panchayattantra24.-रायगढ़। ग्रामीण अंचलों में आजीविका के सीमित साधनों के बीच जब स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक दृष्टिकोण से जोड़ा जाता है, तब सफलता की नई इबारत लिखी जाती है। ऐसी ही एक प्रेरक कहानी है धर्मजयगढ़ वनमंडल अंतर्गत वनधन विकास केंद्र केड़ना की, जहाँ सबई घास से रस्सी निर्माण ने ग्रामीण महिलाओं के जीवन में आर्थिक और सामाजिक बदलाव लाया है। वन विभाग की अधिकारियों ने आज यहां बताया कि सबई घास रायगढ़ जिले के वन क्षेत्रोंकृजमझोर, केड़ना, सोलमुड़ा, सोरझुड़ा, अन्नोला एवं पेलमाकृमें प्राकृतिक रूप से प्रचुर मात्रा में पाई जाती है। पारंपरिक रूप से ग्रामीण महिलाएं इससे हाथ से रस्सी बनाकर घरेलू उपयोग या स्थानीय बाजारों में सीमित स्तर पर बिक्री करती थीं। हालांकि, बाजार तक सीधी पहुंच और उचित मूल्य न मिलने के कारण यह कार्य बड़े पैमाने पर आय का साधन नहीं बन पा रहा था। इसी कड़ी में राज्य सरकार की वनधन योजना के अंतर्गत वनधन विकास केंद्र केड़ना की स्थापना कर महिलाओं को स्व-सहायता समूहों के माध्यम से संगठित किया गया। उन्हें सबई घास से रस्सी निर्माण के लिए हाथों एवं विद्युत चालित मशीनें उपलब्ध कराई गईं। स्तर ही व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया गया। इससे महिलाओं की उत्पादन क्षमता बढ़ी और गुणवत्ता में भी सुधार हुआ।
दरअसल सबई घास से निर्मित रस्सी का उपयोग बांस के बंडलों को बांधने में किया जाता है, जिसकी मांग वन विभाग एवं पेपर उद्योग में लगातार बनी रहती है। वन विभाग द्वारा सबई रस्सी को 45 रुपये प्रति किलो की दर से क्रय किया जाता है, जिससे महिलाओं को मजदूरी के रूप में नियमित आय प्राप्त हो रही है। वहीं तैयार रस्सी को विभिन्न वनमंडलों में 75 रुपये प्रति किलो की दर से विक्रय कर वनधन केंद्र को भी लाभ मिल रहा है। अधिकारियों ने बताया कि पिछले वर्षों में वनधन केंद्र केड़ना से जुड़ी महिलाओं ने 30 से 40 क्विंटल रस्सी का निर्माण कर 1.5 से 2 लाख रुपये तक की आय अर्जित की।
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