Browsing: संपादकीय

K.W.N.S.-भारत एवं बांग्लादेश के बीच 25 वर्षों में पहली बार दोनों देशों के बीच बहने वाली नदियों के जल बंटवारे का नया अध्याय शुरू हुआ है। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी परस्पर हुई बातचीत के बाद कुशियारा नदी के संदर्भ में अंतरिम जल बंटवारा समझौते पर हस्ताक्षर हुए हैं। 1996 में गंगा नदी जल संधि के बाद इस तरह का यह पहला समझौता है। इसे अत्यंत महत्वपूर्ण समझौता माना जा रहा है। यह भारत के असम और बांग्लादेश के सिलहट क्षेत्र को लाभान्वित करेगा। 54 नदियां भारत और बांग्लादेश की सीमाओं के आरपार जाती हैं और सदियों से दोनों देशों के करोड़ों लोगों की आजीविका का मुख्य साधन बनी हुई हैं। इन नदियों के किनारों पर मानव सभ्यता के विकास के साथ सृजित हुए लोक गीत और लोक कथाएं, धर्म एवं संस्कृति की ऐसी धरोहर हैं जो मानव समुदायों को लोक कल्याण का पाठ पढ़ाने के साथ नैतिक बल मजबूत बनाए रखने का काम करती हैं। बावजूद दोनों देशों के बीच बहने वाली तीस्ता नदी के जल बंटवारे पर फिलहाल कोई बात आगे नहीं बढ़ पाई। क्योंकि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की नाराजी पानी की मात्रा को लेकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के समय से ही नाराज बनी हुई है। इस मर्तबा तो वे मोदी से इतनी खफा हैं कि हैदराबाद हाउस में हुए द्विपक्षीय वार्तालाप में शामिल ही नहीं हुईं। लेकिन अब उम्मीद है, देर-सवेर तीस्ता के जल बंटवारे का रास्ता खुल जाएगा। नदियों के जल बंटवारे का विवाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं, राष्ट्रीय स्तर पर भी विवाद का विषय बना रहा है। ब्रह्मपुत्र को लेकर चीन सेस तीस्ता का बांग्लादेश से, झेलम, सतलुज तथा सिंधु का पाकिस्तान से और कोसी को लेकर नेपाल से विरोधाभास कायम है। भारत और बांग्लादेश के बीच रिश्तों में खटास सीमाई क्षेत्र में कुछ भूखंडों, मानव बस्तियों और तीस्ता नदी के जल बंटवारे को लेकर पैदा होती रही है। हालांकि दोनों देशों के बीच संपन्न हुए भू-सीमा समझौते के जरिए इस विवाद पर तो कमोबेश विराम लग गया, लेकिन तीस्ता की उलझन बरकरार है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2015 में बांग्लादेश यात्रा पर गए थे। तब ढाका में द्विपक्षीय वार्ता भी हुई थी, लेकिन तीस्ता की उलझन, सुलझ नहीं पाई थी। अब शेख हसीना की भारत यात्रा के दौरान अनेक समझौतों पर हस्ताक्षर होने के बावजूद तीस्ता का विवाद यथावत बना रह जाना हमारी कूटनीतिक कमजोरी को दर्शाता है। विदेश नीति में अपना लोहा मनवाने में लगे नरेंद्र मोदी से यह उम्मीद इसलिए ज्यादा थी, क्योंकि शेख हसीना दोनों देशों में परस्पर दोस्ती की मजबूत गांठ बांधने के उद्देश्य से भारत आती रही हैं । यह उम्मीद इसलिए भी थी, क्योंकि 2016 में मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार ने बांग्लादेश के साथ कुछ बस्तियों और भूक्षेत्रों की अदला-बदली में सफलता प्राप्त की थी। इसलिए उम्मीद की जा रही थी, कि तीस्ता नदी से जुड़े जल बंटवारे का मसला भी हल हो जाएगा। ऐसा माना जाता है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और केंद्र सरकार के बीच राजनीतिक दूरियों के चलते इस मुद्दे का हल नहीं निकल पा रहा है। यह विवाद 2011 में ही हल हो गया होता, यदि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अड़ंगा नहीं लगाया होता। तीस्ता के उद्गम स्रोत पूर्वी हिमालय में स्थित सिक्किम राज्य के झरने हैं। ये झरने एकत्रित होकर नदी के रूप में बदल जाते हैं। नदी सिक्किम और पश्चिम बंगाल से बहती हुई बांग्लादेश में पहुंचकर ब्रह्मपुत्र में मिल जाती है। इसलिए सिक्किम और पश्चिम बंगाल के पानी से जुड़े हित इस नदी से गहरा संबंध रखते हैं। तीस्ता नदी सिक्किम राज्य के लगभग समूचे मैदानी क्षेत्रों में बहती हुई बांग्लादेश की सीमा में करीब 2800 वर्ग किमी क्षेत्र मे बहती है। नतीजतन इन क्षेत्रों के रहवासियों के लिए तीस्ता का जल आजीविका के लिए वरदान बना हुआ है। इसी तरह पश्चिम बंगाल के लिए भी यह नदी बांग्लादेश के बराबर ही महत्व रखती है। बंगाल के छह जिलों में तो इस नदी की जलधारा को जीवनरेखा माना जाता है। भारत और बांग्लादेश के मध्य द्विपक्षीय सहयोग की शुरुआत इस देश के अस्तित्व में आने के वर्ष 1971 में ही हो गई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान से अलग होने वाले स्वतंत्र राष्ट्र बांग्लादेश का समर्थन करते हुए अपनी शांति सेना भेजी और इस देश को पाक की गुलामी से मुक्त कराया। इस कारण दोनों देशों के बीच भावनात्मक संबंध हिंदुओं पर अत्याचार के बावजूद कायम हैं। 1983 में दोनों देशों के बीच एक तदर्थ जल हिस्सेदारी पर संधि हुई थी, जिसके तहत 39 एवं 36 प्रतिशत जल बंटवारा तय हुआ। इस समझौते द्वारा तीस्ता नदी के जल वितरण का समान आवंटन का प्रस्ताव ही नई द्विपक्षीय संधियों का अब तक आधार बना हुआ है। इसी कड़ी में वर्ष 2011 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह के बांग्लादेश दौरे से पहले इस नदी जल के बंटवारे पर प्रस्तावित अनुबंध की सभी शर्तें सुनिश्चित हो गई थीं, लेकिन पानी की मात्रा के प्रश्न पर ममता ने आपत्ति जताकर ऐन वक्त पर डा. सिंह के साथ ढाका जाने से इनकार कर दिया था। हालांकि तब की शर्तें सार्वजनिक नहीं हुई हैं, लेकिन ऐसा माना जाता है कि वर्षा ऋतु के दौरान तीस्ता का पश्चिम बंगाल को 50 प्रतिशत पानी मिलेगा और अन्य ऋतुओं में 60 फीसदी पानी दिया जाएगा। ममता की जिद थी कि भारत सरकार 80 प्रतिशत पानी बंगाल को दे, तब इस समझौते को अंतिम रूप दिया जाए। लेकिन तत्कालीन केंद्र सरकार इस प्रारूप में कोई फेरबदल करने को तैयार नहीं हुई, क्योंकि उस समय केंद्रीय सत्ता के कई केंद्र थे। नतीजतन लाचार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह शर्तों में कोई परिवर्तन नहीं कर सके। लिहाजा ममता ने मनमोहन सिंह के साथ ढाका जाने की प्रस्तावित यात्रा को रद्द कर दिया था। लेकिन अब राजग सरकार ने तब के मसौदे को बदलने के संकेत दिए हैं। लिहाजा उम्मीद की जा रही थी कि पश्चिम बंगाल को पानी देने की मात्रा बढ़ाई जा सकती है। हालांकि 80 प्रतिशत पानी तो अभी भी मिलना मुश्किल है, लेकिन पानी की मात्रा बढ़ाकर 65-70 फीसदी तक पहुंचाई जा सकती है। परंतु नतीजा ठन-ठन गोपाल ही रहा। ममता बनर्जी राजनीति की चतुर खिलाड़ी हैं, इसलिए वे एक तीर से कई निशाने साधने की फिराक में भी रहती हैं। तीस्ता का समझौता पश्चिम बंगाल के अधिकतम हितों को ध्यान में रखते हुए होता तो ममता बंगाल की जनता में यह संदेश देने में सफल होती कि बंगाल के हित उनकी पहली प्राथमिकता हैं। तब से अब तक ममता इस मुद्दे पर एकतरफा प्रभाव जमाए हुए हैं। नतीजतन परिणाम नहीं निकल पा रहा है। यदि यह समझौता हो जाता है तो इसके सामरिक हित भी भारत के लिए महत्वपूर्ण हैं। भारत का उत्तर-पूर्वी क्षेत्र सामरिक दृष्टि से बांग्लादेश के उदय के समय से ही नाजुक बना हुआ है। इसलिए बांग्लादेश की आर्थिक कमजोरी के चलते बांग्लादेशी घुसपैठियों की निरंतरता बनी हुई है। बांग्लादेश में करीब 10 लाख म्यांमार से विस्थापित रोहिंग्या शरणार्थी बने हुए हैं। यह भी भारत में लगातार घुसपैठ कर सीमावर्ती राज्यों में जनसंख्यात्मक घनत्व बिगाड़ रहे हैं। करीब 40000 रोहिंग्या भारत में अवैध घुसपैठियों के रूप में आमद कर चुके हैं। लिहाजा तीस्ता एवं अन्य नदियों के जल बंटवारों पर कोई निर्णायक स्थिति बन जाती है तो बांग्लादेश में कृषि और जल आधारित रोजगार मिलने लग जाएंगे, फलस्वरूप भारत में घुसपैठ थमने की उम्म्मीद की जा सकेगी। दोनों देशों में संधि के उपरांत संयुक्त रूप से बाढ़ और सूखे की आपदा से निराकरण के उपाय तलाशना भी आसान होगा। कालांतर में दक्षिण पूर्व एशियाई देशों से व्यापार व पर्यटन को बढ़ावा देने के मकसद से बांग्लादेश से भी भारत को मदद मिलेगी। वैसे भी नरेंद्र मोदी सरकार का मुख्य मकसद व्यापार के जरिए देश का चहुंमुखी विकास ही है। लेकिन इन जरूरी समस्याओं के निदान के साथ साहित्य और संस्कृति के आदान-प्रदान की भी जरूरत है।
 

 
 
 K.W.N.S.-गुलाम नबी आजाद ने पार्टी छोड़ने से पहले, राहुल गांधी के निजी सहायकों (पीए) को उन सभी गड़बड़ियों के लिए जिम्मेदार ठहराया, जिनका कांग्रेस सामना कर रही थी. हालांकि उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन आरोप लगाया कि ये सहायक राहुल गांधी तक पहुंच को अवरुद्ध करने के लिए जिम्मेदार थे. लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इस आरोप से हैरान हैं क्योंकि निजी सचिवों और निजी सहायकों को प्रधानमंत्रियों और सभी कांग्रेस अध्यक्षों के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए जाना जाता है. भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की राजनीतिक यात्रा के दौरान एम.ओ. मथाई के महत्व को पुस्तकों में व्यक्त किया गया है. कांग्रेस पार्टी में लगभग 50 वर्ष बिताने वाले गुलाम नबी आजाद इंदिरा गांधी युग के दौरान आर.के. धवन और एम.एल. फोतेदार द्वारा निभाई गई भूमिका से पूरी तरह वाकिफ थे. यह कोई रहस्य नहीं है कि इंदिरा गांधी से उनकी सहायता के बिना कोई नहीं मिल सकता था. यह कांग्रेस पार्टी में राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा था और मुख्यमंत्रियों, कैबिनेट मंत्रियों और वरिष्ठ नेताओं ने इसके साथ रहना सीख लिया था. वी. जॉर्ज का महत्व सभी कांग्रेसी राजीव गांधी के पीए के रूप में जानते थे. राजीव गांधी के निधन के बाद, वे 1991 में सोनिया गांधी के सबसे शक्तिशाली निजी सचिव बने और लंबे समय तक उनकी सेवा की. लेकिन कई नेता अपनी खुद की कार्यप्रणाली बनाते हैं ताकि पीए अपनी भूमिका से आगे न बढ़ें. फिर भी, नेता अपने भरोसेमंद पीएस, ओएसडी और पीए पर बहुत अधिक निर्भर होते हैं जो वीआईपी से मिलने के इच्छुक आगंतुकों को फिल्टर करना शुरू कर देते हैं. संयोग से, आर.के. धवन और एम.एल. फोतेदार पीवी नरसिम्हा राव सरकार में केंद्रीय मंत्री बने. वी. जॉर्ज बहुत कम अंतर से अपनी राज्यसभा सीट से चूक गए. तो राहुल गांधी को दोष क्यों दें! पार्टी का प्रसार करना चाहते हैं पवार ऐसे समय में जब भाजपा महाराष्ट्र, बिहार, झारखंड और अन्य जगहों पर आक्रामक है, एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार इन दिनों दिल्ली और हरियाणा में अपनी पार्टी के आधार का विस्तार करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं. एक तरफ उन्होंने दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशनल क्लब ऑफ इंडिया में पार्टी को मजबूत करने के लिए एक युवा सम्मेलन आयोजित किया, तो दूसरी तरफ हरियाणा से संबंधित पार्टी कार्यकर्ताओं की एक बड़ी सभा की अध्यक्षता की. उन्होंने पार्टी को मजबूत करने के लिए अन्य राज्यों में इस तरह के सम्मेलन आयोजित करने की योजना बनाई है. अंदरूनी सूत्राें का कहना है कि पवार 2024 में लोकसभा चुनावों के दौरान अपनी पार्टी का फैलाव बढ़ाना चाहते हैं. नए एजी का चयन शीघ्र एक अप्रत्याशित कदम के रूप में, प्रधानमंत्री ने भारत के अटॉर्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल से अपना उत्तराधिकारी खोजने के लिए कहा था. 90 वर्षीय वेणुगोपाल को तीन महीने का सेवा-विस्तार दिया गया ताकि वे सरकार को उत्तराधिकारी खोजने में मदद कर सकें. अंतत: नए एजी के नाम की सिफारिश करने के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया गया, जिसने तीन नामों को शॉर्ट-लिस्ट किया, सॉलिसिटर-जनरल तुषार मेहता, राकेश द्विवेदी व सी.एस. वैद्यनाथन. इससे पहले मुंबई के डेरियस जे. खंबाटा का नाम चर्चा में था. हरिवंश बने रहेंगे राज्यसभा के उपसभापति राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश अपने पद पर बने रहने को लेकर असमंजस में थे क्योंकि उनकी पार्टी जनता दल (यू) ने भाजपा से नाता तोड़ लिया था. जद (यू) का राज्यसभा सांसद होने के नाते, उनके पद छोड़ने की उम्मीद थी. जब वह पिछले महीने पटना में पार्टी के सभी सांसदों और विधायकों की बैठक में शामिल नहीं हुए, तो इसे अवज्ञा के रूप में देखा गया. लेकिन बताया जाता है कि नीतीश कुमार ने उन्हें बता दिया था कि वे इस पद पर बने रह सकते हैं क्योंकि उन्हें अगस्त 2018 में पूरे सदन द्वारा सर्वसम्मति से चुना गया था और यह एक गैर-दलीय पद है. हरिवंश नीतीश कुमार के खिलाफ बगावत करते नहीं दिखना चाहते, जिन्होंने उन्हें सार्वजनिक जीवन में लाया. उन्होंने नीतीश कुमार को एक संदेश भेजा था कि वे पार्टी के आदेश का पालन करेंगे. लेकिन अब मामला ठंडा हो चुका है. भाजपा भी सहज है क्योंकि वह राज्यसभा की कार्यवाही को चतुराई और कठोरता के साथ संभाल रहे हैं. और अंत में 28 अगस्त को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में गांधी परिवार के सभी तीन सदस्य शोक संतप्त होते हुए भी शामिल हुए क्योंकि एक दिन पहले ही सोनिया गांधी की मां का इटली में निधन हो गया था. गांधी परिवार 23 अगस्त को भारत से चला गया था और फिर भी उन्होंने वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सीडब्ल्यूसी की बैठक में शामिल होने का फैसला किया, क्योंकि वे संगठनात्मक चुनाव कार्यक्रम की घोषणा में देरी नहीं करना चाहते थे.
 

 
  K.W.N.S.-गुलाम नबी आजाद ने पार्टी छोड़ने से पहले, राहुल गांधी के निजी सहायकों (पीए) को उन सभी गड़बड़ियों के लिए जिम्मेदार ठहराया, जिनका कांग्रेस सामना कर रही थी. हालांकि उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन आरोप लगाया कि ये सहायक राहुल गांधी तक पहुंच को अवरुद्ध करने के लिए जिम्मेदार थे. लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इस आरोप से हैरान हैं क्योंकि निजी सचिवों और निजी सहायकों को प्रधानमंत्रियों और सभी कांग्रेस अध्यक्षों के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए जाना जाता है. भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की राजनीतिक यात्रा के दौरान एम.ओ. मथाई के महत्व को पुस्तकों में व्यक्त किया गया है. कांग्रेस पार्टी में लगभग 50 वर्ष बिताने वाले गुलाम नबी आजाद इंदिरा गांधी युग के दौरान आर.के. धवन और एम.एल. फोतेदार द्वारा निभाई गई भूमिका से पूरी तरह वाकिफ थे. यह कोई रहस्य नहीं है कि इंदिरा गांधी से उनकी सहायता के बिना कोई नहीं मिल सकता था. यह कांग्रेस पार्टी में राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा था और मुख्यमंत्रियों, कैबिनेट मंत्रियों और वरिष्ठ नेताओं ने इसके साथ रहना सीख लिया था. वी. जॉर्ज का महत्व सभी कांग्रेसी राजीव गांधी के पीए के रूप में जानते थे. राजीव गांधी के निधन के बाद, वे 1991 में सोनिया गांधी के सबसे शक्तिशाली निजी सचिव बने और लंबे समय तक उनकी सेवा की. लेकिन कई नेता अपनी खुद की कार्यप्रणाली बनाते हैं ताकि पीए अपनी भूमिका से आगे न बढ़ें. फिर भी, नेता अपने भरोसेमंद पीएस, ओएसडी और पीए पर बहुत अधिक निर्भर होते हैं जो वीआईपी से मिलने के इच्छुक आगंतुकों को फिल्टर करना शुरू कर देते हैं. संयोग से, आर.के. धवन और एम.एल. फोतेदार पीवी नरसिम्हा राव सरकार में केंद्रीय मंत्री बने. वी. जॉर्ज बहुत कम अंतर से अपनी राज्यसभा सीट से चूक गए. तो राहुल गांधी को दोष क्यों दें! पार्टी का प्रसार करना चाहते हैं पवार ऐसे समय में जब भाजपा महाराष्ट्र, बिहार, झारखंड और अन्य जगहों पर आक्रामक है, एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार इन दिनों दिल्ली और हरियाणा में अपनी पार्टी के आधार का विस्तार करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं. एक तरफ उन्होंने दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशनल क्लब ऑफ इंडिया में पार्टी को मजबूत करने के लिए एक युवा सम्मेलन आयोजित किया, तो दूसरी तरफ हरियाणा से संबंधित पार्टी कार्यकर्ताओं की एक बड़ी सभा की अध्यक्षता की. उन्होंने पार्टी को मजबूत करने के लिए अन्य राज्यों में इस तरह के सम्मेलन आयोजित करने की योजना बनाई है. अंदरूनी सूत्राें का कहना है कि पवार 2024 में लोकसभा चुनावों के दौरान अपनी पार्टी का फैलाव बढ़ाना चाहते हैं. नए एजी का चयन शीघ्र एक अप्रत्याशित कदम के रूप में, प्रधानमंत्री ने भारत के अटॉर्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल से अपना उत्तराधिकारी खोजने के लिए कहा था. 90 वर्षीय वेणुगोपाल को तीन महीने का सेवा-विस्तार दिया गया ताकि वे सरकार को उत्तराधिकारी खोजने में मदद कर सकें. अंतत: नए एजी के नाम की सिफारिश करने के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया गया, जिसने तीन नामों को शॉर्ट-लिस्ट किया, सॉलिसिटर-जनरल तुषार मेहता, राकेश द्विवेदी व सी.एस. वैद्यनाथन. इससे पहले मुंबई के डेरियस जे. खंबाटा का नाम चर्चा में था. हरिवंश बने रहेंगे राज्यसभा के उपसभापति राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश अपने पद पर बने रहने को लेकर असमंजस में थे क्योंकि उनकी पार्टी जनता दल (यू) ने भाजपा से नाता तोड़ लिया था. जद (यू) का राज्यसभा सांसद होने के नाते, उनके पद छोड़ने की उम्मीद थी. जब वह पिछले महीने पटना में पार्टी के सभी सांसदों और विधायकों की बैठक में शामिल नहीं हुए, तो इसे अवज्ञा के रूप में देखा गया. लेकिन बताया जाता है कि नीतीश कुमार ने उन्हें बता दिया था कि वे इस पद पर बने रह सकते हैं क्योंकि उन्हें अगस्त 2018 में पूरे सदन द्वारा सर्वसम्मति से चुना गया था और यह एक गैर-दलीय पद है. हरिवंश नीतीश कुमार के खिलाफ बगावत करते नहीं दिखना चाहते, जिन्होंने उन्हें सार्वजनिक जीवन में लाया. उन्होंने नीतीश कुमार को एक संदेश भेजा था कि वे पार्टी के आदेश का पालन करेंगे. लेकिन अब मामला ठंडा हो चुका है. भाजपा भी सहज है क्योंकि वह राज्यसभा की कार्यवाही को चतुराई और कठोरता के साथ संभाल रहे हैं. और अंत में 28 अगस्त को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में गांधी परिवार के सभी तीन सदस्य शोक संतप्त होते हुए भी शामिल हुए क्योंकि एक दिन पहले ही सोनिया गांधी की मां का इटली में निधन हो गया था. गांधी परिवार 23 अगस्त को भारत से चला गया था और फिर भी उन्होंने वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सीडब्ल्यूसी की बैठक में शामिल होने का फैसला किया, क्योंकि वे संगठनात्मक चुनाव कार्यक्रम की घोषणा में देरी नहीं करना चाहते थे.
 

 K.W.N.S.-निगरानी और अग्नि-नियंत्रण रडार, इसे एक दुर्जेय युद्ध मंच बनाते हैं। . आईएनएस विक्रांत की कमीशनिंग भारत के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। नौसेना के युद्धपोत डिजाइन ब्यूरो द्वारा विकसित और कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (सीएसएल) द्वारा निर्मित, विक्रांत भारत का सबसे बड़ा और सबसे जटिल स्वदेश निर्मित युद्धपोत है। 43,000 टन के विस्थापन के साथ, जहाज लगभग 7,500 समुद्री मील की सहनशक्ति और 18 समुद्री मील (इसके आकार और टन भार के लिए महत्वपूर्ण) की परिभ्रमण गति का दावा करता है। जहाज के मिग 29K विमान का अभिन्न बेड़ा, कामोव 31 प्रारंभिक चेतावनी और MH-60R बहु-भूमिका हेलीकॉप्टर, साथ ही अत्याधुनिक शिपबोर्ड अपराध और रक्षा प्रणाली, निगरानी और अग्नि-नियंत्रण रडार, इसे एक दुर्जेय युद्ध मंच बनाते हैं। .
 

 
K.W.N.S.-पिछले पांच वर्षों में साइबर अपराध के मामलों में लगातार वृद्धि हुई है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार, 2016 में साइबर अपराध के 12,317 मामलों में से, 2020 में 50,035 मामले दर्ज किए गए थे। भारत में, सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) के बढ़ते उपयोग के साथ साइबर अपराध बढ़ रहा है। हालांकि, इस खतरनाक प्रवृत्ति के बावजूद, साइबर अपराध की जांच करने के लिए प्रवर्तन एजेंसियों की क्षमता सीमित है। जहां तक ​​इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की स्वीकार्यता का संबंध है, हालांकि पहले भारत के सर्वोच्च न्यायालय के कुछ परस्पर विरोधी निर्णय थे, कानून अंततः अर्जुन पंडित राव खोतकर बनाम कैलाश कुशानराव गोरंट्याल एट अल में तय किया गया था। अदालत ने माना कि भारतीय साक्ष्य (आईई) अधिनियम की धारा 65 बी (4) के तहत एक प्रमाण पत्र (माध्यमिक) इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की स्वीकार्यता के लिए एक अनिवार्य पूर्व-आवश्यकता थी यदि मूल रिकॉर्ड का उत्पादन नहीं किया जा सकता था। राज्य सूची में ‘पुलिस’ और ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ के साथ, अपराध की जांच और आवश्यक साइबर बुनियादी ढांचे के निर्माण की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्यों के पास है। साथ ही, आईटी अधिनियम और प्रमुख कानून केंद्रीय कानून होने के कारण, केंद्र सरकार प्रवर्तन एजेंसियों के लिए समान वैधानिक प्रक्रियाओं को विकसित करने के लिए कम जिम्मेदार नहीं है। हालांकि भारत सरकार ने सभी प्रकार के साइबर अपराध से निपटने के लिए गृह मंत्रालय के तहत भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) की स्थापना सहित कई कदम उठाए हैं, लेकिन इसकी कमी को दूर करने के लिए और भी बहुत कुछ किए जाने की आवश्यकता है। आधारभूत संरचना।
 

 
K.W.N.S.-कभी-कभी, केवल एक पतली रेखा शक्ति के उपयोग को इसके दुरुपयोग से अलग करती है। दिसंबर 2016 में तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता की मृत्यु का कारण बनने वाली परिस्थितियों की जांच करने वाले जांच आयोग के गठन में राजनीतिक गणना, न कि चिकित्सा की भावना या जनहित। अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके) अलगाव की अवधि के बाद, पूर्व मुख्यमंत्री ओ पनीरसेल्वम ने जयललिता की मौत की जांच के लिए वापस आने के लिए एक पूर्व शर्त रखी। अन्नाद्रमुक के एडप्पादी के. पलानीस्वामी को कथित विरोधी के रूप में स्वीकार करना आसान लगा – वी.के. जयललिता की सहयोगी शशिकला – एक आम दुश्मन थीं। इस प्रकार, ए. अरुमुघस्वामी जांच आयोग (सीओआई) का गठन सितंबर 2017 में किया गया था। इस पोस्टमॉर्टम डीकंस्ट्रक्शन में परेशानी का पहला संकेत तब था जब अपोलो अस्पताल, जहां जयललिता की मृत्यु तक उनका इलाज किया गया था, ने दावा किया कि सीओआई आपराधिक इरादे को ठीक करने की मांग कर रहा था। अस्पताल की ओर से।
 

 K.W.N.S.-व्यापार घाटे पर काबू जरूरी (30 अगस्त) चेतावनियों से भरपूर लेख था। सबसे पहले हमें यह जान लेना चाहिए कि व्यापार घाटा क्या होता है? व्यापार में अगर आयात और निर्यात का मूल्य एक समान हो तो इसे संतुलित व्यापार कहते हैं, इसका किसी देश को नुकसान नहीं होता, लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता। अगर निर्यात का मूल्य ज्यादा हो और आयात का मूल्य कम हो तब व्यापार शेष अनुकूल माना जाता है। इसे अच्छा समझा जाता है, क्योंकि इससे हमें विदेश से आमदनी प्राप्त होती है। लेकिन अगर निर्यात का मूल्य कम हो और आयात का मूल्य ज्यादा हो तो व्यापार में घाटा होता है, इसे प्रतिकूल व्यापार शेष भी कहते हैं। इसमें देश को नुकसान होता है क्योंकि हमें अपने साधन दूसरे देश को देने पड़ते हैं। अगर विपरीत व्यापार शेष लंबे समय तक चले तो वह देश के लिए खतरे की घंटी है ,क्योंकि ऐसा होने से देश के साधन विदेशों में चले जाते हैं और देश के विकास के लिए कम पूंजी देश में रह जाती है। हमारे देश को इसी लंबे समय के व्यापार घाटे या विपरीत व्यापार संतुलन का सामना करना पड़ रहा है, जो कि देश के लिए खतरे की घंटी है।
एक महीना पहले हमारा व्यापार घाटा 31.02 अरब डालर था, जो अब तक का उच्चतम व्यापार घाटा था। एक साल पहले हमारा व्यापार घाटा 10.63 अरब डालर था। यानी अब हमारा व्यापार घाटा पहले के मुकाबले तीन गुना बढ़ गया। हम विदेश से तेल, पेट्रोल, दवाइयों का कच्चा माल, कोयला, रसायनिक खाद आदि मंगवाते हैं। रूस यूक्रेन युद्ध के कारण हमें कोयला पहले से तीन गुना महंगा मिलने लगा है। इसके अलावा आजकल भारत का रुपया डालर के मुकाबले बहुत कमजोर है। इससे आयात की जाने वाली वस्तुएं हमें महंगी मिलती हैं। आखिर इसका समाधान तो ढूंढ़ना ही पड़ेगा। इसका समाधान यह है कि हमें अपना निर्यात बढ़ाना चाहिए। हमारा व्यापार शेष चीन के साथ बहुत विपरीत है। चीन भारत से बहुत कम चीजें मंगवाता है, लेकिन हम चीन से उससे कई गुना ज्यादा मंगवाते हैं। इसका समाधान यह है कि हमें चीन से मंगाई जाने वाली वस्तुओं का आयात प्रतिस्थापन ढूंढ़ना पड़ेगा और आत्मनिर्भरता बढ़ाना पड़ेगा। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी की रिपोर्ट में बताया गया है कि हमारे देश में वर्ष 2021 में सड़क दुर्घटनाओं में डेढ़ लाख से ऊपर लोगों की मौत हुई। उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा, इक्कीस हजार से ऊपर, तमिलनाडु में पंद्रह हजार से ऊपर और ऐसे ही आंकड़े देश के विभिन्न राज्यों के हैं। इन सड़क दुर्घटनाओं में दुपहिया वाहनों से दुर्घटनाओं में जान गंवाने वालों का आंकड़ा भी भारी है।

हमारे देश में दिन-प्रतिदिन वाहनों की संख्या बढ़ती जा रही, वाहनों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ सड़क हादसों में भी बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। देश में सड़क हादसों में एक दिन में जितने लोग जान गंवाते हैं, उतने तो आतंकवाद का शिकार नहीं होते। सड़क हादसों के वैसे तो बहुत से कारण है, लेकिन वाहन चलाते समय अधिक भार लादना और तेज रफ्तार भी हादसों का कारण है। इन पर सभी को नियंत्रण करना चाहिए। ऐसे हादसों के लिए मात्र सरकारों को दोष नहीं दिया जा सकता, बल्कि इसके लिए वे लोग भी कम जिम्मेदार नहीं हैं, जो यातायात के नियमों का पालन मात्र चालान कटने के डर से कभी-कभार करते हैं। अगर लोग सभी यातायात नियमों का पालन गंभीरता से करें तो देश में सड़क हादसे न के बराबर हों। जिस गाड़ी कि जितनी क्षमता हो उसमें उतनी सवारियां बिठाई जानी चाहिए। अगर कोई वाहन चालक ठूंस-ठूंस कर सवारियां बिठाने की कोशिश करे, तो उसके वाहन में बैठेन की भूल कदापि नहीं करनी चाहिए। अगर छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखा जाए तो सफर सुहाना बन सकता है।
 

 K.W.N.S.-किसी समाज और देश को भीतर से खोखला करना हो तो उसकी युवाशक्ति को नशे के गर्त में धकेलना काफी है। हाल के वर्षों में देश के अलग-अलग हिस्सों में नशीले पदार्थों की बरामदगी, जब्ती और मादक पदार्थों की आपूर्ति के संजाल के खुलासों पर नजर दौड़ाई जाए, तो कह सकते हैं कि नशे की गिरफ्त में जाती हमारी युवा पीढ़ी ऐसे ही संकट से दो-चार है। मामला सिर्फ यह नहीं है कि चौकसी बरते जाने के कारण देश में मादक पदार्थों की भारी-भरकम खेपें पकड़ी जा रही हैं, बल्कि गंभीर पहलू यह भी है कि आखिर इस नेटवर्क में कौन लोग शामिल हैं, ये मादक पदार्थ कहां से आ रहे और कहां जा रहे हैं और इतनी भारी खपत हमारे देश के किन इलाकों व समाज के किन वर्गों के बीच हो रही है। इस समस्या का एक सिरा इससे भी जुड़ता है कि दिखावे की परंपरा, अमीरों जैसी रहन-सहन वाली शैली, परिवारों की टूटन, बेरोजगारी या अकेलेपन आदि ने ही तो कहीं हमारी युवा पीढ़ी को जाने-अनजाने नशे की अंधेरी गलियों में नहीं धकेल दिया है! देश के विभिन्न हिस्सों में मादक पदार्थों की धरपकड़ में इधर काफी तेजी आई है। हाल में मुंबई की मादक द्रव्य निरोधी इकाई (एंटी नारकोटिक्स सेल) ने गुजरात के भरूच जिले के अंकलेश्वर में नशीले पदार्थ बनाने वाली फैक्ट्री का भंडाफोड़ कर एक हजार करोड़ रुपए से ज्यादा के पांच सौ तेरह किलो नशीले पदार्थों की बरामदगी के साथ सात लोगों को पकड़ा था। इसी तीन अगस्त को मुंबई के नालासोपारा से चौदह अरब रुपए की नशीली दवा मेफेड्रान-एमडी पकड़ी गई थी। पता चला था कि ये खेपें उच्च वर्ग के युवाओं के दायरों में बेची जा रही हैं। यही नहीं, मादक पदार्थों के इस गोरखधंधे में लगे लोग कारोबार के लिए सोशल मीडिया और अन्य आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं, ताकि उनकी आसानी से धरपकड़ न हो सके। उल्लेखनीय यह भी है कि मादक पदार्थों की यह आपूर्ति देश के बाहर के कई ठिकानों से हो रही है। गुजरात में मुंद्रा और पीपीववा जैसे निजी बंदरगाह देश में बाहर से नशीले पदार्थों के कारोबार के प्रवेश द्वार बन गए हैं। वर्ष 2017 से 2020 के दौरान गुजरात में ढाई लाख करोड़ रुपए की नशीली दवाएं पकड़ी जाना इस बात का संकेत है कि एजंसियां इस गोरखधंधे में शामिल लोगों को पकड़ने में नाकाम रही हैं। वरना कैसे ये मादक पदार्थ हमारे यहां पहुंच रहे हैं? शायद इसकी एकमात्र वजह यही है कि इस कारोबार में लगे लोगों को कहीं न कहीं राजनीतिक संरक्षण हासिल है और इसलिए पुलिस व केंद्रीय एजंसियां अवैध कारोबार में लगे असली दोषियों को पकड़ने में हिचकिचाती हैं। नशीले पदार्थों की तस्करी में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल बढ़ना और चिंता पैदा कर रहा है। यह एक किस्म का नार्को आतंकवाद है जिस पर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है। वर्ष 2019 में अटारी-वाघा सीमा पर पांच सौ किलो से ज्यादा हेरोइन बरामद होने के दो साल बाद पिछले साल दिसंबर में गुजरात तट पर एक पाकिस्तानी नाव से सतहत्तर किलो हेरोइन की जब्ती से ऐसा संकेत मिला था कि सीमा पर सख्ती के चलते आतंकवादियों को हथियार व गोला-बारूद जुटाने में मदद के लिए नशे की खेपों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके सबूत भी मिल चुके हैं कि बड़े पैमाने पर ड्रोनों का इस्तेमाल भारतीय क्षेत्रों में नशे की खेप पहुंचाने के लिए किया जाता रहा है। सितंबर, 2020 में गुजरात के कच्छ इलाके में मुंद्रा बंदरगाह पर करीब तीन हजार किलो हेरोइन की बरामदगी ने देश को चौंका दिया था। इससे यह पता चला था कि नशे की तस्करी के लिए समुद्री मार्गों का भी लगातार इस्तेमाल हो रहा है। भारत को यह खेप अफगानिस्तान से ईरान के रास्ते भेजी गई थी, जो यह बताता है कि नई पीढ़ी को पथ भ्रष्ट करने के लिए किस तरह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साजिशें हो रही हैं। असल में नशीले पदार्थों की तस्करी में जिस तरह के तरीके अपनाए जाने लगे हैं, उनके कारण भी इनकी आपूर्ति को रोक पाना मुश्किल होता रहा है। जैसे कच्छ में मुंद्रा बंदरगाह पर तीन हजार किलो हेरोइन ईरानी टेल्कम पाउडर की शक्ल में बरामद हुई थी। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इक्कीस हजार करोड़ रुपए कीमत वाली इस खेप को सबसे बड़ी बरामदगी बताया गया था। वर्ष 2021 में मादक पदार्थों की धरपकड़ के आंकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन बताता है कि पहले पूरे साल जांच एजंसियां नशे की जो खेपें पकड़ती थीं, उसमें कुल मिला कर सालाना बरामदगी ढाई हजार किलो तक रहती थी, लेकिन मुंद्रा पोर्ट पर एक ही बार में तीन हजार किलो हेरोइन का देश में आना बताता है कि देश में या तो इसकी खपत कई गुना बढ़ गई है या फिर भारत नशीले पदार्थों की आपूर्ति के किसी नेटवर्क का बड़ा केंद्र बन गया है। दोनों ही सूरतों में हालात चिंताजनक हैं। यदि पकड़ी गई खेप विशुद्ध हेरोइन हुई तो देश में खपत को आधार बनाने से जुड़ा आकलन बताता है कि इसे पचहत्तर लाख युवाओं को नशे की चपेट में लाया जा सकता था। इस तरह तीन हजार किलो हेरोइन एक व्यक्ति द्वारा एक दिन में सेवन की जाने लायक चार सौ साठ मिलीग्राम की न्यूनतम पचहत्तर लाख खुराकों में तब्दील हो सकती है। अगर यह हेरोइन मिलावटी हुई तो भी इससे पंद्रह लाख लोगों के इस्तेमाल लायक खुराकों में बदला जा सकता है। ऐसी धरपकड़ अकेले गुजरात में नहीं हुई हैं, बल्कि महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, पंजाब, तेलंगाना, तमिलनाडु, राजस्थान और मध्यप्रदेश आदि राज्यों में मादक पदार्थ तस्करी के कई बड़े गिरोहों का का भंडाफोड़ हुआ है। यह भी उल्लेखनीय है कि जांच एजंसियों को इनकी तस्करी के रास्तों का अंदाजा है। वैसे तो सबसे ज्यादा मादक पदार्थ अफगानिस्तान से आते हैं। इसके अलावा नेपाल, पाकिस्तान, म्यांमा और बांग्लादेश के रास्ते से भी नशीले पदार्थ भारत आ रहे हैं। इससे यह अंदाजा सहज लगाया जा सकता है कि देश में युवा बड़ी तेजी से नशे की जद में आ रहे हैं। सरकार, पुलिस प्रशासन और जांच एजंसियां अगर सख्ती करें और चुस्त निगरानी करें तो मादक पदार्थों के अवैध कारोबार को ध्वस्त करना कोई मुश्किल काम है। लेकिन इसमें तकनीकी चुनौतियां भारी पड़ रही हैं। देखा गया है कि कोरोना काल में नशीले पदार्थों का कारोबार इंटरनेट के अवैध स्वरूप डार्कनेट और समुद्री मार्ग के जरिए बढ़ा है। दावा है कि डार्कनेट बाजार में नब्बे प्रतिशत बिक्री कथित तौर पर नशीले पदार्थों से संबंधित है। संभवत: यह एक बड़ी वजह है जिसके कारण देश में हेरोइन की बरामदगी तीन गुना से अधिक हो गई है। तस्कर आधुनिक तकनीकों का सहारा लेकर कानून-व्यवस्था की आंख में धूल झोंकने में कामयाब हो जाते हैं। ऐसे में सरकारी एजंसियों को साइबर मोर्चे पर अंकुश लगाने के लिए उन्नत तकनीकों का इस्तेमाल करना होगा। हालांकि यह समस्या तब तक नहीं सुलझेगी, जब तक कि समाज इसकी रोकथाम में अपनी सक्रियता नहीं दिखाएगा। नशीले पदार्थों का सेवन असल में एक सामाजिक समस्या भी है। –अभिषेक कुमार सिंह

 

 
K.W.N.S.-आर.के. सिन्हा यह कोई बहुत पुरानी बात नहीं हैं जब अंतरराष्ट्रीय स्तर के खेल आयोजनों में भारत की लगभग सांकेतिक उपस्थिति ही रहा करती थी। हम हॉकी में तो कभी-कभार बेहतर प्रदर्शन कर लिया करते थे, पर शेष खेलों में हमारा प्रदर्शन औसत से नीचे या खराब ही रहता था। हमारे खिलाड़ियों- अधिकरियों की टोलियां वहां पर जाकर मौज-मस्ती करके वापस आ जाया करती थी। हिन्दुस्तानी खेल प्रेमियों की निगाहें तरस जाती थीं कि एक अदद पदक को देखने के लिए। पर गुजरे दशक से स्थितियां तेजी से बदल रही हैं खासकर मोदी सरकार के आने के बाद। सबसे बड़ी बात ये है कि हम बैडमिंटन में विश्व चैंपियन बनने लगे हैं, हमारा धावक ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतता है और क्रिकेट में तो हम विश्व की सबस बड़ी शक्ति हैं ही। इस कामनवेल्थ गेम में 22 स्वर्ण पदकों सहित कुल 61 पदकों के साथ भारत चौथे स्थान पर पहुँच गयाI पहली बार भारत को 22 स्वर्ण, 16 रजत और 23 कांस्य पदक मिलेI 6 स्वर्ण पदक तो भारत ने कुश्ती में कब्जाये और 6 अन्य में जीते I 8 स्वर्ण पदक सेकंड फील्ड में हासिल कीI पैरा पॉवर लिफ्टिंग में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचा और भारतीय शटलर पी. वी सिन्धु ने आखिरी दिन बैडमिंटन में स्वर्ण पदक जीता I बैडमिंटन में पी.वी.सिन्धु के अतिरिक्त लक्ष्य सेन ने एकल में और चिराग -सात्विक साईराज ने जुगल में स्वर्ण पदक जीता I ईशा-गायत्री और श्रीकांत ने भी कास्यं पदक प्राप्त किये I यह आजाद भारत के इतिहास में पहली बार इस प्रकार पदकों की बारिश हुई I इसका कुछ श्रेय तो लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को तो जायेगा ही I बेटियां वेटलिफ्टिंग तथा कुश्ती जैसी स्पर्धाओं में देश की झोली पदकों से भर देती हैं। चालू कॉमनवेल्थ खेलों की वेटलिफ्टिंग स्पर्धाओं में मीराबाई चानू, जेरेमी लालरिनुंगा और अचिंता शुली ने भारत के लिए तीन गोल्ड मेडल जीते, जबकि संकेत महादेव सरगर, बिंद्यारानी देवी सोरोखैबम और विकास ठाकुर ने सिल्वर मेडल और लवप्रीत सिंह, गुरुराजा, हरजिंदर कौर और गुरदीप सिंह ने ब्रॉन्ज मेडल जीता। फिर कुश्ती मुकाबलों में भारतीय खिलाड़ियों का जलवा देखने को मिला। कुश्ती मुकाबलों के पहले ही दिन साक्षी मलिक ने महिला 62 किलो भारवर्ग के फाइनल में कनाडा की एना गोडिनेज गोंजालेज को हराकर गोल्ड मेडल जीता। भगवान शिव के भक्त बजरंग पूनिया ने भी भारत के लिए गोल्ड मेडल जीता। पुरुषों की फ्रीस्टाइल 65 किलो भारवर्ग के फाइनल में बजरंग पूनिया ने कनाडा के एल. मैकलीन को 9-2 मात दी। वहीं अंशु मलिक सिल्वर मेडल जीतने में कामयाब रहीं। जबकि दिव्या काकरान और मोहित ग्रेवाल कांस्य का पदक हासिल करने में सफल रहे। कुश्ती में रवि दहिया और दीपक पुनिया ने भी स्वर्ण पदक हासिल किये I एक तरफ हमारे खिलाड़ी कॉमनवेल्थ खेलों में बेहतरीन प्रदर्शन कर रहे हैं, दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चेन्नई में 44वें शतरंज ओलंपियाड का उद्घाटन करते हैं। जो पहली बार भारत में हो रही है। शतरंज ओलंपियाड का चेन्नई से 50 किलोमीटर दूर मामल्लापुरम में हो रहा है और इसमें रिकॉर्ड खिलाड़ी भाग ले रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा,” यह खास टूर्नामेंट है और हमारे लिये यह सम्मान की बात है कि इसका आयोजन भारत में हो रहा है और वह भी तमिलनाडु में जिसका शतरंज से सुनहरा नाता रहा है।” तमिलनाडु सरकार ने टूर्नामेंट का जबर्दस्त प्रचार भी किया है । पारंपरिक तमिल परिधान पहने ओलंपियाड के शुभंकर ‘थम्बी’ के कटआउट जगह-जगह लगाये गए हैं। ओलंपियाड रूस में होना था I लेकिन, यूक्रेन पर रूस के सैन्य हमले के बाद उससे मेजबानी छीन ली गई। शतरंज के जानकारों का मानना है कि इसके आयोजन सन्देश में शतरंज की लोकप्रियता और बढेगी । कॉमनवेल्थ खेलों से ठीक पहले ओलंपिक चैंपियन नीरज चोपड़ा ने वर्ल्ड एथलेटिक्स चैंपियनशिप में इतिहास रच दिया था। उन्होंने इस चैंपियनशिप में 19 साल बाद भारत को पदक दिलाया। उनकी उपलब्धि पर सारा देश गर्व कर रहा था। वे दूसरे स्थान पर रहने के बावजूद इतिहास रचने में कामयाब रहे। वह भारत के पहले पुरुष खिलाड़ी बन गए हैं, जिन्होंने वर्ल्ड एथलेटिक्स चैंपियनशिप में पदक हासिल किया है। उनसे पहले लंबी कूद में भारतीय महिला एथलीट अंजू बेबी जॉर्ज ने यहां पदक जीता था। अंजू ने साल 2003 में हुई वर्ल्ड एथलेटिक्स चैंपियनशिप में मेडल अपने नाम किया था। और बीती मई के महीने में भारत ने थॉमस कप जीता था। लक्ष्य सेन, किदांबी श्रीकांत, एच एस प्रणय और सात्विकसाईराज रंकीरेड्डी-चिराग शेट्टी ने जो धैर्य और दृढ़ संकल्प दिखाया उसने उस धारणा को धराशायी कर दिया कि भारतीय खेलों के लिए नहीं बने हैं। लंबे समय से हम भारतीयों ने अपने मन में इन भ्रांतियों को पनपने दिया। कहा जाता रहा है कि भारतीयों में वह जीतने वाला दम नहीं होता। हम सिर्फ देश में ही अच्छा खेलते हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेकार साबित होते हैं। अफसोस कि हमने खुद दूसरों को अपने ऊपर हंसने का मौका दिया है। भारतीय बैडमिंटन की लंबी छलांग की बात करेंगे तो पी.वी. सिधु को कैसे नजरअंदाज कर सकते हैं। उसने कुछ हफ्ते पहले सिंगापुर ओपन चैंपियनशिप को जीता। उसने अपनी चिर प्रतिद्वंद्वी चीन की वैंग झी यी को धूल चटाई। सिंधु के लिए ये किसी कड़ी परीक्षा की तरह था। लेकिन वो जंग ही क्या जिसे भारत की सिंधु पार नहीं कर पाए। मुकाबला टक्कर का था पर कोर्ट पर सिंधु की फुर्ती के सामने चीनी दीवार ढेर हो गई। सिंधु ने महत्वपूर्ण लम्हों पर धैर्य बरकरार रखना सीख लिया है। सिंधु का मौजूदा सत्र का यह तीसरा खिताब है। सिंधु ओलिंपिक में रजत और कांस्य पदक के अलावा विश्व चैंपियनशिप में एक स्वर्ण, दो रजत और दो कांस्य पदक भी जीत चुकी हैं। बहरहाल, ये कहना पड़ेगा कि भारत खेलों में चौतरफा स्तर पर आगे बढ़ रहा है। हमारी क्रिकेट टीम ने हाल ही में पहले इंग्लैंड में और वेस्ट इंडीज में शानदार प्रदर्शन किया। ये वास्तव में सुखद स्थिति है। पर एक पहलू को देखना होगा कि हमें खेलों में उपलब्धियां पूर्वोत्तर या हरियाणा से ही अधिक क्यों मिल रही हैं। दरअसल चानू मीराबाई और साक्षी मलिक जैसी महिला खिलाड़ी सारे देश की आधी आबादी के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं। इन सबने कठिन और विपरीत हालातों में भी अपने देश का नाम रोशन किया है। इन्होंने देश को गौरव और आनंद के अनेक लम्हें दिये हैं। ये ओलंपिक तथा कॉमनवेल्थ जैसे मंचों पर अपनी श्रेष्ठता को साबित कर रही हैं। इनकी कामयाबियों से सारा देश अपने को गौरवान्वित महसूस करता है। इनके रास्ते पर देश की लाखों-करोड़ों बेटियां भी चलें तो अच्छा रहेगा। पर अब भी बिहार, झारखंड तथा उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से सफल खिलाड़ियों का निकलना बाकी है। इन राज्यों में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। उभरती हुई प्रतिभाओं को सुविधायें देनी होंगी। झारखंड से बेहतरीन हॉकी खिलाड़ी खास तौर पर निकलते रहे हैं। भारत ने कॉमनवेल्थ खेलों की कुश्ती स्पर्धा में उम्मीद के मुताबिक सही प्रदर्शन किया। भारत को पदक दिलवाने वाले लगभग सब पहलवान हरियाणा से थे। इन हरियाणा के पहलवानों पर देश को गर्व है। पर उत्तर प्रदेश के वाराणसी, इलाहाबाद, आजमगढ़, गाजीपुर, गोरखपुर आदि जिलों के अपने अखाडों से श्रेष्ठ पहलवान क्यों नहीं निकल रहे हैं? क्या हालत है इन जिलों के अखाड़ों की? उत्तर सुनकर सिर शर्म से झुक जाएगा कि बदहाल इन आखाड़ो को कोई पूछने वाला नही है। रुस्तमे हिन्द मंगला राय, हिन्द केसरी विजय बहादुर, मनोहर पहलवान कभी तो इन्हीं अखाड़ों से निकले थे। बिहार को भी खेलना होगा। याद नहीं आता कि 10-12 करोड़ की आबादी वाले प्रदेश से कब कोई नामवर खिलाड़ी निकला । बिहारी समाज को खेलों पर फोकस करना होगा। खेलों में करियर बनाना कतई गलत नहीं है। इन सब राज्यों में श्रेष्ठ खेल मैदान बनाये जाने चाहिए। इन सब राज्यों में खेलों का कल्चर विकसित करना जरूरी है। हरेक भारतवासी की यह चाहत है कि भारत दुनिया में खेलों की महाशक्ति बने। बेशक, हम इस दिशा में तेजी से बढ़ भी रहे हैं। लेकिन, अब भी हमारे देश के कुछ राज्यों में खेलों की संस्कृति विकसित नहीं हो पा रही है। इसी तरह से दिल्ली, मुंबई, कोलकाता तथा कुछ अन्य महानगरों से भी पदक दिलवाने वाले खिलाड़ी सामने नहीं आ रहे हैं। दिल्ली में 1982 के एशियाई खेल हुए। उसके बाद 2012 में क़ॉमनवेल्थ खेल हुए। इस लिए यहां तमाम विश्व स्तरीय स्टेडियम बने। इनमें उच्च कोटि की सुविधाएं दी गईं। इसके बावजूद दिल्ली भी बहुत सारे खिलाड़ी देश को नहीं दे रही है। इन पहलुओं पर भी गौर करने की जरूरत है।
 

 

K.W.N.S.-भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने जनजातीय गौरव द्रौपदी मुर्मू को भारत के सर्वोच्च, राष्ट्रपति पद के लिए प्रत्याशी घोषित कर न केवल समाज के सभी वर्गों के प्रति सम्मान के भाव को पुनः सिद्द किया है अपितु कांग्रेस शासन के उस अंधे युग के अंत की भी घोषणा भी कर दी है, जिसमें सम्मान और पद अपने-अपने लोगों को पहचान कर बांटे जाते थे। सर्वोच्च पद को सुशोभित करेंगी द्रौपदी मुर्मू भारतीय लोकतंत्र में यह पहली बार होगा जब कोई आदिवासी और वह भी महिला, इस सर्वोच्च पद को सुशोभित करेगी। भारतीय जनता पार्टी की सोच हमेशा से ही भेदभाव रहित, समरस तथा समानतामूलक समाज की स्थापना की रही है। भाजपा को अपने शासन काल में तीन अवसर प्राप्त हुए और तीनों अवसरों पर उसने समाज के तीन अलग-अलग समुदायों से राष्ट्रपति का चयन किया। सर्वप्रथम अल्पसंख्यक वर्ग से महान वैज्ञानिक और कर्मयोगी डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, फिर दलित समुदाय के माननीय श्री रामनाथ कोविंद जी और अब जनजातीय समुदाय से माननीया श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी। हमें यह कहते हुए प्रसन्नता है कि अभी हाल ही में संपन्न हुए राज्यसभा के लिए चुनाव में मध्यप्रदेश से हमने दो बहनों को राज्यसभा के लिए निर्विरोध निर्वाचित किया है जिसमें वाल्मीकि समाज की बहन सुमित्रा वाल्मीकि भी हैं। भारतीय जनता पार्टी अद्वैत दर्शन के एकात्म मानववाद को मानती है, जिसमें कहा गया है – ‘तत्वमसि’ अर्थात् ‘तू भी वही है’। पं. दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानव दर्शन भी अद्वैत पर ही आधारित है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का ‘सबका साथ, सबका विकास’ का संकल्प भी एकात्म मानववाद की भावना से ही निकला हुआ है। मोदी जी के निर्णयों में उनकी दूरदृष्टि और संवेदनशीलता हर भारतीय को स्पष्ट महसूस होती है। कठिनाइयों से भरा रहा है द्रौपदी मुर्मू जी का जीवन मुझे याद आता है कि द्रौपदी मुर्मू जी को उड़ीसा विधानसभा में सर्वश्रेष्ठ विधायक के सम्मान से सम्मानित किया था और इस सम्मान का नाम था- नीलकंठ सम्मान। द्रौपदी मुर्मू समाज में सेवा का अमृत बांटती रही हैं। उड़ीसा के बैदापैसी आदिवासी गांव में जन्मीं द्रौपदी मुर्मू जी ने अपने जीवन में कठोरतम परीक्षाएं दी हैं। उनके विवाह के कुछ वर्ष बाद ही पति का देहान्त हुआ और फिर दो पुत्र भी स्वर्गवासी हो गए। उन्होंने विपरीत आर्थिक परिस्थितियों में संघर्ष का मार्ग चुना और अपनी एक मात्र पुत्री के पालन पोषण के लिए शिक्षक और लिपिक जैसी नौकरियां कीं। उन्होंने कड़ी मेहनत से पुत्री को योग्य बनाया। जनसेवा की भावना से ओतप्रोत द्रौपदी जी ने रायरंगपुर नगर पंचायत में पार्षद का चुनाव जीत कर सक्रिय राजनीति की शुरुआत की। वे भाजपा के अनुसूचित जनजाति मोर्चा से जुड़ी रहीं और राष्ट्रीय कार्यकारिणी की सदस्य भी रहीं। उड़ीसा में बीजू जनता दल एवं भाजपा की सरकार में मंत्री रहीं और 2015 में झारखण्ड की पहली महिला राज्यपाल बनीं। समाज के लोग लेते हैं प्रेरणा आदिवासी हितों की रक्षा के लिए वे इतनी प्रतिबद्ध रहीं कि तत्कालीन रघुवरदास सरकार के आदिवासियों की भूमि से संबंधित अध्यादेश पर इसलिए हस्ताक्षर नहीं किए, क्योंकि उन्हें संदेह था कि इससे आदिवासियों का अहित हो सकता है। वे किसी भी प्रकार के दबाव के आगे नहीं झुकीं। यही कारण है कि उड़ीसा में लोग उन्हें आत्मबल, संघर्ष, न्याय तथा मूल्यों के प्रति समर्पित ऐसी सशक्त महिला के रूप में देखते हैं जिनसे समाज के लोग प्रेरणा लेते हैं। भारतीय जनता पार्टी, प्राचीन भारत में महिलाओं, दलितों और आदिवासियों को जो गौरव और सम्मान प्राप्त था उसे पुनर्स्थापित करना चाहती है। विदेशी आक्रान्ताओं और स्वतंत्रता के पश्चात स्वार्थी राजनीतिक दलों ने इन वर्गों को सेवक या वोट बैंक बना दिया था, भाजपा उन्हें पुन: सामाजिक सम्मान और आत्मगौरव प्रदान करना चाहती है। हम चाहते हैं कि भारत में फिर अपाला, घोषा, लोपामुद्रा, गार्गी, मैत्रेयी जैसी महिलाओं के ऋषित्व की पूजा हो। मनुष्य का जन्म से नहीं, कर्म से मूल्यांकल हो, जैसे वाल्मीकि, कबीर या रैदास का होता रहा है। सामाजिक सोच और व्यवहार में महिलाओं, आदिवासी और दलितों को पर्याप्त सम्मान प्राप्त हो। इसी लक्ष्य को सामने रख कर श्री रामनाथ कोविंद या श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जैसे इन वर्गों के नेताओं को शीर्ष सम्मान देना भारतीय जनता पार्टी का उद्देश्य रहा है। सामाजिक सोच को सही दिशा देने का संकल्प भारतीय जनता पार्टी सत्ता में केवल शासन करने के लिए नहीं है। हमारा उद्देश्य है कि भ्रमित हो चुकी सामाजिक सोच को सही दिशा दी जाए। हम भारतीय आदर्श जीवन मूल्यों को पुनर्स्थापित करने के लिए सत्ता में हैं। हम ऋग्वेद के इस मंत्र कि “ज्योतिस्मत: पथोरक्ष धिया कृतान्” अर्थात् जिन ज्योतिर्मय (ज्ञान अथवा प्रकाश) मार्गों से हम श्रेष्ठ करने में समर्थ हों सकते हैं, उनकी रक्षा की जाए। हम समभाव को शिरोधार्य करते हैं और ज्योतिर्मय मार्गों की रक्षा के लिए वचनबद्ध हैं। हम राजनीतिक आडम्बर के माध्यम से भोली और भावुक जनता को भ्रमित करने वाले लोगों से जनता को बचाने और उसे अंधेरे कूप से निकालने और गिरने वालों को रोकने के लिए प्रतिबद्ध हैं। हम जनता को वहां से बचाना चाहते हैं, जहां परिवारवाद का अजगर कुण्डली मार कर उनका शोषण करने को जीभ लपलपा रहा है। जहां लोकतंत्र का सामन्तीकरण हो गया है और ठेके पर राजनीतिक जागीरें दी जा रही थीं। अब वह समय चला गया जब चापलूसी करने वालों को सम्मानों और पुरस्कारों से अलंकृत किया जाता था। स्वामी विवेकानन्द का राष्ट्रोत्थान का आह्वान “उत्तिष्ठ जाग्रत प्राप्य वरन्निबोधत” हमारे प्राणों में गूंजता है। हम इसे जन-जन की रक्त वाहिनियों में प्रवाहित होने वाले रक्त की ऊष्मा बना देना चाहते हैं। हर वर्ग का सम्मान हमारी प्रवृत्ति भारतीय जनता पार्टी ने न केवल दलित, आदिवासी और महिलाओं को शीर्ष पद पर पहुंचा कर इन वर्गों का सम्मान किया है अपितु राष्ट्र के सर्वोच्च पद्द्म सम्मानों को भी ऐसे लोगों के बीच पहुंचाया जो उनके सच्चे हकदार थे। मोदी जी ने अपनी दूरदृष्टि से वास्तविक लोगों को पहचाना। अब पद्म पुरस्कार राष्ट्र की संस्कृति, परंपरा और प्रगति के लिए महान कार्य करने वाले वास्तविक व्यक्तियों, तपस्वियों, साहित्यकारों, कलाकारों और वैज्ञानिकों को दिए जा रहे हैं। पिछले पद्म सम्मान समारोह में, 30 हज़ार से अधिक पौधे लगाने और जड़ी बूटियों के पारंपरिक ज्ञान को बांटने वाली कर्नाटक की 72 वर्षीय आदिवासी बहन तुलसी गौड़ा को दिया गया। उन्हें नंगे पांव पद्म पुरस्कार लेते देखकर किसका मन भावुक नहीं हुआ होगा? किसका मस्तक गर्व से ऊंचा नहीं हुआ होगा? हजारों लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार करने वाले अयोध्या के भाई मोहम्मद शरीफ हों या फल बेच कर 150 रुपये प्रतिदिन कमा कर भी अपनी छोटी सी कमाई से एक प्रायमरी स्कूल बना देने वाले मंगलोर के भाई हरिकेला हजब्बा हों, क्या ये पहले कभी पद्म पुरस्कार पा सकते थे। योग्य व्यक्तियों को किया सम्मानित आदिवासी किसान भाई महादेव कोली, जिन्होंने अपना पूरा जीवन देशी बीजों के संरक्षण एवं वितरण में लगा दिया। उन्होंने कभी पद्म पुरस्कार की कल्पना भी की होगी क्या? जनजातीय परंपराओं को अपनी चित्रकारी में उकेरने वाली हमारे मध्य प्रदेश की बहन भूरी बाई हों या मधुबनी पेंटिंग कला को जीवित रखने वाली बिहार की बहन दुलारी देवी या कलारी पयट्टू नामक प्राचीन मार्शल आर्ट्स को देश में जीवित रखने वाले केरल के भाई शंकर नारायण मेनन या गांवों और झुग्गी बस्तियों में घूम-घूम कर सफाई का संदेश देने और सफाई करवाने वाले तमिलनाडु के भाई एस. दामोदरन, मध्यप्रदेश के बुन्देलखण्ड के श्रीराम सहाय पाण्डे। इनमें से किसी के बारे में पहले हम लोग सोच भी नहीं सकते थे कि उन्हें पद्म सम्मान मिलेगा, किन्तु इन सभी भाई-बहनों को पद्म पुरस्कार मिले, क्योंकि यह भाजपा सरकार राष्ट्रवाद की जड़ों को सींचने वालों की पहचान करना और उन्हें सम्मानित करना अपना कर्तव्य समझती है। अब सम्मान मांगे नहीं जाते हैं अब सम्मान स्वयं योग्य लोगों तक पहुंचते हैं, ऐसे लोग जो उसे पाने के अधिकारी हैं, फिर चाहे वे कितने ही सुदूर क्षेत्र में गुमनाम जीवन ही क्यों न बिता रहे हों। राष्ट्रपति का चुनाव हो अथवा पद्म पुरस्कारों का वितरण, मोदी जी की दूरदृष्टि, संवेदनशीलता उन्हें राजनीतिक समझौतों या स्वार्थों से बाहर निकालकर पवित्रता प्रदान करती है। भाजपा दलित, आदिवासी या महिलाओं को सम्मान देकर उन्हें उनके वास्तविक हकदारों तक पहुंचाकर समाज को जागृत करने और एक वैचारिक सामाजिक क्रांति करने का प्रयत्न कर रही है। जागृत जनता ही श्रेष्ठ राष्ट्र का, श्रेष्ठ भारत का निर्माण कर सकती है। ऐतरेय ब्राह्मण में सदियों पूर्व लिख दिया गया था- राष्ट्रवाणि वैविश: अर्थात् जनता ही राष्ट्र को बनाती है। द्रौपदी मुर्मू का राष्ट्रपति बनना भाजपा द्वारा समस्त आदिवासी और महिला समाज के भाल पर गौरव तिलक लगाने की तरह होगा। हमें अभी तक उपेक्षित और शोषित रहे वर्ग को समर्थ तथा सशक्त बनाना है। एक आदिवासी महिला का राष्ट्रपति बनना सामाजिक सोच को अंधकार से निकालकर प्रकाश में प्रवेश कराना है। मेरा दृढ़ विश्वास है कि राष्ट्रपति के रूप में द्रौपदी मुर्मू भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों की संरक्षक और आदिवासी उत्थान की प्रणेता बनेंगी।