panchayattantra24.-बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवादों में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की स्वीकार्यता को लेकर महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पारिवारिक न्यायालय को यह विशेष अधिकार है कि वह विवाद के प्रभावी निपटारे के लिए ऐसे दस्तावेज या सामग्री को भी साक्ष्य के रूप में स्वीकार कर सकता है, जो सामान्यतः साक्ष्य अधिनियम के तहत मान्य न हों। न्यायालय ने पत्नी की याचिका खारिज कर दी। रायपुर निवासी एक व्यक्ति ने फैमिली कोर्ट में अपनी पत्नी के खिलाफ तलाक की अर्जी दाखिल की थी। पति ने अदालत से आग्रह किया कि पत्नी के अन्य लोगों के साथ हुए व्हाट्सऐप चैट और कॉल रिकॉर्डिंग को रिकॉर्ड पर लिया जाए। पत्नी ने इसका विरोध करते हुए आरोप लगाया कि पति ने उसके मोबाइल फोन को हैक कर अवैध तरीके से यह सामग्री हासिल की है, जिससे उसके निजता के अधिकार का उल्लंघन हुआ है। फैमिली कोर्ट ने पति की अर्जी स्वीकार कर ली, जिसे पत्नी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
एकल पीठ के न्यायाधीश जस्टिस सचिन सिंह राजपूत ने सुनवाई के दौरान कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त निजता का अधिकार पूर्ण (एब्सोल्यूट) नहीं है। निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार सार्वजनिक न्याय से जुड़ा है और कई बार यह व्यक्तिगत निजता से ऊपर हो सकता है। अदालत ने टिप्पणी की कि यदि केवल निजता का हवाला देकर प्रासंगिक साक्ष्य को रोका जाए, तो फैमिली कोर्ट की स्थापना का उद्देश्य ही निष्फल हो जाएगा। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि फैमिली कोर्ट अधिनियम की धारा 14 पारिवारिक न्यायालय को यह शक्ति देती है कि वह विवाद के समाधान में सहायक किसी भी सामग्री को साक्ष्य के रूप में स्वीकार कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि यदि साक्ष्य प्रासंगिक है, तो उसके प्राप्त करने की विधि मात्र के आधार पर उसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि न्यायालय का दायित्व है कि वह दोनों पक्षों के हितों के बीच संतुलन स्थापित करे। यदि पति अपने दावे को सिद्ध करने के लिए प्रासंगिक साक्ष्य प्रस्तुत करना चाहता है, तो उसे यह अवसर दिया जाना चाहिए। इन सभी पहलुओं पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने पत्नी की याचिका को निरस्त कर दिया और फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा।
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