panchayattantra24.-बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सीबीआई की विशेष अदालत द्वारा वर्ष 2007 में सुनाई गई सजा को रद्द करते हुए पूर्व बीएसएनएल सब-डिविजनल ऑफिसर संजय कुमार शर्मा को रिश्वत लेने के आरोप से बरी कर दिया। एकलपीठ में सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति रजनी दुबे ने कहा कि केवल रकम की बरामदगी किसी को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं है, जब तक यह साबित न हो कि आरोपी ने रिश्वत की मांग की थी। सीबीआई के अनुसार, 20 जून 2003 को बिलासपुर में पदस्थ बीएसएनएल के एसडीओ संजय कुमार शर्मा को 40 हजार रुपये लेते हुए पकड़ा गया था। आरोप था कि उन्होंने अक्षय कंस्ट्रक्शन के संचालक और ठेकेदार के.पी. अग्रवाल से लंबित बिलों के भुगतान के एवज में 80 हजार रुपये की मांग की थी। सीबीआई ने इसे रिश्वत की पहली किस्त बताया था।
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने दलील दी कि शिकायतकर्ता के.पी. अग्रवाल का ट्रायल के दौरान निधन हो गया था। इस कारण उनका प्रतिपरीक्षण (क्रॉस-एग्जामिनेशन) नहीं हो सका। अदालत ने माना कि प्रतिपरीक्षण के बिना गवाही की कानूनी मजबूती कमजोर हो जाती है। इसके अलावा शिकायतकर्ता के पुत्र उमेश अग्रवाल और अन्य गवाहों ने भी अभियोजन का साथ नहीं दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि सीबीआई यह साबित नहीं कर सकी कि आरोपी ने वास्तव में रिश्वत की मांग की थी। गवाहों ने भी स्वीकार किया कि उन्होंने न तो कोई बातचीत सुनी और न ही मांग होते देखा। ट्रायल के दौरान एक अन्य ठेकेदार सूर्यदेव दुबे की गवाही महत्वपूर्ण मानी गई, लेकिन वह भी रिश्वत की मांग को स्पष्ट रूप से साबित नहीं कर पाया। अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि केवल पैसे की बरामदगी के आधार पर दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता। रिश्वत की मांग और स्वीकार करने के ठोस प्रमाण जरूरी हैं। इसी आधार पर वर्ष 2007 में सुनाई गई सजा को निरस्त करते हुए आरोपी को दोषमुक्त कर दिया गया।
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