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K.W.N.S.-इस बार भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की जो बैठक हुई है, उसकी भूमिका एतिहासिक हो सकती है, बशर्ते कि उसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो कहा है, उस पर अमल किया जाए। मोदी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत के मंत्र को अमली जामा पहनाने की बात कही है। मोहनजी बार-बार कह चुके हैं कि हिंदू-मुसलमानों का डीएनए एक ही है। मोदी ने इसी मंत्र को व्यावहारिक रूप देते हुए कहा है कि पसमांदा वर्ग के अल्पसंख्यकों याने मुसलमानों, केरल के ईसाइयों और देश के पिछड़े लोगों को साथ लेकर चलने का संकल्प किया जाना चाहिए। भाजपा के प्रधानमंत्री और संघ के तपस्वी स्वयंसेवक के मुंह से ऐसी बात सुनकर कौन गदगद नहीं हो जाएगा? मैं पिछले तीन-चार दिन से दुबई और अबू धाबी में कई अरब शेखों से मिला और हमारी सभी पार्टियों व विचारधाराओं के लोगों से मेरा खुला संवाद हुआ।
मुझे ऐसा लगा कि जिन लोगों के पास दूरदृष्ष्टि है, वे यह महसूस करते हैं कि यदि भारत में सांप्रदायिक दुर्भाव चलता रहा तो अगले 50-60 साल में भारत के इस बार फिर दो नहीं, सौ टुकड़े भी हो सकते हैं। इस आशंका को निरस्त करने का शंखनाद भाजपा ने अब कर दिया है। यदि भाजपा सरकार सांप्रदायिक सदभाव पैदा करने और देश के पिछड़ों को आगे बढ़ाने के लिए कुछ बुनियादी उपायों पर ध्यान दे तो भारत सिर्फ एक दशक में ही दुनिया का महासंपन्न और महाशक्तिशाली राष्ट्र बन सकता है। भारत का दुर्भाग्य यह रहा कि हमारी अब तक की सरकारों के नेताओं को वह चाबी हाथ ही नहीं लगी, जो सदियों से बंद पड़े भारत के ताले को खोल सकती है। वह चाबी है, शिक्षा और चिकित्सा में मूल सुधार ताकि देश का मन और तन बलवान बन जाए। ये मूल सुधार करने की बजाय हमारी सभी सरकारें रेवड़ियां बांटने की चुनावी रणनीतियां अपनाती रही हैं। मोदी सरकार ने इस मामले में भी जबर्दस्त उस्तादी दिखाई है। 
मोदी ने कहा है कि हमें वोटों के लिए नहीं, लेकिन राष्ट्रीय सुद्दढ़ता के लिए मुसलमानों, ईसाइयों और पिछड़ों की सेवा करनी है। यह बात तो अति उत्तम है लेकिन इसे ठोस रूप कैसे देंगे? इसे समझने के लिए हमारे नेताओं में इतनी विनम्रता होनी चाहिए कि वे चिंतकों और बुद्धिजीवियों के साथ बैठकर खुला संवाद करें। सिर्फ नौकरशाहों के इशारों पर नाचने से आप सत्ता तो प्राप्त कर सकते हैं लेकिन देश की दशा नहीं बदल सकते। भाजपा के अध्यक्ष जगतप्रकाश नड्डा को लगातार दूसरी बार भी अध्यक्ष पद से सम्मानित किया गया है, यह सर्वथा उचित है, क्योंकि वे ऐसे पार्टी-अध्यक्ष हैं, प्रायः जिनके बयान और आचरण आपत्तिजनक और कटु विवादास्पद नहीं होते हैं और जो सभी को साथ लेकर चलने की इच्छा रखते हैं। अब प्रधानमंत्री से भी ज्यादा उनकी जिम्मेदारी है कि वे भाजपा को एक ऐसा रूप प्रदान करें, जो आजादी के तुरंत बाद कांग्रेस का रहा है। यदि भाजपा सर्वसमावेशी बन जाए और बुनियादी परिवर्तनों पर ध्यान दे तो दुनिया की वर्तमान सदी भारत की सदी बन सकती है।
 

K.W.N.S.-कांग्रेस और राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ का मकसद स्पष्ट होने लगा है। एक तरफ इसे 2024 के आम चुनाव से नहीं जोड़ा जा रहा है, लेकिन दूसरी ओर समविचारक दलों के नेताओं को लामबंद करने की कोशिश जारी है। मौजूदा यात्रा 30 जनवरी को श्रीनगर में समाप्त होगी, उससे पहले ही ‘हाथ से हाथ जोड़ो अभियान’ 26 जनवरी, गणतंत्र दिवस के मौके पर, शुरू होगा। उसमें कांग्रेस के चुनाव चिह्न ‘हाथ’ की भी नुमाइश की जाएगी। मंडल, जिला, राज्य स्तर पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं में राहुल गांधी का पत्र वितरित किया जाएगा, जिसे मोदी सरकार के खिलाफ चार्जशीट कहा जा रहा है। यानी पत्र की विषय-वस्तु प्रधानमंत्री मोदी के विरोध पर ही टिकी होगी। कांग्रेस ‘हाथ अभियान’ के जरिए देश के 6 लाख गांवों, करीब 2.5 लाख पंचायतों और 10 लाख बूथों तक पहुंचने की कोशिश करेगी। इसे ‘मतदाता जोड़ो मिशन’ नाम भी दिया गया है। यह सिर्फ नफरत, हिंसा, डर से लेकर तपस्वी, कौरव-पांडव की सोच का अभियान है अथवा विशुद्ध चुनाव प्रचार…! इसी दौरान कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े से 23 विपक्षी नेताओं को आमंत्रण भिजवाया गया है कि वे 30 जनवरी, महात्मा गांधी की पुण्य-तिथि पर और ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के समापन समारोह के साक्षी बनने के लिए श्रीनगर पहुंचें। न्योता भेजने में ही सियासत की गई है, क्योंकि तेलंगाना की ‘भारत राष्ट्र समिति’ के अध्यक्ष एवं मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव, आंध्रप्रदेश की वाईएसआर कांग्रेस तथा तेलुगूदेशम पार्टी, ओडिशा के बीजद एवं मुख्यमंत्री नवीन पटनायक, दिल्ली-पंजाब में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी, असम की कांग्रेस सरकार में घटक पार्टी रही ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट आदि को न्योता नहीं भेजा गया है। क्या ये पार्टियां विपक्ष की मजबूत धुरियां नहीं हैं? क्या उनके नेता विपक्ष का महागठबंधन तैयार करने में महती भूमिका अदा नहीं करेंगे? हम ओवैसी की पार्टी को अलग रखते हैं, क्योंकि वह लोकतांत्रिक नहीं, मुस्लिमवादी पार्टी है। हालांकि वह भी कांग्रेस की सत्ता-साझेदार रह चुकी है। दरअसल इस शुरुआती कोशिश पर ही विपक्ष दरकने लगता है।
यानी कांग्रेस लोकसभा की करीब 100 सीटें तो छोड़ कर चल रही है, जिन पर उसे भरोसा है कि विपक्षी एकता नहीं हो पाएगी! इनके अलावा, तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष एवं बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, जद-यू एवं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, राजद एवं बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव, बसपा प्रमुख मायावती आदि नेता भी श्रीनगर जाएंगे, फिलहाल यह सवालिया है। हमारे भरोसेमंद सूत्रों की ख़बर है कि विपक्ष के ये धुरंधर चेहरे भी ‘यात्रा’ के समापन-समारोह के साक्षी नहीं बनेंगे। कारण अलग-अलग हैं। मायावती और अखिलेश तो ‘यात्रा’ के उप्र पड़ाव में भी शामिल नहीं हुए थे, हालांकि दोनों ही उप्र में मौजूद थे। फिलहाल वे लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस के साथ गठबंधन करने के पक्षधर भी नहीं हैं। इस तरह एक राजनीतिक-चुनावी सत्य बिल्कुल स्पष्ट है कि विपक्ष कांग्रेस और राहुल गांधी की छतरी तले गठबंधन बनाने के पक्ष में नहीं है। यदि 2024 में भाजपा और मोदी के पक्ष में बहुमत नहीं आता है, तो सवाल होगा कि सरकार कौन और कैसे बनाएगा? वर्ष 2004 में जिस तरह कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए बनाया गया था, तो उसमें विभिन्न गैर-भाजपा दलों को गोलबंद करने का प्रयास सीपीएम के तत्कालीन महासचिव हरकिशन सिंह सुरजीत ने किया था। तब वामदलों के निर्वाचित सांसदों की संख्या भी करीब 60 थी। आज वाममोर्चा बेहद कमज़ोर स्थिति में है और राहुल गांधी को नेता मानने पर असहमत है। तब मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में सपा सांसदों की संख्या भी काफी थी। आज सपा के 3-4 सांसद ही लोकसभा में हैं। यदि यही स्थिति रहती है, तो कांग्रेस के लिए 53 से 100 सांसदों तक पहुंचना ही टेढ़ी खीर होगा। कांग्रेस के प्रवक्ताओं ने अभी से मुग़ालता पाल लिया है कि 2024 का जनादेश उसके पक्ष में होगा। यात्रा के बाद कांग्रेस की रेटिंग अचानक बढ़ा दी गई है, जबकि इसका कोई औचित्य नहीं है।
 

 
   K.W.N.S.-निरंकार सिंह: यह प्राकृतिक जगत पर हमारे अनियंत्रित प्रभाव को उसके साथ सचेत, सोद्देश्य तथा नियोजित अंतर्क्रिया में बदलने से भी संबंधित है। सबसे अधिक, पारिस्थितिकीय तथा सामाजिक समस्या सारी दुनिया से कुछ जीव-जातियों का व्यापक पैमाने पर गायब होना है। दुनिया भर के लोग बदलते मौसम का कहर झेल रहे हैं। बर्फबारीे कई देशों के लिए संकट बन गई है। ठंडे स्थान गर्म हो रहे हैं, जबकि गर्म जगहें ज्यादा गर्म हो रही हैं। तूफान, बाढ़, सूखा और भूकंप की घटनाएं अब विकराल रूप में कहर बरपा रही हैं। कुदरत का अंधाधुंध दोहन और शोषण करना अब हमारे लिए काल बनता जा रहा है। बर्फबारी और तूफान से अमेरिका, कनाडा और जापान मुख्य रूप से प्रभावित हैं।
जापान में 229 सेंटीमीटर तक बर्फबारी हुई है, वहीं अमेरिका में बर्फबारी और तूफान कहर मचाए हुए है। अमेरिका में सब कुछ ठप है। जन-जीवन इस तरह रुक गया है कि आपात स्थिति में भी लोगों को मदद नहीं मिल पा रही है। पूर्वी अमेरिका के कुछ हिस्सों में भीषण हिमपात और कड़ाके की ठंड से मौसम संबंधी मौतों की संख्या बढ़ कर कम से कम अट्ठाईस हो गई है। अमेरिका के मुख्य शहरों में बर्फबारी ने लोगों को परेशानी में डाल दिया है। वहां बम चक्रवात से चौदह लाख से ज्यादा घर और व्यवसाय गंभीर रूप से प्रभावित हुए हैं, क्योंकि इससे बिजली कटौती और तापमान में गिरावट आई है। 
जापान में सर्दी से पंद्रह लोगों की मौत हो चुकी है। भारी बर्फबारी के कारण अठारह हजार से अधिक लोग बिजली और पानी से वंचित हो गए थे। जापान के यामागाटा प्रांत के कई क्षेत्रों में 229 सेमी हिमपात हुआ। जापान में मौसम अधिकारियों ने सार्वजनिक परिवहन और बिजली कटौती पर संभावित प्रभावों के लिए सावधानी बरतने का आग्रह किया है। कनाडा में भी स्थिति गंभीर है। बर्फबारी ने लोगों को बहुत परेशानी में डाल दिया है। उत्तरी कनाडा में भयानक ठंड की वजह से तापमान -52 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। हालत यह है कि पानी कुछ सेकंड में जम जा रहा है। बर्फबारी से सामान्य जीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त है। सड़क पर बर्फ की चादर बिछ चुकी है। यूरोप के कई देशों में ठंड की जगह गर्मी हो रही है। चीन में ठंड बढ़ने के साथ-साथ कोरोना संक्रमितों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। भारत में भी इन दिनों उत्तर भारत भीषण ठंड की चपेट में है, तो दक्षिण भारत के कई राज्य बेमौसम वर्षा से परेशान हैं। 
दुनिया के अनेक हिस्सों में इन दिनों मौसम जिस तरह चरम पर पहुंच रहा है, वह हैरान और चिंतित करने वाला है। पिछले साल कनाडा में तापमान पचास डिग्री सेल्सियस के करीब पहुंच गया, जिससे सैकड़ों लोगों की मौत हो गई थी। जबकि कनाडा को ठंडे मौसम के लिए जाना जाता है। अमेरिका के भी कई राज्यों में भीषण गर्मी से जानें चली गई थीं। कनाडा-अमेरिका में जहां हीटडोम के कारण गर्मी झुलसा रही थी, वहीं न्यूजीलैंड में ‘आर्कटिक ब्लास्ट’ से बर्फीला तूफान कहर ढा रहा था। हीटडोम गर्म हवाओं का एक पहाड़ होता है, जो बहुत तेज हवा की लहरों के उतार-चढ़ाव से बनता है। 
जब तेज लहर चलती है, तो वातावरण के ऊपरी स्तर में मजबूत हवाओं का एक बांध बन जाता है, जिससे यह काफी तीव्र और लंबा हो जाता है। हालांकि सांख्यिकीविदों के अनुसार ऐसी घटना एक हजार साल में एक बार होती है। लेकिन मानव निर्मित गर्मी वातावरण को लगातार गर्म करती जा रही है, इसलिए इस घटना के जल्दी होने की आशंका बढ़ गई है। जबकि आर्कटिक विस्फोट तब होता है, जब ठंड के मौसम में तापमान बहुत कम हो जाने पर अक्षांश वाले इलाकों में बर्फीला तूफान चलने लगता है। इससे पूरे इलाके में मोटी-मोटी बर्फ जम जाती है। इसी को ‘आर्कटिक ब्लास्ट’ या ‘कोल्ड ब्लास्ट’ भी कहा जाता है। इस समय अमेरिका इसका शिकार है, जहां कुछ जगह तापमान माइनस पचास डिग्री सेल्सियस तक गिर गया है। अब दुनिया भर के वैज्ञानिक यह अनुभव कर रहे हैं कि तकनीकी विकास से मानव जाति के लिए सबसे बड़ा खतरा पैदा हो गया है। इसके चलते ही आज सांस लेने के लिए न तो शुद्ध हवा है और न पीने के लिए स्वच्छ जल। कई तरह के रसायन और कीटनाशकों के कारण खाद्यान्न पहले से ही प्रदूषित हो चुके हैं। अब मौसम के बदलाव का नतीजा भोगने के लिए तैयार रहिए। एक कोरोना विषाणु ने ही दुनिया को दिखा दिया कि सारी वैज्ञानिक तरक्की के बावजूद प्रकृति के प्रकोप के आगे हम कितने असहाय हैं। कोविड के प्रसार के तीन साल बाद भी हम उसके व्यवहार को पूरी तरह से नहीं समझ पाए हैं। हालांकि पर्यावरणविद बहुत दिनों से पर्यावरण के विनाश से मचने वाली तबाही की चेतावनी देते आ रहे हैं। लेकिन कथित विकास की होड़ में उसे अभी तक लगभग नजरअंदाज ही किया जाता रहा है। दुनिया के विभिन्न हिस्सों में पिछले दिनों कोरोना के कारण लगाई गई पूर्णबंदी में प्रकृति में जिस तरह से निखार आया था, उसने दिखा दिया कि अगर हम पर्यावरण को तबाह करना बंद कर दें तो अब भी शायद परिस्थिति को संभाला जा सकता है। मगर अब भी अगर हम नहीं संभले तो शायद जल्दी ही वापस लौटने के लिए बहुत देर हो चुकी होगी। पिछले चालीस-पचास वर्षो में इस धरती के कई जीव-जंतु हमारी कारगुजारियों के कारण विलुप्त हो गए हैं और कई विलुप्ति के कगार पर हैं। पर्यावरण में कई खतरनाक घटनाएं आज साफ-साफ दिखाई दे रही हैं। हर साल साठ लाख हेक्टेयर खेती योग्य भूमि मरुभूमि में बदल रही है। ऐसी ऊसर जमीन का क्षेत्रफल तीस साल में लगभग सऊदी अरब के क्षेत्रफल के बराबर होता है। हर साल एक सौ दस लाख से अधिक हेक्टेयर वन उजाड़ दिए जाते हैं, जो तीस साल में भारत जैसे देश के क्षेत्रफल के बराबर हो सकता है। अधिकांश जमीन जहां पहले वन उगते थे, ऐसी खराब कृषि भूमि में बदल जाती है, जो वहां रहने वाले खेतिहरों को भी पर्याप्त भोजन दिलाने में असमर्थ है। विकास की इस प्रक्रिया को अगर रोका न गया तो महाविनाश निश्चित है। प्राकृतिक पर्यावरण को मनुष्य की आवश्यकताओं के अनुसार रूपांतरित करना तथा विनाशक प्राकृतिक शक्तियों जैसे भूकंप, टाईफून, चक्रवात, बाढ़ और सूखे, हिमानी भवनों, चुंबकीय और सौर आंधियों, रेडियो सक्रियता, अंतरिक्षीय विकिरणों के विरुद्ध संघर्ष करना अनिवार्य है। पर ऐसे परिवर्तन केवल उन नियमों के अनुसार किए जा सकते हैं, जिनके द्वारा जैव मंडल एक अखंड और स्वनियामक प्रणाली के रूप में काम करता तथा विकसित होता रहे। आज का पर्यावरणीय प्रश्न महज प्रदूषण तथा मनुष्य के आर्थिक क्रियाकलाप के नकारात्मक परिणामों का प्रश्न नहीं है। यह प्राकृतिक जगत पर हमारे अनियंत्रित प्रभाव को उसके साथ सचेत, सोद्देश्य तथा नियोजित अंतर्क्रिया में बदलने से भी संबंधित है। सबसे अधिक, पारिस्थितिकीय तथा सामाजिक समस्या सारी दुनिया से कुछ जीव-जातियों का व्यापक पैमाने पर गायब होना है। प्रमुख जैविकविद जानवरों और पौधों की जातियों के इतने बड़े पैमाने पर लुप्त होने का पूर्वानुमान लगाते हैं, जो प्राकृतिक तथा मनुष्य की क्रिया के फलस्वरूप पिछले करोड़ों वर्षों में हुए उनके विलुप्तीकरण से कहीं अधिक बड़ा होगा। प्रकृति और प्राकृतिक साधनों के अंतरराष्ट्रीय रक्षा संगठन ने अनुमान लगाया है कि अब औसतन हर वर्ष जीवों की एक जाति या उपजाति लुप्त हो जाती है। इस समय पक्षियों और जानवरों की लगभग एक हजार जातियों के लुप्त होने का खतरा है। कुछ जैविकविद यह समझते हैं कि पौधों की किसी एक जाति के लुप्त होने से कीटों, जानवरों या अन्य पौधों की दस से तीस तक जातियां विलुप्त हो सकती हैं।
 

 
K.W.N.S.-निर्मल रानी –उत्तराखंड के सीमाँचलीय क़स्बे जोशीमठ में पहाड़ों के धंसने की सूचना मिलने के बाद ख़बर है कि प्रधानमंत्री कार्यालय स्वयं इस प्राकृतिक आपदा पर नज़र रख रहा है। पहाड़ों के धंसने का सिलसिला फ़िलहाल यहीं थम जायेगा या अभी इस तरह की और घटनाओं का सामना क्षेत्रवासियों को करना पड़ेगा इसके बारे में अभी तो निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता परन्तु इतना तो ज़रूर है कि पहाड़ों के धसान की इस घटना ने उत्तराखंड वासियों विशेषकर कुमाऊं,पौड़ी व गढ़वाल क्षेत्र के लोगों के माथे पर भय व चिंता की लकीरें ज़रूर खींच दी हैं । जोशीमठ में पहाड़ों का धंसना,इमारतों में दरार आना या कुछ इमारतों का तिरछा हो जाना भले ही यह ख़बरें टी वी पर समाचार प्रसारण की ‘विस्फ़ोटक शैली’ व समाचार के प्रस्तुतिकरण के चलते नई सी प्रतीत होती हों परन्तु यह इस इलाक़े में अत्यंत मद्धिम गति से चलने वाली निरंतर घटना का ही एक बड़ा रूप कहा जा सकता है। दशकों से इस इलाक़े में पहाड़ों के धसान का सिलसिला जारी है। परन्तु चूँकि इस बार यह विषय जोशीमठ जैसे पर्यटन व तीर्थ स्थलीय क़स्बे वाली घनी आबादी के इलाक़े से जुड़ा है इसलिये देश दुनिया की नज़रों में यह एक बड़ी ‘प्रकृतिक आपदा’ के नाम से ज़रूर सामने आया। 
जोशीमठ आपदा के बाद एक बार फिर यह बहस तेज़ हो गयी है कि क्या विकास के नाम पर प्रकृति के साथ लगातार हो रही छेड़छाड़ के परिणाम स्वरूप ही इस तरह की आपदाओं का सामना करना पड़ रहा है ? दशकों से छिड़ी इस बहस के बावजूद पृथ्वी के दोहन का सिलसिला, रुकना तो दूर क्या कम भी हुआ है ? या इसके ठीक विपरीत यह बढ़ता ही जा रहा है ? जहां तक जोशीमठ से जुड़ी पर्वत श्रृंख्लाओं का प्रश्न है तो उन्हें तो पिछले कई वर्षों से धार्मिक पर्यटन विकसित करने तथा देश की सुरक्षा के नाम पर लगातार ध्वस्त किया जा रहा है। उत्तराखंड के पहाड़ों में दूरस्थ स्थित केदार नाथ,बद्री नाथ,गंगोत्री व यमनोत्री जैसे चारों प्रमुख तीर्थ धाम को सड़क मार्ग से जोड़ने के लिये विशेष सर्किट तैय्यार किया जा रहा है। ग़ौर तलब है कि समुद्र तल से गंगोत्री की ऊंचाई 11,204 फ़िट बद्रीनाथ की 10,170 यमुनोत्री की 10,804 और केदारनाथ की ऊंचाई 11,755 फ़ीट है। हिमालय में स्थित इन चारों धामों में निरंतर बर्फ़बारी के कारण यहाँ मौसम ठंडा रहता है। दिसंबर 2016 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चार धाम परियोजना की आधारशिला रखी थी उस समय मीडिया द्वारा इसे प्रधान मंत्री का ‘मास्टर स्ट्रोक’ बताया गया था। उस समय यह भी बताया गया था कि लगभग 12000 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाली 900 किलोमीटर लंबी इस चार धाम सड़क परियोजना का उद्देश्य उत्तराखंड के चारों प्रमुख धामों के लिए तीर्थ यात्रियों को हर मौसम में सुलभ और सुविधाजनक रास्ता देना है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रोजेक्ट के तहत तीन डबल-लेन हाईवे का निर्माण करने की इजाज़त दी थी। हालांकि उसी समय ‘सिटीज़न्स फॉर ग्रीन दून’ नामक एक NGO ने पर्यावरण के प्रति गहन चिंता जताते हुए इस प्रोजेक्ट को चुनौती भी दी थी। परन्तु न्यायालय ने देश की रक्षा ज़रूरतों के आधार पर इसे सही ठहराया। केवल राजमार्ग निर्माण ही नहीं बल्कि इसी इलाक़े में रेलवे लाइन्स भी बिछाई जा रही हैं जिसके लिये अनेक छोटी बड़ी सुरंगें भी बनाई जा रही हैं। इसी राष्ट्रीय सुरक्षा,तीर्थ यात्रियों की सुविधा व विकास के नाम पर प्रकृति के साथ खिलवाड़ करने का नतीजा भी जोशीमठ पर्वत धंसान के रूप में हमारे सामने आता रहता है। 
इसी तरह भू गर्भ से कोयला निकालने की क़वायद जोकि भारत में सबसे पुराने कोयला क्षेत्र पश्चिम बंगाल के रानीगंज में 1774 में ईस्ट इण्डिया कंपनी द्वारा शुरू की गयी थी वह झारखण्ड,उड़ीसा,मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़,असम,मेघालय व अरुणाचल प्रदेश के कई इलाक़ों में अंधाधुंध कोयला दोहन के रूप में आज भी जारी है। दशकों पूर्व से ही इस बेतहाशा कोयला दोहन के दुष्परिणाम भी आने शुरू हो चुके हैं। झारखण्ड व छत्तीसगढ़ जैसे कई राज्यों से कोयला खनन क्षेत्रों से ज़मीन के धंसने,ज़मीन से धुंआ निकलने,कहीं धरती से पानी निकलने,मकान ढहने आदि की ख़बरें आती रहती हैं। परन्तु चूँकि इस इलाक़े के प्रभावित लोग प्रायः दो वक़्त की रोटी के लिए जूझने वाला ग़रीब मज़दूर वर्ग के व्यक्ति होते हैं इसलिये इनके भय व तबाही की ख़बरें स्थानीय समाचारपत्रों के भीतर के किसी कोने में प्रकाशित होकर रह जाती हैं। टी वी तो इन ख़बरों को दिखाना ही नहीं चाहता क्योंकि उसे इनमें कोई ‘मास्टर स्ट्रोक ‘ दिखाई नहीं देता। इसी तरह रेत खनन के धंधे से जुड़े लोगों को इसबात की फ़िक्र नहीं रहती कि उनके अवैध रेत या मिट्टी खनन के परिणाम स्वरूप बांध या तटबंध के किनारे टूट सकते हैं। जिससे गांव के गांव बाढ़ से तबाह होते हैं। बाढ़ का कारण भी इसी तरह का अवैध खनन बनता है। और पिछले दिनों बिहार के एक नव निर्मित पुल का खंबा तो कथित रूप से केवल इसलिये टूट गया क्योंकि भ्रष्टाचार के संरक्षण में उस खंबे की जड़ों में से भी रेत निकाली जा चुकी थी जिसके चलते वह खंबा टेढ़ा हो गया और सैकड़ों करोड़ की लागत से बना पुल ढह गया। 
 देश के तमाम क्षेत्रों में विकास के नाम पर चलने वाले इसी प्रकार के कोयला,रेत व मिटटी खनन,विध्वंस,वृक्ष कटाई,सुरंग निर्माण,बारूद ब्लास्ट,सड़क निर्माण के लिये होने वाली पहाड़ों की कटाई,बड़ी संख्या में इन्हीं कारणों से हो रहे वृक्षों के कटान आदि धरती को तबाही के द्वार तक पहुँचाने के पर्याप्त कारण हैं। बड़े पैमाने पर विकास के नाम पर होने वाली इन्हीं मानवीय ‘कारगुज़ारियों ‘ का नतीजा ही ग्लोबल वार्मिंग,ग्लेशियर्स के पिघलने,तापमान के गर्म होने व समुद्रतल के बढ़ने,भूस्खलन,पहाड़ धंसने जैसी आपदाओं के रूप में भी सामने आ रहा है। निश्चित रूप से यह भी दुनिया को विकास की चकाचौंध दिखाने वाले मानव को ही समय रहते यह सोचना होगा कि वह विकास का वास्ता देकर विनाश का रास्ता आख़िर कब तक अख़्तियार करता रहेगा।
 

 
 
K.W.N.S.- ऐसा लगता है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए भारतीय जनता पार्टी के अभियान की शुरुआत कर दी है। वह देश भर में यात्रा कर रहे हैं, रैलियों को संबोधित कर रहे हैं और राम मंदिर को प्रमुख चुनावी मुद्दा बना रहे हैं। हालांकि, पार्टी के गलियारों में फुसफुसाहट है कि शाह यह दावा करने की कोशिश कर रहे हैं कि वह अभी भी प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के मुख्य प्रचारक-सह-रणनीतिकार हैं। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा भी पार्टी के लिए प्रचार करते रहे हैं, लेकिन पार्टी के अंदर और बाहर दोनों जगह शाह की तुलना में उनके प्रयास फीके लगते हैं। नड्डा के भाषणों को केंद्रीय मंत्री जितना मीडिया कवरेज नहीं मिलता। यह कोई रहस्य नहीं है कि शाह का भगवा पार्टी में दबदबा कायम है। जब भी चुनाव नजदीक होते हैं, वह पार्टी के अन्य नेताओं से आगे निकल जाते हैं। इस साल नौ राज्यों में चुनाव होने हैं और उसके बाद अगले साल आम चुनाव होने हैं। शाह के पास आराम करने का समय नहीं है, खासकर इसलिए कि उन्हें यह साबित करना है कि वह मोदी के बाद भाजपा के पदानुक्रम में नंबर 2 बने हुए हैं।
अच्छी खबर
राष्ट्रीय जनता दल के नेता और बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव और उनकी पत्नी राहेल, जिन्हें राजेश्वरी यादव के नाम से भी जाना जाता है, को नए साल के मौके पर दिल्ली के अस्पतालों के चक्कर लगाते देखा गया। तेजस्वी के पिता लालू प्रसाद के बीमार होने और गुर्दा प्रत्यारोपण के बाद वर्तमान में सिंगापुर के एक अस्पताल में उनका स्वास्थ्य लाभ हो रहा है, इससे पार्टी कार्यकर्ता चिंतित हैं। इधर-उधर थोड़ी सी ताक-झांक करने पर पता चला कि अस्पताल के सभी दौरे बीमारी के बारे में नहीं थे। अटकलें लगाई जा रही हैं कि दंपति अपने पहले बच्चे की उम्मीद कर सकते हैं और इस उद्देश्य के लिए डॉक्टरों से सलाह ली जा रही है। रेचेल ने कथित तौर पर गर्भावस्था के दौरान अपने माता-पिता के साथ रहने का फैसला किया है। लालू और उनकी पत्नी राबड़ी देवी – दोनों पूर्व मुख्यमंत्री – अपने बड़े परिवार के लिए जाने जाते हैं। उनकी सात बेटियां और दो बेटे और 11 नाती-पोते हैं। परिवार में नया जुड़ाव 2016 के बाद पहली बार होगा। लालू और राबड़ी पहले से ही नानानी हैं; तेजस्वी की संतान सबसे पहले उन्हें दादा-दादी कहेगी। हालांकि, परिवार इसे लेकर चुप्पी साधे हुए है।
हवाईजहाज योजना
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विकास योजनाओं का जायजा लेने के लिए राज्यव्यापी समाधान यात्रा शुरू की है. एक जिले से दूसरे जिले में जाने के लिए वह हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल कर रहे हैं। हेलिकॉप्टर केरल से आया है – मौजूदा राजनीतिक माहौल में बिहार का एक अप्रत्याशित नया दोस्त। जबकि कई लोग दक्षिणी राज्य से एक हेलीकॉप्टर प्राप्त करने की आवश्यकता के बारे में सोच रहे थे, नीतीश के करीबी एक वरिष्ठ राजनेता ने खुलासा किया: “उनके राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन छोड़ने के बाद से उनके उपयोग के लिए एक हेलीकॉप्टर किराए पर लेना बहुत मुश्किल हो गया है। यहां तक कि अगर एक हेलिकॉप्टर किराए पर लिया गया है, तो भी हम उन पर भरोसा नहीं कर सकते क्योंकि उनके मालिकों द्वारा अत्यधिक देरी, अचानक रुकावटें और अंतिम-मिनट रद्दीकरण हैं। हमने पहले भी इसका सामना किया था जब हम भारतीय जनता पार्टी के साथ नहीं थे…’ जेट विमान किराए पर लेने पर भी इसी तरह की समस्याएं पैदा होंगी। सरकार के सूत्रों ने कहा कि राज्य कैबिनेट द्वारा हाल ही में सीएम और अन्य गणमान्य व्यक्तियों के उपयोग के लिए एक जेट विमान और एक हेलीकॉप्टर खरीदने के प्रस्ताव को मंजूरी देने के पीछे यही कारण था। आखिरकार, नीतीश को उनकी जरूरत तब पड़ेगी जब वह 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए बीजेपी के खिलाफ विपक्ष को एकजुट करने के लिए दूसरे राज्यों की यात्रा करेंगे।
 

K.W.N.S.-अगर मुंबई से आ रही खबरों की मानें तो 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जीवन और कार्यों पर एक बायोपिक की योजना बनाई जा रही है। मुंबई के एक निर्माता महावीर जैन, जिन्हें पीएम के करीब माना जाता है, प्रमुख अभिनेताओं और एक निर्माता के साथ चुपचाप इस परियोजना पर काम कर रहे हैं। जैन पहले ही मोदी पर दो फिल्में बना चुके हैं, जिसमें पिछली फिल्म ‘मन बैरागी’ है, जिसे ‘मोदी के जीवन की अनकही कहानी’ माना जाता है। इसे उन्होंने संजय लीला भंसाली के साथ को-प्रोड्यूस किया है। मन बैरागी में भारतीय प्रधानमंत्री के शुरुआती दिनों की यात्रा के बारे में जानकारी है कि कैसे चुने जाने से पहले उन्होंने अनेक बाधाओं का सामना किया और उन पर विजय पाकर ऊपर उठे। यही चीज विवेक ओबेरॉय की फिल्म ‘पीएम नरेंद्र मोदी’ में प्रधानमंत्री के रूप में है, जबकि ‘मोदी : जर्नी ऑफ अ कॉमन मैन’ नामक एक छोटी टीवी श्रृंखला भी पहले बनाई जा चुकी है। याद रहे कि 10-एपिसोड की वेब सीरीज, ‘मोदी: जर्नी ऑफ अ कॉमन मैन’ को ‘पीएम नरेंद्र मोदी’ के निर्माताओं द्वारा 2019 में फिल्म की रिलीज स्थगित करने के ठीक एक दिन बाद रिलीज किया गया था। इरोस इंटरनेशनल द्वारा निर्मित वेब सीरीज के पांच एपिसोड जारी किए गए। तब आसन्न आम चुनाव के कारण स्ट्रीमिंग को रोक दिया गया था। इस बार निर्माता कोई जोखिम नहीं लेना चाहते हैं और काफी पहले से योजना बना रहे हैं। अभिनेता प्रभास और अक्षय कुमार द्वारा मोदी के 69वें जन्मदिन पर मन बैरागी का पहला लुक जारी किया गया था, जिन्होंने प्रधानमंत्री से पूछा था कि वे चुनाव के बीच आम खाना कैसे पसंद करते हैं। फिल्म की रिलीज की योजना 2024 की शुरुआत में बनाई जा रही है, आम चुनाव की घोषणा से बहुत पहले। 
 कर्नाटक के नेता भी कतार में 2023 में कर्नाटक में भी बायोपिक का मौसम देखा जा सकता है जहां इस साल मई में चुनाव होने हैं। राज्य से आ रही रिपोर्टों से पता चलता है कि दिग्गज कांग्रेसी सिद्धारमैया को जल्द ही ऑफलाइन और ऑनलाइन दोनों में देखा जा सकता है। 75 वर्षीय नेता और पूर्व मुख्यमंत्री पर एक बायोपिक की योजना बनाई जा रही है। हालांकि सिद्धारमैया ने अपने जीवन पर बनने वाली बायोपिक के बारे में और कुछ नहीं बताया लेकिन उनके विश्वासपात्रों ने संकेत दिया कि परियोजना ट्रैक पर है। युवा सिद्धारमैया की भूमिका के लिए एक तमिल अभिनेता विजय सेतुपति के नाम पर विचार किया जा रहा है। सिद्धारमैया के कुछ प्रशंसकों ने समाजवादी युवा नेता, जो आगे चलकर मुख्यमंत्री बने, पर फिल्म बनाने के लिए एक कंपनी का पंजीकरण भी करा लिया है। सिद्धारमैया परियोजना की खबर सामने आने पर भाजपा के दिग्गज नेता बीएस येदियुरप्पा के समर्थक भी कूद पड़े। वे अपने नेता की बायोपिक लेकर आने की योजना बना रहे हैं। 
 मोदी बनाम वाजपेयी 26 दिसंबर को जब राहुल गांधी ने दिवंगत प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की समाधि पर श्रद्धांजलि अर्पित करने का फैसला किया तो भाजपा नेता अचंभित से रह गए। हालांकि इस यात्रा के बाद भाजपा प्रवक्ताओं द्वारा कुछ व्यंग्यात्मक टिप्पणियां की गईं। लेकिन इससे ज्यादा बर्फ नहीं पिघली क्योंकि बाद में राहुल गांधी ने मीडिया को समझाया कि वाजपेयी कभी नफरत और प्रतिशोध की राजनीति में विश्वास नहीं करते थे। यशवंत सिन्हा जल्द ही यह कहते हुए विवाद में शामिल हो गए कि मोदी ने वाजपेयी के छह वर्षों के शासन के दौरान उपलब्धियों को कम आंका और एक प्रमुख अंग्रेजी समाचार पत्र में उन्होंने इन उपलब्धियों को गिनाया। इसके तुरंत बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पहले वाजपेयी युग के दौरान एनडीए के पुराने अच्छे दिनों को याद किया। भाजपा के दिवंगत दिग्गजों को याद करते हुए नीतीश ने अटल बिहारी वाजपेयी, अरुण जेटली और अन्य की प्रशंसा की। नीतीश कुमार ने वर्तमान में भाजपा नेतृत्व में उदारता की कमी पर अफसोस जताया। कुछ दिनों बाद, उन्होंने जेटली को उनकी जयंती पर श्रद्धांजलि अर्पित की और एक बार फिर इस दिग्गज के साथ अपनी दोस्ती को याद किया। केंद्र में भाजपा के तब और अब के शासन की तुलना करने के लिए कहने पर, नीतीश ने व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ कहा, ‘जाने दो’। भाजपा नेतृत्व इन खबरों को लेकर भी चिंतित है कि वरुण गांधी जैसे उसके कुछ नेता 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले पार्टी छोड़ सकते हैं। 
आजाद की चिंता डेमोक्रेटिक आजाद पार्टी (डीएपी) के अध्यक्ष गुलाम नबी आजाद के लिए चिंतित होने के कारण हैं क्योंकि नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी, सीपीएम और अन्य छोटे समूह जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए कांग्रेस के साथ हाथ मिला सकते हैं। राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा कश्मीर में प्रवेश करने की तैयारी कर रही है और राहुल गांधी श्रीनगर में तिरंगा फहराएंगे। आजाद इस नए घटनाक्रम से परेशान हैं। फारुक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती ने राहुल की यात्रा में शामिल होने के संकेत दे दिए हैं। अब्दुल्ला यूपी में राहुल गांधी की यात्रा में भी शामिल हुए और कई लोगों को चौंकाया। राहुल की यात्रा ने कांग्रेस की राज्य इकाई का कायाकल्प कर दिया है। आजाद की मुख्य चिंता यह है कि उनकी अपनी पार्टी में असंतोष व्याप्त है और उन्हें कई वरिष्ठ नेताओं को पार्टी से ही निष्कासित करना पड़ा। आजाद इस बात से भी चिंतित हैं कि उनकी अपनी पार्टी के कई नेता कांग्रेस में शामिल हो सकते हैं क्योंकि घाटी में मिजाज बदल रहा है।
 

K.W.N.S.-पहली बार, नौसेना दिवस समारोह नई दिल्ली के बाहर आयोजित किया गया। भारतीय नौसेना ने विशाखापत्तनम में रामकृष्ण बीच पर एक ऑपरेशनल प्रदर्शन के माध्यम से अपनी शक्तिशाली युद्ध क्षमता का प्रदर्शन किया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, जो इस आयोजन की मुख्य अतिथि थीं, का स्वागत पनडुब्बी आईएनएस सिंधुकीर्ति और आईएनएस तरंगिणी पर सवार नाविकों ने किया, जिसने दुनिया को दरकिनार कर दिया। नौसेना के विमानों द्वारा फ्लाई-पास्ट के साथ-साथ युद्धपोतों से रॉकेट दागना भी इस कार्यक्रम का एक अन्य आकर्षण था। 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान ‘ऑपरेशन ट्राइडेंट’ में भारतीय नौसेना की उपलब्धियों को याद करने के लिए वार्षिक कार्यक्रम मनाया जाता है। 
राष्ट्रपति ने नौसेना के बेड़े की समुद्री शक्ति की समीक्षा की अपनी छह शताब्दी पुरानी परंपरा को जारी रखते हुए, इस साल फरवरी में पूर्वी नौसेना कमान ने भारत की समुद्री शक्ति का प्रदर्शन करते हुए विशाखापत्तनम तट पर राष्ट्रपति के बेड़े की समीक्षा की मेजबानी की। तत्कालीन राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने नौसेना के बेड़े की समीक्षा की जिसमें 60 से अधिक युद्धपोत, पनडुब्बी और 55 विमान शामिल थे। हाई स्पीड स्टीम पास्ट और फ्लाई पास्ट प्रेसिडेंशियल याट के साथ किया गया। 12वीं फ्लीट रिव्यू का महत्व इसलिए है क्योंकि यह भारत की स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित किया गया था।
 

 
K.W.N.S.-ललित गर्ग- प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जैसे विश्वनायक गढ़ने वाली मां हीराबेन मोदी का निधन न केवल पुत्र के लिये बल्कि समूचे राष्ट्र के लिये एक अपूरणीय क्षति है, एक आघात है।। भारतीय मूल्यों एवं आदर्शों की शताब्दी यात्रा का विराम होना निश्चित ही देश के हर व्यक्ति के लिये शोक का विषय है, लेकिन यह वक्त शोक का नहीं, बल्कि उनके आदर्शों एवं जीवन-मूल्यों को आत्मसात करने का है। ऐसा कहा जाता है कि भगवान हर किसी के साथ नहीं रह सकता इसलिए उसने माँ को बनाया। हीराबेन ऐसी ही विलक्षण मां थी, एक देवदूत थी। कहने को वह इंसान थी, लेकिन भगवान से कम नहीं थी। वह एक मन्दिर थी, पूजा थी और वह ही तीर्थ थी। वह न केवल नरेन्द्र मोदी की जीवनदात्री बल्कि संस्कार निर्मात्री थी, बल्कि इस राष्ट्र आदर्श मां थी। उनके निधन से ममत्व, संस्कार, त्याग, समर्पण, सादगी एवं आदर्शो का युग ठहर गया है। 
प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी मां को श्रद्धांजलि देते हुए जो कहा, वह प्रेरणा की एक नजीर है। उन्होंने कहा कि, ”शानदार शताब्दी का ईश्वर चरणों में विराम… मां में मैंने हमेशा उस त्रिमूर्ति की अनुभूति की है, जिसमें एक तपस्वी की यात्रा, निष्काम कर्मयोगी का प्रतीक और मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध जीवन समाहित रहा है। मैं जब उनसे 100वें जन्मदिन पर मिला तो उन्होंने एक बात कही थी, जो हमेशा याद रहती है कि काम करो बुद्धि से और जीवन जियो शुद्धि से।’ मोदी जब-जब मां से मिलने जाते, मां-बेटे का यह मिलन एवं संवाद देश एवं दुनिया के लिये एक प्रेरणा बनता रहा है। मोदी के लिये मां हीराबेन, यह सिर्फ एक शब्द नहीं है, बल्कि उनके जीवन की यह वो भावना है जिसमें स्नेह, धैर्य, विश्वास, प्रेरणा कितना कुछ समाया है। मां हीराबेन, ने मोदी का सिर्फ शरीर ही नहीं गढ़ा बल्कि मन, व्यक्तित्व, आत्मविश्वास गढ़ा है। और ऐसा करते हुए उसने खुद को खपा दिया, खुद को भुला दिया।
‘मां हीराबेन’-इस लघु शब्द में प्रेम की विराटता/समग्रता निहित है। उसके अंदर प्रेम की पराकाष्ठा है या यूं कहें कि वो ही संपूर्ण प्रेम की पराकाष्ठा है। मोदी परिवार के लिए मां हीराबेन प्राण थी, शक्ति थी, ऊर्जा थी, प्रेम थी, करुणा थी, और ममता का पर्याय थी। वे केवल जन्मदात्री ही नहीं जीवन निर्मात्री भी थी। वे नरेन्द्र मोदी ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण परिवार के विकास का आधार थी। उन्होंने अपने हाथों से इस परिवार का ताना-बाना बुना है। इस परिवार के आकार-प्रकार में, रहन-सहन में, सोच-विचार में, मस्तिष्क में लगातार उन्नतिशील एवं संस्कारी बदलाव किये थे। वे मां, मां ही थी, जिसने इस परिवार की तकदीर और तस्वीर दोनों ही बदली है।
मां हीराबेन का सौ वर्षों का संघर्षपूर्ण जीवन भारतीय आदर्शों का प्रतीक है। श्री मोदी ने ‘मातृदेवोभव’ की भावना और हीराबेन के मूल्यों को अपने जीवन में ढाला है। तभी मोदी के लिये मां से बढ़कर कोई इंसानी रिश्ता नहीं रहा। वह सम्पूर्ण गुणों से युक्त थी, गंभीरता में समुद्र और धैर्य में हिमालय के समान थी। उनका आशीर्वाद वरदान बना। यही कारण है कि तमाम व्यस्तताओं एवं जिम्मेदारियों के बीच मोदी अपनी मां के पास जाते, उसके पास बैठते, उसकी सुनते, उसको देखते, उसकी बातों को मानते थे। उसका आशीर्वाद लेकर, उसके दर्शन करके एवं एक नई ऊर्जा लेकर निकलते थे।
साल 1923 में हीराबेन मोदी का जन्म हुआ था। उनकी उम्र 100 साल थी। हीराबेन मोदी का विवाह दामोदर दास मूलचंद मोदी के साथ हुआ था। हीराबेन मोदी के पांच बेटे और एक बेटी है। हीराबेन मोदी के बेटों के नाम सोमा मोदी, अमृत मोदी, नरेंद्र मोदी, प्रह्लाद मोदी व पंकज मोदी हैं। वहीं उनकी बेटी का नाम वासंती बेन हसमुखलाल मोदी है। दामोदर दास मूलचंद मोदी अब इस दुनिया में नहीं हैं।, दामोदर दास मोदी पहले वड़नगर में सड़क पर स्टॉल लगाया करते थे। वहीं इसके बाद कुछ समय तक उन्होंने रेलवे स्टेशन पर चाय भी बेचने का काम किया। मोदी ने अपने एक ब्लॉग में बताया था कि कि वडनगर के जिस घर में हम लोग रहा करते थे वो बहुत ही छोटा था। उस घर में कोई खिड़की नहीं थी, कोई बाथरूम नहीं था, कोई शौचालय नहीं था। कुल मिलाकर मिट्टी की दीवारों और खपरैल की छत से बना वो एक-डेढ़ कमरे का ढांचा ही हमारा घर था, उसी में मां-पिताजी, हम सब भाई-बहन रहा करते थे। यह स्वाभाविक है कि जहां अभाव होता है, वहां तनाव भी होता है। लेकिन मां हीराबेन की विशेषता रही कि अभाव के बीच भी उन्होंने घर में कभी तनाव को हावी नहीं होने दिया। 
हीराबेन का सम्पूर्ण जीवन प्रेरणाओं का समवाय रहा है। वे समय की पाबंद थीं, उन्हें सुबह 4 बजे उठने की आदत थी, सुबह-सुबह ही वो बहुत सारे काम निपटा लिया करती थीं। गेहूं पीसना हो, बाजरा पीसना हो, चावल या दाल बीनना हो, सारे काम वो खुद करती थीं। वे काम करते हुए अपने कुछ पसंदीदा भजन या प्रभातियां गुनगुनाती रहती थीं। नरसी मेहता जी का एक प्रसिद्ध भजन है “जलकमल छांडी जाने बाला, स्वामी अमारो जागशे” वो उन्हें बहुत पसंद था। एक लोरी भी है, “शिवाजी नु हालरडु”, हीराबेन ये भी बहुत गुनगुनाती थीं। घर को नियोजित चलाने के लिए दो चार पैसे ज्यादा मिल जाएं, इसके लिए हीराबेन दूसरों के घर के बर्तन भी मांजा करती थीं। समय निकालकर चरखा भी चलाया करती थीं क्योंकि उससे भी कुछ पैसे जुट जाते थे। कपास के छिलके से रुई निकालने का काम, रुई से धागे बनाने का काम, ये सब कुछ हीराबेन खुद ही करती थीं। उनको घर सजाने का, घर को सुंदर बनाने का भी बहुत शौक था। घर सुंदर दिखे, साफ दिखे, इसके लिए वो दिन भर लगी रहती थीं। वो घर के भीतर की जमीन को गोबर से लीपती थीं। उनका जीवन स्वावलम्बी था। सादगीमय था। संयमित था। 
मां!’ हीराबेन यह वो अलौकिक शब्द है, जिसके स्मरण मात्र से ही नरेन्द्र मोदी का रोम-रोम पुलकित हो उठता, हृदय में भावनाओं का अनहद ज्वार स्वतः उमड़ पड़ता और मनोःमस्तिष्क स्मृतियों के अथाह समुद्र में डूब जाता। उनके लिये ‘मां’ वो अमोघ मंत्र है, जिसके उच्चारण मात्र से ही हर पीड़ा का नाश हो जाता है। मोदी के अनुसार ‘मां’ की ममता और उसके आंचल की महिमा को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है, उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है। जिन्होंने मुझे और मेरे परिवार को आदर्श संस्कार दिए। उनके दिए गए संस्कार ही मेरी दृष्टि में उनकी मूल थाती है। जो हर मां की मूल पहचान होती है। उनके संस्कार एवं स्मृति ही मोदी के भावी जीवन का आधार है। 
हीराबेन का बचपन बहुत संघर्षों एवं अभावों में बीता। उनको अपनी मां का प्यार नसीब नहीं हुआ था। एक शताब्दी पहले आई वैश्विक महामारी का प्रभाव तब बहुत वर्षों तक रहा था। उसी महामारी ने हीराबेन की मां को छीन लिया था। हीराबेन तब कुछ ही दिनों की रही होंगी। उन्हें अपनी मां का चेहरा, उनकी गोद कुछ भी याद नहीं, वो अपनी मां से जिद नहीं कर पाईं, उनके आंचल में सिर नहीं छिपा पाईं। हीराबेन को अक्षर ज्ञान भी नसीब नहीं हुआ, उन्होंने स्कूल का दरवाजा भी नहीं देखा। उन्होंने देखी तो सिर्फ गरीबी और घर में हर तरफ अभाव। फिर भी इन्हीं अभावों में उन्होंने अपने छः बच्चों को पाला-पोषा एवं संस्कारों में ढ़ाला। हीराबेन विधाता के रचे इस परिवार को रचने वाली महाशक्ति थी। वे सपने बुनती थी और यह परिवार उन्हीं सपनों को जीता था और भोगता था। वे जीना सिखाती थी, वे पास रहे या न रहे उनका प्यार दुलार, उनके दिये संस्कार परिवार के हर सदस्य के साथ-साथ रहते थे। उन्होंने अपनी संतानों के भविष्य का निर्माण किया। इसीलिए वे प्रथम गुरु के रूप में भी थी। प्रथम गुरु के रूप में मां हीराबेन की इस परिवार के हर सदस्य के भविष्य निर्माण में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है। कभी उनकी लोरियों में, कभी झिड़कियों में, कभी प्यार से तो कभी दुलार से वे अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के बीज बोती रही। उनके सादगीमय जीवन-आदर्शों से समूचा राष्ट्र प्रेरित होता रहा है और युग-युगों तक होता रहेगा। हीराबेन ने संस्कार के साथ-साथ शक्ति भी दी है, उनकी भावनात्मक शक्ति मोदी के लिए ही नहीं, समूचे राष्ट्र के लिये सुरक्षा कवच का काम करती रहेगी।
 

K.W.N.S.-ललित गर्ग- जल प्रदूषण एवं पीने के स्वच्छ जल की निरन्तर घटती मात्रा को लेकर बड़े खतरे खड़े हैं। धरती पर जीवन के लिये जल सबसे जरूरी वस्तु है, जल है तो जीवन है। जल ही किसी भी प्रकार के जीवन और उसके अस्तित्व को संभव बनाता है। जीव मंडल में पारिस्थितिकी संतुलन को यह बनाये रखता है। पीने, नहाने, ऊर्जा उत्पादन, फसलों की सिंचाई, सीवेज के निपटान, उत्पादन प्रक्रिया आदि बहुत उद्देश्यों को पूरा करने के लिये स्वच्छ जल बहुत जरूरी है। जल-संकट के प्रति सचेेत करते हुए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सर-संघचालक डॉ. मोहन भागवत ने जल का भंडारण बढ़ाने की बात कहीं। उन्होंने कहा कि जल को जितना बचा सकते हैं बचाएं और जितना बढ़ा सकते हैं बढ़ाएं क्योंकि जल पृथ्वी की संचित संपत्ति है। हम जल को कैसे स्टोर कर सके, इसका उपाय करना चाहिए। भागवत की इस पर्यावरण चिन्ता की परिक्रमा करने के बाद ऐसा लगा कि भारतीय परम्परा का मंचमहाभूत एक कल्पवृक्ष है, जिसकी छांव में रहने वाले लोग पूरी तरह से निश्चिंत रहते हैं।
संघ प्रमुख ने पर्यावरण पर भारतीय ज्ञान परंपरा आधारित समकालीन विमर्श स्थापित करने के लिए पंचमहाभूत के जल तत्व पर सुजलाम अंतरराष्ट्रीय सेमिनार को संबोधित करते हुए जल का संयमित उपयोग करने एवं जल को बचाने का आह्वान किया, जो जल-संकट से उभरने की एक रोशनी दे रहा है। उज्जैन में सुजलाम जल महोत्सव में मोहन भागवत ने महाकाल में 60 किलो चांदी से बनाए गए जल स्तंभ का भी अनावरण किया। यह सम्मेलन ‘सुमंगलम’ नामक कार्यक्रमों की एक श्रृंखला का हिस्सा है। इसका उद्देश्य प्रकृति के पांच मूल तत्वों या ‘पंचमहाभूत’ – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और अंतरिक्ष की शुद्धता को सुरक्षित रखने की अनूठी भारतीय अवधारणा को प्रस्तुत करना है। पर्यावरण संकट पर भारत सहित पूरी दुनिया में गहरा संकट देखने को मिल रहा है। इस महासंकट से निजात दिलाने में भारत सक्षम है। पर्यावरण संरक्षण के लिए पंचतत्वों को समझने और व्यापक नीति बनाने के मकसद से देश में सुमंगलम अभियान शुरू किया गया है।
संघ एवं भागवत की बहुआयामी प्रवृत्तियों में एक है पर्यावरण। जल प्रदूषण एवं पीने लायक जल की घटती मात्रा दुनिया के सामने एक बड़ी चुनौती बन चुका हैं। पर्यावरण से जुड़ी इस तरह की समस्याओं एवं खतरों को लेकर वैश्विक स्तर पर चिन्ता तो जाहिर की जाती है, मगर अब तक इस दिशा में कोई खास समाधान की पहल नहीं हो सकी है। परिणाम है कि बढ़ती जनसंख्या के कारण तेज औद्योगिकीकरण और अनियोजित शहरीकरण बढ़ रहा है जो बड़े और छोटे पानी के स्रोतों में ढेर सारा कचरा छोड़ रहें हैं जो अंततः पानी की गुणवत्ता को गिरा रहा है। जल में ऐसे प्रदूषकों के सीधे और लगातार मिलने से पानी में उपलब्ध खतरनाक सूक्ष्म जीवों को मारने की क्षमता वाले ओजोन के घटने के कारण जल की स्व-शुद्धिकरण क्षमता घट रही है। इससे जल की रसायनिक, भौतिक और जैविक विशेषताएं बिगड़ रही है जो पूरे विश्व में सभी पौड़-पौधों, मानव और जानवरों के लिये बहुत खतरनाक है।
पशु और पौधों की बहुत सारी महत्वपूर्ण प्रजातियाँ जल प्रदूषकों के कारण खत्म हो चुकी है। ये एक वैश्विक समस्या है जो विकसित और विकासशील दोनों देशों को प्रभावित कर रही हैं। खनन, कृषि, मछली पालन, स्टॉकब्रिडींग, विभिन्न उद्योग, शहरी मानव क्रियाएँ, शहरीकरण, निर्माण उद्योगों की बढ़ती संख्या, घरेलू सीवेज आदि के कारण बड़े स्तर पर जल एवं जलस्रोत प्रदूषित हो रहे हैं। मोहन भागवत ने इन संकटों से मुक्ति के लिये सार्थक उपक्रम किये जाने की आवश्यकता व्यक्त करते हुए शाकाहार को अपनाने की जरूरत पर बल दिया। उन्होंने कहा कि मांसाहार से पानी की खपत बढ़ गई है। मांसाहार नहीं होगा तो कत्लखाने बंद हो जाएंगे। बेहतर यह है कि शाकाहारी बने। हमें किसी भी तरह जल का अनादर न करना चाहिए। हमारी प्रकृति का सम्मान हो और इसकी सदैव पूजा की जाना चाहिए।
पूरे विश्व के लिये शुद्ध जल की मात्रा का लगातार घटना एवं जल प्रदूषण एक बड़ा पर्यावरणीय और सामाजिक मुद्दा है। यह अपने चरम बिंदु पर पहुँच चुका है। इन संकटों से घिरती विश्व मानवता को बचाने के लिये डॉ. भागवत ने जहां प्रकृति को बचाने के लिये हर प्रकार से कोशिश करने की बात कहीं वहीं उन्होंने खेती के धंधे की पद्धति में बदलाव भी करना पड़े तो करने का सुझाव दिया। हमें अधिक से अधिक जैविक खेती करने की आवश्यकता है। जल का भंडारण अधिक से अधिक धरती पर किया जाए। पानी की खपत कैसे कम हो, कम पानी में हमारा काम हो, इस पर जोर देना जरूरी है। राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नीरी), नागपुर ने चेताया है कि नदी जल का 70 प्रतिशत बड़े स्तर पर प्रदूषित हो गया है।
भारत की मुख्य नदी व्यवस्था जैसे गंगा, ब्रह्मपुत्र, सिंधु, यमुना आदि बड़े पैमाने पर प्रभावित हो चुकी है। भारत में मुख्य नदी खासतौर से गंगा भारतीय संस्कृति और विरासत से अत्यधिक गहरे रूप में जुड़ी हुई है। आमतौर पर लोग जल्दी सुबह नहाते हैं और किसी भी व्रत या उत्सव में गंगा जल को देवी-देवताओं को अर्पण करते हैं। अपने पूजा को संपन्न करने के मिथक में गंगा में पूजा विधि से जुड़ी सभी सामग्री एवं अस्थि विसर्जन कर देते हैं। इसी गंगा नदी एवं अन्य नदियों में उद्योगों से चीनी मिल, भट्टी, ग्लिस्रिन, टिन, पेंट, साबुन, कताई, रेयान, सिल्क, सूत आदि जो जहरीले कचरे बड़ी मात्रा में मिलते हैैं। 1984 में, गंगा के जल प्रदूषण को रोकने के लिये गंगा एक्शन प्लान को शुरु करने के लिये सरकार द्वारा एक केन्द्रिय गंगा प्राधिकरण की स्थापना की गयी थी। सरकार जल प्रदूषण एवं जल संरक्षण के लिये जागरूक बनी है, लेकिन सरकार के साथ जनता को भी जागना होगा।
दुनिया की बहुत सारी नदियों की तरह भारतीय नदियों का पानी भी प्रदूषित हो चुका है, जबकि इन नदियों को हमारी संस्कृति में हमेशा पवित्र जगह दी जाती रही है। भारत के लोग इन नदियों से मुंह नहीं फेर सकते क्योंकि वे उनकी जीवनरेखाएं हैं और भारत का भविष्य कई रूपों में इन्हीं नदियों की सेहत से जुड़ा हुआ है। भारत में जल प्रदूषण सबसे गंभीर पर्यावरण संबंधी खतरों में से एक बनकर उभरा है। इसके सबसे बड़े स्रोत शहरी सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट हैं जो बिना शोधित किए हुए नदियों में प्रवाहित किए जा रहे हैं। सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद शहरों में उत्पन्न कुल अपशिष्ट जल का केवल 10 प्रतिशत हिस्सा ही शोधित किया जा रहा है और बाकी ऐसे ही नदियों, तालाबों एवं महासागरों में प्रवाहित किया जा रहा है। जल प्रदूषण की समस्या से मानव तो बुरी तरह प्रभावित होते ही हैं, जलीय जीव जन्तु, जलीय पादप तथा पशु पक्षी भी प्रभावित होते हैं। खास तौर पर कुछ समुद्री हिस्सों एवं नदियों में तो जल प्रदूषण की वजह से जलीय जीवन समाप्तप्राय हो चुका है। जल बचाने के मुख्य साधन है नदी, ताल एवं कूप। इन्हें अपनाओं, रक्षा करो, अभय दो, इन्हें मरुस्थल के हवाले न करो। अन्तिम समय यही तुम्हारे जीवन और जीवनी को बचायेंगे। ख्यात पर्यावरणविद अनुपम मिश्र तो ‘अब भी खरे है तालाब’ कहते कहते स्वर्गस्थ हो गये।
मोहन भागवत की अवधारणा है कि पंच महाभूतों में पैदा हुए असंतुलन से उत्पन्न विकृतियों के संकट से उभरना आवश्यक है। अपनी-अपनी शक्ति अनुसार पंच महाभूतों पर अलग-अलग स्थानों पर कार्य करना आवश्यक है। पिछले कुछ समय से दुनिया में पर्यावरण के विनाश एवं जल प्रदूषण को लेकर काफी चर्चा हो रही है। मानव की गतिविधियों के कारण पृथ्वी एवं प्रकृति के वायुमंडल पर जो विषैले असर पड़ रहे हैं, उनसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी चिंतित हैं। पंचमहाभूत के जल तत्व पर अंतरराष्ट्रीय सेमिनार एक महाअनुष्ठान है जिसमें अनेक देश-विदेश के विशिष्ट व्यक्तित्व पर्यावरण संरक्षण के इस महाकुंभ में जन-जन को अभिप्रेरित करते हुए पर्यावरण एवं जल संरक्षण को नया जीवन प्रदान करेंगे। चूंकि प्रकृति मनुष्य की हर जरूरत को पूरा करती है, इसलिए यह जिम्मेदारी हरेक व्यक्ति की है कि वह प्रकृति की रक्षा के लिए अपनी ओर से भी कुछ प्रयास करे।
 

 
 
 K.W.N.S.-चीन समेत दुनिया के लगभग 15 देशों में कोरोना संक्रमण में आयी तेजी के मद्देनजर भारत में समुचित तैयारियां हो रही हैं. अगर पड़ोस में कहीं आग लगी हो, तो हम भी चैन से नहीं बैठ सकते हैं. अगर हम स्थिति को वैज्ञानिकता के साथ देखें, तो हमारे देश में हर सप्ताह अभी मात्र हजार के आसपास संक्रमण के मामले आ रहे हैं. यह पिछले कई सप्ताह से चल रहा है. हमारे देश में आर्थिक और कारोबारी गतिविधियां जोरों से चल रही हैं, सामाजिक तौर पर लोग घूम रहे हैं, मिल-जुल रहे हैं, संस्थान चल रहे हैं।
लोगों के मन से महामारी का भय निकल चुका है. यह सब ओमिक्रॉन की वजह से हुआ. उसमें पांच तरह के वायरस हैं. यह दक्षिण अफ्रीका से यूरोप पहुंचा था. उस समय भारत में डेल्टा का प्रकोप था. ओमिक्रॉन का दूसरा रूप यहां आया, जिसका असर मामूली होता था. इसकी वजह से इसके अन्य घातक रूपों को भारत में जगह नहीं मिली. अभी जो वायरस अन्य देशों में फैल रहा है, वह जुलाई में कुछ मामलों में भारत में भी पाया गया था. अभी हाल में इसके कुछ मामले सामने आये हैं. अगर हमारे यहां कोरोना की नयी लहर आनी होती, तो अब तक हजारों मामले हर सप्ताह आने लगते. पर ऐसा नहीं हुआ।
अमेरिका, ब्राजील और यूरोप में जो चल रहा है, वह वायरस का अलग प्रकार है. चीन और कोरिया में भी ओमिक्रॉन के ही अलग-अलग वायरस लोगों को संक्रमित कर रहे हैं. कहीं भी अल्फा, बीटा, डेल्टा आदि नहीं हैं. यह उल्लेखनीय है कि हमारे यहां 90 प्रतिशत लोगों को कभी न कभी संक्रमण हो चुका है. बाकी 10 प्रतिशत या तो झूठ बोल रहे हैं या उन्हें संक्रमण का पता ही नहीं है. इतनी बड़ी आबादी के पास प्राकृतिक रूप से प्रतिरोधक क्षमता है. साथ ही, देश की आबादी के 75 प्रतिशत हिस्से को टीके दिये जा चुके हैं।
शेष को एक खुराक लगा है. इसका सीधा अर्थ है कि हमारे देश में लोगों के पास दोहरी प्रतिरोधक क्षमता है. इसे ‘हर्ड इम्युनिटी’ यानी सामूहिक प्रतिरोधक क्षमता कहा जाता है. इसमें यह भी होता है कि जिन लोगों ने टीका नहीं लगवाया या उन्हें संक्रमण नहीं हुआ, उन्हें भी इस क्षमता का लाभ मिल जाता है. इन सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए मुझे ऐसा लगता है कि नया वायरस हमारे देश में कोई खास असर नहीं कर सकेगा।
एक बहुत मशहूर कहावत है कि दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है. डेल्टा के समय का अनुभव हमलोगों को है. उस समय एक उच्च शिक्षण संस्थान की काउंसिल थी, जिसने निष्कर्ष दिया था कि हमारे यहां डेल्टा आयेगा ही नहीं. सरकार ने इस अनुमान को मान लिया था. और, हमने देखा कि डेल्टा के साथ आयी दूसरी लहर कितनी खतरनाक साबित हुई थी. अभी हमें जो करना है, उसमें सबसे प्रमुख यह है कि हमें संक्रमण का ग्राफ देखते रहना है कि एक सप्ताह और दूसरे सप्ताह के बीच मामलों के घटने या बढ़ने का प्रतिशत क्या है।
अभी यह तीन प्रतिशत प्लस है. जब यह अंतर बहुत अधिक बढ़ने लगेगा, तब हमको चिंतित होने की जरूरत होगी. अभी जो संक्रमण में कुछ बढ़ोतरी होगी, वह इसलिए होगी कि अब ज्यादा लोग टेस्ट करायेंगे. जब जांच अधिक होगी, तो स्वाभाविक रूप से संख्या भी अधिक होगी. अभी हमें तैयारियों पर ध्यान देना होगा तथा उपलब्ध संसाधनों को लेकर मॉक ड्रिल करना होगा. यह प्रक्रिया शुरू भी कर दी गयी है, जो सराहनीय है. लोगों को मास्क लगाना चाहिए. इसका फायदा केवल कोविड से बचाव के रूप में ही नहीं है. मास्क कई तरह के वायरस से आपको बचा सकता है।
हमें किसी तरह से हड़बड़ाना नहीं है और न ही किसी आशंका को लेकर बेचैन होना है. जिन लोगों ने दोनों खुराक नहीं ली है, उन्हें वैक्सीन लेनी चाहिए. इसी तरह बूस्टर डोज भी अहम है. जो लोग 65 साल से अधिक आयु के हैं या गंभीर बीमारियों से ग्रस्त हैं, उन्हें बूस्टर खुराक अवश्य लेनी चाहिए. उन्हें इससे अतिरिक्त सुरक्षा मिलेगी. आम तौर पर किसी तरह का पैनिक लोगों में नहीं फैले, इसके लिए सरकार और मीडिया को कुछ सावधानी रखनी चाहिए।
ऐसा देखा गया है कि कोई रिपोर्ट, जो एक विशेष विभाग के पास जानी थी, किसी तरह से सार्वजनिक हो गयी और उसके आधार पर ऐसी खबरें बना दी गयीं, जिनसे बेचैनी बढ़ी. सरकार और प्रशासनिक विभागों को इसका ध्यान रखना चाहिए. जो सूचना जिसके लिए हो, उसी तक पहुंचनी चाहिए. मेडिकल रिसर्च से जुड़ी जानकारियों को छांटकर ही सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि उनका गलत मतलब न निकले।
मीडिया को भी अनावश्यक सूचना देने और बातों को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करने के रवैये से परहेज करना चाहिए. लोगों को भले कुछ सरकारी निर्देश पसंद न आएं, पर अपनी और सबकी सुरक्षा के लिए उनका पालन करना चाहिए. लापरवाही बरतने से कोई फायदा नहीं है. हमें सावधान और सतर्क रहना है. सरकार की ओर से समुचित पहल हो रही है।