Subscribe to Updates
Get the latest creative news from FooBar about art, design and business.
Browsing: संपादकीय


ममता को नीति आयोग की रीति-नीति से शिकायत हो, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वह उसकी बैठकों में शामिल होने से इनकार करें। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने नीति आयोग की आगामी बैठक में शामिल होने से इनकार करके यही साबित किया कि वह अभी भी चुनाव के दौर वाली मानसिकता से मुक्त नहीं हो सकी हैं। शायद उन्हें इसकी परवाह नहीं कि प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले नीति आयोग की बैठक का बहिष्कार करके वह पश्चिम बंगाल के हितों की ही अनदेखी करेंगी। यह वही ममता बनर्जी हैं, जो एक समय अपने नेतृत्व वाले राजनीतिक मोर्चे का नाम संघीय मोर्चा रख रही थीं, ताकि राज्यों के अधिकारों को प्राथमिकता देती हुई दिख सकें, लेकिन आज वह संघीय ढांचे की भावना के खिलाफ खड़ी होना पसंद कर रही हैं। ऐसा लगता है कि उन्हें जनादेश को स्वीकार करने में मुश्किल हो रही है। वह उन चंद मुख्यमंत्रियों में शामिल थीं, जिन्होंने मोदी सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने से इनकार किया। यह भी ध्यान रहे कि वह चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी को न केवल प्रधानमंत्री मानने से इनकार कर रही थीं, बल्कि उनसे फोन पर बात करना भी जरूरी नहीं समझ रही थीं। इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि वह कई केंद्रीय योजनाओं को लागू करने से भी इनकार करती रही हैं। इनमें आयुष्मान भारत योजना भी है और देश के पिछड़े जिलों के विकास की योजना भी।
कोई हैरानी की बात नहीं कि राज्यों में भी कांग्रेस के भीतर उठापटक तेज होती दिख रही है। लोकसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद जब यह उम्मीद की जा रही थी कि कांग्रेस अपनी रीति-नीति में व्यापक बदलाव लाएगी, तब वह दिशाहीनता से ग्रस्त दिख रही है। किसी को नहीं पता कि आम चुनाव में पार्टी की करारी पराजय के बाद राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद छोड़ने की जो पेशकश की थी, उसका क्या हुआ? इस बारे में भी कोई खबर नहीं कि एक और करारी हार पर कोई आत्ममंथन किया जा रहा है या नहीं? चूंकि यह पता नहीं कि कांग्रेस में शीर्ष स्तर पर क्या हो रहा है, इसलिए इस पर हैरानी नहीं कि राज्यों में भी उठापटक तेज होती दिख रही है। तेलंगाना में कांग्रेस के 18 में से 12 विधायक सत्ताधारी तेलंगाना राष्ट्र समिति में शामिल होने को तैयार हैं। पता नहीं कांग्रेस से मुक्त होने को तैयार इन विधायकों की यह इच्छा पूरी होगी या नहीं कि राज्य कांग्रेस का विलय तेलंगाना राष्ट्र समिति में हो जाए, लेकिन अगर वे पार्टी छोड़ देते हैं तो एक और राज्य में कांग्रेस अस्तित्व के संकट से जूझती दिखाई देगी।
लोक-लुभावन राजनीति किस तरह आर्थिक नियम-कानूनों को ताक पर रखकर चलती है, इसका ही उदाहरण राहुल गांधी की यह घोषणा है कि अगर कांग्रेस सत्ता में आई तो वह देश के सबसे गरीब पांच करोड़ परिवारों को 72,000 रुपए सालाना देगी। इसका मतलब है छह हजार रुपए प्रतिमाह। लगता है कि राहुल गांधी गरीब किसानों को छह हजार रुपए सालाना देने की मोदी सरकार की योजना के जवाब में अपनी यह योजना लाए हैं। उन्होंने जिस तरह यह हिसाब दिया कि इससे करीब 25 करोड़ लोग लाभान्वित होंगे, उससे यही पता चलता है कि वह यह मानकर चल रहे हैं कि गरीब परिवारों की औसतन सदस्य संख्या पांच है।
भले ही कांग्रेस अध्यक्ष ने न्यूनतम आय योजना को दुनिया की ऐतिहासिक योजना करार दिया हो, लेकिन देश्ा यह जानना चाहेगा कि आखिर वह इस आंकड़े तक कैसे पहुंचे कि देश्ा में सबसे गरीब परिवारों की संख्या पांच करोड़ है? एक सवाल यह भी है कि यह कैसे जाना जाएगा कि किसी गरीब परिवार के मुखिया की मौजूदा मासिक आय कितनी है, क्योंकि राहुल गांधी के अनुसार, गरीब परिवार की आय 12 हजार रुपए महीने से जितनी कम होगी, उतनी ही राशि उसे और दी जाएगी। समझना कठिन है कि कांग्रेस किस तरह एक ओर गरीब परिवारों को सालाना 72 हजार रुपए भी देना चाहती है और दूसरी ओर ऐसे परिवारों की हर महीने की आय 12 हजार रुपए भी सुनिश्चित करना चाहती है? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि आखिर पांच करोड़ गरीब परिवारों को सालाना 72 हजार रुपए देने के लिए प्रति वर्ष तीन लाख साठ हजार करोड़ रुपए की भारीभरकम धनराशि कहां से जुटाई जाएगी? क्या कांग्रेस के सत्ता में आते ही पैसे पेड़ पर उगने लगेंगे या फिर शिक्षा, स्वास्थ्य, रक्षा आदि के बजट में कटौती कर दी जाएगी ।
पता नहीं राहुल गांधी की न्यूनतम आय योजना की घोषणा सुनने वाले संवाददाता हैरान हुए या नहीं, लेकिन आर्थिक मामलों के जानकार अवश्य हैरान हुए होंगे। अगर इस योजना पर सचमुच तीन-चार महीने से काम चल रहा था और इसका आकलन कर लिया गया है कि देश के पास इतना पैसा है कि पांच करोड़ गरीब परिवारों को सालाना 72 हजार रुपए आसानी से दिए जा सकते हैं, तो क्या यह अच्छा नहीं होता कि यह स्पष्ट कर दिया जाता कि राजकोषीय घाटे और मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखते हुए सालाना तीन लाख साठ हजार करोड़ रुपए का प्रबंध कैसे कर लिया जाएगा? जब तक यह स्पष्टता सामने नहीं आती, तब तक कांग्रेस अध्यक्ष की नई-अनोखी घोषणा पर केवल परेशान ही हुआ जा सकता है।
गरीबी हटाने का वादा अच्छी बात है, लेकिन किसी भी दल को देश की अर्थव्यवस्था का बेड़ा गर्क करने की इजाजत नहीं मिल सकती। समाजवादी सोच के तहत नोट छापकर गरीबों को बांटने की योजना सुनने में आकर्षक लग सकती है, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि इस तरह की लोक-लुभावन योजनाओं से गरीबी दूर होने के बजाय और बढ़ती ही है। इतना ही नहीं, ऐसी योजनाओं पर अमल करने वाले देश आर्थिक रूप से बर्बाद भी हो जाते हैं।
यह एक और बड़ा आघात ही है कि पुलवामा में भीषण आतंकी हमले में शहीद सीआरपीएफ जवानों की चिता की आग बुझने भी न पाई थी कि आतंकियों से लोहा लेते हुए पांच और जवानों के बलिदान होने की खबर आ गई। इनमें एक मेजर भी हैं। पुलवामा हमले की साजिश रचने वाले आतंकियों को पुलवामा में ही मार गिराने के अभियान में ब्रिगेडियर, लेफ्टिनेंट कर्नल, मेजर, कैप्टन और डीआईजी समेत सात जवान घायल भी हुए हैं। इस अभियान में हताहत अधिकारियों और जवानों की यह संख्या यही बताती है कि कश्मीर में खतरा किस तरह बढ़ता जा रहा है।
नि:संदेह यह सेना, सुरक्षा बलों और जम्मू-कश्मीर पुलिस के अदम्य साहस और संकल्प का प्रमाण है कि उन्होंने मिलकर पुलवामा हमले की साजिश रचने वाले आतंकियों को सौ घंटे के अंदर खोजकर मौत के मुंह में धकेल दिया, लेकिन उनका दमन करने के क्रम में उन्हें जो क्षति उठानी पड़ी, वह चिंता का विषय है। यह सही है कि घिनौनी नफरत से भरे और मरने-मारने पर आमादा आतंकियों के सफाए के हर अभियान में जोखिम होता है, लेकिन आखिर कश्मीर में ऐसा कब तक चलता रहेगा? जनता के मन में यह सवाल उठ रहा है कि कश्मीर में हमारे जवान आखिर कब तक इसी तरह बलिदान देते रहेंगे? यह सवाल इसलिए गंभीर हो गया है, क्योंकि कश्मीर में आतंकियों की विषबेल खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। कश्मीर एक संवेदनशील क्षेत्र है, जहां देश भर के जवान तैनात हैं। जब वे यूं वीरगति को प्राप्त होते हैं तो इससे पूरे देश का वातावरण प्रभावित होता है। जवानों के परिजन कश्मीर में तैनात अपने लोगों की कुशल-क्षेम के लिए सदैव चिंतित बने रहें, यह कोई अच्छी स्थिति नहीं। यह स्थिति आम जनता के मनोबल पर असर डालती है।
देश की जनता इसके प्रति तो सुनिश्चित है कि सेना और सुरक्षा बलों के आगे कश्मीर में सिर उठाने वाले आतंकियों की खैर नहीं, लेकिन वह यह जानने के लिए अधीर हो रही है कि आखिर देश के इस हिस्से में कब अमन-चैन कायम होगा? इस सवाल का जवाब देश के समस्त राजनीतिक नेतृत्व को देना होगा। यह अच्छा नहीं कि कश्मीर को शांत करने की कोई पहल होती नहीं दिख रही है। घाटी में एक ओर जहां अलगाव और आतंक के समर्थकों का सख्ती से दमन करने की जरूरत है, वहीं देशभक्त कश्मीरियों को साथ लेने की भी उतनी ही आवश्यकता है। आखिर इस दिशा में कोई ठोस पहल कब होगी? क्या यह सही समय नहीं जब कश्मीर में अलगाव की मानसिकता का पोषण करने वाली धारा 370 खत्म की जाए और वहां के लोगों को मुख्यधारा में लाने के लिए हरसंभव उपाय किए जाएं? वास्तव में जितनी जरूरत अमन-चैन पसंद लोगों को हर तरह से आश्वस्त करने की है, उतनी ही इसकी भी कि आतंकियों के बचाव में पत्थरबाजी करने वालों को ऐसा सबक सिखाया जाए कि वे फिर कभी पत्थर उठाने की जुर्रत न कर सकें। सहने की एक सीमा होती है। देश का राजनीतिक नेतृत्व यह समझे तो बेहतर कि कश्मीर के हालात से देश व्यथित है और उसकी व्यथा दूर करने के लिए ठोस कदम उठाना उसकी जिम्मेदारी है।
प्रत्यर्पण की प्रक्रिया आसान बनाने हेतु अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आवाज उठानी होगी, ताकि ऐसा कोई कानून बने जिससे वांछित तत्व बहानेबाजी कर बचने न पाएं।
भारत में घपला-घोटाला या अन्य कोई अवैध-अनुचित काम कर विदेश में छिपने वालों को स्वदेश लाने के लिए कूटनीतिक गतिविधियों को गति देना समय की मांग है, लेकिन इसी के साथ उन उपायों पर भी गौर किया जाना चाहिए, जिससे प्रत्यर्पण में कम से कम समय लगे। यह इसलिए आवश्यक है, क्योंकि अधिकतर मामलों में विदेश में जा छिपे लोगों को भारत लाने में कहीं अधिक समय लग जाता है। नि:संदेह यह राहतकारी है कि ब्रिटेन के गृह मंत्री ने विजय माल्या को भारत प्रत्यर्पित करने की अनुमति दे दी, लेकिन अभी यह तय नहीं कि वह भारत के हाथ कब लगेगा। विजय माल्या ब्रिटेन के गृहमंत्री के आदेश के खिलाफ वहां के उच्च न्यायालय में अपील करेगा। यदि उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के आदेश को सही पाया, तब जाकर माल्या का भारत आना सुनिश्चित हो सकेगा। हालांकि इसके आसार न के बराबर हैं कि उच्च न्यायालय निचली अदालत के आदेश में कोई हेरफेर करेगा, लेकिन अभी यह नहीं कहा जा सकता कि वह अपना फैसला कब सुनाएगा? देखना यह भी होगा कि ब्रिटिश उच्च न्यायालय के आदेश के बाद विजय माल्या भारत आने से बचने के लिए कोई जतन करता है या नहीं? ध्यान रहे कि वह भारत आने से बचने के लिए किस्म-किस्म के बहाने गढ़ता रहा है। यही काम पंजाब नेशनल बैंक में घोटाले के आरोपी नीरव मोदी और मेहुल चोकसी भी कर रहे हैं। जहां नीरव मोदी यह राग अलाप रहा कि उसे भारत में खलनायक की तरह देखा जा रहा, वहीं मेहुल चोकसी यह बहाना पेश कर रहा कि वह एंटीगुआ से भारत तक का लंबा हवाई सफर नहीं कर सकता। विडंबना यह है कि कई बार इस तरह की बहानेबाजी को संबंधित देशों की अदालतें महत्व देने लगती हैं।
यह एक तथ्य है कि ब्रिटेन की अदालतों ने भारत में वांछित कई तत्वों को इस आधार पर प्रत्यर्पित करने से मना कर दिया कि यहां की जेलों की दशा अच्छी नहीं है। एक ओर ब्रिटेन जैसे देश हैं, जहां का प्रत्यर्पण संबंधी तंत्र कुछ ज्यादा ही जटिल है, वहीं दूसरी ओर सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश हैं, जो वांछित शख्स की पहचान स्थापित होने और उसकी कारगुजारी का विवरण मिलते ही उसे प्रत्यर्पित कर देते हैं। इसके अतिरिक्त कुछ ऐसे भी देश हैं, जो प्रत्यर्पण के मामले में एक तरह से मनमाना रवैया प्रदर्शित करते हैं। पुरुलिया कांड में वांछित किम डेवी का पुर्तगाल से प्रत्यर्पण नहीं हो पा रहा है तो इसीलिए, क्योंकि वहां की सरकार भारत की चिंता समझने के बजाय अपने आपराधिक अतीत और छवि वाले नागरिक की हिफाजत को ज्यादा अहमियत दे रही है। यह सही है कि पुर्तगाल सरीखे योरपीय देश मानवाधिकारों को कहीं अधिक अहमियत देते हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वे इसके नाम पर अपराधियों का बचाव करें। जरूरी केवल यह नहीं है कि पुर्तगाल सरीखे देशों के प्रति सख्त कूटनीति का परिचय दिया जाए, बल्कि यह भी है कि प्रत्यर्पण की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आवाज भी उठाई जाए, ताकि ऐसा कोई कानून बन सके, जिससे वांछित तत्व बहानेबाजी कर प्रत्यर्पण से बचने न पाएं।
अंतरिम बजट में सरकार ने सभी वर्गों को राहत देते हुए खजाने का मुंह तो खोला, लेकिन राजकोषीय घाटे की चिंता भी की।
आम चुनाव का सामना करने जा रही सरकार से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह अंतरिम बजट में चुनाव की चिंता न करे। इस पर हैरानी नहीं कि कार्यवाहक वित्त मंत्री पीयूष गोयल की ओर से पेश अंतरिम बजट के जरिए मोदी सरकार ने समाज के सभी तबकों और खासकर किसानों एवं मजदूरों के साथ वेतनभोगी मध्य वर्ग को खास तौर पर राहत देने की कोशिश की है। जहां दो हेक्टेयर तक खेती की जमीन वाले किसानों को छह हजार रुपए सालाना देने की घोषणा की गई है, वहीं असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए तीन हजार रुपए की मासिक पेंशन देने की भी योजना पेश की गई है। इसके अतिरिक्त पांच लाख रुपए तक की कर योग्य आय वाले व्यक्तिगत करदाताओं से आयकर न लेने की व्यवस्था भी की गई है। ये तीनों उल्लेखनीय कदम संबंधित तबकों को राहत देने वाले हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या इससे देश का मूड और माहौल बदलेगा?
यह सवाल इसलिए, क्योंकि किसानों और मजदूरों के संदर्भ में जो बड़ी घोषणाएं की गई हैं, उनके अमल के बाद ही यह पता चलेगा कि मुश्किल हालात से दो-चार हो रहे ये दोनों तबके कितने संतुष्ट हुए? चूंकि किसानों को न्यूनतम आमदनी वाली योजना दिसंबर 2018 से ही लागू मानी जाएगी, इसलिए आम चुनाव तक उन्हें पहली किश्त मिल सकती है। मगर असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को हाल-फिलहाल कोई लाभ मिलने की सूरत नहीं दिख रही है। असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की पेंशन योजना के साथ ही छोटे एवं सीमांत किसानों के खाते में सीधे धन पहुंचाने की योजना पर अमल आसान काम नहीं, क्योंकि इसका आकलन करने में कठिनाई हो सकती है कि किस किसान के नाम वास्तव में कितनी जमीन है या फिर किस मजदूर की आय 15 हजार रुपए महीने से कम है?
यह सही है कि सरकार सीधे धन हस्तांतरण की तकनीक से लैस है और कई कल्याणकारी योजनाओं में उसका सफल प्रदर्शन भी हो चुका है, लेकिन इसका अंदेशा है कि अंतरिम बजट में घोषित कल्याणकारी योजनाओं के जरिए उपलब्ध कराई जाने वाली मदद अपेक्षाओं के अनुरूप न साबित हो। पता नहीं किसानों और मजदूरों को राहत देने वाली योजनाओं में देरी के कोई दुष्परिणाम सामने आएंगे या नहीं, लेकिन इससे इंकार नहीं कि इन तबकों को प्राथमिकता के आधार पर राहत देने की दरकार थी। एक तरह से यह सरकार की नैतिक जिम्मेदारी थी कि वह इन वर्गों और साथ ही मध्य वर्ग की सुध ले।
स्पष्ट है कि ऐसे किसी नतीजे पर पहुंचना सही नहीं कि चुनाव सामने देखकर सरकार ने लोकलुभावन योजनाओं की झड़ी लगा दी। ऐसा इसलिए भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि खजाने का मुंह खोलने के बावजूद सरकार ने राजकोषीय घाटे की चिंता की है। शायद यही कारण है कि वैसी कोई घोषणा नहीं की गई जिसके लिए दबाव बनाया जा रहा था और इस क्रम में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने यहां तक कह दिया था कि उन्होंने तो हर गरीब के खाते में पैसा पहुंचाने का फैसला कर लिया है। कोई भी सरकार हो, उसे चुनाव की चिंता के साथ देश की आर्थिक सेहत का भी ध्यान रखना चाहिए।
यह राहतकारी है कि एनआईए ने आतंकी हमलों की एक बड़ी साजिश का पर्दाफाश कर दिया, लेकिन केवल इतना ही पर्याप्त नहीं।
राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआईए ने एक खतरनाक आतंकी गुट का पर्दाफाश करके देश को एक बड़े खतरे से बचाने का काम तो किया ही, यह भी जाहिर किया कि आतंकवाद का खतरा अभी टला नहीं और उससे सतर्क रहने की आवश्यकता पहले जैसी ही बनी हुई है। एनआईए की मानें तो हरकत उल हर्ब ए इस्लाम नाम वाले इस आतंकी गुट का इरादा कुछ नेताओं के साथ देश के महत्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बनाने का था। चिंता की बात केवल यह नहीं कि यह आतंकी गुट बड़ा हमला करने की ताक में था, बल्कि यह भी है कि उसने हथियारों और विस्फोटकों के साथ एक देसी राकेट लॉन्चर भी जुटा लिया था। इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि वह आत्मघाती हमलों की भी तैयारी कर रहा था।
एनआईए ने तथाकथित हरकत उल हर्ब ए इस्लाम के जिन दस लोगों को गिरफ्तार किया, वे मध्यमवर्गीय परिवारों से हैं। इनमें कुछ पढ़े-लिखे भी हैं और एक तो इंजीनियरिंग का छात्र बताया जा रहा है। इससे यह धारणा एक बार फिर खारिज हो जाती है कि सिर्फ गरीब और अशिक्षित युवा ही आसानी से गुमराह होकर आतंक की राह पर चले जाते हैं। स्पष्ट है कि उन कारणों की न केवल पहचान करनी होगी, बल्कि उनका निवारण भी करना होगा जिसके चलते पढ़े-लिखे और आर्थिक तौर पर समर्थ युवा आतंकवाद की राह पर जा रहे हैं। इसी के साथ इस सवाल का भी जवाब खोजना होगा कि आतंकवाद की राह पकड़ने वाले मजहब की आड़ लेने में कैसे सफल हो जा रहे हैं? आखिर हरकत उल हर्ब ए इस्लाम नाम से आतंकी गुट बनाने का क्या मतलब?
एनआईए की गिरफ्त में आए तत्वों ने अपने आतंकी गुट का नाम इस्लाम से जोड़ने की जो हिमाकत की, उस पर मुस्लिम समाज के नेतृत्व को यह विचार करना चाहिए कि क्या उसे उसी तरह सक्रियता दिखाने की फिर जरूरत है, जैसी उसने कुछ समय पहले आईएस के खिलाफ फतवा जारी कर दिखाई थी? जो भी हो, इससे खराब बात और कोई नहीं हो सकती कि जब दुनिया का सबसे खूंखार आतंकी संगठन आईएस अपने गढ़ सीरिया में दम तोड़ रहा है, तब भारत में कुछ गुमराह लोग उसके जैसी हरकतों को अंजाम देने की खतरनाक सोच से ग्रस्त हो रहे हैं। आखिर आईएस जैसे बर्बर आतंकी संगठन से कोई किसी तरह की प्रेरणा कैसे ले सकता है? यह राहतकारी है कि एनआईए ने आतंक की एक बड़ी साजिश का पर्दाफाश कर दिया, लेकिन केवल इतना ही पर्याप्त नहीं है। उसके लिए यह भी जरूरी है कि वह गिरफ्तार तत्वों के खिलाफ सारे सुबूत जुटाकर उन्हें सजा दिलाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़े, ताकि किसी तरह के संदेह और सवालों की गुंजाइश न रहे।
यह इसलिए आवश्यक है, क्योंकि हमने देखा है कि कई बार कुछ लोग आतंकवाद के मसले पर भी राजनीति करने से बाज नहीं आते। आखिर कौन नहीं जानता कि देश भर में तमाम हमलों को अंजाम देने वाले यासीन भटकल के आंतकी गुट इंडियन मुजाहिदीन के बारे में कुछ नेताओं का यह ख्याल था कि यह नाम सरकारी एजेंसियों के दिमाग की उपज है।