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Browsing: संपादकीय

K.W.N.S.-रक्षा मंत्रालय ने अत्याधुनिक हथियारों और साजो-सामान की खरीद के लिए 24 प्रस्तावों को स्वीकृति दी है, जिनका कुल बजट 84,238 करोड़ रुपये का है. इनमें से छह-छह प्रस्ताव थल सेना एवं वायु सेना, 10 नौसेना तथा दो भारतीय तटरक्षक बल के लिए हैं. सरकार कुछ वर्षों से रक्षा उपकरणों के लिए दूसरे देशों पर निर्भरता घटाने की दिशा में तेजी से काम कर रही है. इन 24 प्रस्तावों में से 21 प्रस्ताव ऐसे हैं, जिनमें उल्लिखित वस्तुओं की खरीद भारतीय निर्माताओं से ही होगी।
ये निर्माता सरकारी कंपनियां भी हो सकती हैं और निजी क्षेत्र के उपक्रम भी. रक्षा क्षेत्र में निजी निवेश तथा विदेशी निवेश की सीमाओं एवं शर्तों को सरल बनाने से उद्योगों का तीव्र विस्तार हो रहा है. उल्लेखनीय है कि भारत हथियारों और सैन्य वस्तुओं का निर्यात भी बड़े पैमाने पर कर रहा है. वर्ष 2017 और 2021 के बीच हमारा रक्षा निर्यात 1,520 करोड़ रुपये से बढ़कर 8,435 करोड़ रुपये हो गया।
वर्ष 2021-22 में यह आंकड़ा 14 हजार करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच गया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत बनाने के आह्वान की यह बड़ी सफलता है. इस आह्वान में यह संकल्प भी निहित है कि देश की आवश्यकताओं के लिए तो देश में उत्पादन तो होगा ही, साथ ही गुणवत्तापूर्ण उत्पादों को वैश्विक बाजार में भी उपलब्ध कराया जायेगा. रक्षा उपकरणों के देश में ही निर्मित होने से आयात पर निर्भरता में बड़ी कमी तो आयेगी ही, साथ ही उनकी लागत भी कम होगी।
हम देश के सीमावर्ती क्षेत्रों की भौगोलिक स्थिति के अनुरूप हथियार बना पायेंगे. ताजा प्रस्तावों में 354 हल्के टैंक बनाने की योजना है, जिनका वजन अधिकतम 25 टन होगा. अभी भारतीय सेना इससे करीब दोगुना और तिगुना वजन के टैंकों का इस्तेमाल करती है. हल्के टैंकों को नदी क्षेत्र तथा लद्दाख जैसे दुर्गम इलाकों में भी तैनात किया जा सकेगा. चीन और पाकिस्तान की बढ़ती आक्रामकता को देखते हुए इस तरह के हथियारों की जरूरत बढ़ गयी है।
यह जगजाहिर तथ्य है कि चीन ने सीमा पर अत्याधुनिक छोटे टैंकों की तैनाती की है. इस टैंक में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ड्रोन आदि कैसी नवीनतम क्षमताएं होंगी तथा वह भारी टैंकों के बराबर ही मार कर सकेगा. इसी तरह से आधुनिकतम युद्ध वाहनों से संबंधित एक अहम प्रस्ताव पर भी मुहर लगी है. यह तीसरा अवसर है, जब ऐसे भविष्योन्मुखी वाहनों के लिए कोशिश हो रही है. उम्मीद है कि इस बार यह प्रस्ताव कारगर होगा. हिमालयी क्षेत्र ही नहीं, अरब सागर और हिंद महासागर में भी चीन की सक्रियता बढ़ी है. ऐसे में नौसेना के लिए विशेष प्रकार के वाहनों की जरूरत बढ़ गयी है. आशा है कि ये प्रस्ताव शीघ्र साकार होंगे।

K.W.N.S.-डॉ. वेदप्रताप वैदिक राजस्थान में राहुल गांधी ने अंग्रेजी माध्यम की पढ़ाई की जमकर वकालत कर दी। राहुल ने कहा कि भाजपा अंग्रेजी की पढ़ाई का इसलिए विरोध करती है कि वह देश के गरीबों, किसानों, मजदूरों और ग्रामीणों के बच्चों का भला नहीं चाहती है। भाजपा के नेता अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में क्यों पढ़ाते हैं? राहुल ने जो आरोप भाजपा के नेताओं पर लगाया, वह ज्यादातर सही ही है लेकिन राहुल जरा खुद बताए कि वह खुद और उसकी बहन क्या हिंदी माध्यम की पाठशाला में पढ़े हैं? देश के सारे नेता या भद्रलोक के लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में इसीलिए भेजते हैं कि भारत दिमागी तौर पर अभी भी गुलाम है। उसकी सभी ऊँची नौकरियां अंग्रेजी माध्यम से मिलती हैं। उसके कानून अंग्रेजी में बनते हैं।
उसकी सरकारें और अदालतें अंग्रेजी में चलती हैं। भाजपा ने अपनी नई शिक्षा नीति में प्राथमिक शिक्षा को स्वभाषा के माध्यम से चलाने का आग्रह किया है, जो कि बिल्कुल सही है। लेकिन भाजपा और कांग्रेस, दोनों की कई प्रांतीय सरकारें अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों को प्रोत्साहित कर रही हैं। किसी विदेशी भाषा को पढ़ना एक बात है और उसको अपनी पढ़ाई का माध्यम बनाना बिल्कुल दूसरी बात है। मैंने पहली कक्षा से अपनी अंतरराष्ट्रीय पीएच.डी. तक की परीक्षाएं हिंदी माध्यम से दी है। स्वभाषा के माध्यम से पढ़ने का अर्थ यह नहीं है कि आप विदेशी भाषाओं का बहिष्कार कर दें। मैंने हिंदी के अलावा संस्कृत, जर्मन, रूसी और फारसी भाषाएं भी सीखीं। अंग्रेजी तो हम पर थोप ही दी जाती है। राहुल का यह तर्क सही है कि गरीब और ग्रामीण वर्ग के बच्चे अंग्रेजी स्कूलों में नहीं पढ़ते, इसलिए वे पिछड़ जाते हैं। वे भी अंग्रेजी पढ़ें और अमेरिका जाकर अमेरिकियों को भी मात करें। राहुल की यह बात मुझे बहुत पसंद आई लेकिन मैं पूछता हूं कि हमारे कितनी विद्यार्थी अमेरिका या विदेश जाते हैं? कुछ हजार छात्रों की वजह से करोड़ों छात्रों का दम क्यों घोटा जाए?
जिन्हें विदेश जाना हो, वे साल-दो साल में उस देश की भाषा जरूर सीख लें लेकिन किसी विदेशी भाषा को 16 साल तक अपनी पढ़ाई का माध्यम बनाए रखना और उसे करोड़ों बच्चों पर थोप देना कौनसी अक्लमंदी है? हिरण पर घांस क्यों लादी जाए? यदि हमारे नेता लोग चाहते हैं कि गरीबों, ग्रामीणों, पिछड़ों, किसानों और मजदूरों के बच्चों को भी जीवन में समान अवसर मिलें तो देश में सभी बच्चों के लिए स्वभाषा-माध्यम की पढ़ाई अनिवार्य होनी चाहिए। अंग्रेजी माध्यम की पढ़ाई पर कठोर प्रतिबंध होना चाहिए। विदेशी संपर्कों के लिए हमें सिर्फ अंग्रेजी पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। विदेश-व्यापार, विदेश नीति और उच्च-शोध के लिए अंग्रेजी के साथ-साथ फ्रांसीसी, जर्मन, चीनी, रूसी, अरबी, हिस्पानी, जापानी आदि कई विदेशी भाषाओं की पढ़ाई भी भारत में सुलभ होनी चाहिए। दुनिया के किसी भी संपन्न और शक्तिशाली राष्ट्र में छात्र-छात्राओं की पढ़ाई का माध्यम विदेशी भाषा नहीं है।

K.W.N.S.-“दक्षिणी दिल्ली में गैंगरेप” आज से ठीक 10 साल पहले 17 दिसंबर 2012 को मेरे मोबाइल फोन पर यह मैसेज फ्लैश हुआ. उस वक्त, मैं इस बात का अंदाजा नहीं लगा सकी कि इस केस का देश के कानून, समाज और खुद मुझ पर क्या असर पड़ने वाला है. मैं उस समय राजधानी दिल्ली में एक नेशनल डेली न्यूजपेपर के साथ एक क्राइम रिपोर्टर थी. मुझे पता था कि ‘साउथ दिल्ली’ कीवर्ड का क्या मतलब है. मुझे अपने एडिटर को तुरंत ये जानकारी देनी थी और आगे डिटेल के लिए काम पर लगा जाना था. आखिर ये घटना कैसे घटी और बाकी डिटेल्स के लिए उस वक्त की साउथ दिल्ली की DCP छाया शर्मा को फोन किया।
किरण फोन पर कोई जवाब नहीं मिला. हालांकि कुछ ही मिनटों में मुझे और ज्यादा जानकारी फोन पर ही मिल गई. दिल्ली में चलती बस में 23 साल की पैरामेडिक स्टूडेंट जो वसंत कुंज से सिनेमा देखकर बस से जा रही थी उनके साथ घटना घटी. ये बहुत सदमा देने वाला था. ये मेरी उम्र की किसी महिला के साथ कैसे हो सकता है ? पूरे शहर में यह सबसे सुरक्षित इलाका माना जाता था. कोई सिनेमा देखकर घर लौट रहा हो और ये घटना कैसे घट सकती है…मैं खुद भी इस तरह से कई बार जाती थी।
तब खबरों को ट्रैक करने के लिए शायद ही कोई सोशल मीडिया हुआ करता था. अब के विपरीत, ट्विटर पर मिनटों के भीतर घटनास्थल का कोई वीडियो और फोटो अपलोड नहीं किया जाता था; कोई हैशटैग आक्रोश नहीं था. ऑनलाइन रिपोर्टिंग की भी जल्दी नहीं थी. एक बार कुछ बेसिक जानकारी मिलने के बाद, मैं मौके पर वसंत कुंज पहुंची. हिंदी और अंग्रेजी समाचार पत्रों और समाचार चैनलों के कई अन्य पत्रकार भी उस स्थान पर पहुंचे थे जहां 23 वर्षीय महिला और उसके ब्वॉय फ्रेंड को एक रात पहले बलात्कार के बाद चलती बस से फेंक दिया गया था. दिसंबर की सर्द और अंधेरी शाम थी. मौके पर मौजूद कोई भी मीडियाकर्मी से बात नहीं कर रहा था. इस बीच, मेरे साथी, जो उस समय हेल्थ रिपोर्टर थे, अस्पताल से महिला की स्थिति के बारे में अपडेट लेने का प्रयास कर रहे थे।

K.W.N.S.-अजय कुमार सुप्रीम कोर्ट और कई हाईकोर्ट काफी समय से अपने तमाम फैसलों के दौरान केंद्र सरकार से समान नागरिक संहिता लाने के लिए कह रहा था। यह बात तो सबको पता थी,लेकिन केन्द्र कानून बनाने की राह क्यों नहीं पकड़ रही थी,यह बात कम ही लोगो को समझ में आ रही थी। परंतु राज्यसभा में भाजपा के एक वरिष्ठ सांसद की ओर से निजी स्तर पर समान नागरिक संहिता विधेयक(यूसीसी) प्रस्तुत करके समान नागरिक संहिता पर गरम बहस छेड़ दी है। यूसीसी का राज्यसभा में जैसा विरोध हुआ, उसका औचित्य समझना कठिन है,क्योंकि हमारे संविधान में भी समान नागरिक संहिता को आवश्यक बताया गया था।। इसके बाद भी यूसीसी का विरोध यही बताता है कि विपक्षी दल समान नागरिक संहिता पर बहस करने के लिए भी तैयार नहीं। आखिर जिस समान नागरिक संहिता का उल्लेख संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में है, उस पर संसद में बहस क्यों नहीं हो सकती और वह भी तब, जब निजी विधेयक पेश करने की एक परंपरा है? यह हास्यास्पद है कि कई विपक्षी सांसदों ने समान नागरिक संहिता विधेयक पेश करने की पहल को संविधान विरोधी बता दिया। इसे अंधविरोध और कुतर्क के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता।
भाजपा के राज्यसभा सांसद किरोड़ी लाल मीणा ने 09 दिसंबर 2022 को राज्यसभा में प्राइवेट मैम्बर के तौर पर यूनिफॉर्म सिविल कोड (समान नागरिक संहिता) का प्रस्ताव पेश किया। यानी राज्यसभा में यह विधेयक सरकार द्वारा पेश नहीं किया गया है। बल्कि सांसद द्वारा इस प्रस्ताव को पेश किया गया था। राज्यसभा में एक निजी सदस्य विधेयक के रूप में यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) विधेयक पेश किए जाने के बाद भाजपा के रुख ने संकेत दिया है कि उनके सांसद किरोड़ी लाल मीणा ने जो बिल पेश किया उसका पार्टी मौन समर्थन है।
राजनीति के जानकार कहते है कि बीजेपी की नजर 2024 के आम चुनाव पर है और सदन के नेता पीयूष गोयल ने इस मुद्दे पर बोलते हुए कहा भी था कि यह सदस्य का वैध अधिकार है। उच्च सदन के कई सदस्यों ने स्वीकार किया है कि सत्ता पक्ष अवसर की तलाश कर रहा है और जब सदन में विपक्ष की संख्या कम थी तब विधेयक पेश किया गया। सूत्रों ने कहा कि कांग्रेस कुछ सदस्यों को छोड़कर अनुपस्थित थी और संकेत दिया कि हो सकता है कि कांग्रेस बिल का विरोध नहीं करना चाहती हो।संविधान के नीति निर्देशक तत्वों के तहत अनुच्छेद 44 बनाकर उसमें कहा भी गया है कि सरकार आगे चलकर समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में काम करेगी, लेकिन मीणा की तरफ से लाए गए समान नागरिक संहिता बिल का विपक्षी दलों ने विरोध शुरू कर दिया है। कांग्रेस, सपा और ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ज्डब् ने बिल के खिलाफ आवाज उठाई, हालांकि बिल पेश करने की राह में वे रोड़े नहीं अटका सके।
उल्लेखनीय है कि कई चुनावों में यूसीसी भाजपा के घोषणापत्र में रहा है। जबकि निजी सदस्य का बिल 2020 से लंबित था, लेकिन पेश नहीं किया गया था। यूसीजी नागरिकों के व्यक्तिगत कानूनों को बनाने और लागू करने के लिए एक प्रस्तावित कानून है, जो सभी नागरिकों पर उनके धर्म, लिंग या यौन अभिविन्यास की परवाह किए बिना लागू होगा।दरअसल, उत्तराखंड की भाजपा सरकार ने यूसीसी के कार्यान्वयन की जांच के लिए एक समिति का गठन किया है और गुजरात के मनोनीत मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल भी यूसीसी के पक्ष में अपनी हामी पहले जाहिर कर चुके हैं। वहीं, हिमाचल प्रदेश में भी भाजपा ने अपने घोषणापत्र में यूसीसी के कार्यान्वयन को सूचीबद्ध किया था, लेकिन पार्टी को राज्य में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। उत्तराखंड सरकार ने उत्तराखंड के निवासियों के निजी दीवानी मामलों को विनियमित करने वाले संबंधित कानूनों की जांच करने और कानून का मसौदा तैयार करने के लिए विशेषज्ञों की एक समिति गठित की है। इसके तहत वर्तमान में प्रचलित कानूनों में संशोधन व सुझाव उपलब्ध कराना। साथ ही राज्य में विवाह, तलाक के संबंध में वर्तमान में प्रचलित कानूनों में एकरूपता लाने का मसौदा बनाना। राज्य में समान नागरिक संहिता के लिए मसौदा तैयार करना शामिल है।
बता दें कि विपक्ष के विरोध के बीच समान नागरिक संहिता विधेयक निजी सदस्य द्वारा 09 दिसंबर 2022 को राज्यसभा में पेश किया गया। कुल 63 सदस्यों ने विधेयक के पक्ष में मतदान किया, जबकि 23 मत इसके विरोध में पड़े। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल और द्रमुक ने विरोध प्रदर्शन किया, जबकि बीजू जनता दल ने सदन से वॉक आउट कर दिया। यह ठीक है कि निजी विधेयक मुश्किल से ही कानून का रूप लेते हैं और हाल के इतिहास में तो किसी भी ऐसे विधेयक को संसद की मंजूरी नहीं मिली है, लेकिन किसी भी सांसद को निजी स्तर पर विधेयक पेश करने का अधिकार है। जब ऐसे विधेयकों पर संसद में चर्चा होती है तो देश का ध्यान संबंधित विषय की ओर आकर्षित होता है और उस पर विचार-विमर्श की प्रक्रिया तेज होती है। यदि भाजपा सांसद किरोड़ीमल मीणा के निजी विधेयक के जरिये यह काम होता है तो इससे किसी को परेशानी क्यों होनी चाहिए? निजी स्तर पर पेश किए गए समान नागरिक संहिता विधेयक पर राज्यसभा में व्यापक बहस इसलिए होनी चाहिए, क्योंकि कई राज्य सरकारें इस संहिता के निर्माण की दिशा में सक्रिय हैं। जहां उत्तराखंड ने इसे लेकर एक समिति गठित कर दी है और उसने अपना काम शुरू कर दिया है, वहीं गुजरात सरकार ने भी चुनाव में जाने के पहले ऐसा करने का वादा किया था। इसके अलावा मध्य प्रदेश सरकार ने भी समान नागरिक संहिता के निर्माण की आवश्यकता जताई है। इन स्थितियों में आवश्यक केवल यह नहीं कि संसद में समान नागरिक संहिता को लेकर विस्तार से बहस हो, बल्कि यह भी है कि केंद्र सरकार इस संहिता का कोई मसौदा सामने लाए, जिससे आम जनता के बीच भी विचार-विमर्श की प्रक्रिया आगे बढ़े। जब ऐसा होगा तो समान नागरिक संहिता को लेकर दुष्प्रचार की जो राजनीति हो रही है, उसकी काट करने में मदद मिलेगी। यह दुष्प्रचार वोट बैंक की राजनीति के तहत और साथ ही अल्पसंख्यक समुदायों, खास तौर पर मुस्लिम समुदाय को भ्रमित करने के शरारतपूर्ण इरादे से हो रहा है। इसका पता विपक्षी सांसदों के इस तरह के थोथे बयानों से चलता है कि समान नागरिक संहिता के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ने से विविधता की संस्कृति को क्षति पहुंचेगी। यह निरा झूठ है, क्योंकि यह संहिता तो विविधता में एकता के भाव को बल देगी। इसके साथ ही इससे राष्ट्रीय एकता को भी बल मिलेगा। उधर,ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने समान नागरिक संहिता विधेयक को एक प्राइवेट बिल के तौर पर राज्यसभा में पेश किए जाने को निराशाजनक कदम बताया है। बोर्ड ने इस कदम को देश की एकता और अखंडता को नुकसान पहुंचाने की कोशिश बताया है।बोर्ड के महासचिव खालिद सैफुल्लाह रहमानी ने कहा है कि देश के संविधान का निर्माण करने वालों ने बहुत ही सोच समझ कर संविधान बनाया था। संविधान में हर वर्ग को अपने धर्म और अपनी संस्कृति के अनुसार जिंदगी गुजारने की इजाजत दी गई है। इसी सिद्धांत पर केंद्र सरकार ने आदिवासियों से समझौता भी किया था ताकि वह पूरे देश में अपनी विशेष पहचान के साथ इस देश के नागरिक बनकर रह सकें। उन्हें भरोसा दिलाया गया था कि इनको कभी भी उनकी भाषा एवं संस्कृति से रोकने की कोशिश नहीं की जाएगी। इसी भरोसे के तहत देश में मुसलमान, ईसाई, पारसी और अन्य धार्मिक ग्रुप अपने-अपने पर्सनल लौ के साथ जिंदगी गुजार रहे हैं। अब इन सब पर समान नागरिक संहिता लागू करने का कोई फायदा तो नहीं होगा लेकिन इससे देश को नुकसान हो सकता है। इससे हमारे देश की राष्ट्रीय एकता और अखंडता प्रभावित हो सकती है। इसलिए सरकार को चाहिए कि वह देश की ज्वलंत समस्याओं पर अपना ध्यान केंद्रित करे। ऐसी बातों से बचे जो फायदे के बजाय नफरत पैदा करने वाली हों।बोर्ड महासचिव खालिद सैफुल्लाह ने कहा कि भारत जैसा देश जहां दुनिया के सबसे ज्यादा आबादी बसती है और जो ढेर सारे धार्मिक और सांस्कृतिक ग्रुपों का संगम है, वहां समान नागरिक संहिता बिल्कुल भी सही नहीं है बल्कि यह नुकसानदेह साबित होगा। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट और कई हाईकोर्ट ने पहले अपने फैसलों के दौरान केंद्र सरकार से समान नागरिक संहिता लाने के लिए कहा भी है। इसके अलावा उत्तराखंड, कर्नाटक और गुजरात सरकार ने इसे लागू करने के लिए रिटायर्ड जजों की अध्यक्षता में कमेटियां भी बनाई हैं। कांग्रेस और कई विपक्षी दल समान नागरिक संहिता लागू करने का विरोध कर रहे हैं। जबकि, बीजेपी हर बार इसे चुनावी एजेंडे में शामिल करती है। ऐसे में माना जा रहा है कि समान नागरिक संहिता पर संसद में पेश प्राइवेट मेंबर बिल को मोदी सरकार और बीजेपी की तरफ से समर्थन मिल सकता है। हालांकि, इसे दो-तिहाई बहुमत से दोनों जगह पास कराना होगा। लोकसभा में ऐसा समर्थन तो मिल जाएगा, लेकिन राज्यसभा में बिल को पास कराने के लिए कई विपक्षी दलों की मदद लेनी होगी।

K.W.N.S.-आदित्य नारायण चोपड़ा: अरुणाचल प्रदेश के तवांग सैक्टर में भारत और चीनी सेना के बीच झड़प के बाद एक तरफ भारतीय रक्षा अनुसंधान ने बैलिस्टिक मिसाइल अग्नि-5 का सफल परीक्षण किया तो दूसरी ओर तवांग में चीन सीमा के पास भारतीय वायुसेना के राफेल और सुखोई-30 एमकेआई जैसे लड़ाकू विमानों की गर्जना सुनाई दी। इस तरह भारत ने चीन को रणनीतिक संदेश दिया है। हालांकि एलएसी के पास भारतीय वायुसेना का युद्धाभ्यास एक रूटीन कमांड लेवल एक्सरसाइज है और इसकी योजना तवांग झड़प से पहले ही बना ली गई थी। लेकिन इस अभ्यास के जरिये चीन को संदेश दे दिया गया है कि भारत उसकी किसी भी हिमाकत का जवाब देने के लिए तैयार है। इसी बीच यह खबर आई कि तवांग में भारत और चीन के सैनिक संघर्ष स्थल से दूर जा चुके हैं और वहां पर स्थिति सामान्य हो चुकी है। भारत कभी भी युद्ध समर्थक नहीं रहा लेकिन हमें हर स्थिति का मुकाबला करने के लिए हमेशा तैयार रहना होगा।
वायुसेना का अभ्यास अपनी युद्धक क्षमताओं का आंकलन करने के लिए किया गया है। भारत ने अग्नि-5 बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण कर एक आैर उपलब्धि हासिल कर ली है। एटमी ताकत वाली इस मिसाइल ने 5000 किलोमीटर दूर जाकर अपने टार्गेट को ध्वस्त किया है। अब पूरा एशिया, आधा यूरोप, रूस और यूक्रेन के साथ-साथ राजधानी बीजिंग सहित पूरा चीन अग्नि-5 की जद में आ गया है। मिसाइल बनाने में इस्तेमाल की गई नई तकनीकों और उपकरणों की जांच करने के उद्देश्य से ही यह परीक्षण किया गया है। यह मिसाइल डेढ़ टन तक परमाणु हथियार अपने साथ ले जा सकती है और जरूरत पड़ने पर इसकी मारक क्षमता 8000 किलोमीटर तक की जा सकती है।यहां तक भारतीय वायुसेना के युद्धाभ्यास का सवाल यह ऐसे समय में किया गया है जब चीनी सेना ने पूरे अरुणाचल प्रदेश में वास्तविक िनयंत्रण रेखा पर विमानों, हैलीकाप्टरों और ड्रोन की तैनाती बढ़ा दी है। जून के मध्य से ही पूर्वी लद्दाख में चीनी एयरफोर्स की ओर से अवैध हवाई गतिविधियां जारी हैं और वह 10 किलोमीटर के नो फ्लाई जोन के समझौते का भी उल्लंघन कर देती है। इसी के चलते भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमानों को चीन की हवाई घुसपैठ नाकाम करने के लिए कई बार उड़ान भरनी पड़ी है। भारतीय वायुसेना के शौर्य का एक लम्बा इतिहास रहा है।इंडियन एयर फोर्स का ध्येय वाक्य है, ‘नभः स्पृशं दीप्तम, यानी गर्व के साथ आकाश को छूना। नीला, आसमानी नीला और सफेद इसके रंग हैं। भारतीय वायुसेना का यह ध्येय वाक्य गीता के 11वें अध्याय से लिया गया है। कहते हैं िक जब महाभारत के युद्ध के दौरान कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो उपदेश दिए थे, यह आदर्श वाक्य उसका एक अहम हिस्सा था। युद्ध से पहले जब भगवान श्रीकृष्ण, अर्जुन को अपना विराट रूप दिखाते हैं और तो उसे देखकर अर्जुन कुछ समय के लिए परेशान हो जाते हैं।
उनका वह रूप एक पल को अर्जुन के मन में भय पैदा कर देता है। जो आदर्श वाक्य आईएएफ ने अपनाया है वह इस श्लोक का हिस्सा है, ‘नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्ण व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्, दृष्टवा हि त्वां प्रव्यथितांन्तरात्मा धृति न विन्दामि शमं च विष्णो।’ इसका अर्थ है, ‘हे विष्णु, आकाश को स्पर्श करने वाले, देदीप्यमान, अनेक वर्णों से युक्त एवं फैलाए हुए मुख और प्रकाशमान विशाल नेत्रों से युक्त आपको देखकर भयभीत अन्तःकरण वाला मैं धीरज और शांति नहीं पाता हूं।’संपादकीय :पराक्रम और शौर्य का विजय दिवसपाई-पाई को मोहताज पाकिस्तानचीन को ‘पहाड़ के नीचे’ लाना होगा !हाईवे के नए युग में भारतनीतीश का विपक्षी एकता का प्रेमइस उम्र मे पति-पत्नी का निराला साथअरुणाचल में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीनी सैनिकों की आक्रामकता हमारे लिए गम्भीर चुनौती है। जो हरकत चीनी सेना ने ढाई साल पहले गलवान में की थी। अरुणाचल प्रदेश में उसे दोहराया गया है। हमारे सैनिकों ने पहले की तरह ही चीनियों को मुंहतोड़ जवाब दिया और उन्हें पीछे हटने को मजबूर किया है। भारत हमेशा से यह कहता रहा है कि बल प्रयोग के द्वारा नियंत्रण रेखा को बदलने की किसी भी एक तरफा कोशिश को स्वीकार नहीं किया जाएगा। चीन की हरकतों से साफ पता चलता है कि वह अपनी विस्तारवादी नीतियों पर चल रहा है। चीन की सीमाएं 14-15 देशों से लगती है और भारत सहित कई देशों के साथ इसका सीमा विवाद है। कुछ वर्ष पहले उसने डोकलाम में भी घुसपैठ की थी और वहां भूटान के क्षेत्र में हस्तक्षेप की कोशिश की थी। साऊथ चाइना सी, ईस्ट चाइना सी और ताइवान को लेकर उसके रवैये पर चीन की नजर है। हिन्द महासागर में भी वह अपनी धौंस जमाना चाहता है। भारत ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर चीन के हमलावर रुख को रोकने के कई प्रयास किए हैं। लेकिन हमारे पास खुद को सैन्य स्तर पर मजबूत बनाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। यद्यपि भारत को अब अमेरिका और मित्र देशों का समर्थन प्राप्त है लेकिन भारत को अपनी सैन्य शक्ति को चीन के बराबर बनाना ही होगा। बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण और वायुसेना की गर्जना का उद्देश्य केवल यही दिखाता है कि हम अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए पूरी तरह तैयार हैं। शांति हो या युद्ध दोनों स्थितियों में हम देश की रक्षा के लिए तैयार हैं।

K.W.N.S.-निरंकार सिंह: इसके अलावा, ध्वनि से अधिक गति वाले यान महाद्वीपों के आर-पार उड़ेंगे। जीनोमिक तथा जैव-प्रौद्योगिकीय शोध द्वारा मानव जीवन को और दीर्घ बनाया जा सकेगा। किसी भी देश के विकास में वैज्ञानिक और तकनीकी विकास की प्रमुख भूमिका होती है। दुनिया में आज वही देश आगे बढ़ सकता है, जहां नई खोजों, तकनीक का आविष्कार और पुरानी तकनीक का लगातार उन्नयन होता रहे। इसलिए भारत को विकसित देश बनने के लिए अभी कई मंजिलें पार करनी होंगी। आज दुनिया में एक नई तरह की जंग चल रही है।
आर्थिक मोर्चे पर चल रही यह जंग उच्च तकनीक के माध्यम से बाजार की ताकतों को अपने नियंत्रण में लाने के लिए कौशल रूपी हथियार के इस्तेमाल से लड़ी जा रही है। इस जंग में अमेरिका, चीन, रूस, फ्रांस, जर्मनी, दक्षिण पूर्व एशिया के कुछ देश शामिल हैं। इस जंग की प्रेरक शक्ति है एक खास किस्म के सिद्धांत पर आधारित ज्यादा से ज्यादा दौलत पैदा करना। आज हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि एक राष्ट्र के रूप में पीछे से लड़ी जा रही इस जंग में कैसे कामयाब हों? आर्थिक और सैनिक प्रभुत्व को दांवपेच से हासिल करके आज राष्ट्रीय स्तर पर तकनीकी ही विकास की कुंजी और प्रेरक बन सकती है। इसलिए हमें अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में राष्ट्रीय संपत्ति उत्पन्न करके अपनी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को बढ़ाते रहना होगा।
इसके लिए तकनीक को लगातार विकसित करते रहना होगा। अगर देश का नेतृत्व ईमानदार और उसका लक्ष्य सही हो तो यह सब संभव है। भारत का विकास भी उसकी प्रौद्योगिकीय क्षमता के विकास पर निर्भर होगा। उम्मीद की किरण यह है कि एक साल के भीतर कोरोना का टीका बना कर भारत ने अपनी नई क्षमता परिचय दिया है। यह मानव जाति की सुरक्षा के लिए भारतीय चिकित्सा वैज्ञानिकों की बहुत बड़ी कामयाबी है। यह दुनिया भर के वैज्ञानिकों के आपसी सहयोग से संभव हो सका है।
देश के परमाणु प्रतिष्ठानों ने परमाणु बिजली घर बनाने, न्यूक्लियर मेडिसिन विकसित करने तथा कृषि उत्पादन में वृद्धि के लिए कृषि संबंधी बीजों का नाभिकीय उपचार करने की क्षमता हासिल कर ली है। भारत में परमाणु विज्ञान की उत्पत्ति के दो दशक के अंदर न्यूक्लिर मेडिसिन, कृषि उत्पादों के संरक्षण के लिए परमाणु उपचार, परमाणु अस्त्रों का निर्माण कर लिया गया। पिछले कुछ वर्षों में रक्षा शोध ने मुख्य युद्धक टैंकों, उन्नत मिसाइल प्रणालियों, हल्के लड़ाकू विमानों, इलेक्ट्रानिक युद्ध-प्रणालियों तथा विभिन्न बख्तरबंद यानों की डिजाइनिंग, विकास तथा उत्पादन को प्रेरित किया है। यह उन्नति दर्शाती है कि आज भारत के पास कई उन्नत प्रौद्योगिकीय प्रणालियां हैं। फिर भी, भारत एक विकासशील देश है।
प्रौद्योगिकी के कई आयाम हैं। देश की आवश्यकता के अनुसार भू-राजनीति प्रौद्योगिकी के अनुकूलन को प्रोत्साहित कर सकती है, जो आर्थिक संपन्नता को प्रेरित और राष्ट्रीय सुरक्षा को और सशक्त बना सकता है। मसलन, रासायनिक इंजीनियरिंग में प्रगति ने अधिक उत्पादन के लिए उवर्रकों का निर्माण किया, पर रासायनिक अस्त्रों के उत्पादन में भी योगदान दिया। इसी प्रकार, पर्यावरणीय शोध के लिए विकसित की गई राकेट प्रौद्योगिकी ने दूर संवेदन (रिमोट सेंसिंग) तथा संचार के लिए उपग्रहों के प्रक्षेपण में मदद की, जो आर्थिक विकास के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। इसी प्रौद्योगिकी ने विशिष्ट रक्षा क्षमताओं वाले मिसाइलों के विकास को भी प्रेरित किया, जो देश की सुरक्षा प्रदान करते हैं। उड्डयन प्रौद्योगिकी में प्रगति ने लड़ाकू तथा बमवर्षक विमानों, साथ ही यात्री जेट के निर्माण को संभव बनाया है। इन्होंने प्राकृतिक आपदा से प्रभावित लोगों तक त्वरित मदद पहुंचाने में भी सहयोग किया है। आने वाले वर्षों में सूचना प्रौद्योगिकी द्वारा उत्पन्न बौद्धिक उत्पाद तथा प्रणालियों, जैव-प्रौद्योगिकी और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी द्वारा लोगों का जीवन अधिक संवर्धित होगा। इसके अलावा, ध्वनि से अधिक गति वाले यान महाद्वीपों के आर-पार उड़ेंगे। जीनोमिक तथा जैव-प्रौद्योगिकीय शोध द्वारा मानव जीवन को और दीर्घ बनाया जा सकेगा। इससे भी अधिक संभावनाएं टीके के क्षेत्र में हैं। यह भारत के लिए एक वरदान होगा, जहां लाखों पोलियो तथा हेपेटाइटिस-बी के शिकार हो जाते हैं। विभिन्न परिवहन प्रणालियों, चिकित्सीय उपकरणों तथा ऐरोस्पेस प्रणालियों, जैसे माइक्रो सेटेलाइट, मिनी आरपीवी आदि की नियंत्रण प्रणालियों के रूप में नैनो-टेक्नोलाजी मानव प्रयोग में आएगी।
विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग पांच नए मिशन शुरू कर रहा है, जो भविष्य में देश के विकास की रूपरेखा निर्धारित करने में उपयोगी हो सकते हैं। इनमें इलेक्ट्रिक मोबिलिटी मिशन, क्वांटम साइंस ऐंड टेक्नोलाजी मिशन, मेथेनाल मिशन और मैपिंग इंडिया मिशन शामिल हैं। इनके अलावा, साइबर फिजिकल सिस्टम्स मिशन को पिछले साल ही मंजूरी दी जा चुकी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ‘भविष्य की बढ़ती प्रौद्योगिकी जरूरतों को पूरा करने, अगली पीढ़ी के इलेक्ट्रिक वाहनों के विकास, स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन, देश के विभिन्न क्षेत्रों की सटीक मैपिंग और भविष्य के अत्याधुनिक कंप्यूटिंग प्रणालियों के विकास में ये मिशन उपयोगी हो सकते हैं।’ भविष्य की परिवहन जरूरतों के देखते हुए पांच हजार करोड़ रुपए की लागत से इलेक्ट्रिक मोबिलिटी मिशन शुरू किया जा रहा है। इसके अंतर्गत इलेक्ट्रिक वाहनों के विकास से जुड़े विभिन्न घटकों पर आधारित शोध और विकास को प्रोत्साहित करने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी। 2025 तक दुनिया भर में लिथियम बैटरी चलन से बाहर होने लगेंगी। ऐसे में, नए तत्त्व विकसित करने होंगे। हाइड्रोजन र्इंधन सेल, नई रासायनिक संरचनाओं और अधिक ताप वहन करने में सक्षम बैटरियों का विकास इलेक्ट्रिक वाहनों से जुड़ी उभरती तकनीक इस क्षेत्र में नए विकल्प हो सकते हैं। मेथेनाल और डाइमिथाइल के उत्पादन एवं उपयोग को बढ़ावा देने के लिए मेथेनाल मिशन शुरू किया जा रहा है। इसके लिए सेंटर आफ एक्सीलेंस स्थापित किए जाएंगे। पेट्रोल और डीजल की तुलना में मेथेनाल कम ऊर्जा देता है, पर यह परिवहन तथा ऊर्जा क्षेत्र और रसोई गैस में एलपीजी (आंशिक रूप से), केरोसीन में पेट्रोल तथा डीजल और लकड़ी के कोयले को प्रतिस्थापित कर सकता है।
स्वच्छ पर्यावरण और जीवाश्म र्इंधन पर निर्भरता कम करने में इस मिशन की भूमिका अहम हो सकती है। क्वांटम तकनीक को बढ़ावा देने के लिए शुरू किए जा रहे मिशन के अंतर्गत क्वांटम कंप्यूटिंग, क्वांटम क्रिप्टोग्राफी, क्वांटम कम्युनिकेशन, क्वांटम मौसम विज्ञान, सेंसिंग और संवर्धित इमेजिंग शामिल होगी। इसके अलावा, पिछले वर्ष शुरू किए गए साइबर फिजिकल प्रणालियों के राष्ट्रीय मिशन को भी विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग लागू करने में जुटा है। छत्तीस सौ करोड़ रुपए की लागत से शुरू किया गया यह मिशन समाज की बढ़ती प्रौद्योगिकी जरूरतों को पूरा करने और नई पीढ़ी की प्रौद्योगिकियों के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। क्वांटम मिशन प्रौद्योगिकियों का प्रभावी उपयोग करने में केंद्रीय मंत्रालयों, सरकारी विभागों, राज्य सरकारों और उद्योगों को विभिन्न परियोजनाओं और योजनाओं के संचालन में मदद करेगा। पूरे देश की डिजिटल मैपिंग के लिए एक अन्य मिशन तैयार किया गया है। इसके अंतर्गत उपग्रह चित्रों और ड्रोन की मदद से मानचित्र तैयार किए जाएंगे। ये मानचित्र बड़े पैमाने पर बनाए जाएंगे। अगले दो सालों में पूरे देश की मैपिंग की जाएगी और इस तरह बने मानचित्र विभिन्न विकास परियोजनाओं में मददगार हो सकते हैं। पर आज जरूरत इस बात की है कि छात्र तथा युवा विकसित होकर न केवल विभिन्न क्षेत्रों में पेशवर बनें, बल्कि रचनात्मक उद्यमी बन कर दूसरों को रोजगार के अवसर भी उपलब्ध कराएं। रचनात्मक नेताओं का अनुपात जितना ऊंचा होगा, ‘विकसित भारत’ के स्वप्न की सफलता की संभावना उतनी ही अधिक होगी। हमें किसी भी मिशन में सफल होने के लिए अदम्य उत्साह तथा विफलताओं का सामना करने और उनसे सीखने के साहस की आवश्यकता होती है।

K.W.N.S.- आदित्य नारायण चोपड़ा: आतंक का सिरमौर कहे जाने वाला पाकिस्तान इस समय भिखमंगी की कगार पर है। पाकिस्तान में आर्थिक के साथ-साथ राजनीतिक संकट भी जारी है। अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष यानि आईएमएफ उसे नए कर्ज की किश्त देने को तैयार नहीं है। कहते हैं रस्सी जल गई पर बल नहीं गया। यही हाल पड़ोसी मुल्क का है। उसे अब भी उम्मीद है कि चीन और सऊदी अरब मिलकर उसे दिवालिया होने से बचा लेंगे। पाकिस्तान 75 साल में 28वीं बार दिवालिया होने की कगार पर है। पड़ोसी मुल्क को इस हालत में पहुंचाने के जिम्मेदार उसके हुक्मरान हैं। भले ही पूरा दोष अब पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान पर लगाया जा रहा है, लेकिन सच तो यह है कि पाकिस्तान के हुक्मरानों की नीतियों ने देश की हालत को खस्ता बना दिया है। भारत के अनुभव बताते हैं कि सूर्य चाहे शीतल हो जाए, नदियां चाहे अपनी दिशाएं बदल दें, हिमालय चाहे उष्ण हो जाए पर पाकिस्तान कभी सीधे रास्ते पर नहीं आ सकता। आज उसकी कटुता का दायरा बढ़ चुका है। आज सारे विश्व को पाकिस्तान से खतरा महसूस हो रहा है। उधार लेकर घी पीना और विदेशी मदद का इस्तेमाल आतंकवाद की खेती के लिए करना उसकी राष्ट्रीय नीति का अंग बन चुका है।
पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार सिर्फ 6.7 अरब डॉलर का रह गया है। इसमें 2.5 अरब डॉलर सऊदी अरब, 1.5 अरब डॉलर संयुक्त अरब अमीरात के और 2 अरब डॉलर चीन के हैं। सिक्योरिटी डिपोजिट है। यानि शहबाज सरकार इसे खर्च नहीं कर सकती। शहबाज शरीफ भीख का कटोरा लेकर कभी चीन तो कभी सऊदी अरब से गुहार लगा रहे हैं। लेकिन ऐसा लगता है कि अब यह देश भी इसे बचा नहीं पाएंगे। पाकिस्तान पर चीन का कुल 77.3 अरब डॉलर का कर्ज है। जनवरी में ही पाकिस्तान को 8.8 अरब डॉलर की किश्तें चुकानी हैं। जाहिर है एक तरफ तो वो अपना विदेशी मुद्रा भंडार खाली नहीं कर सकता, दूसरी तरफ दूसरे देशों से उसे मदद भी नहीं मिल रही। ऐसे में अब जनवरी से मार्च के पहले तीन महीने में विदेशी कर्ज चुकाने और आयात के लिए फंड कहां से आएंगे, इस पर बहुत बड़ा सवालिया निशान लग गया है। पाकिस्तान के वित्त मंत्री भले ही सऊदी अरब और चीन से नए लोन मिलने का दावा कर रहे हैं, लेकिन वास्तविकता कुछ और ही है।
नवम्बर की शुरूआत में दोनों देशों से बातचीत हुई थी, लेकिन इनकी तरफ से अब तक कोई पैसा नहीं मिला है।संपादकीय :चीन को ‘पहाड़ के नीचे’ लाना होगा !हाईवे के नए युग में भारतनीतीश का विपक्षी एकता का प्रेमइस उम्र मे पति-पत्नी का निराला साथमहंगाई से राहतचीन की तवांग में ‘दादागिरी’वर्तमान आर्थिक संकट को मुख्य रूप से पाकिस्तान के अदूरदर्शी नीतिगत निर्णय के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है, जिसे गैर-विकासात्मक और आर्थिक रूप से अव्यवहार्य परियोजनाओं पर व्यापक खर्च होता है। ग्वादर-काशगर रेलवे लाइन परियोजना जैसी निरर्थक अवसंरचना परियोजनाओं के आर्थिक कुप्रबंधन और वित्तपोषण को दीर्घावधि ऋण साधनों के माध्यम से और घरेलू संस्थानों के बजाय बाहरी उधार पर बड़े पैमाने पर निर्भर रहने से इसकी परेशानियां बढ़ गई हैं। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) के रोल आउट ने ऋण के बोझ को बढ़ा दिया, जो लगातार बढ़ते विदेशी ऋणों के दरवाजे खोल रहा है। विशेष रूप से सीपीईसी ने पाकिस्तान पर 64 विलियन अमेरिकी डॉलर का चीनी ऋण बनाया, जिसका मूल मूल्य 2014 के दौरान यूएस 47 विलियन डालर था। अमरीकी डॉलर के मुकाबले पाकिस्तानी रुपए में लगातार गिरावट ने विदेशी ऋण वृद्धि में योगदान दिया है।
अन्तर्राष्ट्रीय रेटिंग एजैंसियों द्वारा कम रैंकिंग और वित्तीय कार्रवाई कार्य बल (एफएटीएफ) में पाकिस्तान की ग्रे लिस्टिंग के साथ-साथ आत्मविश्वास में गिरावट ने विदेशी निवेशकों को दूर रखा। स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान के आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले 10 वर्षों में, पाकिस्तान में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) प्रवाह कभी भी सकल घरेलू उत्पाद के 1 प्रतिशत से अधिक नहीं हुआ। नए ऋण लेने और पुराने लोगों को चुकाने के दुष्चक्र ने पाकिस्तान को कुख्यात ‘ऋण जाल’ में धकेल दिया है। इसके अलावा पाकिस्तान को ऋण देने में अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय की अनिच्छा के कारण देश को मुख्य रूप से चीन और सऊदी अरब का सहारा लेेने के लिए मजबूर किया गया था और इस प्रकार यह उनकी जटिल शर्तों के लिए कमजोर हो गया था। यही कारण है कि सबसे ज्यादा चीनी प्रभाव वाले देशों की सूची में पाकिस्तान टॉप पर है। कुछ समय पहले चीन ने तो पाकिस्तान से 1.3 अरब डॉलर की किश्त भी मांग ली थी और इस पर पाकिस्तान ने चुप्पी साध ली थी। अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने 1.7 अरब डॉलर के कर्ज की तीसरी किश्त जारी करने से इंकार कर दिया था और उसने पाकिस्तान से शर्तों के मुताबिक राजस्व बढ़ाने और खर्च कम करने को कहा था।
कौन नहीं जानता कि पाकिस्तान के हुक्मरानों ने देश की सम्पत्ति को लूट कर विदेशों में अपनी अकूत सम्पत्ति बनाई है। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान के भ्रष्टाचार की पोल सबके सामने खुल चुकी है। सारी दुनिया जानती है कि पाकिस्तान ने आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए कितना धन खर्च किया है। जिस तालिबान को पाकिस्तान ने हर तरह से सींचा था आज वो ही तालिबान पाकिस्तान का दुश्मन बना बैठा है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान सीमा पर स्थिति काफी तनावपूर्ण है। जम्मू-कश्मीर में वह अभी भी आतंकवाद को प्रोत्साहित करने में लगा हुआ है। पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता भी बनी हुई है। जनता में बहुत आक्रोश है। देश को संकट से उबारने की शहबाज सरकार की क्षमता पर आम जनता का भरोसा उठ गया है। इमरान खान हकीकी लोकतंत्र के लिए नए चुनाव कराने की मांग को लेकर आंदोलन चलाए हुए हैं। पाकिस्तान के भीतर की राजनीतिक उठापटक पाकिस्तान को तबाही के कगार पर पहुंचा देगी। पाकिस्तान का भविष्य समय के गर्भ में है।

K.W.N.S.-देखा जाए तो इस नाटक में आम आदमी पार्टी का सत्ता के प्रति लालच सामने आया है कि अगर दांव लगे तो किसी भी राजनीतिक दल के नेता किसी अन्य को तोड़ने में पीछे नहीं रहेगी। इन चुनावों में कांग्रेस के नौ निगम पार्षद जीते थे, जिसमें से सात मुसलिम समाज के थे। आम आदमी पार्टी ने पार्टी उपाध्यक्ष के साथ ही दो मुसलिम निगम पार्षद को अपने पाले में कर लिया था। क्षेत्र की जनता ने इनके खिलाफ प्रदर्शन करना शुरू कर दिया और उसका तेवर इतना जबरदस्त था कि कुछ ही घंटे के बाद ही दोनों निगम पार्षदों और नेता को माफी मांगते हुए वापस कांग्रेस में शामिल होकर जनता के गुस्से को शांत करना पड़ा।
यह एक ऐसी घटना है जिसको सभी राजनीतिक दलों को गंभीरता से लेना चाहिए कि धोखेबाज जनप्रतिनिधियों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। स्थानीय चुनाव में दल बदल कानून लागू नहीं होता है, इसलिए विधानसभा और लोकसभा में कोई नियम कायदे कानून बनाने चाहिए। आखिर इस तरह से तो लोकतंत्र का कोई अर्थ नहीं रह जाता है, जिस पर सभी को चिंता करने की जरूर आवश्यकता है। हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस पार्टी ने विधानसभा चुनाव में परचम लहराया, तो इसका मुख्य कारण नई पेंशन योजना की जगह पुरानी पेंशन बहाली का वादा रहा। अब यह देखना होगा कि कांग्रेस पार्टी उक्त पेंशन को लागू करने में कितनी सफल होती है या फिर कर्मचारियों को केवल झूठा आश्वासन दिया गया है। हालांकि जीत के बाद यह आश्वासन पूरा करने की बात कही गई है।
गौरतलब है कि पुरानी पेंशन बहाली का मुद्दा आगामी लोकसभा चुनावों में भी देखने को मिलेगा। केंद्र सरकार को इस मुद्दे को हल्के में नहीं लेना चाहिए। समय रहते इस मुद्दे का हल निकालना चाहिए, क्योंकि सरकारी कर्मचारी को सेवानिवृत्ति के बाद नई पेंशन योजना के तहत चिकित्सा क्षतिपूर्ति बिल का भुगतान भी नहीं मिलता और कम पेंशन मिलती है। इस योजना का फिर अवलोकन करने की जरूरत है। इस मुद्दे पर जनता कितनी गंभीर है, इसे ऐसे समझा सकता है कि अब यह चुनावी मुद्दा बनने लगा है।

K.W.N.S.- एम.एल. चौधरी, सहायक संचालक असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के कल्याण के क्षेत्र में छत्तीसगढ़ देश को नई राह दिखा रहा है। राज्य में ग्रामीण क्षेत्र में मेहनत मजदूरी करके जीवन यापन करने वाले लाखों भूमिहीन लोगों को आर्थिक सहायता देने के लिए न्याय योजनाओं की कड़ी में राजीव गांधी ग्रामीण भूमिहीन कृषि मजदूर न्याय योजना शुरू की गई है। देश में अपने किस्म की यह पहली योजना है। इस योजना में गांव में मजदूरी करने वाले लोगों को साल में 7 हजार रूपए की आर्थिक सहायता दी जा रही है।
छत्तीसगढ़ सरकार श्रमेंव जयते की मूल भावना को लेकर काम कर रही है। श्रम विभाग द्वारा श्रमिकों, मजदूरों के कल्याण के लिए अनेक योजनाओं का संचालन किया जा रहा है। असंगठित श्रमिकों के लिए कौशल वृद्धि, नियोजन सहित विभिन्न सहायता पहुंचाने के लिए ई-श्रमिक पोर्टल में पंजीयन किया जा रहा है। अब तक 82 लाख 40 हजार श्रमिकों का पंजीयन किया जा चुका है। ई-पोर्टल पर पंजीयन के मामले में छत्तीसगढ़ देश के 6वें स्थान पर है। उद्योगांे, कारखानों में काम करने वाले श्रमिकों की सेवानिवृत्ति की आयु में दो वर्ष की वृद्धि की गई है। अब श्रमिक 58 वर्ष की बजाए 60 वर्ष में सेवानिवृत्त होंगे।
छत्तीसगढ़ में श्रमिक और उनके परिवारों के कल्याण के लिए अनेक योजनाओं का संचालन किया जा रहा है। इन योजनाओं के जरिये श्रमिक परिवारों को कौशल उन्नयन, चिकित्सा और शिक्षा के बेहतर मौके मिल रहे हैं। कोरोना संकट काल में श्रमिकों की देख भाल और त्वरित सहायता पहुंचाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी गई। लाकडाउन की अवधि में 73 हजार से अधिक श्रमिकों को 171 करोड़ रूपए से अधिक का वेतन भुगतान कराया गया। श्रमिकों के वेतन संबंधित शिकायतों के आधार पर 875 से ज्यादा श्रमिकों को एक करोड़ से ज्यादा रूपए का वेतन भुगतान कराया गया। राज्य से प्राप्त 1067 अनुरोध में 34,321 श्रमिकों को भोजन, राशन सहायता उपलब्ध कराई गई। अन्य प्रदेशों से 107 श्रमिक स्पेशल ट्रेनों से 1,53,859 श्रमिकों को वापस लाया गया।
पिछले चार साल में श्रमिको के कल्याण के लिए उठाये गये ठोस कदमों के लिए छत्तीसगढ़ को राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा गया है। श्रम विभाग को ई-श्रमिक सेवा क्षेत्र में सार्वभौमिक पहुंच हेतु राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। पुरस्कार स्वरुप 2 लाख रुपए की राशि प्रदान की गई है। श्रम विभाग को ई-श्रमिक सेवा के लिए एकल एकीकृत पंजीकरण हेतु स्कॉच पुरस्कार प्रदान किया गया। प्रवासी श्रमिकों के हितसंरक्षण हेतु छत्तीसगढ़ राज्य प्रवासी श्रमिक नीति 2020 प्रभावशील की गयी है। ई-श्रम पोर्टल में असंगठित क्षेत्र में कार्यरत 82 लाख 40 हजार असंगठित कामगारों का पंजीयन किया जा चुका है। ई-श्रमिक पोर्टल के माध्यम से असंगठित श्रमिकों के पंजीयन संख्या के आधार पर देश में छत्तीसगढ़ छठवें स्थान पर तथा लक्ष्य प्राप्ति के तृतीय स्थान पर है।
निर्माण श्रमिकों हेतु संचालित नवीन योजनाएं-मुख्यमंत्री निर्माण श्रमिक मृत्यु एवं दिव्यांग सहायता योजना के अंतर्गत लगभग 6376 निर्माण श्रमिकों एवं उनके आश्रितों को लगभग 63 करोड़ 76 लाख रूपए प्रदाय किया गया है। ‘मुख्यमंत्री निर्माण श्रमिक निःशुल्क कार्ड योजना’ के अंतर्गत लगभग एक लाख 19 हजार से ज्यादा हितग्राहियों को लाभान्वित करने 12 लाख रूपए व्यय किए गए। मुख्यमंत्री नोनी सशक्तिकरण सहायता योजना के अंतर्गत 9257 हितग्राहियों को लगभग 18 करोड़ 51 लाख रूपए और मुख्यमंत्री श्रमिक सियान सहायता योजना के अंतर्गत 48 हितग्राहियों को करीब पांच लाख रूपए की सहायता प्रदान की गयी है। असंगठित कर्मकारों हेतु संचालित नवीन योजना- असंगठित कर्मकार मृत्यु एवं दिव्यांग सहायता योजना अंतर्गत 3673 असंगठित कर्मकारों एवं उनके आश्रितों को लगभग 36 करोड़ 73 लाख रूपए की सहायता दी गई है। असंगठित श्रमिकों के पंजीयन एवं कल्याण की कार्यवाही अंतर्गत करीब 6 लाख हितग्राहियों को लगभग रुपये 96 करोड़ रुपए की सहायता दी गई है। इसी तरह से संगठित श्रमिकों हेतु 02 नवीन योजना ‘मेधावी शिक्षा प्रोत्साहन योजना’ तथा ‘खेल-कूद प्रोत्साहन योजना’ दो जून 2022 से प्रारंभ की गयी है। संगठित श्रमिकों के पंजीयन एवं कल्याण की कार्यवाही अंतर्गत लगभग 4.09 लाख हितग्राहियों को रूपये 4.91 करोड़ रूपए की सहायता दी गई है। निर्माणी श्रमिकों के पंजीयन एवं श्रमिकों के कल्याण हेतु करीब 14.75 लाख हितग्राहियों को लगभग रुपये 313.64 करोड़ रूपए की राशि से लाभान्वित किया गया है। निर्माणी श्रमिकों का पंजीयन शुल्क माफ कर पंजीयन निःशुल्क किया गया। कर्मचारी राज्य बीमा सेवायें के तहत कामगार योजना से पांच लाख से ज्यादा हितग्राहियों को जोड़ा गया है। कर्मचारी राज्य बीमा सेवायें के द्वारा रायपुर एवं कोरबा में सौ बिस्तर युक्त चिकित्सालय का निर्माण कर बाह्यरोगी सेवा आरंभ की गई है। कर्मचारी राज्य बीमा सेवायें के मुख्यालय में बीमित हितग्राहियों की सहायता हेतु टोल-फ्री नंबर (1800-233-1351) प्रारंभ किया गया है। कर्मचारी राज्य बीमा सेवायें द्वारा एक जनवरी .2019 से अब तक बीमित हितग्राहियों एवं उनके परिवारजन के द्वितीयक उपचार पर लगभग रूपये 107.06 करोड़ का व्यय किया जा चुका है। बीमित श्रमिक हितग्राहियों को चिकित्सा सुविधा प्रदान की जा रही है। कर्मचारी राज्य बीमा सेवायें अंतर्गत एक जनवरी 2019 से अब तक लगभग 24 लाख से ज्यादा बीमित हितग्राहियों को चिकित्सा सुविधा प्रदान की गयी है। कोरोना संकट के दौरान तीन लाख से ज्यादा संकट में फंसे श्रमिकों, प्रवासियों हेतु भोजन, राशन की सहायता दी गई एवं स्थापनाओं, कारखानों की श्रमिकों को वेतन भुगतान एवं छटनी नहीं किये जाने हेतु निर्देश दिए गए। संगठित एवं असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के पंजीयन प्रक्रिया को सरल करने के लिये एकीकृत आवेदन हेतु ऑनलाईन पोर्टल तैयार किया गया है, साथ ही ‘श्रमेव जयते’ ( Shramev Jayate) मोबाईल ऐप एक सितम्बर 2022 को प्रारंभ किया गया है। श्रमिकों की सहायता के लिए शासन की विभिन्न योजनाओं से लाभांवित करने एवं उनकी विभिन्न शिकायत के निराकरण हेतु मुख्यमंत्री श्रमिक सहायता केन्द्र की स्थापना की गई है।

K.W.N.S.- डॉ. वेदप्रताप वैदिक- भारत की कार्यपालिका और न्यायपालिका में आजकल भिड़ंत के समाचार गर्म हैं। भारत के सर्वोच्च न्यायालय का कहना है कि जजों की नियुक्तियों में सरकार का टांग अड़ाना बिल्कुल भी उचित नहीं है जबकि मोदी सरकार के कानून मंत्री किरन रिजिजू का कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय की न्यायाधीश-परिषद (कालेजियम) अगर यह समझती है कि सरकार जजों की नियुक्ति में टांग अड़ा रही है तो वह उनकी नियुक्ति के प्रस्ताव उसके पास भेजती ही क्यों है? कानून मंत्री के इस बयान ने हमारे जजों को काफी नाराज कर दिया है। वे कहते हैं कि जजों की नियुक्ति में सरकार को आनाकानी करने की बजाय कानून का पालन करना चाहिए।
कानून यह है कि न्यायाधीश परिषद जिस जज का भी नाम न्याय मंत्रालय को भेजे, उसे वह तुरंत नियुक्त करे या उसे कोई आपत्ति हो तो वह परिषद को बताए लेकिन लगभग 20 नामों के प्रस्ताव कई महिनों से अधर में लटके हुए हैं। न सरकार उनके नाम पर ‘हाँ’ कहती है और न ही ‘ना’ कहती है। अजब पर्दा है कि वह चिलमन से लगी बैठी है। जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने उस 99 वें संविधान संशोधन को 2015 में रद्द कर दिया था, जिसमें राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को अधिकार दिया गया था कि वह जजों को नियुक्त करे। इस आयोग में सरकार की पूरी दखलंदाजी रह सकती थी।
अब पिछले साल सर्वोच्च न्यायालय ने 3-4 माह की समय-सीमा तय कर दी थी, उन नामों पर सरकारी मोहर लगाने की, जो भी नाम न्यायाधीश परिषद प्रस्तावित करती है। इस वक्त सरकार ने 20 जजों की नियुक्ति-प्रस्ताव वापस कर दिए हैं, उसमें एक जज घोषित समलैंगिक हैं और वह भी ऐसे कि जिनका भागीदार एक विदेशी नागरिक है। इसके अलावा सरकार और सामान्य लोगों को भी यह शिकायत रहती है कि ये जज परिषद अपने रिश्तेदारों और उनके मनपसंद वकीलों को भी जज बनवा देती है। न्यायपालिका में राजनीति की ही तरह भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार किसी न किसी तरह पनपता रहता है।
जजों की नियुक्ति में सत्तारुढ़ नेताओं की भी दखलंदाजी भी देखी जाती है। वे अपने मनपसंद वकीलों को जज बनवाने पर तुले रहते हैं और जो जज उनके पक्ष में फैसले दे देते हैं, उन्हें पुरस्कार स्वरूप पदोन्नतियां भी मिल जाती हैं। ऐसे जजों को सेवा-निवृत्ति के बाद भी राज्यपाल, उप-राष्ट्रपति, किसी आयोग का अध्यक्ष या राज्यसभा का सदस्य आदि कई पद थमा दिए जाते हैं। सरकारी हस्तक्षेप के ये दुष्प्रभाव तो सबको पता हैं लेकिन यदि न्यायाधीशों की नियुक्ति भी सीधे सरकार करने लगेगी तो लोकतांत्रिक शक्ति-विभाजन के सिद्धांत की घोर अवहेलना होने लगेगी।
यदि सरकार को न्यायाधीशों की नियुक्ति का अधिकार दे दिया जाए तो क्या न्यायाधीशों को भी यह अधिकार दिया जाएगा कि वे राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों की नियुक्ति में भी हाथ बंटाएं? अमेरिका जैसे कुछ देशों में वरिष्ठ जजों की नियुक्ति राष्ट्रपति ही करता है। वे जीवनपर्यंत जज बने रह सकते हैं। भारत की न्यायिक नियुक्तियां अधिक तर्कसंगत और व्यावहारिक हैं। वे संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुकूल भी हैं। सरकार को जजों की नियुक्ति पर या तो तुरंत मोहर लगानी चाहिए या न्यायाधीश परिषद के साथ बैठकर स्पष्ट संवाद करना चाहिए।