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Browsing: संपादकीय

K.W.N.S.-डॉ. वेदप्रताप वैदिक- राहुल गांधी की मध्यप्रदेश-यात्रा सर्वाधिक सफल रहने की उम्मीद है। पिछले तीन-चार दिनों में मुझे यहां के कई शहरों और गांवों से गुजरने का अवसर मिला है। जगह-जगह राहुल, कमलनाथ, दिग्विजयसिंह और स्थानीय नेताओं के पोस्टरों से रास्ते सजे हुए हैं। लेकिन राहुल के कुछ बयान इतने अटपटे होते हैं कि वे इस यात्रा पर पानी फेर देते हैं। जैसे जातीय जन-गणना और सावरकर पर कुछ दिन पहले दिए गए बयानों ने यह सिद्ध कर दिया था कि वह अपनी दादीजी और माताजी की राय के भी विरूद्ध बोलने का साहस कर रहे हैं।
ये कथन सचमुच साहसिक होते तो प्रशंसनीय भी शायद कहलाते। लेकिन वे साहसिक कम अज्ञानपूर्ण ज्यादा थे। इसके लिए असली दोष उनका है, जो राहुल को पर्दे के पीछे से पट्ठी पढ़ाते रहते हैं। अब मप्र के महान स्वतंत्रता-सेनानी टंट्या भील के जन्म स्थान पर पहुंचकर उन्होंने कह दिया कि टंट्या भील ने अंग्रेजों के विरुद्ध लड़कर अपनी जान दे दी, जबकि आरएसएस अंग्रेजों की मदद करता रहा। उन्होंने संघ द्वारा आदिवासियों को वनवासी कहने पर भी आपत्ति की, क्योंकि आदिवासियों की सेवा करनेवाले संघ के संगठन इसी नाम का इस्तेमाल करते हैं। राहुल से कोई पूछे कि क्या ये आदिवासी शहरों में रहते हैं? जो वनों में रहते हैं, उन्हें वनवासी कहना तो एकदम सही है। आदिवासी शब्द का इस्तेमाल ‘कबाइली’ या ट्राइबल के लिए हुआ करता था लेकिन उस समय यह सवाल भी उठा था कि क्या सिर्फ आदिवासी लोग भारत के मूल निवासी हैं? बाकी सब 80-90 प्रतिशत लोग क्या बाहर से आकर भारत में बस गए हैं? मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को इस बात का श्रेय है कि उन्होंने टंट्या भील को एक महानायक का सम्मान दिया है। इसी प्रकार संघ को अंग्रेज का समर्थक बताना भी अपने इतिहास के अज्ञान को प्रदर्शित करना है। राहुल का भोलापन अद्भुत है। उस पर कुर्बान जाने का मन करता है। देश की स्वाधीनता का ध्वज फहरानेवाली महान पार्टी कांग्रेस के पास आज कोई परिपक्व नेता नहीं है, यह देश का दुर्भाग्य है। यह ठीक है कि हमारे देश में कुछ नेता प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गए लेकिन उनका ज्ञान राहुल जितना या उससे भी कम रहा होगा लेकिन उनकी खूबी यह थी कि वे अपने चारों तरफ ऐसे लोगों को सटाए रखते थे, जो उन्हें लुढ़कने से बचाए रखते थे। कांग्रेस के पास आज मोदी के विकल्प के तौर पर न तो कोई नेता है और न ही नीति है लेकिन इस अभाव के दौरान राहुल की यह भारत-यात्रा बेचारे निराश कांग्रेसियों में कुछ आशा का संचार जरुर कर रही है लेकिन यदि अपने बयानों में राहुल थोड़ी रचनात्मकता बढ़ा दें और किसी के भी विरुद्ध निराधार अप्रिय टिप्पणियां न करें तो यह यात्रा उन्हें शायद जनता से कुछ हद तक जोड़ सकेगी।

K.W.N.S.-कोरोना महामारी का प्रकोप शांत होने के बावजूद एक तरफ चीन में कोरोना के 31000 से ज्यादा केस आने से लोगों में एक बार फिर भय का वातावरण बन गया है। वहीं महाराष्ट्र में मुंबई और इसके आसपास के इलाकों में खसरे का प्रकोप बढ़ने से राज्य सरकार और केन्द्र सरकार की चिंताएं काफी बढ़ गई हैं। खसरे से अब तक 13 बच्चों की मौत हो चुकी है। जबकि मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। खसरा जिसे मीसल्स रूबेला भी कहा जाता है एक संक्रामक वायरल बीमारी है, एक से दूसरे में आसानी से फैल जाती है। बच्चे इसका सबसे ज्यादा शिकार होते हैं। मुश्किल यह भी है कि बच्चों में खसरे के टीके लगने के बाद भी वे संक्रमित हो रहे हैं। ऐसी रिपोर्टें सामने आई हैं कि मुंबई में लगभग 30 बच्चे ऐसे पाए गए हैं जिन्हें 9 माह से कम उम्र में ही मीसल्स की पहली वैक्सीन लग चुकी है। यह पोलियो के बाद एक घातक बीमारी मानी जाती है। भारत में पोलियो उन्मूलन के लिए देशव्यापी टीकाकरण अभियान चलाया गया था।
जिसके परिणाम स्वरूप पोलियो के मामले अब कभी कभार ही सामने आते हैं। मुंबई में 2019 में खसरे से सिर्फ तीन मौतें दर्ज की गई थी। 2020 में भी केवल तीन मौतें हुई थी। 2021 में केवल एक मौत की पुष्टि हुई थी। लेकिन इस साल अब तक लगभग 600 मामले दर्ज किए गए हैं। मालेगांव, भिवंडी, नासिक, ठाणे, अकोला, यवतमाल, कल्याण और वसई विरार क्षेत्रों में यह बीमारी तेजी से फैल रही है। मुंबई के सात इलाके धारावी, गवंडी, कुर्ला, महिम, बांद्रा और माटूंगा हॉट-स्पॉट बन गए हैं।खसरे का प्रकोप हर दो से तीन सालों के बाद देखने को मिल जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अब तक 5 देशों को खसरा मुक्त घोषित किया है। अब तक श्रीलंका, मालदीव, भूटान, नेपाल, तिमोर-लेस्ते, बंगलादेश शामिल हैं। किसी बीमारी का उन्मूलन तब घोषित किया जाता है जब उस बीमारी का एक भी मामला विगत तीन वर्षों में संज्ञान में न आया हो, लेकिन भारत अभी भी खसरा उन्मूलन के लिए काफी पीछे है। मुंबई और आसपास के इलाकों में खसरा रोग फैलने के कारणों की जांच के लिए यद्यपि टीमें गठित कर दी गई हैं, लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों और अधिकारियों का कहना है कि कोरोना महामारी के चलते सारा ध्यान उस पर ही लगा रहा। कोरोना वैक्सीनेशन के महाअभियान के चलते दूसरे कार्यक्रमों पर ध्यान ही नहीं गया। खसरे के टीके के दो डोज 9 और 15 महीने के बच्चों को लग जानी चाहिए। कोरोना टीका अभियान के चलते बच्चों को खसरे के टीके लगाए ही नहीं गए।
मुंबई और आसपास के इलाकों में 20,000 से ज्यादा ऐसे बच्चे पाए गए जिनके खसरे का टीका लगा ही नहीं। अक्तूबर में जब खसरे के केस सामने आए तब तक के आंकड़े बताते हैं कि मुंबई में 41 प्रतिशत बच्चों को ही टीके लगाए गए थे। इसका अर्थ यही है कि 48 प्रतिशत बच्चों को टीका नहीं लगा। जिन्हें टीका लगा भी उनको दूसरी डोज नहीं मिली। या फिर पहली डोज दूसरी डोज में काफी अंतर आ चुका है। अब ऐसे बच्चों को ढूंढा जा रहा है। जिन्हें अब तक टीका नहीं लगा।दुनिया भर में खसरे से होने वाली मौतों में एक तिहाई से अधिक भारतीय बच्चे शामिल हैं। केन्द्र सरकार ने इससे निपटने के लिए 2005 में टीकाकरण अभियान शुरू किया था। टीकाकरण अभियान के चलते ही देश भर में 50,000 मौतों को टाला जा चुका है। कोरोना महामारी पर नियंत्रण भी सफल टीकाकरण अभियान के चलते ही पाया जा सका है। खसरा उन्मूलन के लिए टीकाकरण अभियान को एक ऐसे स्तर तक पहुंचाना होगा जब कोई भी संक्रमित व्यक्ति किसी अन्य को खसरा फैलाने में असमर्थ हो, क्योंकि उनका टीकाकरण हो चुका है। जब आप को एक बीमारी का सफाया करने के लिए हस्तक्षेप और निगरानी दोनों की जरूरत हो तो जरा सी भी चूक महंगी पड़ सकती है।
पोलियो एक ऐसी बीमारी रही जिससे टीकाकरण से ही सफलतापूर्वक खत्म किया गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक कोराेना काल के दौरान दुनियाभर में लगभग 4 करोड़ बच्चे खसरे के टीके की खुराक से चूक गए। 2.5 करोड़ बच्चों ने अपनी पहली खुराक ही नहीं ली जबकि 1.47 करोड़ बच्चों ने अपनी दूसरी खुराक नहीं ली। टीकाकरण में चूक के चलते ही जिन देशों को खसरा उन्मूलन के करीब समझा जाता था अब वहां भी खसरा के मामले बढ़ रहे हैं।संपादकीय :सरमा जी जबान संभाल कर…चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति?असम-मेघालय खूनी संघर्षबहुत मुस्किल है यह सेवा…बहुत मुस्किल है यह सेवाफुटबाल मैदान पर क्रान्ति !भारत जैसे देश में आज भी टीकों के प्रति जागरूकता कम है। जागरूकता की कमी के चलते या धार्मिक कारणों से लोग आज भी अपने बच्चों को टीके नहीं लगाते। सवाल तो लोगों ने कोरोना वैक्सीन पर भी उठाए थे। केन्द्र सरकार ने 2023 तक देश को खसरा मुक्त कराने का लक्ष्य रखा है, लेकिन लगता नहीं हम इस लक्ष्य को पूरा कर पाएंगे। खसरे को मिटाने के लिए देशव्यापी टीकाकरण की जरूरत है। और इसके लिए पोलियाे उन्मूलन जैसा अभियान चलाने की जरूरत है। जिस तरह से पोलियो उन्मूलन अभियान में शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के डाक्टरों की भूमिका रही वैसी ही भूमिका आज निभाने की जरूरत है। लोगों को बच्चों को खसरा टीका लगवाने के लिए प्रेरित करने की जरूरत है। इसके लिए जरूरी है कि घर-घर अभियान चलाया जाए। लोग भी अपने बच्चों को लेकर सावधानी बरतें और उनका सही समय पर टीकाकरण करवाएं।
K.W.N.S.-इस अध्ययन में यह सामने आया कि वर्ष 2019 में तैंतीस तरह के सामान्य जीवाणुओं के संक्रमण से करीब चौदह लाख लोग मारे गए और इनमें से छह लाख अस्सी हजार लोगों की मौत का कारण सिर्फ पांच तरह के जीवाणुओं के होने वाला संक्रमण था। वैश्विक स्तर पर देखें तो दुनिया में सबसे ज्यादा मौतों का दूसरा बड़ा कारण जीवाणु संक्रमण रहा। यानी वर्ष 2019 में दुनियाभर में सतहत्तर लाख मौतें तैंतीस तरह के जीवाणुओं से हुर्इं।
भारत के संदर्भ में यह कम चिंताजनक स्थिति नहीं है। जिन पांच जीवाणुओं के संक्रमण से लाखों लोग मौत के मुंह में चले गए, उनमें निमोनिया, मूत्र संक्रमण और टायफायड जैसे रोगों के मामले कहीं ज्यादा हैं। आमतौर पर ये बीमारियां हमारे रहन-सहन और खानपान से ही होती हैं। इससे पता चलता है कि स्वास्थ्य, रहन-सहन, खानपान, प्रदूषण, स्वच्छ पेयजल और शौचालयों की उपलब्धता के मोर्चे पर हम कहां खड़े हैं। और फिर ये आंकड़े तो वे हैं जो कहीं न कहीं दर्ज रहे होंगे। भारत के ग्रामीण और दूरदराज इलाकों में तो ऐसी संक्रामक बीमारियों से न जाने कितनी मौतें हर साल हो जाती हैं, जो सरकारी रिकार्ड में दर्ज भी नहीं हो पातीं!
ऐसे अध्ययन और शोध सिर्फ चौंकाते ही नहीं हैं, बल्कि सचेत भी करते हैं कि हमें किस मोर्चे पर क्या काम करना है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि सामान्य संक्रमणों से भी मरने वालों का आंकड़ा कम नहीं है। इससे पता चलता है कि लोगों को मामूली बीमारियों के इलाज भी आसानी से मुहैया नहीं हो पाते हैं। भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति आज भी किस हाल में है, यह किसी से छिपा नहीं है। कहने को देश में बड़े-बड़े पांच सितारा और निजी अस्पतालों की भरमार होती जा रही है, लेकिन आबादी के बड़े हिस्से की यहां तक पहुंच ही नहीं है।
सरकारी अस्पतालों में मरीजों के बोझ से लेकर दूसरी अनगिनत समस्याएं हैं। हजारों लोगों पर एक डाक्टर, एक बिस्तर दशकों से चली आ रही समस्या है। अस्पतालों में उपकरणों और दवाइयों की भारी कमी हमेशा की बीमारी है। जिला अस्पतालों से लेकर ग्रामीण इलाकों में बने प्राथमिक और सामुदायिक चिकित्सा केंद्रों की हालत कौन नहीं जानता। यह भी जगजाहिर है ही कि चिकित्सा सेवा का कर्म किस तरह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा चुका है। जाहिर है, ऐसे में सामान्य संक्रमण से भी लोग मरेंगे ही!
संक्रामक रोग फैलाने वाले जीवाणुओं के पनपने और फैलने का बड़ा कारण स्वच्छता से भी जुड़ा है। भारत के ज्यादातर शहरों में सीवर समस्या से लेकर कूड़े के पहाड़ तक गंभीर संकट का कारण बने हुए हैं। घरों में नलों के जरिए पहुंचाए जाने वाले पानी में सीवर लाइनों का पानी और कीड़े मिलने जैसी शिकायतें इतनी आम हैं कि स्थानीय निकाय और प्रशासन इन्हें समस्या के रूप में देखते ही नहीं। देश की राजधानी दिल्ली में तीन बड़े कूड़े के पहाड़ करीब चार दशकों से खड़े हैं, जो समय-समय पर धधकते रहते हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि लाखों लोग किस तरह के प्रदूषण में रहने को मजबूर हैं। ऐसे में बीमारियां नहीं फैलेंगी तो क्या होगा? अगर सामान्य जीवाणुओं के संक्रमण से लाखों लोग मर रहे हैं तो निश्चित ही इसके लिए जिम्मेदार हमारे नीति-नियंता और दोषपूर्ण नीतियां हैं। संक्रमित बीमारियों पर काबू पाना है तो इसके लिए व्यवस्था को संक्रमणमुक्त करना होगा।

K.W.N.S.-यह अंतर दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। भारतीय रुपए का मूल्य आज आजादी के बाद से सबसे कम हो चुका है। भारत में सबको यह चिंता सता रही है कि भारत का विदेशी मुद्रा भंडार और गिरेगा। इसका दुष्परिणाम यह होगा कि विदेश से आयात महंगा होता जाएगा, जिसके कारण आम लोगों का रहना और खाना-पीना बहुत मुश्किल हो जाएगा। भारतीय रुपए की गिरावट का प्रमुख कारण भारत की कमजोर अर्थव्यवस्था है। रुपए में बढ़ती गिरावट का सीधा असर उन विद्यार्थियों पर भी पड़ेगा जो पढाई के लिए विदेश जाने की इच्छा रखते हैं। उनके माता-पिता को उनकी कालेज की फीस भरने में काफी बोझ महसूस होगा। इसका दुष्परिणाम भारत सरकार को तब महसूस होगा, जब भारी मात्रा में कुशल श्रमिक अमेरिका जैसे देशों में चले जाएंगे। कोविड महामारी के दो वर्षों में अमेरिका की अर्थव्यवस्था अब भी विश्व-बाजार में टिकी हुई है। जबकि दूसरी ओर भारत की अर्थव्यवस्था में 2019 से कोई विशेष सुधार नहीं आया है। बल्कि बिगड़ी जरूर है। रुपए की गिरावट कम करने के लिए भारत सरकार को देश की अर्थव्यवस्था पर विशेष ध्यान देना होगा। आम लोगों को चाहिए कि वे आगामी त्योहारों में अपने शहर की स्थानीय दुकानों से ही खरीदारी करे और इस तरह स्थानीय व्यापार को बढ़ाने में अपना योगदान दें। व्यापार सिर्फ वस्तुओं और सेवाओं का क्रय-विक्रय ही नहीं है, वह प्रेम विश्वास और आत्मीयता का आदान-प्रदान भी है। वह एक दूसरे को बचाने का जरिया भी है।

K.W.N.S.-शारदीय नवरात्र मनाते हुए हम एक बार फिर स्त्री शक्ति के सम्मान के लिये बेटियों एवं महिलाओं के आदर एवं अस्तित्व की बात कर रहे हैं। यह देखना भी दिलचस्प है कि जहां साल में दो बार लड़कियों को महत्व देने के लिए ऐसे पर्व मनाए जाते हों, वहां लड़कियों को दोयम दर्जे का मानने वाले भी बहुत हैं, बालिकाओं और बेटियों के अस्तित्व एवं अस्मिता को नौंचने वाले भी कम नहीं है, आये दिन ऐसी घटनाएं देखने और सुनने कोे मिलती हैं कि किस तरह आज भी बेटियों के साथ बलात्कार, व्यभिचार एवं अत्याचार करने के बाद उन्हें मार दिया जाता है। उत्तराखण्ड की ताजा घटना में सत्ताधारी पार्टी से संबंध रखने वाले एक रिजार्ट के मालिक ने अपने सहयोगियों के साथ मिल कर एक मासूम बालिका के साथ अवैध एवं अनैतिक कृत करने के बाद हत्या कर दी। यों यह घटना आए दिन होने वाले जघन्य अपराधों की ही अगली कड़ी है, भला हमारा नारी को सम्मान देने एवं मां दुर्गा को पूजना कितना अर्थपूर्ण एवं विरोधाभासी है, साफ झलकता है। यहां हमारी कथनी और करनी का फर्क भी साफ नजर आता है, हमारी दूषित सोच एवं विकृत मानसिकता भी उजागर होती है।
इसी सप्ताह हमने राष्ट्रीय पुत्री दिवस मनाया। हालांकि, भारत में बेटी दिवस मनाने की एक खास वजह बेटियों के प्रति लगातार बढ़ रहे अपराधों पर नियंत्रण के लिये लोगों को जागरूक करना है। आज भी हमारे समाज की सोच बेटियों को लेकर विडम्बनापूर्ण एवं विसंगतिपूर्ण है। बेटी को न पढ़ाना, उन्हें जन्म से पहले मारना, घरेलू हिंसा, उनके मासूम शरीर को नौंचना, दहेज और दुष्कर्म से जुडे़ बेटियों के अपराध एवं अत्याचार होना नये भारत, विकसित भारत पर एक बदनुमा दाग है। यह समझाना जरूरी है कि बेटियां बोझ नहीं होती, बल्कि आपके परिवार, समाज एवं राष्ट्र का एक अहम हिस्सा होती हैं, एक बड़ी ताकत होती है। आज बेटियां चांद तक पहुंच गई हैं, कोई भी क्षेत्र हो बेटियों ने अपना दमखम दिखा दिया है और बता दिया है कि वे किसी से कम नही है। इस सबके बावजूद बेटियों को क्यों अपनी हवस का माध्यम बनाया जाता है, यह एक बड़ा प्रश्न नवरात्र जैसे पर्व मनाते हुए हमारे सामने खड़ा है। उत्तराखण्ड की ताजा घटना में समाज में रसूख के बूते अपनी धौंस जमाने वाले कुछ लोग महज मनमानी के लिए किसी बेटी के साथ अत्याचार एवं अनैतिक काम करने से नहीं हिचके।
जिस लड़की की हत्या कर दी गई, वह अपने परिवार की आर्थिक हालत की वजह से भी नौकरी करने के लिये घर से निकली थी। मगर उसकी योग्यता और मेहनत की कद्र करने के बजाय रिजार्ट के मालिक ने उसे अवैध और अनैतिक काम में झोंकने की कोशिश की। ऐसा हर जगह बेटियों के साथ हो रहा है। जाहिर है, लड़की ने मना किया, मगर आरोपों के मुताबिक, इसी वजह से रिजार्ट के मालिक ने उसकी हत्या कर दी। यों यह घटना आए दिन होने वाले जघन्य अपराधों की ही अगली कड़ी है, मगर यह सत्ता और समाज के उस ढांचे को भी सामने करती है, जिसमें महिलाओं की सहज जिंदगी लगातार मुश्किल बनी हुई है, संकटग्रस्त एवं असुरक्षित है। यह घटना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केे ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान की भी धज्जियां उड़ाती है। इस घटना ने समूचे प्रशासन और पुलिस की कार्यशैली पर सवालिया निशान लगाया है। हालत यह है कि अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने या फिर रसूखदार आरोपियों को बचाने की मंशा से सही समय पर कार्रवाई करने को लेकर भी टालमटोल की गई है। गौरतलब है कि मुख्य आरोपी रिजार्ट का मालिक भाजपा नेता और पूर्व राज्यमंत्री का बेटा है और उसका भाई भी उत्तराखंड में अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग का उपाध्यक्ष था।
हर जगह बेटियों के साथ रसूखदार लोगों के द्वारा होने वाले अत्याचारों पर प्रशासन एवं पुलिस की शिथिलता एवं लापरवाही देखने को मिलती है। उत्तराखण्ड की घटना में भी ऐसा ही हुआ। दरअसल, घटनाक्रम को लेकर अगर लोगों के बीच आक्रोश नहीं फैलता तो शायद पुलिस आरोपियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई नहीं करती, मामले को दबा देती। मार डाली गई लड़की के पिता ने आरोप लगाया कि उन्होंने बेटी के लापता होने की सूचना राजस्व पुलिस को दे दी थी, मगर उनकी रिपोर्ट नहीं लिखी गई। जबकि सूचना के तुरंत बाद प्रशासन को सक्रिय होना चाहिए था। क्या इसकी वजह आरोपियों का स्थानीय स्तर पर रसूखदार होना और सत्ताधारी पार्टी से संबंध होना है? भले ही घटना के तूल पकड़ने के बाद भाजपा ने इन दोनों को पार्टी से निकालने की औपचारिकता निभाई, मगर राज्य में कोई लड़की घर से बाहर सुरक्षित महसूस करे, इसकी फिक्र फिलहाल नहीं दिख रही। शर्मनाक यह है कि हत्या से सबंधित तथ्य उजागर होने के बाद भी मुख्य आरोपी के पिता ने अपने बेटे को ‘सीधा-सादा बालक’ बताया! एक राष्ट्रीय पार्टी के किसी नेता की यह कैसी संवेदनहीनता है? बेटियों एवं नारी के प्रति यह संवेदनहीनता कब तक चलती रहेगी? भारत विकास के रास्ते पर तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन अभी भी कई हिस्सों में बेटियों को लेकर गलत धारणा है कि बेटियां परिवार पर एक बोझ की तरह हैं। एक विकृत मानसिकता भी कायम है कि बेटियां भोग्य की वस्तु है? भारत में आज से कुछ वर्षों पहले के लिंगानुपात की बात करें तो लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या बहुत कम थी और गर्भ में बेटियों को मारने का चलन चल पड़ा था। हालांकि, पिछले कुछ दशकों में इस सोच में भारी परिवर्तन भी हुआ है। ज्यों-ज्यों शिक्षित और रोजगारशुदा लड़कियों की संख्या बढ़ी है, उनकी आवाज और ताकत को नेता भी पहचानने लगे हैं। हर राजनीतिक दल अपने घोषणापत्र में औरतों के हितों की बातें करने लगा है। महिला नेताओं ने भी बेटियों एवं नारी की स्थिति बदलने में बहुत सकारात्मक भूमिका निभाई है। साल 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान की शुरुआत हरियाणा के पानीपत जिले से की थी।
इसके बाद भ्रूण हत्या को समाप्त करने व महिलाओं से जुड़े तमाम महत्वपूर्ण मुद्दों पर पुरुष मानसिकता में व्यापक परिवर्तन आया है। नरेन्द्र मोदी की पहल पर ही बड़ी संख्या में छोटे शहरों और गांवों की लड़कियां पढ़-लिखकर देश के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। वे उन क्षेत्रों में जा रही हैं, जहां उनके जाने की कल्पना तक नहीं की जा सकती थी। वे टैक्सी, बस, ट्रक से लेकर जेट तक चला-उड़ा रही हैं। सेना में भर्ती होकर देश की रक्षा कर रही है। अपने दम पर व्यवसायी बन रही हैं। होटलों की मालिक हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों की लाखों रुपये की नौकरी छोड़कर स्टार्टअप शुरू कर रही हैं। वे विदेशों में पढ़कर नौकरी नहीं, अपने गांव का सुधार करना चाहती हैं। अब सिर्फ अध्यापिका, नर्स, बैंकों की नौकरी, डॉक्टर आदि बनना ही लड़कियों के क्षेत्र नहीं रहे, वे अन्य क्षेत्रों में भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। इस तरह नारी एवं बालिका शक्ति ने अपना महत्व तो दुनिया समझाया है, लेकिन नारी एवं बालिका के प्रति हो रहे अपराधों में कमी न आना, एक चिन्तनीय प्रश्न है। सरकार ने सख्ती बरती है, लेकिन आम पुरुष की सोच को बदलने बिना नारी एवं बालिका सम्मान की बात अधूरी ही रहेगी। इस अधूरी सोच को बदलना नये भारत का संकल्प हो, इसीलिये तो इस देश के सर्वाेच्च पद पर द्रौपदी मुर्मू को आसीन किया गया हैं। वह प्रतिभा पाटिल के बाद देश की दूसरी महिला राष्ट्रपति हैं। अमेरिका आज तक किसी महिला को राष्ट्रपति नहीं बना सका, जबकि भारत में इंदिरा गांधी तो 1966 में ही प्रधानमंत्री बन गई थीं। असल में, यही तो स्त्री शक्ति की असली पूजा है। अब स्त्री शक्ति के प्रति सम्मान भावना ही नहीं, सह-अस्तित्व एवं सौहार्द की भावना जागे, तभी उनके प्रति हो रहे अपराधों में कमी आ सकेगी।

K.W.N.S.-अदभूत प्रतिभा के धनी पं. दीनदयाल उपाध्याय उत्कृष्ट लेखक, विचारक, महान राष्ट्र चिंतक एवं 20 वी सदी के आदर्श राजनेता थे। उन्होने देखा कि देश में अमीरी व गरीबी के बीच की खाई दिनों दिन गहरी होती जा रही है । एक ओर जहां बहुसंख्यक लोग गरीबी, बेकारी और भुखमरी से जूझ रहे हैं तो दूसरी ओर समाज में ऐसे भी लोग हैं जिसके पास बेशुमार धन सम्पदा है। देश में एक बड़ा तबका ऐसा भी है जिसकी कमाई सीमित है, अपनी दैनंदिनी की आवश्यकता की आपूर्ति उसके लिए कठिन और दुष्कर कार्य है । यह तबका आर्थिक रूप से काफी पिछड़ा हुआ है । इन्हें अपनी आजीविका के लिए दूसरों पर आश्रित रहना पड़ता है । इस तबके के लोग परस्पर सहयोग व समन्वय से अपनी आर्थिक गतिविधियों का संचालन करते हैं तथा अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं ।
अंगे्रजों के शासनकाल में इस वर्ग का काफी आर्थिक शोषण हुआ। इन्हें ना ही अपने श्रम का उचित मूल्य मिलता था और ना ही सम्मानजनक जीने का अवसर। अतः ये जमीदारों व साहूकारों के चंगुल में फंस कर गरीबी, बेकारी व भुखमरी के शिकार हो गये । उन्हें अपने जीवन यापन के लिए बंधुआ मजदूरी भी करनी पड़ी । अमीरी व गरीबी की खाई के साये में सन् 1947 में आजाद भारत का जन्म हुआ लेकिन दिशाहीनता के कारण यह समस्या नासूर बन गई। पं. दीनदयाल जी ने इस आर्थिक असमानता को दूर करने के लिए ”अंत्योदय” के सिद्धांत का प्रतिपादन किया उन्होंने कहा कि हमारे प्रयास और हमारी विकास की योजनाएं ऐसी हों कि समाज के अंतिम पंक्ति के अंतिम व्यक्ति का विकास पहले हो । समाज के उपेक्षित व शोषित व्यक्ति को समाज की मुख्यधारा से जोड़कर आर्थिक समानता स्थापित करने का काम अन्त्योदय के सिद्धांत से ही हो सकता है । व्यावहारिक जीवन में धनोपार्जन करना हर मनुष्य का कर्तव्य है क्योंकि उसे अपनी असीमित आवश्यकताओं को सीमित साधनों से पूरा करना है, लेकिन केवल धनोपार्जन करना मनुष्य का एक मात्र उद्देश्य नहीं है । इस परिप्रेक्ष्य में पं. दीनदयाल उपाध्याय ने कहा है ”अर्थोपार्जन प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य होता है, परंतु अर्थ के प्रति आसक्ति दुर्गुण ही कहा जाना चाहिए. संपत्ति की लालसा लिए हृदय देश – धर्म – समाज और संस्कृति से उदासीन हो जाता है ।
इस दुर्गुण से ग्रस्त व्यक्ति विवेकहीन और असामाजिक होता है । इससे उस व्यक्ति को तो कष्ट उठाने ही पड़ते हैं, साथ ही साथ समाज भी प्रभावित होता है । ऐसा व्यक्ति अर्थ को साधन नहीं केवल साध्य समझने लगता है । चूंकि संपत्ति से प्राप्त विषय भोगों की कोई सीमा नहीं होती इसलिए ऐसे व्यक्ति के साथ साथ समाज के भी भ्रष्ट और अकर्मण्य होने की आशंका रहती है ।” उन्होने कहा कि ”हमारी भावना और सिद्धांत है कि वह मैले कुचैले, अनपढ़ लोग हमारे नारायण हैं, हमें इनकी पूजा करनी है, यह हमारा सामाजिक व मानव धर्म है, जिस दिन हम इनको पक्के सुंदर, स्वच्छ घर बनाकर देंगें, जिस दिन इनके बच्चों और स्त्रियों को शिक्षा और जीवन दर्शन का ज्ञान देंगें, जिस दिन हम इनके हाथ और पांव की बिवाईयों को भरेंगें और जिस दिन इनको उद्योंगों और धर्मो की शिक्षा देकर इनकी आय को ऊंचा उठा देंगें, उस दिन हमारा मातृभाव व्यक्त होगा ।” पं. उपाध्याय ने अपने अंत्योदय सिद्धांत में कहा है कि आर्थिक असमानता की खाई को पाटने के लिए आवश्यक है कि हमें आर्थिक रूप से कमजोर लोंगों के उत्थान की चिन्ता करनी चाहिए क्योंकि “अर्थ का अभाव और अर्थ का प्रभाव” दोनों समाज के लिए घातक है ।
हमारी नीतियां, योजनाएं व आर्थिक कार्यक्रम कमजोर लोगों को ऊपर लाने की होनी चाहिए ताकि वे भी समाज की मुख्यधारा से जुड़ सकें और उन्हें भी समाज के अन्य वर्ग के साथ बराबरी में खड़े होने का अवसर मिल सके। वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पं. दीनदयाल उपाध्याय के “अंत्योदय” के सिद्धांत से प्रेरित होकर तथा ”सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास एवं सबका प्रयास” के उदघोष के साथ गरीबों की बेहतरी के लिए अनेक कल्याणकारी योजनाएं बनाई हैं। मोदी सरकार ने सबसे पहले उन योजनाओं पर ध्यान दिया, जिन्होंने सामान्य जन के आत्मगौरव, आत्मविश्वास को बढ़ाया और उनकी बुनियादी जरूरतों को पूरा किया। हर व्यक्ति का एक सपना होता है कि उसका एक पक्का आशियाना हो, मोदी सरकार ने प्रधानमंत्री आवास योजना प्रारंभ कर गरीबों के सपने को साकार किया। इस योजना के तहत वर्ष 2022 के अंत तक सभी बुनियादी सुविधाओं वाले 2.70 करोड़ नए मकान बनाने का लक्ष्य रखा गया है. अब तक देश में 1.83 करोड़ घर बन चुके हैं. देश के करोड़ों लोग जिन्होंने बैंक में प्रवेश तक नहीं किया था।
उनके लिए जनधन योजना चलाई गई है। इस योजना के तहत लगभग 45 करोड़ देशवासियों को बैंक से जोड़ा जा चुका है। इसी तरह स्वच्छ भारत अभियान के तहत देश में 11 करोड़ से अधिक शौचालय बने और देश के छह लाख से अधिक गांव शौच मुक्त हुए। उज्ज्वला योजना के तहत भी गरीब परिवारों को गैस कनेक्शन मिला। देश की नौ करोड़ महिलाओं को परंपरागत चूल्हे के धुएं से आजादी मिली है। मोदी सरकार ने नया जल शक्ति मंत्रालय बनाया, जिससे अब तक नौ करोड़ से अधिक परिवारों को पीने का स्वच्छ जल मिला है। प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना अति न्यून प्रीमियम वाली अनोखी योजना है, ये ही नहीं बल्कि सरकार ने प्रधानमंत्री मुद्रा योजना लागू कर न्यूनतम ब्याज दर पर बिना गारण्टी के ऋण प्रदान कर छोटे, लघु व कुटीर उद्योंगों के उन्नयन का काम किया है । इसी प्रकार ग्रामीण क्षेत्रों में कौशल विकास के लिए दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल विकास योजना तथा स्किल इंडिया के अंतर्गत नवजवानों के कौशल विकास की योजना संचालित की जा रही है । स्टार्ट-अप एवं स्टैण्ड-अप योजना के अंतर्गत युवा बेरोजगारों को स्व-रोजगार स्थापित करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है । इससे ना केवल स्वरोजगार स्थापित हो रहा है बल्कि नये रोजगार का भी सृजन हो रहा है । प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने विद्युत अधोसंरचना को मजबूत कर प्रत्येक आबादी क्षेत्र को रोशन करने के लिए दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना प्रारंभ की है। कोरोना काल में प्रारंभ हुई प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना ने गरीबों के लिए संजीवनी का काम किया है, इस योजना में 5 किलो राशन प्रति व्यक्ति, प्रति महीने मुफ्त दिया जाता है. इस योजना से देश के 80 करोड़ से अधिक लोग लाभान्वित हो रहें है। इसी प्रकार शिक्षा, स्वास्थ्य व आर्थिक विकास की असंख्य योजनाएं देश भर में चल रही है ।
इन योजनाओं के माध्यम से भारत के आम आदमी के जीवन-स्तर को सुधारने तथा उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाने के तेजी से प्रयास हो रहे हैं । इन योजनाओं का क्रियान्वयन उन व्यक्तियों को लक्ष्य करके किया गया है जिन्हें पं. दीनदयाल उपाध्याय ने ”समाज के अंतिम व्यक्ति” की संज्ञा देकर सबसे पहले उनके उदय (विकास) की बात रखते हुये अंत्योदय का सिद्धांत प्रतिपादित किया था । लक्ष्य अन्त्योदय, प्रण अन्त्योदय व पथ अन्त्योदय के ध्येय के साथ सरकार आगे कदम बढ़ा रही है। अंत्योदय से प्रेरित मोदी सरकार की नीतियों एवं योजनाओं से देश में एक नया बदलाव आया है ।

K.W.N.S.-रूस- यूक्रेन संघर्ष के बीच उज्बेकिस्तान के शहर समरकंद में संघाई को-|ऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन (एससीओ) का वार्षिक शिखर सम्मेलन गहरे निहितार्थों को समेटे हुए है. भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन के जरिए सामयिक मुद्दों, विस्तार व सहयोग की प्रगाढ़ता की वकालत की, वहीं भारत की भावी- प्रभावी वैश्विक भूमिका को भी रेखांकित कर दिया. उन्होंने दुनिया के मनाेभावों का इजहार करते हुए रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन के साथ द्विपक्षीय बैठक में दो टूक कहा कि आज का युग युद्ध का नहीं है. यूक्रेन संकट का हल बातचीत से निकाला जाना चाहिए. पुतिन ने मोदी की चिंता को गंभीरता से लिया और भरोसा दिया कि वह यूक्रेन संकट को खत्म करना चाहते हैं।
मोदी- पुतिन संवाद से दुनिया को उम्मीद है कि यूक्रेन संकट का हल जरूर निकलेगा. प्रधानमंत्री मोदी ने एससीओ के देशों का आह्नान किया कि कोरोना महामारी और खाद्य ऊर्जा संकट की समस्या से निपटने के लिए एक भरोसेमंद सप्लाई चेन तैयार करें. गौर करें तो प्रधानमंत्री मोदी ने इस मुद्दे को धार देकर पाकिस्तान की कस कर घेराबंदी की. दरअसल भारत युद्धग्रस्त अफगानिस्तान में सामान भेज रहा है और पाकिस्तान अपने रास्ते से जाने देने में अवरोध पैदा कर रहा है. उम्मीद है कि अब पाकिस्तान इस हरकत से बाज आएगा. माना जा रहा था कि पूर्वी लद्दाख में गोगरा हॉट स्प्रिंग क्षेत्र से चीन की सेना के पीछे हटने के बाद प्रधानमंत्री मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच द्विपक्षीय बैठक हो सकती है. इस संभावित बैठक से रिश्तों पर जमी बर्फ पिघलने की उम्मीद थी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. वैसे भी देखें तो किसी एक मुलाकात मात्र से रिश्तों की कड़ुवाहट मिठास में कहां बदलती है. हां, चीनी राष्ट्रपति ने 2023 में एससीओ की मेजबानी भारत को सौंपे जाने पर जरूर बधाई दी. उन्होंने कहा भी कि वह भारत की अध्यक्षता का समर्थन करेंगे।
एससीओ सम्मेलन से इतर प्रधानमंत्री मोदी की तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन से मुलाकात हुई. दोनों देशों ने सहयोग बढ़ाने पर सहमति जतायी. इस मुलाकात से पाकिस्तान को चुभन हो सकती है. इसलिए कि वह तुर्की को अपना सबसे बड़ा दोस्त मानता है और उसके साथ मिलकर वैश्विक मंचों के जरिए भारत की घेराबंदी करता है. लेकिन खाद्यान्न संकट से परेशान तुर्की की बदहाली से साफ है कि भारत को लेकर अब उसके रुख में नरमी आएगी. प्रधानमंत्री मोदी और ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी के बीच चाबहार प्रोजेक्ट और अफगानिस्तान को लेकर चर्चा हुई. यह मुलाकात इस मायने में महत्वपूर्ण है कि मौजूदा समय में दोनों देश दक्षिण पूर्व एशिया और मध्य एशिया के बीच संपर्क में सुधार की बुनियाद को मजबूत कर रहे हैं. भारत के नजर से देखें तो एससीओ सम्मेलन में भारत की भूमिका बेहद प्रभावी रही और प्रधानमंत्री मोदी ने अपने व्यावसायिक हितों को शीर्ष पर रखा. उन्होंने इस साल भारतीय अर्थव्यवस्था के 7.5 फीसदी की दर से बढ़ने की उम्मीद को रेखांकित करते हुए दुनिया को अवगत कराया कि यह बड़ी अर्थव्यवस्था में सबसे ज्यादा है. उन्होंने दुनिया को संदेश दिया कि भारत मैन्युफैक्चरिंग हब बन रहा है. इनोवेशन और 70 हजार से अधिक स्टार्टअप के बूते भारतीय अर्थव्यवस्था की गति तेज है ।
दुनिया चाहे तो भारत के अनुभव का फायदा उठा सकती है. प्रधानमंत्री ने एससीओ का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि उसे मिलेट फूड फेस्टिवल पर विचार करना चाहिए. उन्होंने वर्ष 2023 को यूएन इंटरनेशनल ईयर ऑफ मिलेट्स के रूप में मनाने का सुझाव दिया. उम्मीद है कि इस वार्षिक शिखर सम्मेलन से क्षेत्रीय सुरक्षा की चुनौतियों से निपटने के अलावा आर्थिक विकास को गति देने, व्यापार, निवेश, अंतरिक्ष, स्वास्थ्य सुविधाओं, कृषि, सूचना एवं संचार प्रौद्यागिकी के क्षेत्र में विस्तार को नया आयाम मिलेगा. जाहिर है कि मध्य एशिया एक बहुत बड़ा उपभोक्ता बाजार है. एससीओ में भारत की प्रभावी भूमिका से इस क्षेत्र में उभर रही आतंकी गतिविधियों, अंतरराष्ट्रीय खतरों, अवैध ड्रग कारोबार जैसी चुनौतियों से निपटने और सदस्य देशों को गोलबंद करने में आसानी होगी. एससीओ में भारत की सहभागिता पर नजर दौड़ाएं तो अब से पहले तक वह बतौर पर्यवेक्षक की भूमिका में था. कजाकिस्तान की राजधानी अस्ताना में संपन्न सम्मेलन में भारत की स्थायी सदस्यता पर मुहर लगी और महज पांच वर्षों में भारत ने अपनी धारदार भूमिका से एससीओ के चरित्र को बदल दिया. भारत की सदस्यता से पहले संगठन के सदस्य राष्ट्रों का कुल क्षेत्रफल 30 मिलियन 189 हजार वर्ग किमी और जनसंख्या तकरीबन 1.5 बिलियन था. लेकिन अब भारत के जुड़ जाने से संगठन का क्षेत्रफल व जनसंख्या व्यापक हो गया है. आज की तारीख में यह संगठन विश्व की तकरीबन आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाला संगठन बन चुका है. चूंकि इस संगठन ने संयुक्त राष्ट्र संघ के अलावा यूरोपीय संघ, आसियान, कॉमनवेल्थ और इस्लामिक सहयोग संगठन से भी संबंध स्थापित किए हैं, इस नाते भारत की भूमिका और अधिक व्यापक हो जाती है।
गौर करें तो अभी तक एससीओ पर चीन का वर्चस्व रहा है. लेकिन अब भारत की अर्थव्यवस्था चीन के मुकाबले तेजी से आगे बढ़ रही है. ऐसे में संगठन में भारत की भूमिका और स्वीकार्यता दोनों बढ़ी है. इस कारण चीन के व्यापक प्रभाव में कमी और दृष्टिकोण में बदलाव आ रहा है. एससीओ के दबाव के कारण चीन आतंकिस्तान बन चुके पाकिस्तान को प्रश्रय तो दे रहा है, लेकिन उसे शर्मसार भी होना पड़ रहा है. अच्छी बात है कि भारत ने एससीओ की सदस्यता ग्रहण करने के उपरांत हर सम्मेलन में यूरेशियाई धरती के लोगों के साथ बेहतर संबंध बनाए रखने की प्रतिबद्धता दोहरायी. जिस तरह भारतीय प्रधानमंत्री मोदी ने समरकंद सम्मेलन के जरिए यूक्रेन संकट और खाद्यान्न संकट से निपटने के साथ आपसी सहयोग बढ़ाने का मंत्र दिया, उससे दुनिया भर में भारत की प्रभावकारी भूमिका और प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व कौशल की सराहना हो रही है।

K.W.N.S.- हम मानते रहे हैं कि भारत कुछ मामलों में दक्षिण एशिया से अलग है, लेकिन वास्तव में ऐसा है नहीं। कुछ अर्थपूर्ण संकेतकों को देखें तो सामने आता है कि बहुत मामूली तौर पर हम पाकिस्तानियों या बांग्लादेशियों से अलग हैं। मसलन, हमारी प्रति व्यक्ति आय लगभग एक जैसी है। 2021 में तीनों देशों में प्रति व्यक्ति आय समान थी। बांग्लादेश में 2503 डॉलर, भारत में 2277 डॉलर और पाकिस्तान में 1537 डॉलर थी। तुलना के लिए देखें तो केन्या में प्रति व्यक्ति आय 2006 डॉलर और दक्षिण अफ्रीका में 6900 डॉलर थी। अब चीन और अन्य देशों को देखते हैं। चीन में प्रति व्यक्ति आय 12,556 डॉलर, दक्षिण कोरिया में 34,757 डॉलर और जापान में 39,285 डॉलर है। ये देश निश्चित रूप से अलग स्तर पर है जबकि दक्षिण एशिया में हम एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। इसी तरह मानव विकास सूचकांक को देखते हैं। संयुक्त राष्ट्र अपने मानव विकास सूचकांक को मानव विकास में हासिल की गई औसत उपलब्धियों को आधार बनाता है। इनमें लंबा और स्वस्थ्य जीवन, ज्ञान की प्राप्ति और जिंदगी जीने का एक बेहतर तरीका या साधन शामिल हैं।
स्वास्थ्य आयाम का आकलन जन्म के समय जीवन प्रत्याशा द्वारा किया जाता है, शिक्षा आयाम को 25 वर्ष और उससे अधिक आयु के वयस्कों के लिए स्कूली शिक्षा के वर्षों और स्कूल में प्रवेश करने वाले बच्चों के लिए स्कूली शिक्षा के अपेक्षित वर्षों के आधार पर मापा जाता है। जीवन स्तर के आयाम को प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय द्वारा मापा जाता है। 32 साल पहले 1990 में, बांग्लादेश की जन्म के समय जीवन प्रत्याशा 56 साल थी और स्कूली शिक्षा का औसत वर्ष 3.3 साल था। पाकिस्तान की उम्र 60 साल 2.3 साल थी, जबकि भारत की 58 साल और 2.8 साल थी। 20201 में, यह बांग्लादेश के लिए 72 वर्ष और 7.4 वर्ष, भारत के लिए 67 वर्ष और 6.7 वर्ष और पाकिस्तान के लिए 66 वर्ष और 4.5 वर्ष हो गई है। तुलना के लिए देखें तो नेपाल 68 वर्ष और 5.1 वर्ष और श्रीलंका 76 वर्ष और 10.8 वर्ष हैं। विश्व में औसत जन्म के समय जीवन प्रत्याशा का 72 वर्ष और स्कूली शिक्षा का 8.6 वर्ष था, जिसका अर्थ है कि श्रीलंका को छोड़कर, सभी दक्षिण एशियाई देश विश्व औसत से नीचे हैं। उसी दौर में यानी 1990 में चीन में जीवन प्रत्याशा 68 वर्ष और स्कूली आयू 4.1 साल थी। आज यह 78 वर्ष और 7.6 वर्ष है। चीन में औसत आमदनी इतनी है कि इसके आधार पर चीन विश्व में मानव विकास इंडेक्स के औसत से भी आगे है।
बाहरी लोग अगर इन आंकड़ों को देखेंगे तो उन्हें पाकिस्तान या बांग्लादेश से भारत अलग नजर नहीं आएगा। चूंकि यह डेटा मुश्किल है इसलिए हमें उनसे सहमत होना होगा, भले ही हमारे पास अंतर का कुछ दार्शनिक आधार क्यों न हो। यदि हम स्वीकार करते हैं कि हम समान हैं, और यदि एक जैसे नहीं हैं, तो हमें इस बारे में सोचना चाहिए कि 1947 के बाद से हम अपने लोगों के लिए तेजी से विकास और जीवन को बेहतर बनाने में सक्षम क्यों नहीं हैं। तो क्या, जैसा कि अक्सर माना जाता है, समस्या हमारा वह ‘सिस्टम’ है? और बात वही है, अगर हम दक्षिण एशिया के इतिहास को देखें, तो हम पाते हैं कि 75 वर्षों में हमने हर तरह के सिस्टम का प्रयोग तो किया है लेकिन हम गरीब बने हुए हैं और एक साथ जुड़े हुए हैं। हमने संसदीय लोकतंत्र में ऐसी छेड़छाड़ की है, जिसमें एक पार्टी (पहले कांग्रेस और फिर 2014 के बाद से बीजेपी) का वर्चस्व रहा है, जिसमें विभिन्न गुट शामिल हैं (1979, फिर 1989, 1998 और वाजपेयी के दौर में), और जिसने खुद को सत्तावादी बनाया। हमने कुछ सैनिक तानाशाही भी देखी है।
(पाकिस्तान में 1960, 1980 और 2000 के दशक में और बांग्लादेश में 1970 और 1980 के दशक में)। हमने वंशवाद भी देखा है (गांधी, भुट्टे, मुजीब-हसीना, जिया-खालेदा), हमने क्षमता के आधार पर लोकतंत्र देखा है (मोरारजी देसाई, शास्त्री, वाजपेयी, शरीफ, मोदी, गुजराल, गौड़ा आदि)। हमने केंद्रीय योजना के तहत अर्थव्यवस्था के प्रबंधन की कोशिश की है (1950 और 1960 के दशक में), लाइसेंस राज से, उदारवाद से। हम एक बार फिर उसी जगह आ गए हैं जो हम पहले करते रहे हैं (भारत में आयात का विकल्प अभी और 1970 के दशक में)। हमने ऐसे क्षेत्र विकसित किए हैं जिसमें हम शीर्ष पर है (भारत 30 साल पहले आईटी/बीपीओ और बांग्लादेश आज गारमेंट में)। हमने न्यूक्लियर हथियार विकसित किए हैं, हमने अपनी सेनाओं पर बहुत पैसा खर्च किया है। पाकिस्तान अपनी सेना पर अपने खजाने का 17 फीसदी खर्च करता है। भारत और बांग्लादेश अपनी सेना पर 9 फीसदी खर्च करते हैं। हमने मजबूत होने की कोशिश की है, हमने हठी और जिद्दी होने की भी कोशिश की है। हमने पश्चिमी गठबंधन का साथ दिया है (पाकिस्तान ने 1960 के दशक में), हम गुट निरपेक्ष भी रहे हैं (भारत 1950 के दशक में) और इस दौरान हमने कुछ छोटे-मोटे काम और भी किए हैं। लेकिन इन सबका आखिरी नतीजा क्या है। और वह है जो इस लेख की शुरुआत में लिखा गया है। इसका अर्थ है कि हम कुछ तो गड़बड़ कर रहे हैं, या हमसे कुछ तो छूट रहा है। आखिर वह क्या है? विश्व बैंक बताता है कि बांग्लादेश, भारत और पाकिस्तान के बीच आपसी व्यापार कुल कारोबार का 5 फीसदी है, जबकि दक्षिण एशिया के अन्य देशों का कारोबार इससे पांच गुना ज्यादा है। यहां कारोबार 23 अरब डॉलर का है, हालांकि इसे पांच गुना होना चाहिए था।
समस्या दरअसल मानवीय तौर पर पैदा की हुई है। विश्व बैंक के मुताबिक, “सीमाई चुनौतियों के कारण किसी कंपनी को भारत में अपने पड़ोसी के मुकाबले ब्राजील से कारोबार करना 20 फीसदी सस्ता पड़ता है” और यही मुख्य समस्या है। पूरे क्षेत्र में कारोबारी कमी का बड़ा कारण यही है। यह एक ऐसी बात है जिसके बारे में हमने कोशिश ही नहीं की। हमने एक-दूसरे के लिए अपने दरवाजे खोले ही नहीं, और हम एक तरह से उसी तरह की भौगोलिक और आर्थिक स्थितियों में रहे जैसा कि 1947 से पहले थे। क्या यह संभव है कि हम ऐसा कर सकें और इसका हमारे समाजों पर क्या प्रभाव पड़ सकता है? मुझे नहीं पता कि ऐसा करके हम चीन और जापान और दक्षिण कोरिया ने जो किया उसे दोहरा सकते हैं या नहीं, लेकिन मुझे पता है कि यह एक ऐसे झिझक या अवरोध को हटा सकता है जो हमने खुद पर लगाया है। हकीकत यह है कि इस बारे में आज भी व्यापक रूप से चर्चा नहीं की जाती है, तीनों देशों में लोकतंत्र होने के बावजूद, हमने अपने हालात से मुंह मोड़ रखा है और लगातार उनकी अनदेखी कर रहे हैं। और, जब हम 21वीं सदी की दूसरी तिमाही में प्रवेश कर रहे हैं, दक्षिण एशिया में जिस तरह के हालात हैं, उससे हमारे राजनीतिक दल कितने संतुष्ट हैं।

K.W.N.S.-सरकारें जब कोई वादा एक समय सीमा के अंदर पूरा नहीं करती हैं तो उन्हें जन आक्रोश का सामना करना पड़ता है। बहरहाल, एक वादा ऐसा भी है जिसे पूरा करने के लिए आज तक कोई भी सरकार कभी गंभीर नजर नहीं आई। यह वादा है- हिंदी को संपूर्ण रूप से राजभाषा के रूप में आसीन करना। जनता भी इस मामले में कभी उस तरह से सक्रिय नजर नहीं आई जैसे वह समय-समय पर प्याज और टमाटर के भावों में होने वाली बढ़ोतरी के खिलाफ नजर आती है। तिहत्तर वर्ष बीतने और ग्यारह ‘विश्व हिंदी सम्मलेन’ आयोजित करने के बावजूद आज भी संघ की राजभाषा के रूप में हिंदी कमोबेश वहीं ठिठकी हुई है, जहां यह उस दिन थी, जब इसे एकमत से राजभाषा के रूप में स्वीकार करने के बाद पंद्रह वर्ष के अंदर पूर्ण रूप से अपनाने की बात कही गई थी। इस विभाग ने सभी मंत्रालयों में राजभाषा कार्यान्वयन समितियां बनार्इं।
इसके साथ ही देश के विभिन्न नगरों में ‘नगर राजभाषा कार्यान्वयन समितियों’ का गठन किया गया। विभिन्न सरकारी विभागों में राजभाषा अधिकारियों को यह जिम्मेदारी सौंपी गई कि वे मंत्रालयों के कामकाज को पूर्ण रूप से हिंदी में करने के लिए समुचित कदम उठाएं। विभागों के प्रशासनिक प्रधानों को राजभाषा संबंधी नियमों के पालन के लिए उत्तरदायी बनाया गया। बहरहाल, परिस्थितियां कुछ ऐसी बनी कि आज भी हिंदी को लेकर पखवाड़े आयोजित करने पड़ रहे हैं। इसमें सिर्फ सरकारों की नहीं, आम लोगों की भी जिम्मेदारी बनती है कि वे हिंदी को इतना समृद्ध बनाएं, ताकि उसमें हमारे युवा चिकित्सा, इंजीनियरी और कानून की उच्चतम शिक्षा प्राप्त कर सकें। अपने दैनिक जीवन में भी हिंदी का अधिक से अधिक प्रयोग करें। हम जहां बेहद जरूरी हो, तभी अंग्रेजी या किसी दूसरी विदेशी भाषा का उपयोग करें। हिंदी के अखबार और पत्रिकाएं खरीदें। बच्चों को भी हिंदी का सम्यक ज्ञान कराना जरूरी है।
हिंदी को लेकर दिखावा न करें, बल्कि इसे शोध और बोध की भाषा बनाने में अपना योगदान दें। कबीर के अनमोल ज्ञान की दुनिया ऋणी है। सूत कात कर, दो रोटियां खाकर उन्होंने जो दुनिया को अनमोल ज्ञान दिया, वह अन्यत्र दुर्लभ है। अगर मानवता, नैतिकता को समझना है तो कबीर की दोहे रूपी वाणी को समझना होगा। आज हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए करोड़ों रुपए खर्च किया जा रहा है, लेकिन उतना विकास नहीं कर पाया, जितना कबीर ने सहज, सरल हिंदी भाषा में अपने ज्ञान का उपहार दिए। कबीर एक व्यक्ति होने के बजाय व्यक्तित्व हैं। कबीर जो न हिंदू हैं और न मुसलमान। कबीर, जो दुनियावी होने के बावजूद जाति-धर्म से ऊपर हैं। दुनिया को आईना दिखाते कबीर। समाज में व्याप्त कुरीतियों पर कुठाराघात करते कबीर। एक ऐसी शख्सियत जिस पर हिंदू और मुसलमान, दोनों दावा करते हैं और वे हर तरह के जात-पात से ऊपर उठ गए हैं। जब पूरी दुनिया के लोग मोक्ष के लिए काशी की ओर जाते हैं तो कबीर काशी छोड़ कर मगहर की ओर चले जाते हैं। एक जुलाहे का काम करने वाला शख्स, जिस पर न जाने कितने ही लोग शोध कर चुके हैं… जीवन के यथार्थ को जानने के लिए कबीर को जानना होगा।

K.W.N.S.- यूक्रेन युद्ध के कारण वैश्विक ऊर्जा संकट और खाद्य संकट का असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है। ऐसे में गुरुवार से उज्बेकिस्तान के ऐतिहासिक शहर समरकंद में होने जा रहा शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) का शिखर सम्मेलन काफी अहम हो सकता है। आयोजन पर पूरी दुनिया की नजर है। चूंकि सम्मेलन में क्षेत्रीय और वैश्विक महत्व के सामयिक मुद्दों पर भी चर्चा होने की उम्मीद है। सम्मेलन भारत के लिहाज से भी काफी महत्वपूर्ण है। एक बार फिर भारत रूस के समक्ष अपना पक्ष रख सकता है। सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच द्विपक्षीय वार्ता हो सकती है। एससीओ आठ सदस्य देशों का संगठन है।
क्षेत्रफल के लिहाज से यह दुनिया का सबसे बड़ा क्षेत्रीय संगठन है। यूरोप और एशिया के क्षेत्रफल का 60 प्रतिशत हिस्सा रखने वाले देश इसके सदस्य हैं। इस संगठन के अंतर्गत दुनिया की 50 प्रतिशत आबादी और विश्व जीडीपी का 30 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आता है। क्षेत्रीय और वैश्विक नीतियों को आकार देने, सुरक्षा और सतत विकास सुनिश्चित करने के लिए एक महत्वपूर्ण तंत्र के रूप में एससीओ की भूमिका बढ़ी है। एससीओ में यूरेशिया के ज्यादातर लोग इस क्षेत्र में आर्थिक रूप से सक्रिय हैं और वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन कर रहे हैं। एससीओ के सदस्य देशों की कुल जीडीपी विश्व की जीडीपी का लगभग 20 ट्रिलियन अमेरीकी डॉलर या 1/5 है। विशेषज्ञों के अनुसार 2030 में यह जीडीपी, विश्व की जीडीपी का 35 से 40 प्रतिशत होगी। शिखर सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री की मौजूदगी का इसलिए खास महत्व है क्योंकि सम्मेलन के अंत में भारत एससीओ की अध्यक्षता संभालेगा।
यानि भारत अगले वर्ष 2023 में एससीओ शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा जिसमें चीन और पाकिस्तान के नेता शामिल होंगे। इन दोनों देशों के साथ भारत के रिश्ते लगातार मुश्किल भरे रहे हैं। सम्मेलन से ठीक पहले चीन पूर्वी लद्दाख में एलएसी पर गोगरा-हाटस्प्रिंग से अपने सैनिकों को हटा रहा है। चीन के रक्षा मंत्रालय ने इस कदम को शांति बहाली के लिए अनुकूल बताया है तो क्या चीन शांति की राह पर लौट रहा है? दरअसल चीन को ताइवान मुद्दे पर अमरीका और पश्चिमी देशों के साथ घिरने पर आभास होने लगा है कि संकट की इस घड़ी में भारत के साथ रिश्ते बिगाड़ना ठीक नहीं है। दूसरी ओर युद्ध के कारण रूस पश्चिम देशों की ओर से प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। पुतिन, रूस के नेतृत्व वाले ‘ग्रेटर यूरेशिया’ की अवधारणा पर काम कर रहे हैं और इसके लिए उसे चीन और भारत दोनों के साथ की जरूरत है।