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आतंक की राह पर चलते रहने को आमादा पाकिस्तान यही जाहिर कर रहा है कि वह भारत समेत दुनिया के लिए सिरदर्द बना रहेगा ।
सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत का यह कथन पाकिस्तान के आतंकी चरित्र को ही बयान करता है कि बालाकोट में आतंकियों के ठिकाने को फिर से सक्रिय कर दिया गया है। यह वही आतंकी ठिकाना है, जिसे पुलवामा हमले के बाद भारतीय वायुसेना ने हवाई हमले के जरिए ध्वस्त किया था। माना जाता था कि इस हवाई हमले के बाद पाकिस्तान के होश ठिकाने आ जाएंगे, लेकिन अब पता चल रहा है कि ऐसा नहीं हुआ। इसे देखते हुए यह सर्वथा उचित है कि सेना प्रमुख ने बिना किसी लाग लपेट कहा कि अगली बार बालाकोट से भी बड़ी कार्रवाई होगी। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि पाकिस्तान से कम से कम पांच सौ आतंकी भारत में घुसने की फिराक में हैं। इसका मतलब है कि पाकिस्तान आसानी से मानने वाला नहीं है। कश्मीर पर उसके गर्जन-तर्जन से यह जाहिर भी हो रहा है। वह इस तरह बौराया हुआ है जैसे जम्मू-कश्मीर पर वही शासन कर रहा हो। कश्मीर पर पाकिस्तान की बौखलाहट यही बताती है कि कोई देश किस तरह दिवास्वप्न से ग्रस्त होकर खुद को बर्बादी के रास्ते पर ले जा सकता है। उसे सिर्फ यही मुगालता नहीं था कि मुस्लिम जगत की ठेकेदारी उसके पास है, बल्कि वह इस सनक से भी ग्रस्त था कि एक दिन कश्मीर उसका होगा। वह इस सनक का शिकार तब है, जब उसकी अर्थव्यवस्था रसातल में है और उसे एक तरह से भीख मांग गुजारा करना पड़ रहा है।
हालांकि पाकिस्तान के आम लोग यह जान-समझ रहे हैं कि विश्वव्यापी बदनामी के कारण दुनिया उस पर ध्यान नहीं दे रही है, लेकिन पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान और खासकर उसकी सेना को शायद इसकी परवाह नहीं। हैरानी इस पर है कि क्रिकेटर से नेता बने इमरान खान सच को स्वीकार करने के बजाय अपनी आतंकपरस्त सेना की कठपुतली बनना पसंद कर रहे हैं। पाकिस्तान एक ओर खुद को आतंक पीड़ित बताता है और दूसरी ओर किस्म-किस्म के आतंकियों को पालने-पोसने का भी काम करता है। उसकी इसी दुष्प्रवृत्ति को पिछले दिनों ह्यूस्टन में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और साथ ही एक तरह से विश्व समुदाय के समक्ष इस सवाल के जरिए बयान किया कि आखिर 9/11 और 26/11 के आतंकी हमलों के साजिशकर्ता कहां पाए गए? आतंक के रास्ते पर चलते रहने पर आमादा पाकिस्तान यही जाहिर कर रहा है कि वह अभी भारत समेत दुनिया के लिए सिरदर्द बना रहेगा। हालांकि दुनिया पाकिस्तान का रोना-धोना सुनना पसंद नहीं कर रही है, लेकिन उसकी हरकतों को देखते हुए भारत को उससे नए सिरे से निपटने की तैयारी रखनी चाहिए। यह तैयारी निर्णायक ही होनी चाहिए।

जम्मू-कश्मीर, लद्दाख में नई शुरुआत होने जा रही है। ऐसे में समय की मांग थी कि प्रधानमंत्री देश के लोगों से सीधे अपनी बात कहें।
जैसी कि उम्मीद थी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का राष्ट्र के नाम संबोधन जम्मू-कश्मीर को लेकर किए गए ऐतिहासिक एवं निर्णायक बदलावों पर ही केंद्रित रहा । चूंकि अनुच्छेद 370 और 35ए हटाने के बाद जम्मू-कश्मीर और साथ ही लद्दाख में एक नई शुरुआत होने जा रही है, इसलिए यह समय की मांग थी किखुद प्रधानमंत्री जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के साथ-साथ देश के लोगों से सीधे अपनी बात कहें। यह अच्छा हुआ कि उन्होंने वक्त की यह मांग पूरी की। राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में उन्होंने यह सही कहा कि एक सपने को पूरा करके एक नई शुरुआत होने जा रही है। इस क्रम में उन्होंने यह रेखांकित कर बिल्कुल सही किया कि यह प्रश्न दशकों से अनुत्तरित ही था कि आखिर अनुच्छेद 370 से जम्मू, कश्मीर और लद्दाख के लोगों को क्या लाभ मिल रहा था? इस सवाल का जवाब कम से कम उन्हें अवश्य देना चाहिए, जो अनुच्छेद 370 हटाने और राज्य के पुनर्गठन का विरोध कर रहे हैं? उन्हें बताना चाहिए कि वे भेदभाव भरे और अलगाव को बल देने वाले उस प्रावधान की वकालत क्यों कर रहे हैं, जो इस राज्य के दलितों और आदिवासियों के अधिकारों पर कुठाराघात करने के साथ ही राज्य के बाहर के लोगों से विवाह करने वाली युवतियों के अधिकारों का हनन करता था? ऐसे लोगों को प्रधानमंत्री की ओर से इंगित की गई उस विसंगति पर भी कुछ कहना चाहिए, जिसके चलते राज्य के तमाम लोगों को विभिन्न चुनावों में वोट देने का अधिकार नहीं था।
प्रधानमंत्री ने देशवासियों को बल और संबल देने वाले अपने संबोधन में यह स्पष्ट करके तमाम अंदेशों को खत्म करने का ही काम किया कि जम्मू-कश्मीर को केवल कुछ कालखंड के लिए केंद्र के अधीन रखने का फैसला वहां के हालात सुधारने, भ्रष्टाचार एवं आतंकवाद पर लगाम लगाने, विकास और रोजगार निर्माण को गति देने के इरादे से किया गया है। उन्होंने यह जो भरोसा जताया कि जम्मू-कश्मीर को केंद्रशासित प्रदेश बनाए रखने की जरूरत लंबे समय तक नहीं पड़ेगी, उसे पूरा करने में राज्य और खासकर घाटी के लोगों की महती भूमिका होगी। उम्मीद है कि वे अपनी इस भूमिका के महत्व को समझेंगे। वे इसकी अनदेखी नहीं कर सकते कि प्रधानमंत्री ने साफ तौर पर यह भी कहा है कि वह अनुच्छेद 370 हटाने के फैसले से असहमत लोगों के विचारों को सुनने-समझने को तैयार हैं। चूंकि प्रधानमंत्री ने जम्मू-कश्मीर के हालात ठीक करने में देश के लोगों से भी सहयोग की अपेक्षा की, इसलिए देशवासियों की ओर से भी समवेत स्वर में यही संदेश उभरना चाहिए कि कश्मीर के साथ कश्मीरी भी हमारे हैं।

 
ममता को नीति आयोग की रीति-नीति से शिकायत हो, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वह उसकी बैठकों में शामिल होने से इनकार करें।  पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने नीति आयोग की आगामी बैठक में शामिल होने से इनकार करके यही साबित किया कि वह अभी भी चुनाव के दौर वाली मानसिकता से मुक्त नहीं हो सकी हैं। शायद उन्हें इसकी परवाह नहीं कि प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले नीति आयोग की बैठक का बहिष्कार करके वह पश्चिम बंगाल के हितों की ही अनदेखी करेंगी। यह वही ममता बनर्जी हैं, जो एक समय अपने नेतृत्व वाले राजनीतिक मोर्चे का नाम संघीय मोर्चा रख रही थीं, ताकि राज्यों के अधिकारों को प्राथमिकता देती हुई दिख सकें, लेकिन आज वह संघीय ढांचे की भावना के खिलाफ खड़ी होना पसंद कर रही हैं। ऐसा लगता है कि उन्हें जनादेश को स्वीकार करने में मुश्किल हो रही है। वह उन चंद मुख्यमंत्रियों में शामिल थीं, जिन्होंने मोदी सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने से इनकार किया। यह भी ध्यान रहे कि वह चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी को न केवल प्रधानमंत्री मानने से इनकार कर रही थीं, बल्कि उनसे फोन पर बात करना भी जरूरी नहीं समझ रही थीं। इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि वह कई केंद्रीय योजनाओं को लागू करने से भी इनकार करती रही हैं। इनमें आयुष्मान भारत योजना भी है और देश के पिछड़े जिलों के विकास की योजना भी।
राजनीतिक खुन्न्स में जनकल्याण और विकास की केंद्रीय योजनाओं से अपने राज्य को वंचित रखना सस्ती राजनीति के अलावा और कुछ नहीं। यह एक तरह की जनविरोधी राजनीति भी है। मुश्किल यह है कि ऐसी सस्ती और जनविरोधी राजनीति का परिचय अन्य अनेक दल भी देते रहते हैं। यह किसी से छिपा नहीं कि बीते दिनों द्रमुक नेताओं ने हिंदी थोपे जाने का हल्ला मचाकर किस तरह सस्ती राजनीति का प्रदर्शन किया। हिंदी के नाम पर द्रमुक और कुछ अन्य दलों के नेता किस तरह जनता को गुमराह कर रहे थे, इसका पता इससे चलता है कि तमिलनाडु उन राज्यों में प्रमुख है, जहां हिंदी को पठन-पाठन का हिस्सा बनाया गया है। बहुत दिन नहीं हुए, जब आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने सीबीआई को राज्य के मामलों की जांच करने की इजाजत देने से इनकार कर दिया था। आंध्र प्रदेश के बाद पश्चिम बंगाल ऐसा करने वाला दूसरा राज्य बना था। आखिर ऐसे मनमाने फैसले लेने वाले नेता किस अधिकार से संघीय ढांचे को मजबूती देने की जरूरत जता सकते हैं? पता नहीं ममता बनर्जी चंद्रबाबू नायडू के राजनीतिक पराभव से कोई सीख लेंगी या नहीं, लेकिन किसी भी मुख्यमंत्री को यह शोभा नहीं देता कि वह संकीर्ण राजनीतिक हितों को इतनी अहमियत दे कि राज्य के हित पीछे छूटते हुए दिखें। लोकसभा चुनावों के समय राहुल गांधी की तरह नीति आयोग को खत्म करने का वादा कर रहीं ममता बनर्जी को इस आयोग की रीति-नीति से शिकायत हो सकती है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वह उसकी बैठकों में शामिल होने से इनकार करें। नीति आयोग को निष्प्रभावी संस्था बताते हुए उन्होंने योजना आयोग को बहाल करने की मांग की है। यह तय है कि ऐसी मांग करते समय वह इससे भली तरह परिचित होंगी कि ऐसा नहीं होने जा रहा है।

 
 
कोई हैरानी की बात नहीं कि राज्यों में भी कांग्रेस के भीतर उठापटक तेज होती दिख रही है। लोकसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद जब यह उम्मीद की जा रही थी कि कांग्रेस अपनी रीति-नीति में व्यापक बदलाव लाएगी, तब वह दिशाहीनता से ग्रस्त दिख रही है। किसी को नहीं पता कि आम चुनाव में पार्टी की करारी पराजय के बाद राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद छोड़ने की जो पेशकश की थी, उसका क्या हुआ? इस बारे में भी कोई खबर नहीं कि एक और करारी हार पर कोई आत्ममंथन किया जा रहा है या नहीं? चूंकि यह पता नहीं कि कांग्रेस में शीर्ष स्तर पर क्या हो रहा है, इसलिए इस पर हैरानी नहीं कि राज्यों में भी उठापटक तेज होती दिख रही है। तेलंगाना में कांग्रेस के 18 में से 12 विधायक सत्ताधारी तेलंगाना राष्ट्र समिति में शामिल होने को तैयार हैं। पता नहीं कांग्रेस से मुक्त होने को तैयार इन विधायकों की यह इच्छा पूरी होगी या नहीं कि राज्य कांग्रेस का विलय तेलंगाना राष्ट्र समिति में हो जाए, लेकिन अगर वे पार्टी छोड़ देते हैं तो एक और राज्य में कांग्रेस अस्तित्व के संकट से जूझती दिखाई देगी।
कांग्रेस के लिए यह भी शुभ संकेत नहीं कि पंजाब में मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और उनके बड़बोले मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू के बीच तनातनी बढ़ती जा रही है। यदि यह तनातनी और अधिक बढ़ी तो इसका असर कांग्रेस की एकजुटता और साथ ही उसकी छवि पर भी पड़ेगा। पार्टी नेतृत्व को इसकी चिंता करनी चाहिए कि पंजाब में कांग्रेस आपसी कलह का शिकार न होने पाए।
कांग्रेस नेतृत्व को यह समझना होगा कि अगर मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह क्रिकेटर से नेता बने नवजोत सिंह सिद्धू के रुख-रवैए से नाखुश हैं तो इसके लिए उन्हें दोष नहीं दिया जा सकता। नवजोत सिद्धू एक अरसे से यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि उन्हें अमरिंदर सिंह की परवाह नहीं है। भले ही नवजोत सिद्धू यह कह रहे हों कि उन्हें हल्के में लिया जा रहा है, लेकिन सच यही है कि वह खुद मुख्यमंत्री को यथोचित महत्व देने को तैयार नहीं दिख रहे हैं। क्या ऐसा इसलिए है, क्योंकि कांग्रेस नेतृत्व उनकी पीठ पर हाथ रखे हुए है?
सच्चाई जो भी हो, इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि पंजाब के साथ-साथ अन्य अनेक राज्यों में भी कांग्रेस गुटबाजी और दिशाहीनता से ग्रस्त है। राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच सब कुछ सही नहीं दिख रहा है। जैसे यह नहीं पता कि राहुल गांधी पार्टी अध्यक्ष बने रहेंगे या नहीं, वैसे ही इस बारे में भी संशय ही अधिक है कि विभिन्न् राज्यों के पार्टी अध्यक्ष अपने-अपने पद पर बने रहेंगे या नहीं? सबसे खराब बात यह है कि कांग्रेस नेतृत्व और खासकर गांधी परिवार की ओर से ऐसे संकेत दिए जा रहे हैं, जैसे लोकसभा चुनावों में पराजय के लिए उसके अलावा अन्य सब जिम्मेदार हैं। कहीं राज्यों के नेतृत्व पर दोष मढ़ा जा रहा है तो कहीं सहयोगी दलों पर। इसके अतिरिक्त यह भी प्रतीति कराई जा रही है कि भाजपा गलत तौर-तरीके अपनाकर चुनाव जीत गई। इस सबसे तो यही लगता है कि कांग्रेस नेतृत्व हार के मूल कारणों से जानबूझकर मुंह मोड़ रहा है। ऐसा करना मुसीबत मोल लेना ही है।

 
 
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कश्मीर को सही रास्ते पर लाने के लिए अतिरिक्त प्रयास जरूरी हैं।
भले ही यह स्पष्ट न हो कि पाकिस्तान के विदेश सचिव किस खास मकसद से यकायक भारत आए हैं, लेकिन संभावना यही है कि वह भारतीय प्रधानमंत्री के लिए अपने प्रधानमंत्री का कोई संदेश लेकर आए होंगे, ताकि दोनों देशों के बीच संबंध सुधारने को लेकर कोई सहमति कायम हो सके। यह संभावना इसलिए दिख रही है, क्योंकि एक तो पाकिस्तान ने अरसे बाद अपना हवाई क्षेत्र खोला है और दूसरे, इमरान खान भारत से संबंध सुधारने के लिए व्यग्र दिख रहे हैं।
इस व्यग्रता का एक बड़ा कारण पाकिस्तान की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था है। तमाम उपायों के बावजूद पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था संभलने का नाम नहीं ले रही है। लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था के चलते पाकिस्तान ऐसी स्थिति में नहीं कि वह भारत से तनाव जारी रख सके। यह ठीक है कि पाकिस्तान में कुछ लोग यह समझने लगे हैं कि कश्मीर में दखल जारी रखकर भारत से संबंध नहीं सुधारे जा सकते, लेकिन मुश्किल यह है कि वहां एक तबका अभी भी ऐसा है जो छल-बल से कश्मीर हासिल करने के सपने देख रहा है। इस तबके को ताकत प्रदान कर रही है पाकिस्तानी सेना और जिहादी तत्व। फिलहाल यह कहना कठिन है कि इमरान खान अपनी सेना और अपने यहां के जेहादी तत्वों को यह समझाने में सफल हैं या नहीं कि कश्मीर की रट लगाते रहने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है, लेकिन भारत से संबंध सुधार उनके हाथ में ही है। अगर पाकिस्तान अपने सबसे बड़े पड़ोसी देश से संबंध सामान्य नहीं कर पा रहा है तो इसके लिए वही अधिक जिम्मेदार है। यह पाकिस्तान ही है, जिसने संबंध सुधारने के नाम पर भारत को रह-रहकर धोखे दिए हैं। बीते दो दशक तो खास तौर से पाकिस्तान की धोखेबाजी की कहानी ही कहते हैं।
फिलहाल किसी के लिए भी यह कहना कठिन है कि पाकिस्तान से रिश्ते कब और कैसे सामान्य होंगे, लेकिन इस अनिश्चितता का यह मतलब नहीं हो सकता कि कश्मीर को सही रास्ते पर लाने के लिए भारत सरकार की ओर से अतिरिक्त प्रयास न किए जाएं। कश्मीर के हालात ठीक करने का काम तो प्राथमिकता के आधार पर किया जाना चाहिए। इसलिए और भी, क्योंकि मोदी सरकार इस बार और अधिक मजबूती से सत्ता में आई है और उसने अनुच्छेद 370 खत्म करने का वादा भी किया है। इस अनुच्छेद को खत्म करने अथवा उसकी खामियों को दूर करने के उपायों पर काम करते हुए मोदी सरकार को यह भी देखना होगा कि कश्मीर के वर्चस्व को कैसे खत्म किया जाए?
जम्मू-कश्मीर की समस्या को केवल घाटी की समस्या के तौर पर देखे जाने के अपने दुष्परिणाम सामने आए हैं। चूंकि कश्मीर ही ज्यादा चर्चा के केंद्र में रहता है, इसलिए जम्मू और लद्दाख की अनदेखी ही होती है। एक समस्या यह भी है कि कश्मीर की हर छोटी-बड़ी घटना को सदैव गंभीर चुनौती के तौर पर देखा जाता है। इसके चलते वहां अलगाववाद ने एक धंधे का रूप ले लिया है। जम्मू-कश्मीर में नए सिरे से परिसीमन की तैयारियों के पीछे का सच जो भी हो, उपद्रवग्रस्त घाटी को पटरी पर लाने के लिए हरसंभव कदम उठाने का समय आ गया है।

लोक-लुभावन राजनीति किस तरह आर्थिक नियम-कानूनों को ताक पर रखकर चलती है, इसका ही उदाहरण राहुल गांधी की यह घोषणा है कि अगर कांग्रेस सत्ता में आई तो वह देश के सबसे गरीब पांच करोड़ परिवारों को 72,000 रुपए सालाना देगी। इसका मतलब है छह हजार रुपए प्रतिमाह। लगता है कि राहुल गांधी गरीब किसानों को छह हजार रुपए सालाना देने की मोदी सरकार की योजना के जवाब में अपनी यह योजना लाए हैं। उन्होंने जिस तरह यह हिसाब दिया कि इससे करीब 25 करोड़ लोग लाभान्वित होंगे, उससे यही पता चलता है कि वह यह मानकर चल रहे हैं कि गरीब परिवारों की औसतन सदस्य संख्या पांच है।
भले ही कांग्रेस अध्यक्ष ने न्यूनतम आय योजना को दुनिया की ऐतिहासिक योजना करार दिया हो, लेकिन देश्ा यह जानना चाहेगा कि आखिर वह इस आंकड़े तक कैसे पहुंचे कि देश्ा में सबसे गरीब परिवारों की संख्या पांच करोड़ है? एक सवाल यह भी है कि यह कैसे जाना जाएगा कि किसी गरीब परिवार के मुखिया की मौजूदा मासिक आय कितनी है, क्योंकि राहुल गांधी के अनुसार, गरीब परिवार की आय 12 हजार रुपए महीने से जितनी कम होगी, उतनी ही राशि उसे और दी जाएगी। समझना कठिन है कि कांग्रेस किस तरह एक ओर गरीब परिवारों को सालाना 72 हजार रुपए भी देना चाहती है और दूसरी ओर ऐसे परिवारों की हर महीने की आय 12 हजार रुपए भी सुनिश्चित करना चाहती है? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि आखिर पांच करोड़ गरीब परिवारों को सालाना 72 हजार रुपए देने के लिए प्रति वर्ष तीन लाख साठ हजार करोड़ रुपए की भारीभरकम धनराशि कहां से जुटाई जाएगी? क्या कांग्रेस के सत्ता में आते ही पैसे पेड़ पर उगने लगेंगे या फिर शिक्षा, स्वास्थ्य, रक्षा आदि के बजट में कटौती कर दी जाएगी ।
पता नहीं राहुल गांधी की न्यूनतम आय योजना की घोषणा सुनने वाले संवाददाता हैरान हुए या नहीं, लेकिन आर्थिक मामलों के जानकार अवश्य हैरान हुए होंगे। अगर इस योजना पर सचमुच तीन-चार महीने से काम चल रहा था और इसका आकलन कर लिया गया है कि देश के पास इतना पैसा है कि पांच करोड़ गरीब परिवारों को सालाना 72 हजार रुपए आसानी से दिए जा सकते हैं, तो क्या यह अच्छा नहीं होता कि यह स्पष्ट कर दिया जाता कि राजकोषीय घाटे और मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखते हुए सालाना तीन लाख साठ हजार करोड़ रुपए का प्रबंध कैसे कर लिया जाएगा? जब तक यह स्पष्टता सामने नहीं आती, तब तक कांग्रेस अध्यक्ष की नई-अनोखी घोषणा पर केवल परेशान ही हुआ जा सकता है।
गरीबी हटाने का वादा अच्छी बात है, लेकिन किसी भी दल को देश की अर्थव्यवस्था का बेड़ा गर्क करने की इजाजत नहीं मिल सकती। समाजवादी सोच के तहत नोट छापकर गरीबों को बांटने की योजना सुनने में आकर्षक लग सकती है, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि इस तरह की लोक-लुभावन योजनाओं से गरीबी दूर होने के बजाय और बढ़ती ही है। इतना ही नहीं, ऐसी योजनाओं पर अमल करने वाले देश आर्थिक रूप से बर्बाद भी हो जाते हैं।

यह एक और बड़ा आघात ही है कि पुलवामा में भीषण आतंकी हमले में शहीद सीआरपीएफ जवानों की चिता की आग बुझने भी न पाई थी कि आतंकियों से लोहा लेते हुए पांच और जवानों के बलिदान होने की खबर आ गई। इनमें एक मेजर भी हैं। पुलवामा हमले की साजिश रचने वाले आतंकियों को पुलवामा में ही मार गिराने के अभियान में ब्रिगेडियर, लेफ्टिनेंट कर्नल, मेजर, कैप्टन और डीआईजी समेत सात जवान घायल भी हुए हैं। इस अभियान में हताहत अधिकारियों और जवानों की यह संख्या यही बताती है कि कश्मीर में खतरा किस तरह बढ़ता जा रहा है।
नि:संदेह यह सेना, सुरक्षा बलों और जम्मू-कश्मीर पुलिस के अदम्य साहस और संकल्प का प्रमाण है कि उन्होंने मिलकर पुलवामा हमले की साजिश रचने वाले आतंकियों को सौ घंटे के अंदर खोजकर मौत के मुंह में धकेल दिया, लेकिन उनका दमन करने के क्रम में उन्हें जो क्षति उठानी पड़ी, वह चिंता का विषय है। यह सही है कि घिनौनी नफरत से भरे और मरने-मारने पर आमादा आतंकियों के सफाए के हर अभियान में जोखिम होता है, लेकिन आखिर कश्मीर में ऐसा कब तक चलता रहेगा? जनता के मन में यह सवाल उठ रहा है कि कश्मीर में हमारे जवान आखिर कब तक इसी तरह बलिदान देते रहेंगे? यह सवाल इसलिए गंभीर हो गया है, क्योंकि कश्मीर में आतंकियों की विषबेल खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। कश्मीर एक संवेदनशील क्षेत्र है, जहां देश भर के जवान तैनात हैं। जब वे यूं वीरगति को प्राप्त होते हैं तो इससे पूरे देश का वातावरण प्रभावित होता है। जवानों के परिजन कश्मीर में तैनात अपने लोगों की कुशल-क्षेम के लिए सदैव चिंतित बने रहें, यह कोई अच्छी स्थिति नहीं। यह स्थिति आम जनता के मनोबल पर असर डालती है।
देश की जनता इसके प्रति तो सुनिश्चित है कि सेना और सुरक्षा बलों के आगे कश्मीर में सिर उठाने वाले आतंकियों की खैर नहीं, लेकिन वह यह जानने के लिए अधीर हो रही है कि आखिर देश के इस हिस्से में कब अमन-चैन कायम होगा? इस सवाल का जवाब देश के समस्त राजनीतिक नेतृत्व को देना होगा। यह अच्छा नहीं कि कश्मीर को शांत करने की कोई पहल होती नहीं दिख रही है। घाटी में एक ओर जहां अलगाव और आतंक के समर्थकों का सख्ती से दमन करने की जरूरत है, वहीं देशभक्त कश्मीरियों को साथ लेने की भी उतनी ही आवश्यकता है। आखिर इस दिशा में कोई ठोस पहल कब होगी? क्या यह सही समय नहीं जब कश्मीर में अलगाव की मानसिकता का पोषण करने वाली धारा 370 खत्म की जाए और वहां के लोगों को मुख्यधारा में लाने के लिए हरसंभव उपाय किए जाएं? वास्तव में जितनी जरूरत अमन-चैन पसंद लोगों को हर तरह से आश्वस्त करने की है, उतनी ही इसकी भी कि आतंकियों के बचाव में पत्थरबाजी करने वालों को ऐसा सबक सिखाया जाए कि वे फिर कभी पत्थर उठाने की जुर्रत न कर सकें। सहने की एक सीमा होती है। देश का राजनीतिक नेतृत्व यह समझे तो बेहतर कि कश्मीर के हालात से देश व्यथित है और उसकी व्यथा दूर करने के लिए ठोस कदम उठाना उसकी जिम्मेदारी है।

प्रत्यर्पण की प्रक्रिया आसान बनाने हेतु अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आवाज उठानी होगी, ताकि ऐसा कोई कानून बने जिससे वांछित तत्व बहानेबाजी कर बचने न पाएं।
भारत में घपला-घोटाला या अन्य कोई अवैध-अनुचित काम कर विदेश में छिपने वालों को स्वदेश लाने के लिए कूटनीतिक गतिविधियों को गति देना समय की मांग है, लेकिन इसी के साथ उन उपायों पर भी गौर किया जाना चाहिए, जिससे प्रत्यर्पण में कम से कम समय लगे। यह इसलिए आवश्यक है, क्योंकि अधिकतर मामलों में विदेश में जा छिपे लोगों को भारत लाने में कहीं अधिक समय लग जाता है। नि:संदेह यह राहतकारी है कि ब्रिटेन के गृह मंत्री ने विजय माल्या को भारत प्रत्यर्पित करने की अनुमति दे दी, लेकिन अभी यह तय नहीं कि वह भारत के हाथ कब लगेगा। विजय माल्या ब्रिटेन के गृहमंत्री के आदेश के खिलाफ वहां के उच्च न्यायालय में अपील करेगा। यदि उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के आदेश को सही पाया, तब जाकर माल्या का भारत आना सुनिश्चित हो सकेगा। हालांकि इसके आसार न के बराबर हैं कि उच्च न्यायालय निचली अदालत के आदेश में कोई हेरफेर करेगा, लेकिन अभी यह नहीं कहा जा सकता कि वह अपना फैसला कब सुनाएगा? देखना यह भी होगा कि ब्रिटिश उच्च न्यायालय के आदेश के बाद विजय माल्या भारत आने से बचने के लिए कोई जतन करता है या नहीं? ध्यान रहे कि वह भारत आने से बचने के लिए किस्म-किस्म के बहाने गढ़ता रहा है। यही काम पंजाब नेशनल बैंक में घोटाले के आरोपी नीरव मोदी और मेहुल चोकसी भी कर रहे हैं। जहां नीरव मोदी यह राग अलाप रहा कि उसे भारत में खलनायक की तरह देखा जा रहा, वहीं मेहुल चोकसी यह बहाना पेश कर रहा कि वह एंटीगुआ से भारत तक का लंबा हवाई सफर नहीं कर सकता। विडंबना यह है कि कई बार इस तरह की बहानेबाजी को संबंधित देशों की अदालतें महत्व देने लगती हैं।
यह एक तथ्य है कि ब्रिटेन की अदालतों ने भारत में वांछित कई तत्वों को इस आधार पर प्रत्यर्पित करने से मना कर दिया कि यहां की जेलों की दशा अच्छी नहीं है। एक ओर ब्रिटेन जैसे देश हैं, जहां का प्रत्यर्पण संबंधी तंत्र कुछ ज्यादा ही जटिल है, वहीं दूसरी ओर सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश हैं, जो वांछित शख्स की पहचान स्थापित होने और उसकी कारगुजारी का विवरण मिलते ही उसे प्रत्यर्पित कर देते हैं। इसके अतिरिक्त कुछ ऐसे भी देश हैं, जो प्रत्यर्पण के मामले में एक तरह से मनमाना रवैया प्रदर्शित करते हैं। पुरुलिया कांड में वांछित किम डेवी का पुर्तगाल से प्रत्यर्पण नहीं हो पा रहा है तो इसीलिए, क्योंकि वहां की सरकार भारत की चिंता समझने के बजाय अपने आपराधिक अतीत और छवि वाले नागरिक की हिफाजत को ज्यादा अहमियत दे रही है। यह सही है कि पुर्तगाल सरीखे योरपीय देश मानवाधिकारों को कहीं अधिक अहमियत देते हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वे इसके नाम पर अपराधियों का बचाव करें। जरूरी केवल यह नहीं है कि पुर्तगाल सरीखे देशों के प्रति सख्त कूटनीति का परिचय दिया जाए, बल्कि यह भी है कि प्रत्यर्पण की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आवाज भी उठाई जाए, ताकि ऐसा कोई कानून बन सके, जिससे वांछित तत्व बहानेबाजी कर प्रत्यर्पण से बचने न पाएं।

अंतरिम बजट में सरकार ने सभी वर्गों को राहत देते हुए खजाने का मुंह तो खोला, लेकिन राजकोषीय घाटे की चिंता भी की।
आम चुनाव का सामना करने जा रही सरकार से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह अंतरिम बजट में चुनाव की चिंता न करे। इस पर हैरानी नहीं कि कार्यवाहक वित्त मंत्री पीयूष गोयल की ओर से पेश अंतरिम बजट के जरिए मोदी सरकार ने समाज के सभी तबकों और खासकर किसानों एवं मजदूरों के साथ वेतनभोगी मध्य वर्ग को खास तौर पर राहत देने की कोशिश की है। जहां दो हेक्टेयर तक खेती की जमीन वाले किसानों को छह हजार रुपए सालाना देने की घोषणा की गई है, वहीं असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए तीन हजार रुपए की मासिक पेंशन देने की भी योजना पेश की गई है। इसके अतिरिक्त पांच लाख रुपए तक की कर योग्य आय वाले व्यक्तिगत करदाताओं से आयकर न लेने की व्यवस्था भी की गई है। ये तीनों उल्लेखनीय कदम संबंधित तबकों को राहत देने वाले हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या इससे देश का मूड और माहौल बदलेगा?
यह सवाल इसलिए, क्योंकि किसानों और मजदूरों के संदर्भ में जो बड़ी घोषणाएं की गई हैं, उनके अमल के बाद ही यह पता चलेगा कि मुश्किल हालात से दो-चार हो रहे ये दोनों तबके कितने संतुष्ट हुए? चूंकि किसानों को न्यूनतम आमदनी वाली योजना दिसंबर 2018 से ही लागू मानी जाएगी, इसलिए आम चुनाव तक उन्हें पहली किश्त मिल सकती है। मगर असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को हाल-फिलहाल कोई लाभ मिलने की सूरत नहीं दिख रही है। असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की पेंशन योजना के साथ ही छोटे एवं सीमांत किसानों के खाते में सीधे धन पहुंचाने की योजना पर अमल आसान काम नहीं, क्योंकि इसका आकलन करने में कठिनाई हो सकती है कि किस किसान के नाम वास्तव में कितनी जमीन है या फिर किस मजदूर की आय 15 हजार रुपए महीने से कम है?
यह सही है कि सरकार सीधे धन हस्तांतरण की तकनीक से लैस है और कई कल्याणकारी योजनाओं में उसका सफल प्रदर्शन भी हो चुका है, लेकिन इसका अंदेशा है कि अंतरिम बजट में घोषित कल्याणकारी योजनाओं के जरिए उपलब्ध कराई जाने वाली मदद अपेक्षाओं के अनुरूप न साबित हो। पता नहीं किसानों और मजदूरों को राहत देने वाली योजनाओं में देरी के कोई दुष्परिणाम सामने आएंगे या नहीं, लेकिन इससे इंकार नहीं कि इन तबकों को प्राथमिकता के आधार पर राहत देने की दरकार थी। एक तरह से यह सरकार की नैतिक जिम्मेदारी थी कि वह इन वर्गों और साथ ही मध्य वर्ग की सुध ले।
स्पष्ट है कि ऐसे किसी नतीजे पर पहुंचना सही नहीं कि चुनाव सामने देखकर सरकार ने लोकलुभावन योजनाओं की झड़ी लगा दी। ऐसा इसलिए भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि खजाने का मुंह खोलने के बावजूद सरकार ने राजकोषीय घाटे की चिंता की है। शायद यही कारण है कि वैसी कोई घोषणा नहीं की गई जिसके लिए दबाव बनाया जा रहा था और इस क्रम में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने यहां तक कह दिया था कि उन्होंने तो हर गरीब के खाते में पैसा पहुंचाने का फैसला कर लिया है। कोई भी सरकार हो, उसे चुनाव की चिंता के साथ देश की आर्थिक सेहत का भी ध्यान रखना चाहिए।

यह राहतकारी है कि एनआईए ने आतंकी हमलों की एक बड़ी साजिश का पर्दाफाश कर दिया, लेकिन केवल इतना ही पर्याप्त नहीं।
राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआईए ने एक खतरनाक आतंकी गुट का पर्दाफाश करके देश को एक बड़े खतरे से बचाने का काम तो किया ही, यह भी जाहिर किया कि आतंकवाद का खतरा अभी टला नहीं और उससे सतर्क रहने की आवश्यकता पहले जैसी ही बनी हुई है। एनआईए की मानें तो हरकत उल हर्ब ए इस्लाम नाम वाले इस आतंकी गुट का इरादा कुछ नेताओं के साथ देश के महत्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बनाने का था। चिंता की बात केवल यह नहीं कि यह आतंकी गुट बड़ा हमला करने की ताक में था, बल्कि यह भी है कि उसने हथियारों और विस्फोटकों के साथ एक देसी राकेट लॉन्चर भी जुटा लिया था। इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि वह आत्मघाती हमलों की भी तैयारी कर रहा था।
एनआईए ने तथाकथित हरकत उल हर्ब ए इस्लाम के जिन दस लोगों को गिरफ्तार किया, वे मध्यमवर्गीय परिवारों से हैं। इनमें कुछ पढ़े-लिखे भी हैं और एक तो इंजीनियरिंग का छात्र बताया जा रहा है। इससे यह धारणा एक बार फिर खारिज हो जाती है कि सिर्फ गरीब और अशिक्षित युवा ही आसानी से गुमराह होकर आतंक की राह पर चले जाते हैं। स्पष्ट है कि उन कारणों की न केवल पहचान करनी होगी, बल्कि उनका निवारण भी करना होगा जिसके चलते पढ़े-लिखे और आर्थिक तौर पर समर्थ युवा आतंकवाद की राह पर जा रहे हैं। इसी के साथ इस सवाल का भी जवाब खोजना होगा कि आतंकवाद की राह पकड़ने वाले मजहब की आड़ लेने में कैसे सफल हो जा रहे हैं? आखिर हरकत उल हर्ब ए इस्लाम नाम से आतंकी गुट बनाने का क्या मतलब?
एनआईए की गिरफ्त में आए तत्वों ने अपने आतंकी गुट का नाम इस्लाम से जोड़ने की जो हिमाकत की, उस पर मुस्लिम समाज के नेतृत्व को यह विचार करना चाहिए कि क्या उसे उसी तरह सक्रियता दिखाने की फिर जरूरत है, जैसी उसने कुछ समय पहले आईएस के खिलाफ फतवा जारी कर दिखाई थी? जो भी हो, इससे खराब बात और कोई नहीं हो सकती कि जब दुनिया का सबसे खूंखार आतंकी संगठन आईएस अपने गढ़ सीरिया में दम तोड़ रहा है, तब भारत में कुछ गुमराह लोग उसके जैसी हरकतों को अंजाम देने की खतरनाक सोच से ग्रस्त हो रहे हैं। आखिर आईएस जैसे बर्बर आतंकी संगठन से कोई किसी तरह की प्रेरणा कैसे ले सकता है? यह राहतकारी है कि एनआईए ने आतंक की एक बड़ी साजिश का पर्दाफाश कर दिया, लेकिन केवल इतना ही पर्याप्त नहीं है। उसके लिए यह भी जरूरी है कि वह गिरफ्तार तत्वों के खिलाफ सारे सुबूत जुटाकर उन्हें सजा दिलाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़े, ताकि किसी तरह के संदेह और सवालों की गुंजाइश न रहे।

यह इसलिए आवश्यक है, क्योंकि हमने देखा है कि कई बार कुछ लोग आतंकवाद के मसले पर भी राजनीति करने से बाज नहीं आते। आखिर कौन नहीं जानता कि देश भर में तमाम हमलों को अंजाम देने वाले यासीन भटकल के आंतकी गुट इंडियन मुजाहिदीन के बारे में कुछ नेताओं का यह ख्याल था कि यह नाम सरकारी एजेंसियों के दिमाग की उपज है।