
रायपुर । “ये मुख्यमंत्री ह तो बड़ गजबे किसम के ही जी, निमगा गंवईहा, देहाती किसम के छत्तीसगढ़िया. गाँव-गंवई म जाथे, गौठान म चौपाल लगाथे, ठेठ छत्तीसगढ़ी म गोठियाथे अउ तो अउ मॉल म छत्तीसगढ़ी फिलिम देखे बर घलोक चले जाथे. मोला तो ये देख के बड़ गरब होथे. सिरतोन म ये ह देहाती होये के परमान आय. देहाती होना सरम के नहीं बड़ गरब के बात हरय.” गुरतुर छत्तीसगढ़ी के राजा अउ ठेठ छत्तीसगढ़िया पद्मश्री श्यामलाल चतुर्वेदी बाबूजी आज ज़िंदा होथे तो भूपेश बघेल को देखकर उनके लिए छत्तीसगढ़ी में यही कहते.
ऐसा मैं इस लिए कह रहा हूँ कि क्योंकि छत्तीसगढ़ में, छत्तीसगढ़ी और छत्तीसगढ़िया होने के अर्थ को समझना है तो आपको श्यामलाल बाबूजी के व्यक्तित्व को जानना होगा. उनके मन में छत्तीसगढ़ के हित में काम करने वाले लोगों के लिए अथाह प्रेम रहा, मुझे ध्यान है 2013 में पं. रविशंकर शुक्ल विवि के कार्यक्रम में उन्होंने तात्कालीन राज्यपाल शेखर दत्त के लिए कहा था कि, “ये राज्यपाल बड़ अलग किसम के हे जी. येखर मन म छत्तीसगढ़ अउ छत्तीसगढ़िया मन बर बड़ प्रेम हे. मै तो कहथव इन जीवन भर इही धरती हमरे तिर रहि जातिन.
यह सब मैं इसलिए बता रहा हूँ, क्योंकि छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी, छत्तीसगढ़ियों के हित में जो भी काम करता बाबूजी उन्हें खूब प्रोत्साहित करते, खुले मन से और हर मंच से उनकी तारीफ़ करते. मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के काम-काज में अभी तक छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी, छत्तीसगढ़ियों का हित होते दिख रहा है. तभी तो दिन बुधवार, तारीख़ 19 जून 2019 छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ी सिनेमा के इतिहास में हमेशा महत्वपूर्ण दिन के लिए याद किया जाएगा, क्योंकि यह पहला अवसर था जब छत्तीसगढ़ी सिनेमा को प्रोत्साहित करने के लिए कोई मुख्यमंत्री मल्टीप्लेक्स तक पहुँचा हो. मुख्यमंत्री का मल्टीप्लेक्स में फिल्म देखने जाना उन सभी मल्टीप्लेक्स संचालकों के लिए एक संदेश है, जो छत्तीसगढ़ी फिल्मों को उपेक्षित करके रखे हुए हैं, जो छत्तीसगढ़ी फिल्मों को प्रदर्शित नहीं करते. वहीं यह उन सभी छत्तीसगढ़ी सिने कलाकारों का सम्मान भी है जिन्हें मल्टीप्लेक्स में फिल्म लगाने के लिए विरोध-प्रदर्शन करना पड़ा था. कह सकते हैं कि मुख्यमंत्री के इस पहल से कलाकारों को ताकत भी मिली है, उनके विरोध को बल मिला है
पाठकों के मन में पढ़ते हुए कई सवाल हो सकते हैं कि मैं यह सब क्यों लिख रहा हूँ ? इस लेख को श्यामलाल बाबूजी के साथ जोड़कर लिखने का क्या अर्थ ? कहीं यह मुख्यमंत्री की जबरिया तारीफ तो नहीं ? कहीं यह चासनी वाला लेख तो नहीं…अन्य जो भी ? इन सब सवालों का एक ही जवाब है, छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी, छत्तीसगढ़िया हित, जब प्रदेश को चलाने वाले की ओर से ऐसी पहल हो तो सराहना तो की ही जानी चाहिए. वइसे भी बाबूजी हमेशा यही कहते थे ‘देहाती होना मोर बर सरम के नहीं, गरब के बात हरय.” मैं भी यह कहता हूँ, छत्तीसगढ़ी बोलते वक़्त, खुद को छत्तीसगढ़िया बताते वक़्त, छत्तीसगढ़ी फिल्में देखते वक़्त( बशर्ते फिल्मे कला-संस्कृति पर आधारित हो, फूहड़ नहीं) आपको शर्म नहीं, गर्व होना चाहिए. काबर के मुख्यमंत्री ह तो सिरतोन म निमगा देहाती अउ ठेठ छत्तीसगढ़िया हरय.
उम्मीद है इन प्रयासो के साथ श्यामलाल बाबूजी की अंतिम इच्छा और पुरखों के सपनों के साथ करोड़ों छत्तीसगढ़ियों की मांग महतारी भाषा(माध्यम) में शिक्षा के अधिकार को भी मुख्यमंत्री भूपेश जल्द पूरा करेंगे.
निमगा- शुद्ध
देहाती- गाँव का