों में लोगों में यह समस्या काफी बढ़ जाती है। साल के इस समय में सिर की सूखी त्वचा के कारण बालों में खुजली और रूसी हो जाती है। अगर आपके बालों के झड़ने का कारण डैंड्रफ है तो करी पत्ते का यह उपाय आपकी डैंड्रफ की समस्या से छुटकारा दिलाएगा।
करी पत्ते में मौजूद पोषक तत्व:
करी पत्ते में प्रोटीन, विटामिन, आयरन, बीटा-कैरोटीन, कैल्शियम और फॉस्फोरस जैसे कई पोषक तत्व होते हैं और इसमें एंटीबैक्टीरियल और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण भी होते हैं। यह आपके स्कैल्प को साफ और स्वस्थ रखने में मदद करेगा।
डैंड्रफ से छुटकारा पाने के लिए करी पत्ते का इस्तेमाल इस प्रकार करें:करी पत्ता और दही
फिर करी पत्ते को अच्छे से पीस लें और दो बड़े चम्मच दही का पेस्ट बना लें. अब इस पेस्ट को अपने बालों पर 30 मिनट के लिए लगाएं। इस प्रोडक्ट के इस्तेमाल से ना सिर्फ आपको डैंड्रफ की समस्या से राहत मिलेगी|
करी अपने पीछे पानी छोड़ देती है
करी पत्ते को उबालकर इस पानी को बालों में लगाने से भी आप डैंड्रफ से छुटकारा पा सकते हैं। करी पत्ते का पानी स्कैल्प को कई तरह के इंफेक्शन से भी बचाने में मदद करता है. करी पत्ते का पानी बनाने के लिए करी पत्ते को तोड़ लें, उसमें एक गिलास पानी डालें और अच्छे से उबाल लें. बाल धोने के बाद इस पानी से धो लें।
 

PT – हिंदू धर्म के कई ग्रंथ व्यक्ति को जीवन में आने वाली समस्याओं से लड़ने की ताकत देते हैं। वह बताते हैं कि आप कैसे इन समस्याओं पर विजय पा सकेंगे। भगवत गीता में भगवान श्री कृष्ण कृष्ण ने उपदेश देकर जीवन के कई विषयों पर अपनी राय दी है।

भगवान श्री कृष्ण ने भगवत गीता में बताया है कि आपको जीवन की सफल होने के लिए क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। भगवान ने बताया है कि क्या करने से आप पाप के भागीदार बनेंगे। ज्योतिषाचार्य राधाकांत वत्स ने विस्तार से बताया कि कौन से काम महापाप के समान हैं।

कौन से कामों को करने से लगता है पाप

हिंसा

भगवत गीता में हिंसा को महापाप माना गया है। अगर आप किसी भी व्यक्ति या जानवर के साथ हिंसा करते हैं। उसे नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते हैं या उसकी हत्या तक कर दते हैं। यह सभी महापाप है।

चोरी

भगवान ने चोरी को भी महापाप की श्रेणी में रखा है। केवल धन की ही चोरी महापाप नहीं है, अगर आप किसी सफल व्यक्ति के साथ छल कर उसकी सफलता को चुरा लेते हैं, तो यह भी महापाप ही है।

वासना

आप किसी पुरुष या स्त्री को उसके मन के खिलाफ जाकर जबरन वासना करते हैं, तो यह भी महापाप की श्रेणी में आता है।

लालच

आपके अंदर लालच है, तो वह भी महापाप में आता है। यह लालत वस्तु का, धन का, खाने-पीने का किसी का भी हो सकता है।

ईर्ष्या

ईर्ष्या करना भी भगवान श्री कृष्ण ने महापाप में शामिल किया है। ईर्ष्या किसी को भी एक सामान्य इंसानी भाव लगता है, लेकिन इसकी वजह से कई बार व्यक्ति गलत मार्ग को अपना लेता है।

अहंकार

अंहकार भी महापाप की श्रेणी में आता है। यह आपको गलत काम करने के लिए प्रेरित कर सकता है।

 
 panchayattantra24.-इस साल 01 नवंबर को करवा चौथ का व्रत रखा जा रहा है। यह व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए बहुत खास होता है। इस दिन सुहागिनें निर्जला व्रत रखती हैं और पति की लंबी उम्र की कामना के साथ पूजा करती हैं। करवा चौथ का व्रत करवा माता और शिव परिवार को समर्पित है। दिन भर व्रत रखने के बाद शाम को महिलाएं चांद देखकर व्रत का पारण करती हैं। इस व्रत को करने से दांपत्य जीवन में खुशियां आती हैं। साथ ही घर में समृद्धि और सौभाग्य भी बढ़ता है। कहा जाता है कि इस दिन करवा माता की पूजा के बाद मंत्र और आरती पढ़े बिना व्रत अधूरा रह जाता है, इसलिए इस दिन पूजा के दौरान विधिवत मंत्र और आरती जरूर करें। यहां करवा चौथ की आरती और मंत्र दिए जा रहे हैं, जहां से आप पूजा के दौरान आरती पढ़ सकती है…
करवा चौथ के मंत्र
श्रीगणेश का मंत्र – ॐ गणेशाय नमः
शिव का मंत्र – ॐ नमः शिवाय
पार्वतीजी का मंत्र – ॐ शिवायै नमः
स्वामी कार्तिकेय का मंत्र – ॐ षण्मुखाय नमः
चंद्रमा का पूजन मंत्र – ॐ सोमाय नमः
‘मम सुख सौभाग्य पुत्र-पौत्रादि सुस्थिर श्री प्राप्तये करक चतुर्थी व्रतमहं करिष्ये।’
‘नमस्त्यै शिवायै शर्वाण्यै सौभाग्यं संतति शुभा। प्रयच्छ भक्तियुक्तानां नारीणां हरवल्लभे।’
करवा चौथ की आरती
ओम जय करवा मैया, माता जय करवा मैया।
जो व्रत करे तुम्हारा, पार करो नइया।। ओम जय करवा मैया।
सब जग की हो माता, तुम हो रुद्राणी।
यश तुम्हारा गावत, जग के सब प्राणी।।
कार्तिक कृष्ण चतुर्थी, जो नारी व्रत करती।
दीर्घायु पति होवे , दुख सारे हरती।।
ओम जय करवा मैया, माता जय करवा मैया।
जो व्रत करे तुम्हारा, पार करो नइया।।
होए सुहागिन नारी, सुख संपत्ति पावे।
गणपति जी बड़े दयालु, विघ्न सभी नाशे।।
ओम जय करवा मैया, माता जय करवा मैया।
जो व्रत करे तुम्हारा, पार करो नइया।।
करवा मैया की आरती, व्रत कर जो गावे।
व्रत हो जाता पूरन, सब विधि सुख पावे।।
ओम जय करवा मैया, माता जय करवा मैया।
जो व्रत करे तुम्हारा, पार करो नइया।।
 

 
panchayattantra24.-मां दुर्गा ; कल यानी 15 अक्टूबर दिन रविवार से शारदीय नवरात्रि का शुभारंभ हो चुका है और इसका समापन 24 अक्टूबर को हो जाएगा। इस दौरान भक्त माता के विभिन्न रूपों की विधि विधान से पूजा करते हैं और व्रत आदि भी रखते हैं माना जाता है कि ऐसा करने से देवी कृपा बरसती है।
नवरात्रि के पावन दिनों में आप माता के प्रसिद्ध मंदिरों के दर्शन व पूजन कर देवी कृपा प्राप्त कर सकते हैं और सभी इच्छाओं को भी पूरा कर सकते हैं तो आज हम आपको शारदीय नवरात्रि पर मां दुर्गा के प्रसिद्ध मंदिरों के बारे में बता रहे हैं तो आइए जानते हैं।
मां दुर्गा के प्रसिद्ध मंदिर—
उत्तर प्रदेश के मीरजापुर में गंगा नदी के किनारे माता विंध्यवासिनी का एक पवित्र मंदिर है मान्यता है कि नवरात्रि के पावन दिनों में अगर इस मंदिर के दर्शन किए जाए तो भक्तों की हर मनोकामना पूरी हो जाती है। यह मंदिर मां विंध्यवासिनी स्वरूप को समर्पित होता है मां विंध्यवासिनी को महामाया या योगामाया मां दुर्गा का रूप माना जाता है। नवरात्रि के दिनों पर यहां भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिलती है।
नवरात्रि में माता के दर्शन के लिए शाकम्भरी देवी शक्तिपीठ भी है जो कि उत्तर प्रदेश के ​सहारनपुर जिले में बना हुआ है यह अवस्थित एक महाशक्तिपीठ है। इस पीठ को ब्रह्मपुराण में सिद्ध पीठ के नाम से भी बताया गया है। मान्यता है कि माता सती का शीश इसी क्षेत्र में गिरा था इसलिए इसकी गणना देवी के प्रसिद्ध शक्तिपीठों में होती है। यहां नवरात्रि के दिनों में भक्तों का तांता लगा रहता है इसके अलावा देवी के दर्शन पूजन से सभी मनोकामनाएं सिद्ध होती हैं।
 

 
panchayattantra24.-हिंदू धर्म में कई सारे व्रत त्योहार पड़ते हैं और सभी का अपना महत्व होता है लेकिन नवरात्रि बेहद ही खास मानी जाती है जो कि मां दुर्गा की पूजा अर्चना को समर्पित होता है। इस दौरान भक्त देवी मां को प्रसन्न करने के लिए उनकी विधिवत पूजा करते हैं और उपवास आदि भी रखते हैं नवरात्रि का व्रत नौ दिनों तक चलता है और इस दौरान माता के अलग अलग रूपों की पूजा की जाती है। इस साल शारदीय नवरात्रि 15 अक्टूबर से आरंभ हो रही है और समापन 28 अक्टूबर को हो जाएगा। ऐसे में अगर आप देवी मां को शीघ्र प्रसन्न कर उनका आशीर्वाद पाना चाहते हैं तो नवरात्रि के नौ दिनों में माता के प्रिय रंगों के वस्त्र जरूर धारण करें। माना जाता है कि ऐसा करने से देवी मां प्रसन्न होकर सुख समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करती है, तो आइए जानते हैं।
 नवरात्रि में पहनें इन रंगों के वस्त्र— नवरात्रि का पहला दिन 15 अक्टूबर को पड़ रहा है जो कि मां शैलपुत्री की पूजा को समर्पित होता है। इस दिन माता को प्रसन्न करने के लिए पीले रंग के वस्त्र धारण करें। ऐसा करने से जीवन में खुशहाली आती है। इसके अलावा नवरात्रि के दूसरा दिन ब्रह्मचारिणी माता की पूजा को समर्पित होता है ऐसे में आप इस दिन हरे रंग के वस्त्र धारण करें। नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा का होता है ऐसे में इस दिन ग्रे कलर के वस्त्र धारण करने से माता प्रसन्न होती है। वही चौथे दिन मां कुष्मांडा की पूजा होती है इस दिन आप नारंगी रंग के वस्त्र धारण करें।
नवरात्रि का पांचवा स्कंदमाता को समर्पित होता है इस दिन सफेद रंग धारण कर माता की पूजा करें। इसके अलावा छठा दिन कात्यायनी का है इस दिन लाल रंग के वस्त्र धारण करना उत्तम होगा। सातवां दिन कालरात्रि की पूजा के लिए खास है इस दिन नीले रंग के वस्त्र धारण करें। नवरात्रि के आठवे दिन महागौरी की पूजा में गुलाबी वस्त्र धारण करें। नौवें दिन सिद्धीदात्री की पूजा को समर्पित होता है इस दिन पर्पल कलर के वस्त्र धारण करें।