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K.W.N.S.-आदित्य नारायण चोपड़ा: पिछले कुछ महीनों से देश में बढ़ती महंगाई के मद्देनजर केन्द्र सरकार जो चहुंमुखी कदम उठा रही है उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि शीघ्र ही खुले बाजारों में इसका असर दिखाई देगा और खाद्य वस्तुओं समेत अन्य उपभोक्ता सामग्री के दामों में ठंडक आयेगी। मगर यह सवाल पैदा होना स्वाभाविक है कि इस तरफ ध्यान देने में सरकार को इतना समय क्यों लगा? महंगाई निश्चित रूप से अन्तर्राष्ट्रीय समस्या हो चुकी है और रूस- यूक्रेन युद्ध छिड़ने के बाद इसने विकराल रूप भी धारण किया। इसका प्रमाण यह है कि अमेरिका जैसे देश में ही यह रिकार्ड स्तर पर पहुंच चुकी है जिसकी वजह से वहां की जनता में भी बेचैनी है परन्तु भारत के सन्दर्भ में यह ध्यान रखना होगा कि इसकी अर्थव्यवस्था के मूल आधारभूत मानक अपेक्षाकृत सारी दुनिया में मजबूत माने जा रहे हैं जिसकी वजह से यहां विदेशी निवेश की रफ्तार में मामूली कमी ही दर्ज हुई है परन्तु भारत में खाद्य वस्तुओं के दामों में पिछले दो महीने के दौरान जो तेजी आयी है वह स्वाभाविक रूप से चिन्ता का विषय है क्योंकि कोरोना काल के दो वर्षों के भीतर आम आदमी की आमदनी में खासी गिरावट दर्ज हुई है और इसकी भरपाई अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर आठ प्रतिशत तक पहुंच जाने के बावजूद नहीं हुई है अतः सरकार ने खाद्य मोर्चे पर कीमतों को नियन्त्रित करने के लिए जो ताजा कदम उठाये हैं उनका आर्थिक विश्लेषण किये जाने की भी जरूरत है। स्वाभाविक तौर पर विपक्षी दलों को इस मोर्चे पर सरकार की आलोचना करने का पूरा अधिकार है और वे कर भी रहे हैं किन्तु उन्हें यह भी सोचना होगा कि महंगाई और बेरोजगारी ऐसे शाश्वत विषय हैं जिन्हें लेकर आजादी के बाद से विपक्ष में बैठे राजनीतिक दल हर सरकार की आलोचना करते आ रहे हैं। महंगाई का सम्बन्ध वैसे तो ‘मांग व आपूर्ति’ से जुड़ा होता है परन्तु कुछ ऐसे अन्य आर्थिक अवयव भी होते हैं जो इस पर सीधा असर डालते हैं जैसे पैट्रोल व डीजल के घरेलू दाम। विगत अक्तूबर महीने से लेकर अब तक केन्द्र सरकार दो बार इन दोनों उत्पादों पर उत्पाद शुल्क में कमी कर चुकी है और कुछ राज्य सरकारों ने भी इस पर लगने वाले बिक्री कर या वैट को भी कम किया है इसके बावजूद पैट्रोल के दाम 100 रुपए प्रति लीटर के आसपास ही बने हुए हैं। दूसरी डालर की कीमत में भी इजाफा हुआ है यह 77 रुपए प्रति डालर के पास पहुंच चुका है। तीसरी तरफ अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दामों में गरमाहट कम होने का नाम नहीं ले रही है। इसे देखते हुए केन्द्र सरकार द्वारा उत्पाद शुल्क में कमी करने का फैसला स्वागत योग्य कदम कहा जायेगा जिसका असर विभिन्न आवश्यक वस्तुओं की मालभाड़े की दरों में कमी लाने वाला होना चाहिए। लोकतन्त्र में सरकार कोई धर्मादा संस्था भी नहीं होती है क्योंकि वह लोगों से ही राजस्व वसूल करके वापस लोगों को ही देती है। राजस्व या शुल्क वसूलने में उसे इस तरह न्यायसंगत रहना पड़ता है कि समाज के गरीब वर्ग के लोगों पर उसकी शुल्क नीति का कम से कम प्रभाव पड़े अर्थात गरीब वर्ग के लोगों की दैनिक आवश्यकताओं की वस्तुओं के दामों में वृद्धि न होने पाये। इसके साथ ही खुली व बाजार मूलक अर्थव्यवस्था में घरेलू उद्योग से लेकर विभिन्न वाणिज्यिक संस्थानों के हितों का संरक्षण भी उसे इसी नीति के तहत करना होता है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को दुरुस्त रखने के लिए किसानों से लेकर मजदूरों के हितों का संरक्षण भी करना होता है। यह कार्य उसे जनता की क्रयशक्ति के अनुपात को ध्यान में रख कर करना होता है। जब यह अनुपात बिगड़ जाता है तो महंगाई बढ़ने लगती है। इसके साथ ही सरकार को उत्पादन मोर्चे पर भी कान खड़े रखने होते हैं जिससे बाजार में किसी भी वस्तु की मांग को पूरा किया जा सके। इस सन्दर्भ में मोदी सरकार ने हाल ही में जो कदम उठाये हैं उहें पूर्णतः घरेलू अर्थव्यवस्था मूलक कहा जायेगा। संपादकीय :बड़े साहब की ‘डॉग वॉक’यासीन के गुनाहों का हिसाबगुदड़ी के ‘लाल’ मोदीकर्नाटक में भी ‘ज्ञानवापी’क्वाड में मोदी का विजय मन्त्रमदरसों के अस्तित्व पर सवालभारत में किसी भी जरूरी खाद्य सामग्री की आपूर्ति में कमी न हो सके इसके लिए सरकार ने सबसे पहले गेहूं के निर्यात पर प्रतिबन्ध लगाने की घोषणा की। इसके बाद उसने चीनी के निर्यात पर शर्तें लगाई और घोषणा की आगामी गन्ना सीजन के शुरू होने पर अक्तूबर 2021 से सितम्बर 2022 तक केवल 100 लाख मीट्रिक टन ही चीनी निर्यात की जा सकेगी। भारत विश्व में चीनी के तीन प्रमुख देशों में से एक है। ये कदम इसलिए उठाये गये जिससे बाजारों में गेहूं, चीनी की आपूर्ति की बहुतायत लगातार बनी रहे। दूसरी तरफ खाद्य तेलों के दामों में गर्मी देखते हुए सरकार ने फैसला किया कि अगले दो वर्षों के दौरान भारत का कोई भी व्यापारी या वाणिज्यिक संस्थान 20 लाख टन सोयाबीन तेल व सूरजमुखी तेल का आयात बिना कोई आयात या तट कर शुल्क दिये कर सकेगा। खाद्य तेलों के बारे में हम जानते हैं कि इसकी मांग को पूरा करने के लिए 56 प्रतिशत आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। पिछले दिनों पाम आयल के आयात में कमी आने और यूक्रेन व रूस के सूरजमुखी तेल के प्रमुख निर्यातक देश होने की वजह से खाद्य तेलों के आयात में कमी आयी जिसकी वजह से इनके भाव बढे़। हालांकि पिछले वर्ष ही इनके दामों में काफी उछाला आया था मगर सरकार ने उसे आयात शुल्क में कमी करके साधना चाहा जिसमें वह सफल नहीं हो सकी अब शुल्क मुक्त आयात की इजाजत देने से गुणात्मक अंतर की अपेक्षा की जा सकती है। अब सरकार भारत के भंडार में जमा चावल की मिकदार की भी समीक्षा कर रही है और इसके निर्यात पर भी प्रतिबन्ध लगा सकती है। दूसरी तरफ इसके उलट सरकार ने स्टील के निर्यात पर शुल्क की दर बढ़ा दी है जिससे घरेलू बाजार में इसके दामों में ठंड़क आये। प्रसन्नता की बात यह है कि कृषि मोर्चे पर भारत के उत्पादन में लगातार वृद्धि ही हो रही है जिसकी वजह से आम जनता निश्चिन्त रह सकती है परन्तु अन्य उपभोक्ता वस्तुओं के दामों की समीक्षा भी की जानी चाहिए और वस्तुओं पर लिखे जाने वाले अधिकतम मूल्य (एमआरपी) को समाप्त किया जाना चाहिए क्योंकि महंगाई बढ़ने का यह भी प्रमुख औजार है।
 

K.W.N.S.-देश में कोरोना महामारी (Corona Pandemic) एंडेमिक फेज में है. एक्टिव मरीजों की संख्या भी 16 हजार से कम रह गई है. इस बीच दुनियाभर में मंकीपॉक्स (Monkeypox) का खतरा मंडराने लगा है. करीब 15 देशों में मंकीपॉक्स के 131 मामले दर्ज किए गए हैं और 106 संदिग्ध मरीज भी मिले हैं. ये वायरस तेजी से अपने पैर पसार रहा है. सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (Centers for Disease Control and Prevention) ने भी मंकीपॉक्स से बचाव के लिए दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं. भारत में भी इस वायरस के खतरे को देखते हुए सर्विलांस बढ़ा दिया गया है. खासतौर पर जिन इलाकों में यह विदेशी पर्यटक आते हैं. वहां उनकी जांच और संदिग्ध मरीजों के सैंपल लिए जा रहे हैं। 
एक्सपर्ट का कहना है कि भारत में इस वायरस से खतरा नहीं है. इससे पहले जब मंकीपॉक्स वायरस का आउटब्रेक अफ्रीका में जब भी हुआ है, यह किसी एक इलाके तक ही सीमित रहा है. पहले कभी भी वायरस का खास असर नहीं देखा गया है. इस वायरस से बचाव के लिए वैक्सीन भी उपलब्ध है. इसके लक्षण भी चिकन पॉक्स और स्मॉल पॉक्स की तरह हैं. ये वायरस कोरोना जितना खतरनाक नहीं है, लेकिन जो लोग कोरोना वायरस से गंभीर रूप से बीमार हुए थे. उनको इससे बचाव करने की जरूरत है. क्योंकि कोरोना की वजह से लोगों की इम्युनिटी कमजोर हो गई है. जिससे मंकीपॉक्स का वायरस उन पर असर कर सकता है. जो लोग डायबिटीज, हाइपरटेंशन, लिवर, हार्ट और किडनी की बीमारी के मरीज है. उनको खास एहतियात बरतनी चाहिए। 
दिल्ली के सर गंगाराम हॉस्पिटल के लिवर एंड गैस्ट्रोलॉजी इंस्टीट्यूट के एचओडी प्रोफेसर डॉ. अनिल अरोड़ा का कहना है कि कई सालों बाद मंकीपॉक्स का वायरस फिर से फैल रहा है, हालांकि इसको लेकर ज्यादा घबराने की जरूरत नहीं है. मंकीपॉक्स का ट्रांसमिशन एक से दूसरे इंसान में कम होता है. इसकी होने की आशंका तब ज्यादा होती है, जब कोई व्यक्ति किसी संक्रमित जानवर के संपर्क में आए. इसके अलावा अगर कोई व्यक्ति इस वायरस से संक्रमित हो भी गया है तो ये जानलेवा नहीं होता है. इसके लक्षण कुछ दिन में ठीक हो जाते हैं. बस इस दौरान संक्रमित व्यक्ति अपनी सेहत का ध्यान रखें और किसी के संपर्क में न आए। 
कोरोना से संक्रमित हुए लोगों पर होगा असर? 
प्रोफेसर अरोड़ा कहते हैं कि जो लोग कोरोना से गंभीर रूप से बीमार हुए हैं. उनको फिलहाल खास ध्यान रखना चाहिए. क्योंकि कोरोना की वजह से इम्युनिटी पर असर पड़ा है. ऐसे में मंकीपॉक्स वायरस कमजोर इम्युनिटी वालों को संक्रमित कर सकता है. खासतौर पर जो लोग पुरानी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं, उनको किसी बीमार व्यक्ति से दूर रहना चाहिए. कमजोर इम्यूनिटी वालों के शरीर में किसी भी प्रकार का वायरस असर कर सकता है. भले ही मंकीपॉक्स कोरोना जितना खतरनाक नहीं है, लेकिन ऐसे लोगों को ये संक्रमित कर सकता है. इसके अलावा बच्चों और बुजुर्गों को भी एहतियात बरतनी चाहिए. इन लोगों की भी इम्यूनिटी कम होती है. ऐसे में उनको मंकीपॉक्स से संक्रमण हो सकता है. मंकीपॉक्स भले ही खतरनाक नहीं है, लेकिन बचाव जरूरी है। 
जंगली जानवरों से बनाएं दूरी 
प्रोफेसर अरोड़ा कहते हैं कि अगर कोई व्यक्ति किसी संक्रमित जानवर के संपर्क में आता है, तो उसको मंकीपॉक्स हो सकता है. इसलिए यह जरूरी है कि बीमार जानवरों से दूरी बनाई जाए. जो लोग जंगलों में घूमने जाते हैं. उनके लिए जरूरी है कि वे बंदरों के संपर्क में न आए. इसके अलावा चिड़ियाघर में जानवरों की देखरेख करने वालों को भी बीमार जानवरों के संपर्क में नहीं आना चाहिए. क्योंकि इस बात की काफी है कि अगर संक्रमित जानवर के संपर्क में कोई व्यक्ति आया तो वह संक्रमित हो सकता है। 
हाइजीन का रखें ध्यान 
एक्सपर्ट के मुताबिक, किसी भी प्रकार के वायरस या बैक्टीरिया से बचाव के लिए हैंड हाइजीन का ध्यान रखें. भोजन करने से पहले हाथ धोएं. जो लोग हार्ट, डायबिटीज और अन्य किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं वे मास्क भी लगाकर रखें. अगर घर में कोई व्यक्ति बीमार है और उसमें फ्लू के लक्षण हैं, तो ऐसे व्यक्ति से दूर रहें. क्योंकि अगर उस व्यक्ति में वायरस है तो कम इम्यूनिटी वालों में ये आसानी से फैल सकता है। 
पर्यावरण को नुकसान की वजह से फिर से सक्रिय हो रहे हैं पुराने वायरस
 एक्सपर्ट के मुताबिक, लोग जंगलों में जाकर जानवरों के स्पेस में घुस रहे हैं. ये प्रकृति के साथ खिलवाड़ है. जानवरों के संपर्क में आने से लोग इन वायरस के कैरियर बन रहे हैं. जिससे कई पुराने वायरस फिर से लौट रहे हैं. इसलिए ये बहुत जरूरी है कि जानवरों के संपर्क में आने से बचा जाए. जो लोग चिड़ियाघर में जानवरों की देखरेख कर रहे हैं. उन्हें इस समय खास सावधानी बरतने की जरूरत है। 
 किसी महामारी का रूप ले सकता है मंकीपॉक्स 
डॉ. के मुताबिक, मंकीपॉक्स किसी नई महामारी का रूप नहीं लेगा. ऐसा इसलिए क्योंकि ये एक पुराना वायरस है. इसे आए हुए 60 सालों से भी ज्यादा का समय हो गया है. इस वायरस पर मौजूद चिकन और स्मॉल पॉक्स की वैक्सीन भी काम कर सकती है. इन वैक्सीन के माध्यम से इस वायरस का इलाज़ किया जा सकता है। 
 

 
K.W.N.S.- युद्ध विनाश का कारण बनते हैं, लेकिन कभी-कभी वे अपरिहार्य हो जाते हैं। जैसे 1971 का बांग्लादेश युद्ध। यह याद रखें कि आज जो अमेरिका और ब्रिटेन यूक्रेन पर रूस के हमले पर भारत को अपने पक्ष में लाना चाहते हैं, उन्होंने 1971 में किस तरह पाकिस्तान की सैन्य सहायता करने की कोशिश की थी। इन दिनों अमेरिका एवं उसके साथी देश और इन देशों का अधिकांश मीडिया पुतिन को खलनायक साबित करने में जुटा है। नि:संदेह यूक्रेन पर रूस के हमले का समर्थन नहीं किया जा सकता। इस हमले ने यूक्रेन में तबाही मचाने के साथ विश्व शांति और विश्व अर्थव्यवस्था को गंभीर खतरे में डाल दिया है, लेकिन कल्पना करें कि यदि चीन कल को बांग्लादेश को अपने प्रभाव में लेकर वहां अपने सैन्य अड्डे बनाने लगे तो क्या यह भारत का स्वीकार होगा? क्या चीन की ऐसी किसी पहल पर भारत को यह कहते हुए बांग्लादेश पर हमला कर देना चाहिए कि एक समय तो यह हमारा ही हिस्सा था? इस कल्पना से बाहर निकल कर इस यथार्थ को देखें कि चीन गुलाम कश्मीर यानी हमारे भूभाग पर गलियारा बना रहा है। क्या इसके चलते पर भारत को वहां हमला कर देना चाहिए?
इसमें संदेह नहीं कि यूक्रेन एक संप्रभु राष्ट्र है, लेकिन उसे रूस की सुरक्षा चिंताओं की अनदेखी नहीं करनी चाहिए थी। किसी भी देश की सुरक्षा केवल उसकी भौगोलिक स्थिति पर ही नहीं, बल्कि उस पूरे क्षेत्र पर निर्भर करती है। इसी कारण भारत श्रीलंका, मालदीव, नेपाल जैसे देशों को चीन के चंगुल से बचाने की कोशिश कर रहा है। क्या अतीत में इन देशों के चीन के पाले में जाने की कोशिश पर भारत यह कहकर कर्तव्य की इतिश्री कर लेता कि ये संप्रभु देश हैं और यदि ये चीन की गोद में बैठना चाहते हैं तो उनकी मर्जी?
रूस लगातार इसका विरोध कर रहा था कि यूक्रेन को अमेरिकी नेतृत्व वाले सैन्य संगठन नाटो का हिस्सा नहीं बनना चाहिए, लेकिन अमेरिका उसे इस सैन्य समूह का हिस्सा बनाने के लिए आमादा था। नाटो का गठन सोवियत संघ के जमाने में साम्यवाद के विस्तार को रोकने के लिए किया गया था। 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद जब उसके नेतृत्व वाले वारसा पैक्ट का भी अस्तित्व खत्म हो गया, तब यदि नाटो अपनी दुकान नहीं समेटता तो भी कम से कम उसका विस्तार तो रोक ही देता। उसने रूस की आपत्तियों के बाद भी अपना विस्तार जारी रखा। अमेरिका और यूरोपीय देश सोवियत संघ एवं वारसा पैक्ट का हिस्सा रहे देशों को भी नाटो के दायरे में ले आए। जब वे यूक्रेन को भी नाटो का हिस्सा बनाने की दिशा में आगे बढ़े तो रूस ने उन्हें आगाह किया। अमेरिका और यूरोपीय देश इसके बाद भी यह समझने को तैयार नहीं हुए कि यूक्रेन को नाटो का हिस्सा बनाने की कोशिश रूस को भड़काने वाली कार्रवाई होगी। रूस की सुरक्षा चिंताओं को समझने के बजाय अमेरिका और यूरोपीय देश यूक्रेन को न केवल सैन्य मदद देने लगे, बल्कि उसकी सेनाओं के साथ संयुक्त युद्धाभ्यास करने लगे। ऐसे दो सैन्याभ्यास पिछले साल जून और सितंबर में हुए। शायद इसी के बाद पुतिन इस नतीजे पर पहुंचे कि पानी सिर से ऊपर गुजरने लगा है। उन्होंने यूक्रेन पर हमला कर दिया। उन्हें लेने के देने पड़ सकते हैं, क्योंकि यूक्रेन के लोग अपने देश को बचाने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। फिलहाल यूक्रेन तबाह हो रहा है, पर अमेरिका-यूरोपीय देश शांति की कोई ठोस पहल करने के बजाय उसे हथियारों से लैस कर रहे हैैं। इससे बात बनने के बजाय बिगड़ रही है। लगता है अमेरिका-यूरोप को अपनी हथियार निर्माता कंपनियों के हितों की चिंता अधिक है।
अमेरिका ने पुतिन को तानाशाह करार दिया है, लेकिन यह वही अमेरिका है जिसका एक समय दुनिया भर के तानाशाहों से याराना था-चाहे वे पाकिस्तान के जनरल जिया हों या इराक के सद्दाम हुसैन अथवा लीबिया के गद्दाफी। जब सद्दाम अमेरिकी हितों की पूर्ति में बाधक बनने लगे तो अमेरिका और उसके साथ ही पश्चिमी मीडिया को इराक में जनसंहारक हथियारों का जखीरा ‘दिख’ गया। इसके बाद उस पर हमला कर उसे तबाह कर दिया गया। इस तबाही से ही खूंखार आतंकी संगठन आइएस यानी इस्लामिक स्टेट जन्मा, जिसने सीरिया में भी अपनी जड़ें जमाईं। इसी समय अमेरिका को लगा कि सीरिया में बशर अल असद के बजाय उसके हिसाब से चलने वाला शासक होना चाहिए। यह कुछ वैसी ही चाहत थी, जैसी आज रूस यूक्रेन के मामले में दिखा रहा है। अमेरिका ने असद को सत्ता से बाहर करने के लिए वहां भी सैन्य हस्तक्षेप किया। इससे आइएस को मदद मिली। यह संगठन इराक में भले ही पस्त हो गया हो, लेकिन उसके आतंकी न जाने कितने देशों में फैल गए हैं। एक समय ट्रंप ने कहा था कि आइएस के संस्थापक तो बराक ओबामा हैं। बड़बोले ट्रंप किसी को कुछ भी कह सकते हैं, लेकिन 2009 के नोबेल पुरस्कार विजेता ओबामा ने अकेले 2016 में इराक, सीरिया, लीबिया, सोमालिया, यमन में हमले कर 24 हजार से अधिक बम बरसाए। ये आंकड़े ब्रिटिश अखबार ‘द गार्जियन’ के हैं। इन देशों में हमलों के दौरान अमेरिका का साथ अन्य नाटो देश भी दे रहे थे। जब यह सब हो रहा था तब पश्चिमी मीडिया यह कह रहा था कि इन देशों को तानाशाहों से मुक्त कर वहां लोकतंत्र का प्रसार करने की पहल की जा रही है। आज इन देशों की हालत किसी से छिपी नहीं। नि:संदेह इसका यह मतलब नहीं कि जो गलत काम अमेरिका ने किए, वही रूस भी करे, लेकिन यह समझा जाना चाहिए कि इस युद्ध का कोई एक खलनायक नहीं।

 
 
panchayattantra24.com,एक के बाद एक विधायक और मंत्रियों के इस्तीफे हो रहे हैं, बीजेपी वाले कह रहे हैं कि उनको टिकट कटने का पता चल गया था तो विरोधी कह रहे हैं कि योगी आदित्यनाथ की पिछड़ा-दलित विरोधी नीतियों से परेशान थे। ऐसे में जबकि हर कोई अपना संदेश, अपना ‘नरेटिव’ अपनी जीत के लिए लोगों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन सच क्या है?
राजनीति के इन पेंचोखम में इतिहास क्या बताता है और इस सब कवायद का भविष्य क्या होगा? क्या जो पंडित नेहरू ने झेला, इंदिरा गांधी ने झेला, थोड़ा बहुत अटलजी ने भी और मोदी ने भी कम नहीं झेला, अपनों का विरोध। लेकिन बाद में यही लोग भारत के लोकतांत्रिक इतिहास के सबसे ताकतवर नेता के रूप में उभरे तो क्या योगी आदित्यनाथ के लिए वही ‘संकट’ आ गया है।
योगी की मुश्किलें और नेहरू जी की चुनौतियां
योगी आदित्यनाथ अभी तक ऐसे संकट से दो चार नहीं हुए थे, जब उनके खिलाफ अपने ही आवाज उठाएं। जब उनके नाम का मुख्यमंत्री पद के लिए ऐलान हुआ था, तब लोग चौंके जरूर थे, लेकिन कोई भी आवाज उनके अपनों की उनके खिलाफ नहीं उठी थी। जबकि पंडित नेहरू, इंदिरा गाधी, अटलजी और मोदी भी इतने भाग्यशाली नहीं थे। अब भी देखा जाए तो इस्तीफा देने वाला ज्यादातर वो लोग हैं, जो दूसरी पार्टियों से आए थे, बीजेपी का कोई सशक्त चेहरा अभी भी योगी के सामने उस तरह खुलकर नहीं आया है, जैसे कि इन सभी लोगों के खिलाफ आए थे।
योगी आदित्यनाथ के मुकाबले इस वक्त यूपी में और कोई उनके कद का नेता नहीं है, लेकिन पंडित नेहरू के मामले में ऐसा नहीं था। जब 1946 में अंग्रेजों ने 4 साल बाद गांधीजी समेत कांग्रेस के दिग्गज नेताओं को छोड़ा तो वो आजादी के प्रावधानों की बात किससे करें, उसके लिए एक कांग्रेस अध्यक्ष चुनना था और उसी को एक तरह से बाद में आजाद भारत का प्रधानमंत्री चुना जाना था। कई साल से अध्यक्ष पद के चुनाव नहीं हुए थे, 1940 से मौलाना आजाद ही अध्यक्ष थे और केबिनेट मिशन आदि से मीटिंग्स कर रहे थे, ऐसे में उनको पूरा भरोसा था कि गांधीजी उनको ही चुनेंगे। लेकिन गांधीजी ने उनको चुनाव लड़ने से ही रोक दिया।
उस वक्त कांग्रेस की 15 प्रदेश कार्यसमितियां थीं, एक ने भी नेहरूजी का नाम नहीं भेजा, 12 ने सरदार पटेल का भेजा तो 3 ने आचार्य कृपलानी का, बावजूद इसके गांधीजी ने पटेल से नाम वापस करवाया और कृपलानी से कहकर नेहरूजी का नाम अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की तरफ से प्रस्तावित करवाया, तब वो अध्यक्ष बने और फिर अंतरिम सरकार के मुखिया।
जवाहर लाल नेहरू और सरदार पटेल, दोनों दिग्गज कांग्रेस की दिशा तय कर रहे थे।
सोचिए कितना मुश्किल रहा होगा पंडित नेहरू के लिए, ये जानते हुए भी पद लेना, जब उन्हें कोई चाहता ही ना हो। उसके बाद भी उनके लिए कम मुश्किले नहीं रहीं। पटेल को गांधीजी के नाम पर माउंटबेटन ने इमोशनल करके नेहरूजी की अगुवाई में सरकार में शामिल करने के लिए मना जरूर लिया था, लेकिन कई मौकों पर पटेल की ज्यादा तवज्जो मिलती थी। जिस तरह से उन्होंने नेहरूजी के आग्रह पर कश्मीर छोड़कर बाकी 564 रियासतों को भारत से जोड़ा था, उससे उनकी इज्जत पार्टी और देश में काफी ज्यादा बढ़ गई थी। 1950 में जब आचार्य कृपलानी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाकर उनका 1946 का कर्ज चुकाना चाहा तो आड़े आ गए सरदार पटेल।
पटेल ने नेहरू के विरोधी रहे इलाहाबाद के ही पुरुषोत्तम दास टंडन को कृपलान के खिलाफ ना केवल खड़ा किया बल्कि जिता भी दिया। नेहरू ने इस्तीफे की धमकी तक दे डाली। उनकी मुश्किलें तभी कम हो पाईं, जब पटेल की उसी साल मौत हो गई। बीच में ही टंडन को इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया, फिर कई साल तक खुद ही पीएम और कांग्रेस अध्यक्ष के पद पर जमे रहकर अपने विरोधियों को ठिकाने लगा दिया। 1955 से अपने विश्वस्त यूएन ढेबर को फिर 1959 में इंदिरा गांधी को अध्यक्ष बनवाया। उनकी कांग्रेस पर पकड़ चीन युद्ध के बाद ही ढीली हुई और कामराज की अगुवाई में सिंडिकेट मजबूत होता चला गया। लेकिन 1950 से 1962 तक का काल में नेहरूजी सर्वशक्तिमान थे।
आज तमाम बुद्धिजीवियों को, जो उनके गुण गाते हुए आप देखते हैं, उनमें तमाम वो लोग भी शामिल हैं, जिनके परिवारों को नेहरूजी ने इसी दौर में फर्श से अर्श तक पहुंचा दिया। वहीं पटेल, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, जेपी, आचार्य कृपलानी, मौलाना आजाद जैसे गांधीजी के साथियों और उनका खुद का परिवार राष्ट्रीय परिदृश्य से लापता है। आचार्य कृपलानी भी बाद में नेहरूजी से नाराज हो गए थे और वही थे जो उनके खिलाफ पहला अविश्वास प्रस्ताव भारत की संसद में लेकर आए थे। वहीं जेपी और सी राजगोपालाचारी ने उनके खिलाफ स्वतंत्र पार्टी को जन्म दिया था।
इंदिरा गांधी के लिए भी आसान नहीं थी राह
नेहरूजी के समय ही दक्षिण के दिग्गज कांग्रेस नेताओं का ग्रुप ‘सिंडिकेट’ हावी हो चला था। ऐसे में नेहरूजी की मौत के बाद शास्त्रीजी के नाम पर भी सर्व सहमति नहीं थी, तब मोरारजी देसाई के मुकाबले शास्त्रीजी को समर्थन देकर सिंडिकेट के कामराज ने उनको पीएम बनवाया। तब लंदन मे बसने की सोच रहीं इंदिरा गांधी को तीन मूर्ति भवन छोड़ना पडा। नेहरूजी के करीबियों ने भरोसा दिलाया कि वह भी पीएम बन सकती हैं।
शास्त्रीजी को भी इंदिरा के रूप में कम मुसीबतें नहीं झेलनी पड़ीं। कभी वो बिना बताए भारत पाक युद्ध के दौरान बॉर्डर पर पहुंच गईं, कभी हिंदी विरोधी आंदोलन में बिना पूछे मद्रास जाकर आंदोलनकारियों से कुछ वायदा कर आईं।
एक बार तो शास्त्रीजी ने रक्षा मंत्री बदला तो सवाल उठा दिए कि मुझसे बिना चर्चा किए इतना बड़ा फैसला कैसे ले लिया। एक बार तो उन्होंने बयान दे दिया था कि “यस, आई हैव जम्प्ड ओवर द प्राइम मिनिस्टर’स हैड और आई वुड डू इट अगेन व्हैन एवर द नीड एराइजेज”, सोचिए क्या किसी भी पीएम को ऐसा सुनने को मिला है कभी?
ऐसा व्यवहार था इंदिरा गांधी का शायद तभी उन्हें ही सबसे ज्यादा अपनों का विरोध झेलना पड़ा और सबको ठिकाने लगाने के बाद जनता ने उन्हें ही सबसे ताकतवर माना। शुरूआत हुई शास्त्रीजी की मौत के बाद पीएम पद के चुनाव के लिए। बड़ी मुश्किल से उनके अपनों ने कामराज को उनके नाम के लिए मनाया तो फिर से मोरारजी देसाई उनके खिलाफ भी खड़े हो गए। उससे पहले दो-दो बार कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहे गुलजारी लाल नंदा ने भी पीएम पद के लिए अपनी खातिर उनसे समर्थन मांगा।
सिंडिकेट के जरिए गुलजारी लाल नंदा से निपटीं तो सांसदों की सीधी वोटिंग में मोराराजी देसाई को हराया। तब जाकर पीएम बनीं। लेकिन राह इतनी आसान कहां थी। धीरे- धीरे सिंडिकेट के नेता ही उनके खिलाफ हो गए।
इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री रहते हुए कांग्रेस के नेताओं ने पार्टी से बाहर कर दिया था।
इंदिरा गांधी ने सिंडिकेट द्वारा घोषित राष्ट्रपति पद के कांग्रेस प्रत्याशी नीलम संजीवा रेड्डी की जगह निर्दलीय वीवी गिरि को समर्थन देकर ‘आत्मा की आवाज’ का आव्हान करके गिरि को राष्ट्रपति बनवा दिया। देश में पहली बार ऐसा हुआ कि पीएम ने अपनी पार्टी का प्रत्याशी हरवा दिया और वो पहली पीएम ऐसी बनीं जिसे उनकी ही पार्टी के अध्यक्ष निंजालिंगप्पा ने पार्टी से निकाल बाहर किया। सोचिए योगीजी ने तो अभी इसका पांच फीसदी भी नहीं झेला है।
खैर, इंदिरा गांधी ने अपनी कांग्रेस बनाई, कांग्रेस (इंदिरा गांधी) यानी कांग्रेस (आई), फिर सिंडिकेट का अस्तित्व ही खत्म हो गया, नेता धीरे-धीरे किनारे लग गए। फिर इमरजेंसी की कहानी तो सबको पता ही है। उन दिनों कांग्रेस से इस्तीफा देकर नई पार्टी बनाने वालों में एके एंटनी, शरद पवार, प्रियरंजन दास मुंशी, चौधरी चरण सिंह, बाबू जगजीवन राम, यशवंत राव चाह्वाण, ब्रह्मानंद रेड्डी, देवकांत बरुआ आदि शामिल थे। फिर इंदिरा के खिलाफ आ गए इन ऐसे तमाम दिग्गज नेताओं के संरक्षक, जयप्रकाश जेपी।
इंदिरा को पहली बार ना केवल सत्ता से हाथ धोना पड़ गया बल्कि दो-दो बार जेल की सलाखों के पीछे भी जाना पड़ा। इन सबका इतिहास पढ़ेंगे तो पाएंगे स्वामी प्रसाद मौर्या और धर्म सैनी जैसे नेता तो गिनती में कहीं नहीं हैं। हालांकि योगी भी अभी उस मुकाम पर नहीं पहुंचे हैं।
हालांकि अटलजी संघर्ष करते करते जिस मुकाम पर पहुंचे, जो उन्होंने खुद पाया था। इंदिरा की तरह नेहरू के नाम और करीबी लोगों का साथ नहीं मिला, सो उनको अपनों का विरोध कम ही झेलना पड़ा, काफी हद तक सर्वमान्य थे। कभी बलराज मधोक का विरोध करना या गोविंदाचार्य का ‘मुखौटा’ जैसे बयान बेमानी ही थे। बिना संगठन के संगठन खड़ा करना और पार्टी को जीत हासिल करवाना और बिना सत्ता के लम्बे समय तक कार्यकर्ताओं का जोश बढ़ाना आसान काम नहीं था। लेकिन नरेन्द्र मोदी के लिए ये राह आसान नहीं थी।
मोदी के लिए अपने शुरुआती समय में जगह बनाना आसान नहीं था।
मोदी के लिए भी कम नहीं रहीं चुनौतियां
इमरजेंसी से पहले छात्र आंदोलन की कमान और फिर इमरजेंसी के दौरान गुजरात लोक संघर्ष समिति का महासचिव चुना जाना मोदी के विरोधियों को रास नहीं आ रहा था। इमरजेंसी में उनका कद बढ़ गया था, सो 1979 में कुछ समय के लिए उनको दिल्ली भेज दिया गया। ऐसा ही 1992 मे भी शंकर सिंह वाघेला से रिश्ते खराब होने के बाद किया गया था। 1979 मे जब आए तो उन्होंने समय का सदुपयोग किया और इमरजेंसी में गुजरात की घटनाक्रम पर एक किताब लिख डाली।
1987 में गुजरात प्रदेश के संगठन मंत्री बने तो 1990 की आडवाणीजी की रथ यात्रा और 1991-92 की मुरली मनोहर जोशी की एकता यात्रा ने उनका कद काफी ऊंचा कर दिया। लेकिन शंकर सिंह वाघेला को ये रास नहीं आया, उनको फिर से दिल्ली आना पड़ा। गुजरात ने उनको वनवास दे दिया। 1994 में वो फिर चुनावी राजनीति में उतरे और 1995 में बीजेपी की सरकार गुजरात में बनी, मोदी को राष्ट्रीय महासचिव बनाकर फिर दिल्ली बुलाया गया और हिमाचल व हरियाणा का प्रभार दे दिया गया। लेकिन वाघेला ने केशुभाई के अमेरिकी यात्रा पर जाते ही मोदी और केशुभाई दोनों की गैरमौजूदगी में बीजेपी को तोड़कर सरकार गिरा दी, सुरेश मेहता को सीएम बनाया गया।
इधर, फिर चुनाव हुए, मोदी वापस लौटे और फिर केशुभाई को सीएम बनवाया, लेकिन अब नेतृत्व उनसे नाखुश हो चला था। ऐसे में अगले तीन सालों में जनता का रोष, केशुभाई की गिरता स्वास्थ्य, उपचुनाव में हार और फिर 2001 भुज भूकम्प ने मोदी के लिए सत्ता के दरवाजे उसी तरह अचानक खोल दिए, जैसे योगी आदित्य नाथ के लिए 2017 की जीत के बाद खोले थे। क्योंकि जैसे बाघेला और केशुभाई मोदी के रास्ते से हटे थे, वैसे ही राजनाथ और कल्याण सिंह जैसे दिग्गज भी अब यूपी में नहीं थे।
2002 दंगों के बाद तो मोदी ने फिर अमेरिका से लेकर नेशनल टीवी चैनल्स और दुनियाभर के एनजीओ संगठनों का विरोध ही झेला है। पीएम बनने से पहले आडवाणीजी का शालीन विरोध और फिर पीएम बनने के बाद यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी, शत्रुघ्न सिन्हा से लेकर अब सत्यपाल मलिक जैसे अपनों का विरोध उनकी आदत में आ गया है और किसी मजबूत नेता का भारी विरोध दोतरफा असर करता है।
आम जनता में उसकी लोकप्रियता उतनी ही तेजी से बढ़ती है। ऐन चुनाव के वक्त योगी के खिलाफ जो मोर्चा उनके अपनों ने खोला है, इतिहास के हिसाब से आंकलन करें तो वो उनको जबरदस्त फायदा पहुंचाने वाला है। अगर मोदी और इंदिरा की तरह उनके सारे पासे वैसा ही नतीजा दें, जैसा सोचकर वो फेंके गए हैं। तो ऐसे में इसे योगी आदित्यनाथ का लिटमस टेस्ट कहना सही ही है।
 

panchayattantra24.com,- वैसे तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बहुमुखी प्रतिभा संपन्न व्यक्ति हैं अजय झा वैसे तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बहुमुखी प्रतिभा संपन्न व्यक्ति हैं, पर उनकी एक और खासियत है- भाषा और शब्दों से खेलने में वह माहिर हैं. कुछ समय पहले मोदी ने एक नए शब्द ‘आन्दोलनजीवी’ का उपहार हिंदी शब्दकोश को दिया था. अब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को एक नया नाम दे दिया UP-Yogi. यूपी का साथ मोदी ने योगी शब्द जोड़ दिया और बन गए योगी ‘उपयोगी’. योगी को उपयोगी कहना इतना पसंद आया कि उसके ठीक अगले दिन ही उत्तर प्रदेश सरकार का विज्ञापन अख़बारों में छपा जिसमें योगी के लिए उपयोगी शब्द का प्रयोग किया गया.’उपयोगी योगी’ एक नारा बनने वाला है और उत्तर प्रदेश चुनावों में इसका जम कर इस्तेमाल होने वाला है।
हालांकि यह एक राजनीतिक बहस का मुद्दा हो सकता है, पर इसमें शक नहीं कि अपने पांच साल के कार्य की बदौलत योगी अपने विरोधियों पर अभी से भारी पड़ने लगे हैं. यह पहला चुनाव है जिसमें उत्तर प्रदेश  की जनता को योगी और दो पूर्व मुख्यमंत्री, बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो मायावती और समाजवादी पार्टी  के अध्यक्ष अखिलेश यादव  के काम काज की समीक्षा और तुलना कर सकते हैं. ये तीनों नेता अपने अपने दल के मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं. योगी की छवि एक साफ़ सुथरे नेता की है. कुंवारे हैं और संन्यास ग्रहण करते समय उन्होंने परिवार को त्याग दिया था, इसलिए उनकी जरूरतें कम हैं. लिहाजा उनपर विपक्ष भी भ्रष्टाचार में लिप्त होने का आरोप नहीं लगा सकती।
चूंकि योगी मूलरूप से उत्तराखंड के रहने वाले हैं, इसलिए उत्तर प्रदेश की जातिगत राजनीति से परे हैं. मायावती और अखिलेश यादव के कार्यकाल में उनकी जातियों का समाज और प्रशासन में दबदवा होता था, पर योगी, जिनका असली नाम अजय मोहन बिष्ट है और पौड़ी गढ़वाल के राजपूत हैं, जातीय राजनीति से दूर रहे हैं जिस कारण किसी भी जाति का बीजेपी के खिलाफ रोष नहीं है।
 

panchayattantra24.com,अगर प्रयास करने से ही सफलता मिलती है, तो सफलता एक बार फिर से कांग्रेस पार्टी का कदम चूमने वाली है और राहुल गांधी जल्द ही देश के प्रधानमंत्री बन जाएंगे. पर ज़रा रुकिए. प्रयत्न अगर सही दिशा में हो तब ही सफलता हाथ लगती है और अगर वह प्रयास गलत दिशा में हो तो सफलता कोसों दूर ही रह जाती है. कांग्रेस पार्टी ने कल घोषणा की कि पार्टी में परिवारवाद के जनक जवाहरलाल नेहरु के जन्मदिन यानि 14 नवम्बर से पार्टी के पखवाड़े पर एक जन जागरण आन्दोलन की शुरुआत करेगी। 
योजना काफी महत्वाकांक्षी है. पार्टी के नेता टोपी पहन कर जनता के बीच जाएंगे और उन्हें टोपी पहनाने का प्रयास करेंगे. यह आंदोलन महात्मा गांधी के डांडी मार्च के तर्ज पर आयोजित किया जाएगा, पार्टी के नेता पैदल चल कर जनता के बीच जायेंगे और भारत बीजेपी मुक्त और मोदी मुक्त हो जाएगा. इस आंदोलन का लोगो यानि प्रतिक चिन्ह डांडी मार्च के थीम पर होगा. जिसे 12 नवम्बर को जारी किया जाएगा. जो परिवार गांधी और नेहरु के नाम की रोटी आज तक सेंक रही है, वह एक बार फिर से गांधी और नेहरु के नाम को जनता के बीच भुनाएगी। 
प्रयास सही दिशा में हो तभी सफलता हाथ लगती है
अगर प्रयास करने का ही अंक दिया जाए तो कांग्रेस पार्टी को पूरे दस में से दस अंक मिलेगा और पप्पू पास हो जाएगा. पर समस्या यह है कि इस आंदोलन पर भी नेहरु-गांधी परिवार की वही सोच है जिसके कारण पार्टी विनाश के कगार पर पहुंच चुकी है. इसमें नया सिर्फ इतना है कि दिल्ली में बैठ कर मीडिया और सोशल मीडिया के जरिए जनता के बीच पहुंचने के बजाय पार्टी के नेता अब जनता के बीच जाएंगे, भाषण देने की बजाय जानता से सीधी बात होगी, नुक्कड़ सभा होंगी. जनता को जागरूक किया जाएगा और उन्हें बताया जाएगा कि उनकी कमर टूटी पड़ी है, क्योंकि मोदी सरकार के शासनकाल में महंगाई ने जनता की कमर तोड़ दी है। 
महंगाई का असली जिम्मेदार कौन है?
सच है कि भारत में इनदिनों महंगाई बेलगाम होती जा रही है. फल, सब्जी, खाने का तेल, गैस, पेट्रोल, डीजल आदि की कीमतें आसमान चूमने लगी हैं, जिससे आम जनता परेशान है. पर सुना है कि कोरोना महामारी के कारण पूरे विश्व में महंगाई बढ़ गयी है. तो क्या, भारत इसका अपवाद नहीं हो सकता था. अगर पेट्रोल उत्पादक देश कच्चे तेल की कीमत बढ़ा रहे हैं तो गलती मोदी की है. अगर चीन ने खाद में इस्तेमाल होने वाले केमिकल की कीमत बढ़ा दी है तो गलती मोदी की ही है. अगर असमय बारिश के कारण टमाटर की फसल ख़राब हो गयी और अब टमाटर और सेब की कीमत एक जैसी हो गयी है तो भी गलती मोदी सरकार की है. मोदी सजा के हकदार हैं क्योंकि उन्होंने नेहरु-गांधी परिवार को बेरोजगार जो बना दिया है और जिस कुर्सी पर उनका खानदानी हक़ था उस पर मोदी बैठे हुए हैं। 
दिग्विजय सिंह के हाथों में है आंदोलनों की बागडोर
पर यह कहना भी अनुचित होगा कि भारत का प्रमुख विपक्षी दल सरकार की आलोचना ना करे और चुपचाप बैठा रहे. अगर पिछले लगभग एक साल से चल रहे किसान आंदोलन के बावजूद सरकार अडिग है तो कांग्रेस पार्टी को उससे भी कुछ बड़ा करना होगा, और वह महंगाई के विरोध में जन जागरण आंदोलन है. कांग्रेस पार्टी ने घोषणा की है कि दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता में एक कमिटी बनाई गयी है जिसका पूर्णकालिक काम ही होगा लगातार एक के बाद एक आंदोलन करना. दिग्विजय सिंह ने कल ही विधिवत घोषणा भी कर दी कि महंगाई पर आन्दोलन के बाद बेरोजगारी के मुद्दे पर देशव्यापी आंदोलन होगा और उसके बाद कृषि के मुद्दे पर,
योजना बहुत अच्छी है कि पार्टी अब जनता के बीच जाएगी. पर इससे सफलता मिलेगी इसकी गारंटी नहीं है. कारण, जनता बेवकूफ नहीं है, उसे सब पता है कि मोदी सरकार की खामियां क्या हैं. नेगेटिव सोच के साथ चलना ही कांग्रेस पार्टी की गलती रही है, जिससे मोदी और बीजेपी को बल मिलता रहा है. जरूरत थी कि कांग्रेस पार्टी जनता के बीच जा कर मोदी सरकार की विफलताओं से जनता को अवगत कराने की जगह यह बताती कि इस परिस्थति में अगर उसका शासन होता तो वह क्या करती. पार्टी के भविष्य के लिए सरकारी खजाना लुटाने और भारत को पाकिस्तान की तरह कंगाल बनाने के अलावा उनकी और क्या योजना है। 
सबसे महत्वपूर्ण बात कि कैसे राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनने के बाद देश में गांधी का राम राज्य स्थापित कर पाएंगे और किस तरह वह अपने परदादा, दादी और पिता से अलग और बेहतर शासक साबित होंगे. यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि निगेटिव सोच के साथ राजनीति करने के कारण हासिये पर पहुंच चुकी पार्टी अब उसी मानसिकता से साथ जन आंदोलन चला कर क्या सफल हो पाएगी। 
 

 
panchayattantra24.com,नशीले पदार्थ के सेवन के आरोप में गिरफ्तार किये गये अभिनेता शाहरुख खान के सुपुत्र आर्यन खान का मामला अब किसी जासूसी उपन्यास की तरह नये रहस्यों की तह में खोता जा रहा है। मगर सबसे गंभीर रहस्य इस सन्दर्भ में यह बन रहा है कि पूरे मामले की जांच करने वाले नारकोटिक्स ब्यूरो के अधिकारी समीर वानखेड़े की विश्वसनीयता क्या है? इसी से जुड़ा हुआ दूसरा रहस्य यह है कि समुद्री नौका में मुम्बई में विगत 2 अक्तूबर को हुई ‘ड्रग पार्टी’ की नारकोटिक्स ब्यूरो को सूचना देने वाले मुख्य गवाह किरन गोसावी का अता-पता क्या है। पिछले कई दिनों से गोसावी गुम है और लापता है। तीसरा रहस्य यह है कि गोसावी को एक गवाह की हैसियत से इस पार्टी में पकड़े गये आरोपी आर्यन खान से पूछताछ करने और उसके साथ अपनी वीडियो बनाने की इजाजत नारकोटिक्स विभाग ने किस कानून के तहत दी। चौथा और सबसे महत्वपूर्ण रहस्य यह है कि क्या आर्यन खान की गिरफ्तारी भारी रकम की वसूली करने की गरज से की गई थी।मुद्दा यह भी है कि आर्यन के पास से न तो कोई नशीला पदार्थ बरामद हुआ और न उसकी चिकित्सीय जांच कराई गई जिससे यह पता चल सकता कि उसने नशा किया हुआ था या नहीं लेकिन इन सब रहस्यों के ऊपर नया रहस्य यह है कि इस मामले के एक दूसरे प्रमुख गवाह प्रभाकर सेल ने बाकायदा शपथ पत्र जारी कर कहा कि आर्यन को गिरफ्तार करने के पीछे असली मंशा 25 करोड़ रुपए की उगाही करने की थी और सौदा 18 करोड़ रुपए पर पटाने की कोशिश किरण गोसावी ने की जिसमें से आठ करोड़ रु. नारकोटिक्स विभाग के अधिकारी समीर वानखेडे़ को दिये जाने थे। इसके साथ प्रभाकर सेल ने अपने शपथ पत्र में यह भी कहा है कि एक गवाह (पंच) के तौर पर ब्यूरो ने उससे दस खाली कागजों पर हस्तातक्षर करा कर अपने पास रख लिये।पूरा मामला नारकोटिक्स ब्यूरो की विश्वसनीयता से इस प्रकार जुड़ा हुआ है कि देश की नशीले पदार्थों की अवरोधक इस जांच एजेंसी को भारत की आम जनता की निगाहों में अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए कठोर कार्रवाई करने को मजबूर होना पड़े। आर्यन खान मामले में जो कहानी निकल कर बाहर आ रही है उसकी कड़ियां जोड़ने पर पूरे प्रकरण में गवाह किरण गोसावी की भूमिका बहुत रहस्यमयी होती जा रही है। यदि जासूसी उपन्यासों के अन्तिम पल- निष्कर्षों का विश्लेषण करें तो पूरी पटकथा का वही सूत्रधार होना चाहिए परन्तु उसका अब अता-पता ही नहीं है। यह भी दिलचस्प है कि प्रभाकर सेल गोसावी का अंगरक्षक था। गोसावी एक निजी जासूस बताया जाता है। यदि नारकोटिक्स ब्यूरो को आर्यन खान को पकड़ने के ​िलए एक निजी जासूस की मदद लेनी पड़ी है और उसे अपनी जांच में शामिल कर उसकी गतिविधियों के सार्वजनिक होने पर उन्हें बर्दाश्त करना पड़ा है तो इसका मन्तव्य आम जनता के लिए जानना जरूरी है क्योंकि इससे ब्यूरो की विश्वसनीयता जुड़ी हुई है। मगर हैरत की बात है कि अभी तक ब्यूरो की ओर से गोसावी की उसकी जांच में सक्रियता का कोई ब्यौरा नहीं दिया गया है। इन सब घटनाओं के सिलसिले से सामान्य नागरिक भी इस नतीजे पर पहुंच सकता है कि दाल में कुछ काला जरूर है जिसकी वजह से ड्रग पार्टी में सिर्फ छह ग्राम गांजे की बरामदगी होने पर इस मामले को ‘तिल से ताड़’ बनाया जा रहा है। इससे पूर्व प्रिया चक्रवर्ती के मामले में भी ब्यूरो की खासी किरकिरी हो चुकी है। किसी भी जांच के मामले में सबसे ऊपर जांच एजेंसी की विश्वसनीयता मायने रखती है और आर्यन के मामले में तो फिरौती जैसी तोहमत सामने आ रही है। आर्यन का मामला अदालत में जमानत के मुद्दे पर ही अटका हुआ है। जमानत देना या न देना अदालत का काम है मगर इस बारे में सर्वोच्च न्यायालय का स्पष्ट आदेश है कि किसी भी नागरिक की निजी स्वतन्त्रता का यदि एक दिन के लिए भी हनन होता है तो इसे उचित नहीं माना जायेगा।संपादकीय :अफगानिस्तान पर मोदी का एजेंडा !’अपराधी’ नहीं ‘पीड़ित’न्यायपालिका का बुनियादी ढांचामोदी है तो मुमकिन है-कोरोना अब कुछ दिन हैश्रीनगर में अमित शाहसतर्कता का दामन न छोड़ेंबेशक यह किसी भी जांच एजेंसी का अधिकार है क्योंकि उसकी कार्रवाई की तसदीक अदालत में होती है। मगर ब्यूरो को उन आरोपों का जवाब भी देना होगा जो इस मामले के प्रमुख गवाह प्रभाकर सेल ने उस पर लगाये हैं। ये आरोप इतने संगीन हैं कि अधिकारी समीर वानखेड़े की पूरी जांच प्रक्रिया पर गहरा सवालिया निशान लगाते हैं। हालांकि वानखेड़े साहब ने अपनी तरफ से निजी तौर पर अदालत में हलफनामा दाखिल करके अपने विरुद्ध षड्यन्त्र रचे जाने व झूठे आरोप लगाये जाने की बात कही है और ब्यूरो की तरफ से भी शपथ पत्र दाखिल करके कहा गया है कि श्री वानखेडे़ पूरे ईमानदार अधिकारी हैं। दूसरी तरफ प्रमुख गवाह प्रभाकर सेल ने मुम्बई पुलिस कमिश्नर के दफ्तर जाकर अपने संरक्षण की गुहार लगाई है। यदि प्रभाकर के आरोपों की तह में जायें तो यह मामला गंभीर भ्रष्टाचार का है जिसकी जांच करने का अधिकार मुम्बई पुलिस के भ्रष्टाचार निरोधक दस्ते को है जिससे सेल के आरोपों की सच्चाई सामने आ सके। दूसरी तरफ ब्यूरो के सतर्कता विभाग ने सेल के आरोपों की जांच करनी शुरू कर दी है। मगर यह विभागीय जांच होगी जिस पर फिर से सवाल उठ सकते हैं अतः इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच किये जाने की सख्त जरूरत है।
 

 
panchayattantra24.com, गुजरात के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने के बाद नरेंद्र मोदी ने सात साल पहले प्रधानमंत्री के रूप में पदभार संभाला. सार्वजनिक पद पर 20 वर्षों के निर्बाध कार्यकाल ने उन्हें विकास पुरुष के रूप में स्थापित किया है. भारतीय मतदाताओं ने मोदी को एक जन-नेता के रूप में तो देखा, लेकिन आर्थिक सुधारों के संदर्भ में उनकी सरकार से शायद अधिक की उम्मीद नहीं की. मोदी ने न्यूनतम सरकार और अधिकतम शासन के अपने दर्शन के तहत प्रशासन को सुव्यवस्थित किया. उन्होंने भ्रष्टाचार से छुटकारा दिलाया और एक स्वच्छ शासन प्रदान किया।
यूपीए के 10 साल के शासन में भ्रष्टाचार, घोटालों और वित्तीय धोखाधड़ियों को देखते हुए यह आसान काम नहीं था. डॉ मनमोहन सिंह की सरकार निष्क्रिय भूमिका में थी. उनकी गठबंधन की राजनीति ने प्रशासन को अलग-अलग दिशाओं में खींचा. निश्चित रूप से एक व्यापक प्रशासनिक बदलाव की जरूरत थी. इस संदर्भ में मोदी की सफलताएं सराहनीय हैं. मोदी ने लोगों को निराश नहीं किया. उन्होंने चुपचाप ऐसे आर्थिक सुधारों की शुरुआत की, जिसकी कल्पना महान पुरानी पार्टी और उसके हार्वर्ड-प्रशिक्षित तथाकथित ‘सुधार ब्रिगेड’ द्वारा अब तक भी नहीं की गयी थी।
मोदी सरकार द्वारा आर्थिक, प्रशासनिक और शासन संबंधी सुधारों को पुनर्निर्देशित किया गया है. यह सरकार अंत्योदय की भारतीय अवधारणा में दृढ़ता से विश्वास करती है. सैकड़ों उदाहरण दिये जा सकते हैं कि कैसे शासन को जमीनी स्तर पर ले जाया गया और उन सबसे गरीबों को लाभ प्रदान किये गये. कांग्रेस सरकारें लाखों कमजोर लोगों को राहत पहुंचाने के लिए आर्थिक सुधारों को सही दिशा देने में असमर्थ रहीं, लेकिन मोदी युग के आर्थिक सुधार असर दिखा रहे हैं. जन-धन योजना के माध्यम से बैंकिंग सुविधा से वंचित रहे क्षेत्रों में चौबीसों घंटे काम में जुटे 1.26 लाख से अधिक बैंक मित्रों की सहायता से 43.29 करोड़ खाते खोले गये।
जब प्रधानमंत्री मोदी ने उज्ज्वला योजना के तहत सभी के लिए ‘स्वच्छ’ रसोई गैस कनेक्शन की घोषणा की, तो बहुत लोगों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया. इसके तहत महिलाओं को 81.665 मिलियन से अधिक रसोई गैस कनेक्शन प्रदान दिये गये. 7 सितंबर, 2021 तक और 16.69 लाख रसोई गैस कनेक्शन प्रदान किये जाने के साथ उज्ज्वला योजना 2.0 भी शुरू की गयी. मनमोहन सिंह ने जहां वृहद-आर्थिक पुनर्गठन से जुड़े मुद्दों को हल करने पर जोर दिया।
वहीं मोदी सरकार ने लोगों के सामने आर्थिक सुधारों और भारत की विकास गाथा का फल परोसा. पिछले छह वर्षों में जमीनी स्तर पर उद्यमिता को मजबूत करने के लिए 28.68 करोड़ लाभार्थियों पर 15 लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च किये गये, जो कि दुनियाभर के बैंकिंग इतिहास में अद्वितीय है. यह मोदी युग का एक स्थापित तथ्य है. आजादी के बाद 75 वर्षों में स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने को कभी प्राथमिकता नहीं दी गयी, जिससे हर साल लाखों लोग जलजनित बीमारियों के शिकार होते हैं. हो सकता है कि एक सम्मेलन कक्ष से दूसरे सम्मेलन कक्ष की ओर भागते रहनेवाले लैपटॉप-छाप अर्थशास्त्रियों द्वारा इसे बड़े सुधार के रूप में नहीं गिना जाए, लेकिन जल जीवन मिशन सबसे बड़ा सुधार है, जिसे किसी देश ने शुरू करने की हिम्मत की है. इसकी वजह से आज 8.18 करोड़ घरों में स्वच्छ पेयजल उपलब्ध है. इसमें 4.94 करोड़ से अधिक घरों को पानी के कनेक्शन तो 15 अगस्त, 2019 के बाद ही मिले, जब जल मिशन चालू हुआ. क्या नेहरूवादी नव-उदारवादी कल्पना कर सकते थे कि हर परिवार के सिर पर छत हो? उन्होंने ‘कल्याणकारी राज्य’ की अवधारणा को पूरा करने में नाकाम रहने के लिए धन की कमी से लेकर सीमित आर्थिक अवशोषण क्षमता जैसे कई बहाने गिनाये होंगे. इस सरकार में शहरों में बसे लोगों के लिए 54 लाख और गांवों में गरीबों के लिए एक करोड़ और घरों के निर्माण की घोषणा करने का साहस था. अगर सभी के लिए आवास एक जनोन्मुखी सुधारात्मक उपाय नहीं है, तो और क्या है? जब 28 अप्रैल, 2018 को मणिपुर के आखिरी गांव लीसांग को बिजली प्रदान की गयी, तो यह बहुत बड़ी बात थी. मोदी सरकार को आजादी के बाद सभी 5.97 लाख गांवों में बिजली पहुंचाने वाली सरकार के रूप में दर्ज किया जायेगा. ये कदम ऐसी सरकार द्वारा उठाये गये हैं, जिसे गलत तरीके से व्यापारियों की पार्टी के रूप में चिह्नित किया जाता है. मोदी-पूर्व युग में आर्थिक सुधारों को भारतीय अर्थव्यवस्था को दुनिया के लिए खोलने, बड़े उद्योगों के लिए करों में कमी आदि के जरिये परिभाषित किया गया था. आज शासन को सरल और सेवाओं के वितरण की ओर उन्मुख बना कर आर्थिक सुधारों को नये सिरे से परिभाषित किया गया है, जिसमें उच्च माने जाने वाला कोई हॉर्वर्ड-जनित आर्थिक सिद्धांत नहीं है. आर्थिक सुधारों को सरल बनाने और विकास के मानकों को फिर से गढ़ने का मतलब यह नहीं है कि यह बाजार विरोधी या उद्योग विरोधी है. वस्तुओं और सेवाओं के अंतिम उपभोक्ता को सशक्त किये बिना कोई भी सुधार टिक नहीं सकता. अगर आर्थिक सुधारों को संकीर्ण रूप से परिभाषित किया जाता, तो उद्योग टिक नहीं सकते थे, बाजार का विस्तार नहीं होता, निर्यात नहीं बढ़ता या किसान समृद्ध नहीं होते और भारत की विकास गाथा कायम नहीं रहती।
 

panchayattantra24.com,वो कैसी किस्मत थी, कैसी विपदा थी. चारों तरफ से चीख के थपेड़ों की चुभती गूंज, उखड़ती सांसों की कराह, कब्र की जमीं चिता से रोशन और आसमान आसुंओं से भरा पड़ा था. हुकूमत सियासत में मशगूल और जीवन की धरा अस्पताल की दहलीज पर सांसें गिन रही थी. सिस्टम से नाराजगी और सांसों में आक्रोश की आग सुलग रही थी. वक्त गुजरा, थमी चिताएं और धीरे-धीरे मन की तपिश ठंडी होती गई. अब फिर से मनाहियों के बाद लापरवाही का धुआं गुबार बन रहा है. कब्रगाहों को फिर लापरवाहियों तले सजाया जा रहा है. इंसान इंसानों के लिए बेफिक्री तले मौतनुमा जाल बिछाता जा रहा है। 
सुखमय मुल्क ने कोरोना की पहली और दूसरी लहर के बीच खून के आंसुओं से नहाया है. कोरोना की अनगिनत क़त्लेआम भरे गुनाहों को भुगता है. इस कातिल के सामने सरकारें और न्यायालय भी नतमस्तक थे. इसके गुनाह सरेआम थे, लेकिन गुनाह को समझते तक लाशों की ढेर लग गई थी. कोरोना रूपी मौत का तांडव सरेआम अपनों को अपनों से बेरहमी से छीन रहा था, हिम्मत अंधेरे सी दरवाजे के पीछे हिफ़ाजत की भीख मांग रही थी. सिस्टम की तीखी मनाहियां और पेट को कचोटती भूख बन्दिशों के बीच मिट्टी चाट रही थी. जिंदगी की सुलगती आग सफतकोसी में लपटें बनकर उभरती जा रही थी. वो वक्त था, इंसानी जिन्दगी में हर तबक़े की इंतेक़ाम का, जो महरूमियत तले जिए जा रहा था। 
चीख, पुकार, कब्र और जलती चिताएं अपनों की मातम और बेरूखी के बीच सांसें ले रही थी. कब्र में लाश और धधकती चिताओं से ज़मीं रौशन तो थी, लेकिन आसुंओं की धार से आसमानी सितारों की चमक बुझी हुई थी. होंठ जिंदगी में छाई मातम से सूखे थे और मन में अनदेखी खंजर से घाव कर रही थी. कोरोना रूपी काल से मानो सीधा सादा जीवन समाधि ले रहा था, जिंदगी की धुंध अंधकार में हिम्मत की साख जीवन बन रही थी। 
वक्त थमता गया, पहली लहर गई, दूसरी लहर गई, तबाहियों में लगाम लगी. सरकारें कोरोना पर जीत की थपकियां लेती गईं, लेकिन तीसरी लहर को हम सबकी नाकामियां और लापरवाही निमंत्रण दे रही है, क्योंकि सरकारी घोषणाएं कागजी मिलियन और ट्रिलियन पर होती हैं, भुगतना हमको ही पड़ता है. हम किसी अमेरिका, इटली या जापान में नहीं हैं, जो डॉक्टरों की बाढ़ आ जाएगी. ग्रामीण इलाकों में अस्पताल और डॉक्टर दीया लेकर तलाशने निलकोगे तो सिर्फ सिस्टम और हुकूमत का अंधकार मिलेगा, जिसमें सिर्फ मौतनुमा कुंआ है, उस कुएं में न पानी है और न ही जान बचाने के लिए सीढियां हैं. बस मौत का कुंआ इंसानी मौत लेकर जमीं पर समाने के लिए तैयार रहेगा। 
उफ्फ ये भागती-दौंड़ती और चकाचौंध सी जिंदगी, हुकूमत और जिम्मेदार बन्दिशें बनाते हैं, मास्क लगाने की अपील करते हैं, लेकिन भीड़ की जिंदगी भी न वाकई क्या मजे की जिंदगी है. हमने अनगिनत करीबियों को पल भर में खो दिया, लेकिन वाह रे भाग-दौड़ की रफ्तार. न चेहरे पर मास्क और वैक्सीन लगवाए हैं. ये फेस पर आधे-अधूरे मास्क हमारी पूरी जिंदगी को फिर मरहम की दहलीज में सांसों के लिए खींचती दिखेगी. कब हमारी लापरवाहियां हमें ही वायरस से सीधा रू-ब-रू करा दे, लेकिन वाह रे भीड़ और वाह रे मजा। 
हमारी और उन सबकी जिंदगी अनमोल है, मौसम सुहाना है, नदियां, पहाड़, झरने और मनमोहक वादियां हमें बुला रही हैं, अपने गोद में बिठाना चाह रही हैं, लेकिन इन सबका का क्या है, आज नहीं तो कल फिर मिल जाएंगे. मौसम हर पल बदलते रहता है, ये कल फिर सुहाने होंगे, लेकिन कल को देखने के लिए आज को संजोना पड़ेगा, क्योंकि हर गांव, हर शहर, हर कस्बा और न जानें कितने मुल्कों से कितने करोड़ जिंदगियां मिट्टी में मिल गईं. ऐसे हाल में भी अगर हम खुद की ही चिंता नहीं करेंगे, तो फिर से चिताएं निकलना तय है। 
 

 panchayattantra24.com,अस्पताल हाउसफुल, बेड खाली नहीं. अब न फूल वर्षा, घंटी-थाली नहीं. कोरोना का ये नया स्ट्रैन है. फिर से लॉकडाउन, सब बैन हैं. ज्यादातर राज्यों में हालात बेकाबू है. लेकिन बंगाल में जाने कोरोना के खिलाफ कैसा काला जादू है. बड़ी-बड़ी रैलियाँ, हजारों की भीड़, नेताओं के चेहरे न मास्क, न दो गज की दूरी है. यहाँ आयोग मजबूर और चुनाव जरूरी है. जी हाँ साहब चुनाव जरूरी है. कोरोना फिलहाल जैसे यहाँ पर छू मंतर है. गजब का सिस्टम, गजब का परजातंतर है। 
देखिए शिकायत मत करिएगा. सवाल न पूछिएगा. हम जो कड़े कदम हो सकते हैं सब उठा रहे हैं. कोरोना से बचने ही तो टीका लगा रहे हैं. जितना संभव है वो सब कर रहे हैं. यहाँ तक की अब बोर्ड परीक्षा भी रद्द कर रहे हैं. लेकिन चुनाव रद्द नहीं होगा, रैलियाँ रद्द नहीं होगी, सभा कराएंगे. भीड़ बुलवाएंगे, नारे लगवाएंगे. और अंत में यह भी कहेंगे. कोरोना से बचकर रहना है. याद रखिए वोट हमें ही करना है। 
वोट..! जी हाँ वोट..! मत..मतदान…! लोकतंत्र में सबसे बड़ा काम. इसी वोट के जरिए नेता, विधायक, मंत्री चुने जाते हैं, सरकार चुनी जाती है. लेकिन चुनने के बाद, वे कहाँ ? कब ? आम जन की सुनी जाती है. सुनी जाती तो वे अपने मन का न करती. कोरोना संकट में काम ढंग का करती. कई राज्यों में कोरोना से दुर्गति है. चीरघरों में लाशें यहाँ-वहाँ पड़ी हैं. श्मशान घाट में दिन-रात चिताएं जल रही हैं. व्यवस्था अब संभाले नहीं संभल रही है। 
ये त्रासदी बहुत ही भीषण है. आँखों के सामने मरण ही मरण है. रोते-बिलखते परिजन, पसरा सन्नाटा और मातम है. ये विपदा, ये विपत्ति, ये संकट जाने कौन हरेगा ? हे ईश्वर ! या अल्लाह तू कुछ करेगा ? आस्था और मनौती के साथ यही सवाल अब हर कोई कर रहा है. क्योंकि यहाँ हर कोई लड़ रहा है…डर रहा है.. कहते हैं डर के आगे जीत है. बस अब एक नई सुबह की उम्मीद है। 
–  वैभव बेमेतरिहा