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panchayattantra24.com, छत्तीसगढ़ का 44 प्रतिशत भूभाग वनों से आच्छादित है, जबकि देश के कुल क्षेत्रफल का यह 12 प्रतिशत है। जाहिर है कि प्रदेश के आर्थिक विकास के साथ-साथ देश के आर्थिक विकास में भी यहां के जंगलों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। पिछले 2 वर्षों के दौरान छत्तीसगढ़ शासन ने अपने निरंतर प्रयासों और नवाचारों से इस भूमिका को और भी विस्तारित करने का काम किया है। किसानों और वनवासियों के जीवनस्तर को एक-साथ ऊंचा उठाने के लिए राज्य अपनी नयी आर्थिक रणनीति पर काम कर रहा है।
जैव-विविधता से भरपूर छत्तीसगढ़ के जंगलों में अनेक तरह के वनोपज और दुर्लभ जड़ी-बूटियां पाई जाती हैं। वनक्षेत्रों के रहवासियों द्वारा परंपरागत रूप से इनका संग्रहण कर आय अर्जित की जाती रही है। वनोपजों के संग्रहण और विक्रय की इस पूरी प्रक्रिया में वनवासियों को कभी भी उनके परिश्रम की सही कीमत नहीं मिल पाई थी, फलतः उनके हिस्से में हमेशा न्यून आय ही आई। दूसरी ओर इन्हीं वनोपजों से बिचौलिये और बड़े व्यापारी अच्छा मुनाफा कमाते रहे। वनों को क्षति पहुंचाए बिना वनक्षेत्रों के विकास की जो रणनीति शासन ने तैयार की है, उसमें वनोपजों के संग्रहण और विक्रय से जुड़ी विसंगतियों को दूर करना सर्वोच्च प्राथमिकता में रहा है। इसी क्रम में तेंदूपत्ता संग्रहण दर को बढ़ाकर 4000 रुपए प्रति मानक बोरा कर दिया गया, जिससे प्रदेश के करीब 13 लाख संग्राहक परिवारों की आय में एक साथ 60 प्रतिशत का इजाफा हो गया। इसी तरह समर्थन मूल्य पर खरीदे जाने वाले लघु वनोपजों की संख्या 7 से बढ़ाकर 52 कर दी गई। इनमें से 38 वनोपजों की खरीदी छत्तीसगढ़ लघु वनोपज संघ द्वारा सीधे की जाती है, जबकि संघ द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य पर 14 वनोपजों की खरीदी स्व सहायता समूहों द्वारा की जाती है।
पिछले दो वर्षों के दौरान वनक्षेत्रों में तेज हुई आर्थिक गतिविधियों का ही यह परिणाम है कि कोरोना-काल में देशव्यापी लॉकडाउन के दौर में भी छत्तीसगढ़ के जंगलों में वनोपजों के संग्रहण का कार्य तेजी से चलता रहा। इस दौरान देश में संग्रहित कुल वनोपजों का 73 प्रतिशत छत्तीसगढ़ ने संग्रहित करते हुए सभी राज्यों में पहला स्थान प्राप्त किया। संग्राहकों ने 130 करोड़ 21 लाख रुपए मूल्य के 04 लाख 75 हजार क्विंटल लघु वनोपजों का संग्रहण किया। संकटकाल में राज्य ने बेरोजगारी दर में नियंत्रण समेत जो आर्थिक उपलब्धियां हासिल की, उनमें वनक्षेत्रों में चल रही आर्थिक गतिविधियों का बड़ा योगदान रहा।
वनोपजों के प्राथमिक प्रसंस्करण को बढ़ावा देने के लिए राज्य में 139 वन-धन केंद्रों की स्थापना की गई है। इनके माध्यम से 103 प्रकार के हर्बल उत्पाद तैयार कर “छत्तीसगढ़ हर्बल्स” नाम से संजीवनी केंद्रों द्वारा विक्रय किए जा रहे हैं। इस कार्य से लगभग 14 हजार स्व-सहायता समूहों के सदस्य लाभान्वित हो रहे हैं। राज्य के पाटन क्षेत्र में एक केंद्रीय प्रसंस्करण इकाई तथा प्रसंस्करण पार्क की स्थापना की जा रही है। इसमें निजी उद्यमियों के भूखंड तथा अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। इस पार्क में विभिन्न प्रकार के लघु वनोपज आधारित उत्पाद वृहद स्तर पर तैयार किए जाएंगे। इसी प्रकार दंतेवाड़ा जिले में भी एक क्षेत्रीय प्रसंस्करण इकाई की स्थापना की जा रही है।
राज्य में लाख उत्पादन को आगामी तीन वर्षों में 4000 टन से बढ़ाकर 10,000 टन करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। लाख उत्पादन से फिलहाल करीब 50 हजार परिवारों को 100 करोड़ रुपए की सालाना आय प्राप्त होती है। लाख पालन को कृषि का दर्जा देते हुए ब्याज रहित फसल ऋण तथा फसल बीमा सुविधा का लाभ देने का निर्णय लिया गया है। लाख की खरीदी न्यूनतम समर्थन मूल्य पर करते हुए 20 क्षेत्रीय संयंत्रों के माध्यम से इसका प्रसंस्करण किया जाएगा। प्रसंस्कृत लाख का विक्रय करके 200 करोड़ रुपए से अधिक की आय प्राप्त होगी।
राज्य में वनौषधियों के उपयोग से परंपरागत उपचारकर्ताओं द्वारा सुदूर वनांचलों में प्राचीन परंपरा के अनुसार प्राथमिक चिकित्सा उपलब्ध कराई जा रही है। इस परंपरागत ज्ञान तथा पद्धति का दस्तावेजीकरण करने, उसे संरक्षित करने तथा औषधियों का परीक्षण-प्रमाणीकरण करने के उद्देश्य से “राज्य औषधि पादप बोर्ड” को पुनर्गठित करते हुए “छत्तीसगढ़ आदिवासी, स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड” का गठन किया गया है।
वनों तथा वनवासियों ने हमेशा एक-दूसरे को सुरक्षित-संवर्धित किया है। इस परस्परता को और सघन करते हुए वनक्षेत्रों में निवास करने वाले लोगों को कृषि, मछलीपालन, चराई, रहवास तथा अन्य निस्तार के लिए व्यक्तिगत तथा सामुदायिक अधिकार पत्र वितरित किए जा रहे हैं। सामुदायिक वन अधिकार के तहत कृषि करने वाले वनवासी आम कृषकों की तरह शासन की कृषि-योजनाओं का लाभ उठा रहे हैं। धान उत्पादकों से उनका उत्पाद समर्थन मूल्य पर शासन द्वारा खरीदा जाता है। अब तक 14 लाख 31 हजार 504 हेक्टेयर वनक्षेत्र में 24 हजार 528 सामुदायिक वन अधिकार पत्र प्रदान किए जा चुके हैं। इसके अलावा सामुदायिक वन संसाधनों के संरक्षण, प्रबंधन तथा पुनर्जीवन के लिए सामुदायिक वन संसाधन अधिकार भी दिए गए हैं। अब तक 05 लाख 91 हजार 88 हेक्टेयर वन क्षेत्रों में 1366 सामुदायिक वन संसाधन अधिकार पत्र प्रदाय किए जा चुके हैं।
वन्य प्राणियों तथा मानव के बीच द्वंद्व को नियंत्रित करने के लिए वाइल्ड लाइफ कॉरीडोर में आनेवाले क्षेत्रों में वन्य प्राणियों के रहवास में सुधार तथा सुगम आवागमन की व्यवस्था की जा रही है। राज्य के सभी वाइल्ड लाइफ कॉरीडोरों की पहचान, उनके प्रबंधन की योजना तैयार की गई है। वर्ष 2020-21 में इसके लिए 85 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। जैव विविधता के संरक्षण के लिए राज्य में 5698. 47 हेक्टेयर क्षेत्र में 24 बायोडावर्सिटी पार्कों की स्थापना की जा रही है। इसके लिए लगभग 52 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। प्रदेश में हाथियों और मानव के बीच बढ़ते द्वंद्व को रोकने हाथी रहवास विकास के लिए लेमरू एलीफेंट रिजर्व की स्थापना की जा रही है। इसके लिए 94 करोड़ रुपए स्वीकृत किए जा चुके हैं। इस योजना के क्रियान्वयन के लिए भारतीय वन्य जीव संस्थान देहरादून से अनुबंध किया जा रहा है।
राज्य में बिगड़े वनों के सुधार की योजना पर भी व्यापक स्तर पर काम किया जा रहा है। वनक्षेत्रों को सघन करने के साथ-साथ उनके भीतर प्राकृतिक रूप से पनपने वाली विभिन्न दुर्लभ वनस्पतियों की सुरक्षा को भी महत्व के कार्यों में शामिल किया गया है। बांस वनों से एक बड़े समुदाय की आजीविका जुड़ी रही है, इसकी व्यापक उपलब्धता ने बीजापुर जैसे बांस-संपन्न क्षेत्रों में कागज-उद्योग की संभावनाओं को भी जन्म दिया है। इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए बांस वनों के संवर्धन तथा प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
शासन द्वारा न केवल वनों को संरक्षित और संवर्धित किया जा रहा है, साथ ही वनक्षेत्रों में बहने वाले नालों के पानी को सहेजने का भी काम किया जा रहा है। इससे वनों के साथ-साथ वनक्षेत्रों में कृषि करने वाले रहवासियों को भी सिंचाई के लिए जल उपलब्ध हो सकेगा। नरवा विकास योजना के तहत कैंपा मद से 1955 नालों में 25 लाख 26 हजार जल संरचनाएं स्वीकृत की गई हैं। इन संरचनाओं में ब्रशवुड, चैकडेम, अर्देन गली प्लग, गेबियन स्ट्रक्चर, स्टॉप डेम, तालाबों आदि शामिल हैं। इन कार्यों से बड़े पैमाने पर रोजगार का भी सृजन हो रहा है। भूमि का कटाव रोकने के लिए प्रदेश की नदियों के तटों पर भी बड़े पैमाने पर पौधों का रोपण किया जा रहा है।
थोड़े ही समय में वनक्षेत्रों के रहवासियों के जीवनस्तर में जो बदलाव आया है, उसका असर इन क्षेत्रों के स्थानीय बाजारों में देखा जा सकता है। विश्वव्यापी मंदी के बावजूद वनक्षेत्रों समेत छत्तीसगढ़ के सभी ग्रामीण क्षेत्रों में रौनक बनी रही। राज्य ने जो आर्थिक उपलब्धियां हासिल की है, उसकी सराहना रिजर्व बैंक ने भी की है। तात्कालिक गतिविधियों के जरिये अर्थव्यवस्था को गतिशील रखने के साथ-साथ राज्य शासन दूरगामी लक्ष्यों को लेकर भी आगे बढ़ रहा है। राज्य की नयी उद्योग नीति में कृषि के साथ-साथ वनोत्पादों पर आधारित प्रदूषण मुक्त उद्योगों की स्थापना को भी प्राथमिकता सूची में रखा गया है। हम परस्परता की टूटी हुई कड़ियों को जोड़ते हुए एक ऐसा ईको सिस्टम विकसित कर रहे हैं, जिसमें जंगल मनुष्यों के जीवन को संवारेंगे और मनुष्य जंगलों को।
लेखक – मोहम्मद अकबर,

 
panchayattantra24.com,इस युग के चर्चित कवि मंगलेश डबराल नहीं रहे। कल कोरोना से उनका निधन हो गया। मंगलेश का चला जाना किसी रौशनी से आग के चले जाने जैसा है। अपनी एक कविता ‘टार्च’ में वे लिखते हैं-
“दादी ने कहा- बेटा उजाले में थोड़ी आग भी रहती तो कितना अच्छा था…”
मंगलेश कह रहे थे कि हमारे वक्त की कविताएं टार्च की तरह बेशक अंधेरे को चीर देती हैं। पहाड़ों पर अंधकार में रास्तों के खतरे दिखाती हैं, लेकिन उनमें वह आग अनुपस्थित है, जिसकी जरूरत दादी को अपने चूल्हे के लिए है।
पहाड़ों पर जन्मे मंगलेश डबराल की कविताओं में पहाड़ों जैसा सौंदर्य और वैसा ही संघर्ष हमेशा उपस्थित रहा। उसमें बुनावट रही, बनावट कभी नहीं। इसीलिए उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। उन्होंने अपनी कविताओं का इस्तेमाल मशीनी टार्च की तरह नहीं, बल्कि धधकते हुए मशाल की तरह किया। यह एक विचारों की मशाल थी, जिसमें वंचितों, शोषितों, पीड़ितों के लिए आग भी थी।
साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त मंगलेश डबराल का यूं चला जाना, साहित्य को एक बड़ी क्षति है। न केवल हिंदी साहित्य को, बल्कि संपूर्ण भारतीय साहित्य को भी। उनकी कविताओं ने भाषाओं, राज्यों और देशों की सीमाएं लांघ कर लंबी-लंबी यात्राएं कीं। वे जहां-जहां पहुंची, वहां-वहां बसती गईं। वे भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेजी, रूसी, जर्मन, डच, फ्रांसीसी, इतालवी, पुर्तगाली समेत अनेक भाषाओं में अनुदित हुईं। ‘पहाड़ पर लालटेन’, ‘घर का रास्ता’, ‘हम जो देखते हैं’, उनकी प्रमुख कृतियां हैं।
मंगलेश की कविता वर्णमाला की पहली पंक्तियां हैं-
“एक भाषा में अ लिखना चाहता हूं
अ से अनार अ से अमरूद
लेकिन लिखने लगता हूं अ से अनर्थ अ से अत्याचार…”
– एक कवि के रूप में कविता की नयी वर्णमाला रचने वाले मंगलेश डबराल का चले जाना कविता के क्लास-रूम से चॉक के गुम हो जाने जैसा है।
लेखक -तारन प्रकाश सिन्हा
(लेखक छत्तीसगढ़ जनसंपर्क विभाग में जनसंपर्क आयुक्त हैं)

 
 
 
पंचायत तंत्र 24.com,पराधीन देश मे स्वतंत्रता और अपने स्वयं के संविधान के लिए आकुल जनता की आवाज को बुलंद करते हुए जनवरी 1938 में पं.नेहरू नें कहा था कि राष्‍ट्रीय कांग्रेस का लक्ष्‍य स्‍वतंत्रता और लोकतांत्रिक राज्‍य की स्‍थापना है। उसकी मांग है कि स्‍वतंत्र भारत का संविधान वयस्‍क मताधिकार के आधार पर निर्मित हो। नेहरू और राष्‍ट्रीय कांग्रेस के इच्‍छा के अनुरूप भारतीय लोकतंत्र के संविधान के निर्माण की प्रक्रिया आरंभ हुई। देश की आजादी के पूर्व अंग्रेजी सरकार के प्रयासों से प्रांतीय विधान सभा द्वारा चुने गए एवं रियासतों और प्रांतों के कुल 389 सदस्यों से संविधान सभा का गठन किया जा चुका था। संविधान सभा ने जवाहरलाल नेहरू के साथ 13 दिसंबर, 1946 को भारत के संविधान निर्माण के लिए औपचारिक रूप से पहल आरंभ किया। इसका उदेश्‍य भारत को एक संप्रभु गणराज्य के रूप में स्‍वतंत्र घोषित करना और उसके लिए संविधान का निर्माण करना था।
इस बीच देश का विभाजन हो गया और 15 अगस्‍त को भारत को जब स्‍वतंत्रता मिली, संविधान सभा में सीटों की कुल संख्या 299 हो गई। डॉ. राजेंद्र प्रसाद संविधान सभा के अध्यक्ष चुने गये। सभा की अगली कार्यवाहियों में 29 अगस्त 1947 को, संविधान सभा में एक प्रस्ताव के माध्यम से मसौदा समिति की नियुक्ती की गई। जिसमें ए. कृष्णस्वामी अय्यर, एन. गोपालस्वामी, बी.आर. अम्बेडकर, के.एम. मुंशी, मो. सादुल्ला, बी.एल. मित्तर और डी.पी. खेतान थे। अगले दिन मसौदा समिति ने अपनी पहली बैठक में बी.आर. अंबेडकर को समिति का अध्यक्ष चुन लिया। सनद रहे कि इस बीच संवैधानिक सलाहकार बी.एन.राऊ द्वारा ड्राफ्ट संविधान तैयार कर लिया गया था।
अक्टूबर 1947 के अंत में मसौदा समिति ने बी.एन.राऊ द्वारा तैयार किए गए ड्राफ्ट संविधान की जांच शुरू की। समिति ने इसमें विभिन्न परिवर्तन किए और सुधार के उपरांत 21 फरवरी 1948 को इसे संविधान सभा के समक्ष प्रस्तुत किया। संविधान सभा में इस पर सदस्‍यों के बीच व्‍यापक विचार-विमर्श हुआ, भारतीय संविधान को स्‍वरूप देनें में इन प्रभावशाली बहसों का अहम योगदान था। संविधान सभा के सदस्यों ने संशोधनों का प्रस्ताव रखा और इन पर बहसें की। संविधान सभा के ज्‍यादातर वाद-विवाद मसौदा समिति द्वारा तैयार किए गए ड्राफ्ट संविधान के चारों ओर घूमती रही। संविधान सभा के 165 सदस्यों में से 114 सदस्‍यों नें ड्राफ्ट संविधान पर 11 सत्रों में दिनों की संख्‍या के हिसाब से कुल 165 दिन बहस करते हुए बिताए। मसौदा संविधान के अनुच्छेदों पर बहस के उपरांत संविधान सभा ने संशोधनों को या तो अपनाया या बहुसंख्यक मत के आधार पर अस्वीकार कर दिया। 6 दिसंबर 1946 को, संविधान सभा की पहली बैठक हुई। संविधान निर्माण की प्रक्रिया में 2 साल और 11 महीने, 18 दिन लगे। मूल संविधान में 395 अनुच्छेद, जो 22 भागों में विभाजित थे इसमें केवल 12 अनुसूचियां थीं। 26 नवंबर को संविधान सभा ने भारत के संविधान को अपनाया और 26 जनवरी 1950 को यह लागू हुआ।
भारत के इस पवित्र संविधान के निर्माण में मसौदा समिति के अध्‍यक्ष डॉ.बी.आर.अम्‍बेडकर का मुख्‍य योगदान रहा। बाबासाहब ने बी.एन.राऊ द्वारा बनाये गए ड्राफ्ट संविधान में आमूलचूल परिर्वतन किए और संविधान सभा में अनुच्‍छेदों के संशोधनों पर हो रहे वाद-विवादों में अपने तथ्‍यात्‍मक तर्क दिये। संविधान सभा में सदस्यों के बीच, संविधान के अनुच्छेदों, उसमे प्रयुक्त शब्दो पर उसके पक्ष और विपक्ष में तर्कों के साथ बहस होती थी। संविधान सभा में देश के विभिन्‍न प्रातों के उल्‍लेखनीय सदस्‍य भी थे जिन्‍होंनें संविधान के निर्माण में अहम योगदान दिया उनमें पंडित जवाहर लाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल, आचार्य जे बी कृपलानी, बी पट्टाभि सीतारमैया, के.एम.मुशी, एन.गोपालस्‍वामी अयंगार, सैयद मोहम्मद सादुल्लाह, राजकुमारी अमृत कौर, रफी अहमद किदवई एवं पं. कुंजरू आदि का नाम उल्‍लेखनीय है।
हमारे प्रदेश के लिए भी यह गर्व की बात है कि संविधान निर्माण के इस महायज्ञ में छत्‍तीसगढ़ का योगदान रहा। इस प्रदेश के गुरू अगमदास, ठाकुर छेदीलाल, पं.रविशंकर शुक्‍ल, किशोरी मोहन त्रिपाठी, रामप्रसाद पोटई एवं धनश्‍याम सिंह गुप्‍त संविधान सभा के सदस्‍य थे। संविधान के अनुच्‍छेदों पर हो रहे वाद-विवादों में पं.रविशंकर शुक्‍ल एवं धनश्‍याम सिंह गुप्‍त नें हिस्‍सा लिया जिसमें गुप्‍त सबसे लम्‍बे समय तक संविधान निर्माण के कार्य में दिल्‍ली में डटे रहे। पं.रविशंकर शुक्‍ल 12, 13 और 14 सितम्‍बर 1949 को संविधान सभा में उपस्थित रहे जिसमें 13 सितम्‍बर को शुक्‍ल जी नें राष्‍ट्रभाषा हिन्‍दी के पक्ष में लम्‍बा और एतिहससिक अभिभाषण दिया था। संविधान सभा के बहसों में गुप्‍त जी ने लगातार भाग लिया और महीनों काम करते हुए संविधान का हिन्‍दी अनुवाद किया। संविधान सभा में वे संशोधनों के लिए नियत अलग-अलग तिथियों में लगभग 30 दिन तक पूरी कार्यवाही तक उपस्थित रहे। उन्‍होंनें संविधान के अनुच्‍छेदों और शब्‍दों के संशोधनों में अपना दमदार हस्‍तक्षेप प्रस्‍तुत किया।
विधान सभा के द्वारा गुप्‍त जी को संविधान के हिन्‍दी ड्राफ्ट कमेंटी का अध्‍यक्ष नियुक्‍त किया गया था। वे दिन-प्रतिदिन के बहसों में भाग लेते रहे और अपने 41 विशेषज्ञों की टीम को लीड करते हुए संविधान के अनुवाद कार्य में तल्‍लीन रहे। अनुवाद विशेषज्ञ समिति में सर्वश्री राहुल सांकृत्यायन, डा. सुनीति कुमार चटर्जी, जयचंद विद्यालंकार, मोटुरि सत्यनारायण और यशवंत आर दाते का विशेष सहयोग गुप्‍त जी को मिलता रहा। 24 जनवरी, 1950 को डॉ. राजेन्द्र प्रसाद नें सदन में अध्यक्ष की आसंदी से कहा कि माननीय घनश्याम सिंह गुप्त जी संविधान के हिन्दी अनुवाद की प्रति प्रस्तुत करें तब घनश्याम गुप्त नें हिन्दी अनुवाद की प्रति सदन में प्रस्तुत किया। डॉ. राजेन्‍द्र प्रसाद की इच्‍छा के अनुरूप 2 वर्ष 6 माह की अवधि में घनश्‍याम सिंह गुप्‍त के नेतृत्‍व में संविधान का हिन्‍दी ड्राफ्ट सदन में प्रस्‍तुत कर दिया गया। संविधान के हिन्‍दी अनुवाद के लिए उन्‍होंनें अपनी संपूर्ण उर्जा लगा दी थी। अनुवाद समिति के विद्वान सदस्‍यों के बीच तालमेल बैठाते हुए दुरूह और कठिन संवैधानिक शब्‍दों का अनुवाद आसान नहीं था। एक-एक शब्‍दों के सटीक अनुवाद में विद्वानों नें कई-कई दिन बिताये तब जाकर संविधान का वह स्‍वरूप सामने आया जिसे भारत की बहुसंख्‍यक जनता पढ़ और समझ पाने में सक्षम हुई।
हिन्‍दी जनमानस के हृदय में आज भी संविधान के इसी हिन्‍दी पाठ का आदर विराजमान है। ‘वी द पीपल आफ इंडिया के स्‍थान पर हमारी जिव्‍हा ‘हम भारत के लोग…’ कहने के लिए ज्‍यादा सहज होती है। संविधान जैसे तकनीकी ग्रन्थ को इतना सहज और ग्राह्य बनाने के लिए जिन मनीषियों नें कार्य किया उनमें घनश्‍याम सिंह गुप्‍त का नाम हमेशा भुला दिया जाता है जबकि वे इस समिति के अध्‍यक्ष और विद्वान विधि वेत्‍ता थे। पद-प्रतिष्‍ठा और नाम की ज्‍याद फिक्र ना करने के कारण ही उन्‍होने अपने इस कार्य को प्रचारित भी नहीं किया। सरकार नें उनकी प्रतिभा को पहचानते हुए उन्‍हें आगे इंडिया कोड के अनुवाद की जिम्‍मेदारी दी एवं अंग्रेजीमय सरकारी काम-काज के हिन्‍दीकरण के कई अहम दायित्‍व उन्‍हें प्रदान किया गया। वे गांव के जोगी जोगड़ा बने रहे उनके खुद के गृह नगर दुर्ग में लोगों को पता नहीं था कि घनश्‍याम दाउ राष्‍ट्र के लिए क्‍या कर रहे हैं। न उन्‍होंनें प्रचारित किया ना ही बताया, बाद की पीढ़ी नें आर्य समाज की परम्‍परा के मुताबिक स्‍वर्गवासी व्‍यक्ति के अवदानों पर चर्चा को औचित्‍यहीन समझा। उन्‍हें ना गांव नें समझा और ना ही उनके स्‍वयं के प्रदेश छत्‍तीसगढ़ नें जिसकी भाषा को सबसे पहले उन्‍होंनें ही सी.पी.एण्‍ड बरार विधान सभा में प्रयोग की अनुमति दी थी। देश के संविधान के निर्माण में सक्रिय योगदान देने वाले घनश्‍याम सिंह गुप्‍त के संवैधानिक अवदानों की चर्चा छत्‍तीसगढ़ में हुई ही नहीं, हुई भी तो बहुत कम हुई।
दुर्ग में मोती सूबेदार के वंश में 22 दिसंबर 1885 को जन्‍में घनश्याम सिंह गुप्त की प्राथमिक शिक्षा दुर्ग एवं हाईस्‍कूल की शिक्षा रायपुर में हुई थी। सन 1906 में जबलपुर के राबर्टसन कॉलेज से उन्‍होंनें बीएससी की डिग्री गोल्ड मेडल के साथ प्राप्त की। छात्र जीवन से ही उनमें नेतृत्‍व क्षमता का विकास होने लगा था, राबर्टसन कॉलेज में लम्‍बे समय तक चलने वाले हड़ताल का उन्‍होंनें नेतृत्‍व किया था। वे हाकी के अच्‍छे खिलाड़ी भी थे और कालेज हाकी टीम के कैप्टन थे। आगे उन्‍होंनें सन 1908 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एलएल बी की उपाधि प्राप्त की फिर गुरूकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय में फिजिक्स के प्राध्यापक के रूप में सेवा देनें लगे।
वहां से सन् 1910 में वापस आकर दुर्ग में वकालत आरंभ कर दिया। यहां उन्‍होंनें छत्‍तीसगढ़ में चल रहे स्‍वतंत्रता आन्‍दोंलन में सक्रिय भागीदारी देना आरंभ किया। 1915 में मध्य प्रांत एवं बरार के प्रांतीय परिषद के सदस्य चुने गए और आन्‍दोंलन में छत्‍तीसगढ़ के शीर्ष स्‍वतंत्रता संगा्रम सेनानियों के साथ अपनी सक्रिय भूमिका निभाते रहे। महात्मा गांधी के आह्वान पर 1921 में उन्‍होंनें वकालत का परित्याग कर दिया। 1923 से 1926 सेंट्रल प्रोविंस एंड बरार विधानसभा के निर्विरोध सदस्य निर्वाचित हुए, 1927-1930 के कार्यकाल में भी आप निर्वाचित हुए और प्रदेश विधान सभा के कांग्रेस दल के नेता चुने गए। इस बीच आप सन् 1926 में दुर्ग नगर निगम के भी अध्यक्ष निर्वाचित हुए थे। सन् 1933 में गांधी जी जब दुर्ग आए तब इनके घर में ठहरे थे। स्‍वतंत्रता आन्‍दोलन के समय में वे कई बार गिरफ्तार किये गए और देश के स्‍वतंत्र होते तक कई बार लम्‍बे समय तक जेल की सजा भी काटे।
सन् 1930 में दिल्ली के सेंट्रल असेंबली सदस्‍य के लिए हुए चुनाव में डॉ. हरिसिंह गौर को हराकर आप सदस्‍य निर्वाचित हुए जहां सन् वे 1937 तक आपने छत्‍तीसगढ़ की दमदार उपस्थिति दर्ज की। आपने विधिवेत्ता और आईसीएस वी.एन. राव के साथ सांविधिक कोड के पुनरीक्षण कार्य मे सहयोग किया। बाद में यही बीएन राउ बंगाल हाईकोर्ट के जस्टिस भी बने। केन्‍द्रीय संसद में इस अवधि में गुप्त जी ने गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्‍ट सहित कई महत्‍वपूर्ण कानूनों का प्रणवन किया जिसमें माल बिक्री अधिनियम, भागीदारी अधिनियम, बाल श्रम निषेध अधिनियम, भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, गन्ना अधिनियम, विमान अधिनियम, पेट्रोलियम अधिनियम, मजदूरी भुगतान अधिनियम, आर्य विवाह मान्यता अधिनियम, बीमा अधिनियम आदि प्रमुख है। देश-विदेश के कानूनों का अध्‍ययन कर भारत के अनुरूप इन सभी कानूनों का ड्राफ्ट स्‍वयं घनश्‍याम सिंह गुप्‍त नें ही तैयार किया है। ये कानून संसद में वाद-विवाद के उपरांत लागू किया गया जो आज भी देश में लागू है। इतिहास के पन्‍नों पर भी उनके इन अवदानों का उल्‍लेख है किन्‍तु हम अनजान बने हुए हैं।
सन् 1937 के अंत में संजारी बालोद से सी पी एंड बरार एसेंबली के चुनाव में जीत कर मेंबर चुने गए जहां आप मध्‍य प्रांत और बरार विधान सभा के अध्‍यक्ष मनोनीत किये गए। इस प्रकार से अविभाजित छत्‍तीसगढ़ के पहले विधान सभा अध्‍यक्ष आप माने जावेंगें क्‍योंकि तत्‍कालीन राज्‍य में छत्‍तीसगढ़ का संपूर्ण हिस्‍सा सम्मिलित था। आप लगातार विभाजित मध्‍य प्रदेश के गठन एवं प्रथम विधान सभा के अध्‍यक्ष को चार्ज देते समय तक (सन् 1952) विधान सभा अध्‍यक्ष बने रहे।
संविधान निर्माण के लिए गठित संविधान सभा के लिए उनका मनोनयन 1939 में किया गया था। जहां वे सन् 1949-1950 तक संविधान सभा के हिंदी समिति के अध्यक्ष और संविधान के हिन्दी अनुवाद विशेषज्ञ समिति के अध्यक्ष रहे। धनश्याम सिंह गुप्त के अवदानों में भारतीय संविधान के हिन्दी अनुवाद संबंधी किए गए कार्य एवं संविधान के अनुच्‍छेदों पर संशोधनों के लिए संविधान सभा में किए गए बहस महत्वपूर्ण है। उन्हें विश्व के अन्यान्य प्रजातांतित्रक देशों में लागू संविधानों को विषद ज्ञान था। वे जानते थे कि संविधान सभा में संविधान निर्माण के महायज्ञ लिए अपने-अपने हिस्से की आहुति देनें वाले सदस्यों के इस योगदान का प्रभाव कितना दीर्घजीवी होगा। उनके द्वारा संविधान सभा में किए गए बहसों में उनके संवैधानिक ज्ञान एवं देश की जनता के प्रति दायित्व का बोध होता है।
संविधान सभा में वे कितने स्‍पष्‍टवादी एवं मुखर थे इसका उदाहरण दिनांक 25.05.1949 को हुए बहस में दृष्टिगत होता है। उस दिन सदन के अध्‍यक्ष डॉ.राजेन्‍द्र प्रसाद सदन की कार्यवाही प्रारंभ होने के 10 मिनट देर से पहुंचे। उनके सदन में आते ही गुप्‍त जी नें कहा कि हम सब अपना घर-द्वार, परिवार, रोजी-रोजगार छोड़कर इस पुनीत कार्य के लिए अपना पल-पल दे रहे हैं, हमें समय का पाबंद होना चाहिए। इस पर डॉ.राजेन्‍द्र प्रसाद नें अपनी गलती स्‍वीकारते हुए कहा कि मैं यहां आ गया था किन्‍तु सदन से आने में देरी हुई, इसके लिए मैं सदन से माफी मांगता हूं।
संविधान सभा में गुप्‍त जी के द्वारा किये गए लम्‍बे एवं उल्‍लेखनीय बहसों में दिनांक 04.11.1948 को हुए राष्‍ट्रभाषा के संबंध में उनका वक्‍तव्‍य मैं सरल हिंदुस्तानी भाषा को खोज रहा हूं एवं दिनांक 15.11.1948 को संघ और राज्य शब्‍द के प्रयोग के संबंध में अर्थान्‍वयन, दिनांक 18.11.1948 को संशोधन के प्रस्तावक के पास संशोधन का अधिकार होता है कि नहीं विषय पर, दिनांक 30.11.1948 को राज्य की परिभाषा के संबंध में एवं दिनांक को 03.12.1948 धर्म के संबंध में, दिनांक 19.05.1949 को अनुच्‍छेद के शब्‍द ‘और-या’ का अंतर, दिनांक को 20.05.1949 ‘केवल’ शब्द के प्रयोग, दिनांक 10.09.1949 को इसके बावजूद-बशर्ते कि में अंतर आदि पर गंभीर बहसें एवं संशोधन प्रस्‍तुत किए गए हैं। इसके अतिरिक्‍त दिनांक 06.12.1948 को उपराष्ट्रपति से वार्ता एवं दिनांक 17.09.1949 को अनुवाद समिति के गठन पर उनका उद्बोधन देश के लिए धरोहर है। अभी पिछले साल सर्वोच्‍च न्‍यायालय में जयराम नरेश नें आधार कार्ड के संबंध में एक याचिका प्रस्‍तुत किया था जिसमें संविधान सभा मे घनश्याम सिंह गुप्ता के अंग्रेजी के ओनली शब्द पर किये गए बहस का उल्लेख किया गया था। उस समय देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में घनश्याम सिंह गुप्ता का संदर्भ लगातार आते रहा। उनके सभी अभिभाषण भारत सरकार के द्वारा प्रकाशित संविधान सभा के वाद विवाद खंडों में संग्रहित हैं। गुप्‍त जी के द्वारा दिनांक 24.01.1950 को संविधान का हिन्दी अनुवाद सदन में राष्ट्रपति को समर्पित किया गया और उसमें सभी सदस्‍यों नें हस्‍ताक्षर किये। यह हमारे छत्‍तीसगढ़ के लिए बहुत गर्व का क्षण था जब इस भू-भाग का एक महापुरूष देश को संविधान का पुष्‍प अर्पित कर रहा था।
उनके संवैधानिक अवदानों के अतिरिक्‍त उन्‍होंनें सन् 1938-40 में हैदराबाद आर्य समाज आंदोलन का नेतृत्व किया। उन्‍होंनें सन् 1944-47 में सिंध प्रदेश में सत्यार्थ प्रकाश के बैन के विरुद्ध आंदोलन का नेतृत्व किया। सन् 1953-55 में भारत सरकार द्वारा जस्टिस एम बी नियोगी कमेटी के सदस्‍य बनाये गए, जो ईसाई मिशनरीज के द्वारा छलपूर्वक किये जा रहे धर्मानंतरण क्रियाकलापों की जांच के लिए बनाई गई थी। आपने सन 1957 में हुए पंजाब सूबा हिन्दी आंदोलन का भी नेतृत्व किया। आप राजभाषा आयोग, भारत सरकार, के दिनांक 15.11.1961 से 13.06.1964 तक सदस्य भी रहे। आपने सन् 1963 में राजभाषा अधिनियम का ड्राफ्ट तैयार किया।
इसके अतिरिक्‍त वे ऑल इंडिया बैकवर्ड कम्युनिटी पूर्णकालिक सदस्य और अध्यक्ष रहे। आप सन् 1961-1965 तक ऑफिशियल लैंग्वेज लेजिस्लेटिव कमीशन, भारत सरकार के सदस्‍य रहे, जिसमें आधिकारिक रूप से से मूल केंद्रीय कानूनों को हिंदी में अनुवाद किया गया। आप एक्सपर्ट ट्रांसलेशन कमेटी, भारत सरकार के भी सदस्‍य रहे, जो तकनीकी शब्दों के हिंदीकरण के लिए कार्य करती थी। उस समय मीडिया जगत में सिरमौर हिंदुस्तान समाचार राष्ट्रीय न्यूज़ एजेंसी के आप प्रथम अध्यक्ष रहे। रिहैबिलिटेशन फाइनेंसियल एडमिनिस्ट्रेशन कमीशन, भारत सरकार, के 10 साल तक आप स्थाई चेयरमैन रहे, जो पाकिस्तान से भारत आए शरणार्थियों के आर्थिक पुनर्वास से संबंधित था।
इसके साथ ही आप सार्वदेशिक भाषा स्वतंत्र समिति के अध्यक्ष रहे, इस समिति ने हिंदी के लिए ऐतिहासिक आंदोलन किया। आप विलेज बोर्ड ऑफ रायपुर डिवीजन के भी 1955 से 1957 तक चेयरमैन रहे। आप आर्य प्रतिनिधि सभा के सेंट्रल प्रोविंस एंड बरार प्रदेश के लगभग 30 वर्ष तक अध्यक्ष रहे। आपने छत्तीसगढ़ में नारी शिक्षा का अलख जगाया जिसके लिए आपने दुर्ग में तुला राम आर्य कन्या शाला का संचालन आरंभ किया। आप सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा जो आर्य समाजियों का वैश्विक प्रतिनिधित्व करता है के 1938 से कई वर्षो तक अध्यक्ष रहे। आपकी मृत्यु 13 जून 1976 को हुई। वे संसदीय परम्‍परा और विधि-विधाई कार्यवाहियों के मानक सर्वश्रेष्‍ठ ज्ञाता थे। यह बड़ी विडंबना है कि विधान-सभा के रूप में अब सी.पी.एण्‍ड बरार का अस्तित्‍व नहीं है परन्‍तु भौतिक रूप से छत्‍तीसगढ़ का यह संपूर्ण भू-भाग उसी सी.पी.एण्‍ड बरार विधान-सभा का अंग रहा जिसके वे पहले स्‍पीकर थे। सी.पी.एण्‍ड बरार विधान-सभा पहले दो प्रदेश क्रमश: महाराष्‍ट्र और मध्‍यप्रदेश में विभाजित हुआ। सी.पी.एण्‍ड बरार से विधि-विधाई मंत्रों से अभिमंत्रित कुर्सियां मध्‍य प्रदेश होते हुए छत्‍तीसगढ़ विधान सभा में जमा दी गई किन्‍तु इस विधाई व्यवस्था के लिए मंगलाचरण पढ़ने वाले धनश्‍याम सिंह गुप्‍त छत्‍तीसगढ़ विधान सभा में आज भी अनचिन्हार हैं।
साभार : आरंभ

 
 
पंचायत तंत्र- देश जब आजाद हुआ था। तब देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 14 अगस्त 1947 की आधी रात को जो भाषण दिया था उसे ट्रिस्ट विद डेस्टिनी के नाम से जाना जाता है। इस ऐतिहासिक भाषण में उन्होंने गरीबी, अज्ञानता और अवसर की असमानता मिटाने, बीमारी को दूर करने का जिक्र किया था। आधुनिक और नए भारत का इतिहास पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू और इन्दिरा गांधी की निर्णायक भूमिका के बिना पूरा नहीं माना जा सकता। क्योंकि इन दोनों नेताओं ने ही भारत के विकास की वह नींव रखी थी जिसका फल वर्तमान पीढियां खा रही हैं। अंग्रेजों द्वारा बुरी तरह कंगाल किए गए भारत को अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए प्रथम प्रधानमंत्री पं. नेहरू ने जो नीतियां बनाईं उसी का परिणाम है कि आज भारत विश्व के औद्योगिक देशों की श्रृंखला में आकर खड़ा हो चुका है। आजादी के पहले से ही नेहरू को जो तथ्य सबसे ज्यादा तकलीफ देता था वह इस देश में चारों तरफ पसरी हुई गरीबी और किसानों की दुर्दशा ही थी। आजादी की लड़ाई से लेकर स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री बनने के सफर में उन्होंने बहुत कुछ बदलते हुए देखा था। यहीं वजह थीं कि पं. नेहरू ने इस देश के विकास का जो रोडमैप तैयार किया उसमें समाज के सबसे पिछड़े और गरीब आदमी को केन्द्र में रखते हुए योजनाएं बनाईं। उन्होंने अपने ऐतिहासिक भाषण में संदेश दिया था कि ‘भविष्य हमें बुला रहा है। हमें किधर जाना चाहिए और हमें क्या करना चाहिए, जिससे हम आम आदमी, किसानों और कामगारों के लिए आजादी और अवसर ला सकें, हम गरीबी, हम एक समृद्ध और लोकतांत्रिक देश बना सकें। हम ऐसी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक संस्थाओं को बना सकें जो आदमी औरत के लिए जीवन की परिपूर्णता और न्याय सुनिश्चित कर सकें? हमें बहुत मेहनत करनी होगी, कोई तब तक चैन से नहीं बैठ सकता जब तक हम अपने वादे को पूरा नही कर देते।
वर्ष 1971 में देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने भी गरीबी हटाओ का ऐतिहासिक नारा दिया था। वर्ष 1975 में गरीबी उन्मूलन के लिए 20 सूत्रीय कार्यक्रम प्रस्तुत कर गांव के जीवन स्तर को सुधारने और गरीबी को दूर करने का प्रयास हुआ। उनका यह कार्यक्रम प्रभावशाली भी रहा। वर्ष 1971 में गरीबी की दर 57 प्रतिशत थीं वह 1977 में 52 और 1983 में 44, 1987 में 38.9 प्रतिशत हो गई। प्रधानमंत्री बनने के बाद स्व. राजीव गाँधी ने भी निर्धन उन्मूलन की दिशा में कदम बढ़ाते हुए पंचवर्षीय योजना में निर्धन उन्मूलन कोे शामिल किया। पंडित नेहरू से लेकर राजीव गांधी तक सबने गरीबी हटाने की बात ही नहीं की अपितु किसानों, गरीबों, कामगारों की आर्थिक दशा सुधारने के लिए योजना बनाकर उसे धरातल पर अमल भी कराया।
प्राकृतिक संसाधनों और अपनी विशिष्ट संस्कृति से परिपूर्ण हमारा छत्तीसगढ़ अन्य कई प्रदेशों की तुलना में हमेशा खुशहाल रहा है। विरासत को देखे तो पाएंगे कि यहा के लोग परिश्रमी और स्वाभीमानी से भी परिपूर्ण रहे हैं। लेकिन धान का कटोरा कहे जाने वाला यह प्रदेश समय के साथ कैसे कंगाल होता गया और यहां के लोग कैसे गरीब होते चले गए ? क्या कुछ ऐसी नीतियां तैयार नही हो पाई जो यहां की वैभवशाली परम्परा, संस्कृति को अपनाने प्रेरित करें और छत्तीसगढ़ को आर्थिक समृद्धि की ओर ले जा सकें? ‘अमीर धरती के गरीब लोग‘ का नारा ही क्यों गूंजता रहां ? हो सकता है कि ठोस रणनीति का अभाव रहा हो। लेकिन ठीक आज से एक साल पहले जब बतौर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने 15 अगस्त 2019 को स्वतंत्रता दिवस के दिन तिरंगा फहराया था तब उन्होंने आम जनता के नाम अपने संदेश में कहा था कि हमने विरासतों के साथ आगे बढ़ने की नीति अपनाई है। उन्होंने गरीबी से आजादी का आह्वान करते हुए नरवा, गरवा, घुरवा, बारी’ के माध्यम से गांवों की अर्थव्यवस्था और पर्यावरण को नया जीवन देने की पहल की। उस वक्त इस नई सरकार को एक साल भी पूरे नही हुए थे बावजूद इसके सरकार ने कई निर्णायक फैसले लेकर प्रदेश के हर वर्गों में नई आस, उत्साह और उमंग भर दिया।
मुख्यमंत्री ने गरीबी की गुलामी से आजादी के लिए सरकार बनते ही पहले दिन से वादा निभाने की शुरूआत कर दी थी। किसानों को 2500 रू. प्रति क्विंटल की दर से धान खरीदी कर तत्काल प्रभाव से भुगतान की प्रक्रिया शुरू तो किया ही, वर्षों से लंबित 17 लाख 82 हजार किसानों का 8 हजार 755 करोड़ रू. का कृषि ऋण, 244 करोड़ रू. का सिंचाई कर माफ किया। लोहंडीगुड़ा में 1700 से अधिक आदिवासी किसानों की 4200 एकड़ जमीन वापिस कर दी। तेन्दूपत्ता संग्रहण पारिश्रमिक 2500 रू. प्रति मानक बोरा से बढ़ा कर 4000 रू. प्रति मानक बोरा कर दिया। बिजली बिल हाफ करने के साथ ही 19.78 लाख गरीब परिवारों को 30 यूनिट तक निःशुल्क बिजली की सुविधा से लाभान्वित किया गया। महात्मा गांधी के 150वीं जयंती पर प्रदेश में दो अक्टूबर को मुख्यमंत्री सुपोषण योजना, मुख्यमंत्री हाट बाजार क्लीनिक योजना, मुख्यमंत्री शहरी स्लम स्वास्थ्य योजना, छत्तीसगढ़ सर्वभौम पीडीएस की शुरूआत की। गरीबी की वजह से बीमारी का इलाज नही करा पाने वाले लोगों को जहां सरल व सहज स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराई, वहीं महिलाओं, किशोरियों को पोषण आहार, जरूरतमंद सभी गरीब परिवारों को पीडीएस के माध्यम से खाद्यान्न उपलब्ध कराने की नई पहल की। मुख्यमंत्री ने डाॅ. खूबचंद बघेल स्वास्थ्य योजना लागू कर प्रदेश के 56 लाख परिवारों को 5 लाख रुपए तक का उपचार, 9 लााख परिवारों को 50 हजार रुपए तक इलाज की सुविधा दी। मुख्यमंत्री विशेष स्वास्थ्य सहायता के तहत 20 लाख रू. तक उपचार की सुविधा देने वाला पहला राज्य भी बन गया।
अभी नई सरकार ने दो वर्ष पूरे नही किए है लेकिन गरीबी से आजादी का आह्वान करने के ठीक एक साल के भीतर ही बड़े से बड़े फैसले ने किसानों, गरीबों और आम नागरिकों को राहत पहुचानें में अहम भूमिका निभाई है। प्रदेश के मुख्यमंत्री बघेल ने नरवा, गरवा, घुरवा, बारी’ का जो खाका बुना था अब वह धरातल पर साकार होता दिख रहा है। प्रदेश में 5300 गौठान स्वीकृत होने के साथ 2600 पूर्ण हो चुके हैं। इन गौठानों में तैयार जैविक खाद और इसकी उपयोगिता ने गाय और गोबर की महत्ता को भी बढ़ाया है। देश में एक अलग तरह की योजना गोधन न्याय योजना की शुरूआत भी इन्हीं उपयोगिताओं और महत्व का परिणाम है। किसानों से 2 रुपए प्रति किलो गोबर खरीदने और गोबर से वर्मी कम्पोस्ट बनाने के लिए स्वसहायता समूहों को जोड़ने के साथ बड़े पैमाने पर प्रशिक्षण की व्यवस्था की जा रही है। प्राथमिक कृषि साख सहकारी समिति तथा लैम्प्स के माध्यम से वर्मी कम्पोस्ट को 8 रू. प्रति किलो की दर से किसानों को बेचकर एक नये अध्यााय की शुरूआत की जा रही है। गोधन न्याय योजना ने देश भर में प्रशंसा बटोरी है। इस योजना में महज 15 दिन बाद ही गोबर बेचने वाले 46 हजार 964 हितग्राहियों को 1 करोड़ 64 लाख रुपए का भुगतान भी आॅनलाइन किया गया है। निश्चित ही इन प्रयासों से ग्रामीण अर्थव्यवस्था संवरने के साथ पर्यावरण संतुलन सफल होगा।
पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी सदैव ही किसानों के हिमायती थे। वे किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में कदम उठाने के साथ आधुनिक टेक्नोलाॅजी के सहयोग से फसल उत्पादन बढ़ाने पर भी जोर देते रहें। शायद उनका यह विश्वास था कि किसान आत्मनिर्भर और मजबूत बनेंगे तो सही मायने में आजादी सार्थक सिद्ध होगी। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भी किसान है। किसानों की व्यथा को महसूस करने के साथ उनकी जरूरतों को भी भलीभांति जानते समझते हैं। पहले साल धान के किसानों को 2500 रूपए प्रति क्विंटल का दाम देने के बाद जब दूसरे साल में एक बड़ी बाधा आई तो भी उन्होंने अपना वायदा पूरा किया और कोरोना संकटकाल में मुसीबतों से घिरे किसानों के सच्चे हमदर्द बने और राजीव गांधी किसान न्याय योजना शुरू कर उनके खाते में राशि डाली। ‘राजीव गांधी किसान न्याय योजना’ के माध्यम से धान, मक्का और गन्ना के 21 लाख से अधिक किसानों को उनके बैंक खातों में डीबीटी के माध्यम से 5700 करोड़ रू. की राशि का भुगतान 4 किस्तों में किया जाना है। जिसकी पहली किस्त 1500 करोड़ रू. 21 मई को किसानों की खाते में डाल दी गई है। 20 अगस्त को राजीव गांधी जी के जन्म दिन के अवसर पर दूसरी किस्त की राशि भी किसानों के खाते में जमा की जाएगी। मुख्यमंत्री ने ऐसे ग्रामीण परिवार जिनकेे पास खेती के लिए अपनी जमीन नहीं है उनके लिए ‘भूमिहीन कृषि मजदूर न्याय योजना’ की घोषणा भी की है ताकि ऐसे परिवारों को निश्चित आय हासिल हो।
कोरोना संक्रमणकाल में लॉकडाउन के दौरान भी प्रदेश के मुख्यमंत्री गरीबों के मसीहा बने। उन्होंने इस संकटकाल में राशन कार्डधारियों सहित प्रवासी मजदूर परिवारों के लिए खाद्यान्न की व्यवस्था कराई। जरूरतमंदों को निःशुल्क खाद्यान्न देने के निर्देश दिए। आंगनबाड़ी, स्कूल से जुड़े बच्चों को सूखा अनाज घर-घर तक देने का काम किया। मनरेगा के तहत काम और समय पर मजदूरी भुगतान, लघु वनोपज संग्रह के लिए पारिश्रमिक देने में भी छत्तीसगढ़ अव्वल रहा है। इस दौरान लाॅकडाउन में फंसे परिवारों के खाते में पैसा डालने के साथ ही प्रवासी मजदूरों और बाहर अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों की सुरक्षित घर वापसी कर हर किसी को विपरीत परिस्थितियों में सम्हलनें का अवसर दिया।
अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी को वन अधिकार पट्टा देने सरकार द्वारा निरस्त वन अधिकार पट्टों की समीक्षा की जा रही है। राज्य में जून 2020 तक 8 लाख 45 से अधिक व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकार के आवेदन प्राप्त हुए है जिसमें से 4 लाख 51 हजार से अधिक वन अधिकर पत्र स्वीकृत व वितरित भी कर दिए गए हैं। तेंदूपत्ता संग्रहण करने वाले संग्राहकों के लिए शहीद महेन्द्र कर्मा तेंदूपत्ता संग्राहक सामाजिक सुरक्षा योजना लागू कर प्रदेश के लगभग 12.50 लाख संग्राहकों को सुरक्षा का भरोसा दिलाया है। उन्होंने विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर इंदिरा मितान योजना शुरू करने की घोषणा भी की है। इसके माध्यम से आदिवासी अंचल के दस हजार गांव में युवाओं का समूह गठित कर वन आधारित आर्थिक गतिविधियों का संचालन किया जाएगा। प्रदेश में गरीब वर्गो के कल्याण की दिशा में योजना बनाने के साथ उसका प्रभावी अमल भी किया जा रहा है। आज हम आजादी की 73वीं सालगिरह मना रहे हैं। पंडित नेहरू भी गुलाम भारत को आजाद कराना चाहते थे और आजादी के बाद स्वतंत्र भारत में गरीब आदमी की सभी क्षेत्रों में भागीदारी चाहते थे ताकि उसका खोया हुआ आत्म सम्मान और गौरव वापस आ सकें। प्रदेश के मुखिया भी शायद यह बात भलीभांति जानते हैं। इसलिए कोरोना संक्रमण के बीच किसी तरह की आर्थिक चुनौतियों की परवाह न कर अपनी जनहितैषी योजनाओं से गरीबों, किसानों, कामगारों सहित छत्तीसगढ़ियों के दिल में अपनी छाप छोड़ते जा रहे हैं और गरीबी की गुलामी को दूर करने की दिशा में एक वीर योद्धा की तरह लड़ाई लड़ रहे हैं।

 
पंचायत तंत्र-छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री निवास में बड़ी आश्चर्य जनक घटना घटी। राष्ट्रीय स्वयं सेवक के कुछ वरिष्ठ पदाधिकारी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का अभिनन्दन करने पहुंचे थे। राजनीतिक प्रेक्षकों के लिए यह सहज स्वीकार करने वाली घटना नहीं है।
आरएसएस इतनी सहिष्णु नहीं है कि वो एक कांग्रेसी मुख्यमंत्री विशेष तौर पर भूपेश बघेल का अभिनन्दन करने पहुँच जाए। वो भूपेश बघेल जिन्होंने राहुल गांधी के बाद पिछले कुछ सालों में आरएसएस पर सबसे ज्यादा तीखा और चुभने वाला हमला किया हो। वे भूपेश बघेल जिन्होंने वीर सावरकर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय जैसे संघ के प्रतिमानों पर अनेको बार न जाने कितनो प्रहार किया हो उनका अभिनन्दन यदि संघ के लोग करने को आतुर है. यकीन मानिए यह संघ की बड़ी मजबूरी और भूपेश बघेल की बड़ी कामयाबी है।
नरवा गरवा घुरवा बारी के बाद गो धन न्याय योजना के निहितार्थ को संघ बहुत अच्छी भांति समझता है. उसे मालूम है यह योजना फलीभूत होते ही भूपेश बघेल न सिर्फ गांव के सबसे निचले तबके तक पहुंच जाएंगे, बल्कि सही मायने में छत्तीसगढ़ को आत्मनिर्भर बनाने में कामयाब भी होंगे। गाय, गोबर गो मूत्र जिसके माध्यम से संघ दशको से भारत के गांव गांव में अपनी पैठ बनाने के हथियार के रूप में इस्तेमाल करते रहा हो। जिस गाय के नाम पर संघ देश के एक बड़े वर्ग को भावनात्मक और धार्मिक रूप से भड़काती रही हो, जिस गाय के नाम पर देश में अनगिनत मॉब लिंचिंग की घटनाएं हुई हो, उस गाय के गोबर को आर्थिक उन्नति का आधार बना कर यदि भूपेष बघेल प्रस्तुत कर रहे है, तो इससे गाय के नाम पर वर्षो से ठेकेदारी करने वालो की जमीन खिसकना स्वाभाविक है।
गो धन न्याय योजना का सीधा विरोध करते है, तो दशको से किये गए अपने ही एजेंडे का विरोध होगा और फिर इस विरोध का आधार और जन स्वीकार्यता भी नहीं रहेगी, लेकिन चुप चाप बैठ कर इतने बड़े हथियार को हाथ से निकलते भी तो नहीं देखा जा सकता. इसीलिए जब विरोध नहीं कर सकते तो चुप रहो या समर्थन करो। संघ की फितरत चुप रह कर तमाशा देखने वाली नहीं है, विशेष कर जब मसला गाय से जुड़ा हो तब तो बिल्कुल भी नहीं। यहाँ तो वर्षो से एकाधिकार कर रखे मसला हाथ से निकलते दिख रहा।
भूपेश बघेल ने साबित किया की असली गो सेवा गाय के नाम पर नारेबाजी करने, लक्षेदार भाषण से नहीं गाय के नाम पर उन्माद फैला कर मॉब लीचिंग में नहीं, गाय और गो वंश को जन जीवन से जोड़ कर उसकी उपयोगिता को प्रासंगिक बनाने में है। उपयोगिता और प्रासंगिकता के इसी सिद्धांत के कारण द्वापर में भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पूजा की शुरुआत किया था।
साम्प्रदायिकता पर कड़े प्रहार के साथ राम लीला का मंचन करवाना और छत्तीसगढ़ में भगवान राम वन गमन पथ को पावन पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने वाले भूपेश बघेल ने गो वंश संरक्षण की योजना ला कर यह भी साबित किया कि उनके लिए संवैधानिक मूल्य और धार्मिक आस्था दोनों महत्वपूर्ण हैं।
ऐसे में छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार की गांव और गो वंश केंद्रित योजना नरवा गरवा घुरवा बाड़ी और गो धन न्याय योजना का समर्थन कर इस योजना से प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष तौर से मन मसोस कर भी खुद को जुड़े होना दिखाने की संघ की मजबूरी है।
लेखक- छग कांग्रेस के वरिष्ठ प्रवक्ता सुशील आनंद शुक्ला

पंचायत तंत्र- दुनिया में ताकतवर देशों का बढ़ता सैन्य खर्च उनकी साम्राज्यवादी सोच और नीतियों की ओर संकेत करता है। अमेरिका, चीन, रूस जैसे देश अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने के लिए जिस तरह पैसा बहा रहे हैं, वह दुनिया की शांति के लिए किसी खतरे से कम नहीं है। धरती से लेकर अंतरिक्ष तक में सैन्य ताकत बढ़ाते रहना इन देशों के लिए अपरिहार्य हो गया है। अंतरिक्ष में सैन्य शक्ति बढ़ाने के लिए अमेरिका का बाकायदा अलग से बजट है। चीन भी इसमें पीछे नहीं है। हाल में स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट ने एक रिपोर्ट में खुलासा किया है कि पिछले साल सबसे ज्यादा सैन्य खर्च करने वाले देशों में अमेरिका, चीन और भारत शीर्ष पर रहे हैं।

इसे वैश्विक संदर्भ में देखा जाए तो 2018 के मुकाबले 2019 में दुनिया का सैन्य खर्च साढ़े तीन फीसद से ज्यादा बढ़ा है। जाहिर है, दुनिया में असुरक्षा की भावना और युद्ध की आशंकाएं भी बलवती हुई हैं। लेकिन आज दुनिया में जिस तरह के हथियार बन रहे हैं, वे थोड़े से वक्त में ही मानव जाति का अस्तित्व समाप्त कर देने को पर्याप्त हैं। ऐसे में यह डर हमेशा बना रहता है कि न जाने कौन कब इनका इस्तेमाल कर डाले और दुनिया के सामने मिट जाने का खतरा खड़ा हो जाए ।
सबसे ज्यादा सैन्य खर्च अमेरिका का है। हथियारों के विकास से लेकर उनके वैश्विक कारोबार तक में उसका दबदबा है। पिछले दो साल में सैन्य साजो-सामान पर अमेरिका के खर्च में पांच फीसद से ज्यादा की वृद्धि हुई है, जो पूरी दुनिया के सैन्य खर्च का अड़तीस फीसद है। चीन का सैन्य खर्च भी दो साल में पांच फीसद से ज्यादा बढ़ा है। इसके अलावा ईरान, इजराइल, उत्तर कोरिया, पाकिस्तान जैसे देश भी उन देशों में शुमार हैं जो परमाणु ताकत हासिल कर चुके हैं। साफ है कि सैन्य शक्ति पर उनका खर्च भी मामूली नहीं होगा। दरअसल, हथियारों का कारोबार अमेरिका, रूस, चीन जैसे देशों की अर्थव्यवस्था में भी बड़ी भूमिका निभाता है ।
ये उन छोटे देशों को हथियार बेचते हैं जो अपने अंदरूनी और बाहरी संकटों से जूझ रहे हैं। जिस देश के पास जितने घातक हथियार होंगे, उसका बाजार भी उतना ही बड़ा होगा। उत्तर कोरिया की ताकत के पीछे चीन का हाथ माना जाता है, जबकि पाकिस्तान की बढ़ती सैन्य शक्ति के पीछे अमेरिका और चीन दोनों हैं। इसलिए जो देश अपनी सैन्य ताकत पर जितना ज्यादा खर्च कर रहा है, उसे हथियारों का उतना बड़ा बाजार भी मिल रहा है।
हाल के कुछ सालों में भारत ने भी अपने सैन्य आधुनिकीकरण पर जोर दिया है। भारत की शुरू से नीति रही है कि वह हथियारों का विकास और खरीद सेना की क्षमता बढ़ाने के लिए करेगा, न कि किसी अन्य मकसद के लिए। भारत के लिए पाकिस्तान और चीन शुरू से बड़ा खतरा रहे हैं। ऐसे में भारत के लिए सैन्य क्षमता बढ़ाना जरूरी है। यह भी हकीकत है कि दुनिया के कुछ देश सैन्य क्षमता बढ़ाने के नाम पर हथियारों की होड़ को बढ़ावा दे रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं से लेकर तमाम देश हमेशा से हथियारों की होड़ रोकने के प्रयास करते रहे हैं और इसके लिए कई संधिया भी हुई हैं। लेकिन देखने में यही आया कि जब-जब इन संधियों पर अमल की बारी आई तो वही देश पीछे हट गए जिन्हें नेतृत्व करना था। इसलिए हथियारों की होड़ पर लगाम नहीं लग पाती।

 
पंचायत तंत्र – कोरोना वायरस का डर इतना ज्यादा मन के अंदर भरा हुआ है कि सोते जागते केवल कोरोना ही दिखाई दे रहा है। ऐसे कोरोनामय जिंदगी जीते जीते कल रात मुझे बहुत सारे लोगों के खिलखिलाने की आवाज सुनाई दी ।मैं सोच में पड़ गया कि इतनी रात को कौन “सोशल डिस्टेस्सिंग” को तोड़कर हंसी खिलवाड़ में जूटा है।
बिस्तर छोड़ कर मैं उस मैदान की ओर गया जहां से खिलखिलाहट की आवाज आ रही थी ।मैंने देखा वहां पर बहुत सारे कोरोना वायरस एकत्रित हुए थे । मैं उनकी बातें सुनने के लिए डरते डरते उनके करीब में पहूंचा और एक बरगद के पेड़ के पीछे छुप गया।उनमें से एक वायरस कह रहा था हमने अपने वायरस खानदान की दबंगता दिखा दी ।आज पूरी दुनियां में हमारे कारण त्राहि-त्राहि मचा हुआ है ।रात दिन भागने वाला इंसान अपने घरों में उल्लू की भांति घुसा बैठा है ।वह हमें कोसने मैं कोई कमी नहीं कर रहा है। सभी एक ही सुर अलाप रहे हैं कि ना जाने कब मरेगा यह कुकर्मी।
इस वायरस की बातपर ठहाका लगाते हुए एक अन्य वायरस ने कहा हमें कुकर्मी कहने वाला मानव ही सही अर्थों में आज कुकर्मी बन बैठा है। वह इस बात को भूल बैठा है कि ,उसके ही कुकर्मों से हम जैसे वायरसों और विविध विकारों का जन्म दूनियां में हो रहा है। धरती माता ने मानव समुदाय को विविध प्रकार की सुख सुविधाएं दी हैं। खाने पीने के लिए एक से बढ़कर एक चीजें भी दी है। इंसान एक बीज धरती पर डालता है तो बदले में उसे धरती माता कई गुना ज्यादा अनाज के दाने लौटा देती है। इसके बावजूद राक्षसनी सुरसा के मुंह की तरह मानव समुदाय के मन में लोभ- लालच बढ़ता ही जा रहा है। घने जंगल में फैलते दावानल की तरह इंसानों के भीतर लालच की आग हर पल धधक रही है। लालच की चासनी में डूबा इंसान अपनी बुद्धि विवेक सब कुछ खो बैठा है। विकटस्थिति तो यहां तक बन गई है कि इंसान धन के पीछे तब तक भाग रहा है जब तक उसका निधन नहीं हो जा रहा है।
इस कोरोना वायरस की बात को आगे बढ़ाते हुए एक अन्य वायरस ने कहा अपनी सुख-सुविधा बढ़ाने के लिए मानव समुदाय ने तरह तरह के कुकर्म किए हैं।जिसके दुष्परिणाम स्वरुप दुनिया में विविध लाईलाज बीमारियों नेआज घर कर लिया है।साथ ही कोरोनावंश में आये नई पीढ़ी के वायरस यानि कि हम कोविड19 भी मनुष्यों के दुष्कर्म से उपजे है। चांद तारों पर पहुंचने का घमंड दिखाने वाले उन्नत देस के लोग हमारे प्रकोप से भयभीत हैं।हमारे आगे नतमस्तक हो गए हैं।चारों खाने चित होकर धूल चाटते नजर आ रहे हैं। दूनियां के कई देशों मेंकोहराम मचाते अब हमने भारत के भीतर प्रवेश कर लिया है। यहां के विभिन्न प्रदेशों के साथ छत्तीसगढ़ में भी अब कोरोना का काला जादू चल पड़ा है।
इतना सूनते ही वहां बैठा एक अन्य कोविड किसी भड़कीले सांड की तरह भड़कता उठ खड़ा हुआ। वह हुंकार भरते हुए बोला क्या खाक जादू चल पड़ा है। अरे यहां पर तो अभी हमें बहुत ज्यादा पांव पसारने का मौका ही नहीं मिला है। हम यहां पागल कुत्ते की भांति गांव शहर की गलियों में शिकार की तलाश में लगे हुए हैं। मुझे तो लगता है शायद यहां के लोग जान गए हैं कि अपने अपने घरों में घुसे रहना कोरोना वायरस से बचने का एकमात्र उपाय है। हम तो मौके की ताक में बैठे हैं कि दिल्ली मुंबई जैसे यहां के लोग भी गाय बैल भैंस भेड़ बकरियों की तरह झून्ड के झून्ड बाहर निकले और हम इन्हें लपक के दबोच लें। इन्होंने बाहर निकलने और सोशल डिस्पेंसिंग को तोड़ने कीजरा भी गलती की तो हम इन्हें ऐसे दबोच लेंगे जैसे कि एक मकड़ी अपने जाल में फंसे कीड़े को दबोच कर चूस डालती है।
तभी वहां बैठा एक बूढ़ा सा कोरोना वायरस बोल पड़ा इसे जानते देखते हुए भी बहुत से लोग घर के बाहर निकलने की फिराक में रहते हैं। कई अक्ल के दुश्मन ऐसे भी हैं, जो चावल- दाल साग- सब्जी और खाने -पीने की चीजों को ठूंस ठूंस कर घर भरने में लगे हैं ।
गरीबों और जरूरतमंदों की पीड़ा को अनदेखी करने वाले  ऐसे लोभी लालची इंसानों की सच्चाई को उजागर करते हुए एक छोटी सी कथा की याद आ रही है। गांव का एक किसान बैलगाड़ी में चावल से भरी हुई बोरियां लेकर जा रहा था। तभी पीछे से एक चावल की बोरी गाड़ी से गिर गई ।इससे अनभिज्ञ किसान आगे चला गया ।गाड़ी से गिरी हुई बोरी एक कोने से फट गई थी ।जहां से चावल बिखर गए थे। उसी समय वहां से एक चिड़िया, गिलहरी और गाय गुजरी। इन तीनों ने अपने अपने पेट भर चावल ही खाए और संतुष्ट होकर वहां से चले चले गए। इनके बाद उस रास्ते से एक इंसान गुजरा । चांवल के बोरे को देखते ही  उसकी आंखों में धूर्तता और जीभ में लालच ने रंग दिखाना आरंभ कर दिया।वह बिना देर किए पूरे बोरे को उठाया और तेजी से अपने घर की ओर चल पड़ा। 
        बूढ़े वायरस की बात सब वायरस ध्यान से सून रहे थे। वह एक लम्बी सांस छोड़ते हूए आगे बोला यह कथा इस बात को स्पष्ट बता रही  है कि छोटे-छोटे जीव जंतु अपने साथ दूसरों के पेट का भी ध्यान रखते हैं, किंतु केवल मनुष्य ऐसा प्राणी है जो अपना पेट ,अपना घर भरने में जिंदगी भर लगा रहता है। दूसरों का हक मारने में भी वह चूकता नहीं है ।ऐसे ही लोभी लालची मतिभ्रष्ट मानवों का विनाश करने प्रकृति हमें हथियार बनाती है।वैश्विक महामारी जैसी आपदाओं को इंसान के द्वार ले आती है।  समय रहते अगर इंसान नहीं समझा तो हमसे भी बड़े-बड़े वायरस गिद्ध की भांति इंसानों को नोचने नज़रें गड़ाए बैठे हैं। ।
     हां भाई ठीक कह रहे हो कहते हूए वहां बैठा एक और बूढ़ा सा वायरस बोल पड़ा हमारी खौफ की वजह से अभी इंसानों को अपने अपने घरों में पूरे समय रहने का मौका मिला है। ऐसे समय में घर के भीतर रहते हुए बुजुर्गों की सेवा करते , आपसी रिश्तो में आय कड़वाहट को मिटाकर मिठास लाने का सुनहरा अवसर इंसानों को मिला है।
      हां ताऊ आपकी बात सही है पर लोग तो घर के बाहर निकल कर काल के गाल में समाने और अपने साथ-साथ अपने सगे संबंधियों की जान के दुश्मन बनने पर तुले हुए हैं। झूठी शान शौकत के दिखावा में डूबे अनेक लोग लॉक डाउन की स्थिति में भी फर फर मोटर गाड़ी मैं धूल उड़ाते उड़ाते घूम रहे हैं। ऐसे अज्ञानियों को संदेश देना होगा कि “क्यों  इतराते हो अपने ठाठ बाट पर ,खाली रहेगा हाथ जब जाओगे घाट पर।”
               इन पंक्तियों पर वाह भाई वाह, कहते हूए एक अन्य वायरस ने कहा -हमने सुना है कि छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया । तीन मई तक वे अगर  लॉक डाउन के दौरान ज्यादा तीन पांच ना करें तो हम कोरोना वायरसों को खुद ही यहां से नौ दो ग्यारह होना ही पड़ेगा। इतना कहते हुए वह वायरस अचानक पीछे की ओर पलटा तो उसकी नजर मुझ पर पड़ गई । मुझे देखते ही वह   झपटने के लिए  दौड़ पड़ा। मैं उसे अपनी ओर आते देख कर बदहवास भागने लगा।        
    भागते भागते एक बड़े से गड्ढे में धड़ाम से जा गिरा। मैं जोर जोर  से चिल्लाया बचाओ बचाओ 

 
पंचायत तंत्र – संपादकीय – साथियों आपको यह तो अवगत होगा ही कि आज न केवल देश बल्कि पूरी दुनिया मे कोविड19 जैसी महामारी ने अपने पांव पसार कर एक बार फिर से इंसान को चुनौती दी है। इस महामारी से कई लाखों लोग संक्रमित हुए है तथा एक लाख से भी ज्यादा लोग इसकी चपेट मे आ गए हैं।
इस महामारी से बचाने के लिए दुनिया के देशों के साथ हमारे यहां भी लाकडाउन चल रहा है। जिसमें न केवल हवाई जहाज बल्कि ट्रेन, बस टैक्सी आटो, रिक्शा सब कुछ थम गए है. लेकिन समाज का एक वर्ग हैं जो स्वास्थ्यकर्मियों, पुलिसकर्मियों, सफाईकर्मी और प्रशासनिक कर्मियों के अतिरिक्त भी है, जो उतनी ही सक्रियता से बिना थके अपना फर्ज निभा रहा है और वो है मीडिया कर्मी (प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक, वेब पोर्टल)।
मीडिया के साथी भी कोरोना योद्धाओं की तरह मैदान में डटे हुए हैं। लोगों को अपनी कलम और आवाज के माध्यम से न केवल जागरूक कर रहे हैं, बल्कि उनकी समस्याओं को शासन- प्रशासन तक भी पहुंचा रहे है. समाजसेवी लोग जो पीड़ित लोगों की मदद कर रहे है प्रशासन के लोग जो दिन रात जुटे हुए है उनके अच्छे कार्यों को समाज में दिखाकर उनका भी हौसला बढ़ा रहे हैं।
इसके लिए ये साथी सैकड़ों किमी यात्राएं गांवों, बीहडों में करके तथ्यात्मक जानकारी निकाल कर पुलिस प्रशासन को उपलब्ध कराने में लगे हैं। जिससे प्रशासन को और बेहतरी से काम करने मे मदद मिल रही हैं। आम लोगों को इसका फायदा मिल रहा है। यह सब करते हुए हमेशा उन पर भी कोविड से संक्रमित होने का खतरा बना रहता है, लेकिन यह अपने फर्ज को तरजीह देकर अपना चौथे स्तंभ का दायित्व निभा रहे हैं।
देश दुनिया में कई मीडिया कर्मियों के संक्रमित होने की खबरें आती रहती हैं फिर भी इनके हौसले में कोई कमी नहीं दिखाई देती हैं।
ये सब कोरोना योद्धा की तरह डटे हुए हैं। मैं पुलिस विभाग और देशवासियों की तरफ से आपका अभिन्दन करता हूँ, सलाम करता हूँ।
लेखक- रतन लाल डांगी, पुलिस महानिरीक्षक, सरगुजा रेंज, छत्तीसगढ़.

 
पंचायत तंत्र – सम्पादकीय – यह गंभीर चिंता की बात है कि कोरोना के खिलाफ जंग के मैदान में उतरे हमारे पुलिस कर्मी भी इस संक्रमण की चपेट में आ रहे हैं। रविवार तड़के मध्य प्रदेश में इंदौर के एक पुलिस निरीक्षक ने कोरोना संक्रमण से दम तोड़ दिया। इससे पहले शनिवार को पंजाब में लुधियाना के सहायक पुलिस आयुक्त की जान भी कोरोना संक्रमण से चली गई। देश में कोरोना न फैल पाए, इसके लिए पूर्णबंदी को सख्ती से लागू कराने के लिए सबसे ज्यादा अगर कोई जान जोखिम में डाल कर अपनी सेवाएं दे रहा है, तो वह इस देश की पुलिस है।
पुलिस का काम और जिम्मेदारियां इस वक्त सबसे ज्यादा जोखिम और चुनौती भरी है। पूर्णबंदी में सरकार के दिशानिर्देशों के पालन से लेकर जिला प्रशासन के सारे काम पुलिस की मदद से ही चल रहे हैं। चाहे कोरोना संदिग्धों का पता लगाना हो, चिह्नित स्थानों की घेराबंदी हो, संदिग्धों को अस्पताल तक पहुंचाना हो, घर-घर जरूरत का सामान बंटवाना हो, सड़कों पर लोगों को आने-जाने से रोकने और वाहनों की जांच करना, न जाने ऐसे कितने ही काम हैं जो पुलिस कर रही है। जाहिर है, ऐसे में सबसे ज्यादा खतरा भी उसके सामने ही है, चाहे कोरोना संक्रमण लगने का हो, या अपने पर होने वालों हमलों का।
कोरोना से लड़ाई अभी बहुत लंबी है। देश में रोजाना जिस तेजी से नए मामले सामने आ रहे हैं, वह भी कम चिंता का विषय नहीं है। पुलिस की भूमिका सिर्फ पूर्णबंदी तक ही तो सीमित है नहीं। जैसे-जैसे पूर्णबंदी खुलेगी, तब चुनौतियां और बढ़ेंगी। लोगों की आवाजाही शुरू होते ही संक्रमण फैलने का खतरा भी बढ़ेगा। व्यापक स्तर पर जांच अभियान के तहत जब जांच का दायरा बढ़ेगा, तो यह काम भी पुलिस की मदद के बिना संभव नहीं होगा।
दिल्ली पुलिस का ही उदाहरण लें। इस वक्त पुरानी दिल्ली के चांदनी महल पुलिस थाने के दो जवानों में यह संक्रमण पाया गया है। चांदनी महल सबसे ज्यादा खतरे वाले चिह्नित इलाकों में से है, जहां तबलीगी जमात के लोगों की आवाजाही सबसे ज्यादा रही। दिल्ली पुलिस के नौ जवान अब तक कोरोना संक्रमण का शिकार हो चुके हैं। ऐसे में पुलिस के सामने बड़ा संकट अपने को सुरक्षित बनाए रखने का भी है।
देश की थलसेना और नौसेना भी कोरोना संक्रमण की मार से नहीं बची है। थल सेना में अभी तक नौ मामले सामने आ चुके हैं। लेकिन मुंबई स्थित नौसेना की पश्चिमी कमान में आइएनएस आंग्रे पोत में छब्बीस नाविकों के कोरोना संक्रमित पाए जाने की घटना ने नींद उड़ा दी है। इस पोत से थोड़ी ही दूर तट पर कमान का दफ्तर है और इसी क्षेत्र में जंगी बेड़े और पनडुब्बियां भी तैनात हैं। पश्चिमी कमान के तहत अरब सागर से हिंद महासागर तक इलाका है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि हमारी सेनाएं पहले से सतर्क हैं और जरूरी बचाव के लिए सभी संभव कदम उठाए होंगे। लेकिन अब एक-एक सैनिक पर कड़ी निगरानी रखने की चुनौती है। नौसेना के इन छब्बीस संक्रमितों में एक सैनिक कुछ दिन अपनी मां के पास रह कर आया था। इस सैनिक की मां भी संक्रमित पाई गई। संक्रमण मां से बेटे में फैला या बेटे के जरिए मां में, यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा। पर इस घटना से यह तो साफ हो गया है कि कोरोना से बचने के लिए सेना को भी खास तरह के बंदोबस्त तो करने ही होंगे।

 
 
पंचायत तंत्र – ऐसी घटनाएं हमारे आपके साथ अनेको बार हुई होगी भले ही आप पहले न हो लेकिन दूसरे तीसरे पांचवे दसवें तो जरूर रहे होंगे। आप सड़क पर बाइक या कार से किसी भी साधन से जाते हुए रुक जाइये और किनारे लगे बिजली के खम्भे को देखना शुरू कर दीजिए. कुछ देर में कोई और पक्का रुकेगा वह भी देखेगा धीरे-धीरे एक एक करके दर्जनों लोग रुक कर ऊपर उसी खम्भे को देखने लगेंगे।भले ही किसी को कुछ समझ नहीं आये। किसी ने दूसरे से पूछ लिया कि भाई क्या है तो वह जबाब देगा पता नहीं कुछ तो है ऊपर यह सारा क्रम काफी देर चल सकता है। यह मनुष्य की कौतूहल वाली प्रवित्ति का नतीजा है।
कभी कभी आप घर मे महिलाओं को अचानक किसी अजीबोगरीब क्रिया कलाप में सलंग्न देखते है मसलन पीपल के पेड़ पर सात दिया जलाना या फिर सुहागन को पांच बिंदी दान देना या जिसके जितने बच्चे है उतना फल खाओ या दान करो ।पूछने पर पता चलता है फला दीदी ,भाभी, बुआ ,मामी का फोन आया था वह बता रही थी ऐसा करना है नही तो वो अपशगुन होगा सब कर रहे हैं मैं भी कर लेती हूं टोका टाकी मत करना इस प्रकार के तमाम प्रपंच हिंदुस्तान के कोने कोने में वर्षो से चल रहे है ।हम सबके लिए यह सामान्य बात है।
यह किस्सा मैं आप सबको इसलिए बता रहा हूं कुछ दिन पहले कोरोना से बचाव के लिए देश भर ने ,थाली पीटा, मोमबत्तियां जलाई ।कुछ लोग इसे मोदी जी के आह्वान का प्रभाव मान बड़े खुश हो रहे मोदी जी ने आह्वान किया देश ने उनका समर्थन किया यह उनका जनाधार है।अरे भइया जिस देश में समान्य अफवाह पर लोग गणेश जी को दूध पिलाने लोग मंदिरों में दूध ले लाईन लगा लेते है जिस देश मे महिलाएं बिना किसी ठोस जानकारी के टोटके कर लेती है यह सोच कर ऐसा करने में हमारा जाता क्या है ।जहाँ लोग एक आदमी के सड़क पर ऊपर देखते देख कर कौतूहल में खुद भी ऊपर देखने लगते है उस देश मे यदि प्रधानमंत्री नेशनल टीवी पर दैवीय आपदा के समय कोई टोटका करने का आह्वान करते है तो लोगो को उसको मानना सामान्य बात है। इस घटना को नेता की महिमा और प्रभाव बता कर मगन रहने वाले जान ले यह संक्रमण काल नोटबन्दी के समान नही है कि लोग पर पीड़ा से खुश होंगे हमारा क्या गया ।पैसे वालो का गया जिसने जमा कर के रखा था उसका गया ।कोरोना महामारी है बीमारी अमीर गरीब देख कर नही आती ।वैसे भी कोरोना की मार में देश का गरीब जादा बेहाल है ।
लॉक डाउन से उनको कोई फर्क नही पड़ने वाला जो साधन संपन्न है या जिनके पास घर मे खाने पीने की कुछ महीने कोई दिक्कत नही आने वाली ।इसका सबसे ज्यादा प्रभाव उन पर पड़ रहा जिन्हें रोज कमाना है तभी उनके घरों में चूल्हे जल पाते हैं जब वे दिन भर में कुछ कमा लें। सब्जी फल का ठेला लगाने वालों को छोड़ दिया जाय तो आज सड़क पर व्यवसाय करने वाला तथा मजदूरी कर जीवन यापन करने वाला हर आदमी बेबस और मजबूर है ।उसे या सरकार का सहारा चाहिए या फिर समाज के समृद्ध तबके की मदद की ।इस अनिश्चितता के माहौल में समाज मे भी बहुत बड़ा तबका मदद की स्थिति में खुद को नही पाता , उसे खुद नही मालुम कि वह अपने परिवार की व्यवस्थाओं को कितने दिन पूरी कर पायेगा।अपनी तमाम संवेदनाओं के वावजूद स्वम को असहाय पा रहा है। लॉक डाउन के 21 दिन बाद भी चलने पर दिहाड़ी मजदूरी से ऊपर जो लोग छोटी मोटी नौकरियां दुकानों ,छोटे कार्यालयों में काम करते है छोटे निजी संस्थानों में काम करते है , भृत्य मुंशी आदि की नौकरी कर होने वाली आमदनी से अपना और अपने परिवार का भरण पोषण करते है उनके पास भी अब पैसे और राशन दोनो खत्म होने को है।
इस वर्ग ने भी अपने प्रधानमंत्री के आह्वान पर अपने परिवार की कुशलता के लिए थाली भी पीटा ,और दिया भी जलाया रैलियां निकलने पर जिंदाबाद के नारे भी लगाया अब जरूरत है प्रधानमंत्री भी थाली मोमबत्ती के प्रपंच से ऊपर उठ कर इन निम्न और मध्यम तबके के लोगो की परेशानियों को दूर करने की कवायद करें। एक शहर से दूसरे शहर एक राज्य से दूसरे राज्य जाने की आपाधापी शौकिया नही थी ।इसके पीछे भूख भय और असुरक्षा की भावना थी ।हजार पांच सौ किलोमीटर पैदल चलने निकलने वाले लोगो ने इसे अंतिम रास्ते के रूप में चुना था।
निसन्देह यह एक वैश्विक महामारी है इससे दुनिया के तमाम ताकतवर देशों मे कोइ नही बचा है।भारत मे इस महामारी ने जनवरी में दस्तक दिया और काफी धीरे धीरे विस्तार किया कह सकते है कि कोरोना ने भारत को बचाव का पूरा अवसर दिया था ।दुर्भाग्य से हमने इस अवसर का सदुपयोग नही किया ।प्रधानमंत्री जी अमीरों को हवाई अड्डो पर रोकने का साहस जब दिखाना था तब तो आप इच्छा शक्ति सुसुप्त थी।यदि कुछ लाख लोगों को आइसोलेशन में रखने का कदम उठाया गया होता तो आज देश के लिए 135 करोड़ लोगों को घरों के अंदर रहने की नौबत नहीं आती और न ही देश के करोङो लोगो को भूख से लड़ने की जद्दोजहद करने की मजबूर होना पड़ता।फरवरी में वेंटिलेटर और पीपीई जैसे आवस्यक चिकित्सीय उपकरणों के निर्यात की अनुमति देने के अदूरदर्शी निर्णयों का जबाब भी कालांतर में जनता को देना ही पड़ेगा।