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K.W.N.S.-नवरात्रि दिवस 1 अवतार शैलपुत्री पूजा, प्रसादम: यह नवरात्रि है… नवरात्रि का पहला दिन 26 सितंबर को शुरू हुआ और त्योहार 5 अक्टूबर को समाप्त होता है। नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। “शैल” का अर्थ है पर्वत और “पुत्री” का अर्थ है बेटी और शैलपुत्री का अर्थ है पहाड़ों की बेटी। देवी शैलपुत्री को मूल चक्र या मूलाधार चक्र की देवी माना जाता है। पूजा के लिए शुभ मुहूर्त: कलश स्थापना या घटस्थापना के लिए शुभ मुहूर्त सुबह 06:11 बजे से 07:51 बजे तक और घटस्थापना अभिजीत मुहूर्त 11:48 पूर्वाह्न से 12:36 बजे तक है। नवरात्रि 2022 प्रतिपदा तिथि 26 सितंबर, 2022 को सुबह 03:23 बजे शुरू होती है और 27 सितंबर, 2022 को 03:08 बजे समाप्त होती है। शैलपुत्री पूजा विधानम: सबसे पहले भगवान गणेश की पूजा करें और घी या सरसों या तिल के तेल से दीपक जलाकर वेदी पर रखें। शैलपुत्री मंत्रों का जाप करें मां शैलपुत्री पूजा मंत्र: Om देवी शैलपुत्र्यै नमः वंदे वंचितलभय चंद्राधाकृतशेखरम। वृषरुधम शुलधरम शैलपुत्रिम यशस्विनीम्॥ मां शैलपुत्री ध्यान मंत्र: या देवी सर्वभूटेशु माँ शैलपुत्री रूपेना संस्था। नमस्तास्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः शैलपुत्री आरती गीत: शैलपुत्री मां जमानत पर सवार, करे देवता जयजयकार शिव शंकर की प्रिया भवानी, तेरी महिमा किसने न जानी पार्वती तू उमा कहलावे, जो तुझे सिमरे सो सुख पावे रिद्धि सिद्धि परवन करे तू, दया करे धनवान करे तू सोमवार को शिव संग प्यारी, आरती तेरी जिसे उतरी उसकी सागर आस पूजा दो, सागर दुख तकलीफ मिला दो घी का सुंदर गहरा जलके, गोला गरी का भोग लगाके श्रद्धा भाव से मंत्र गए, प्रेम साहित्य फिर शीश झुके जय गिरिराज किशोरी अम्बे, शिवमुख चंद्र चकोरी अम्बे मनोकामना पूर्ण केरी दो, भक्त सदा सुख संपदा भर दो। पहनने के लिए रंग और नैवेद्यम: सफेद रंग के कपड़े पहनना शुभ होता है। नवरात्रि के पहले दिन देसी घी से प्रसाद बनाएं।
 

K.W.N.S.-प्रत्येक वर्ष विजयादशमी यानी दशहे के दिन अन्याय के प्रतीक रावण का पुतला फूंका जाता है. यह उत्सव प्रभु श्रीराम द्वारा रावण के वध के उपलक्ष्य में देश-विदेश में मनाया जाता है. आखिर क्या कारण था कि इस सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी के मानस पुत्र ऋषि पुलत्स्य के परिवार में ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के बाद भी रावण राक्षस बना. इस लेख में जानिए कि वह क्यों अपने ही आराध्य भगवान शिव के अवतार हनुमान जी को सामने देखकर भी, उन्हें नहीं पहचान सका. द्वारपाल बने रावण-कुंभकरण पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भगवान विष्णु के दर्शन करने सनत, सनंदन ऋषि वैकुंठ पधारे, किंतु उनके द्वारपाल जय और विजय ने बिना आज्ञा प्रवेध देने से इनकार कर दिया। 
 ऋषियों ने क्रोध में उन्हें राक्षस होने का शाप दे दिया तो दोनों ने उनसे क्षमा मांगी. इस बीच जानकारी होने पर विष्णु जी आए और उन्होंने भी क्षमा करने का आग्रह किया तो उन्होंने श्राप की तीव्रता कम करते हुए कहा कि तीन जन्मों तक राक्षस रहने के बाद ही इस योनि से मुक्ति मिलेगी, किंतु इसके लिए विष्णु जी के अवतार से तुम्हें मरना होगा. इस तरह पहले जन्म में वे हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु हुए, फिर दूसरे जन्म में रावण और कुंभकरण के रूप में जन्मे और श्रीराम ने उनका उद्धार किया तथा तीसरे जन्म में वे शिशुपाल और दंतवक्त्र बने, जब श्री कृष्ण ने उनका उद्धार किया. रावण और कुंभकरण के रूप में उन्होंने ऋषि विश्रवा की पत्नी कैकसी के गर्भ से भाई-बहन के साथ जन्म लिया। 
ऋषि विश्रवा पुलस्त्य ऋषि के पुत्र थे, जो ब्रह्मा जी के मानस पुत्र कहलाते थे और स्वयं ब्रह्मा जी ने उन्हें मनुष्यों के बीच पुराणों के ज्ञान के प्रसार के लिए भेजा था. रावण का उद्धार रावण ने तप करके तमाम सिद्धियां प्राप्त कीं और यहां तक कि उसने अपना सिर काटकर अग्नि को भेंट कर दिया था, जिससे प्रसन्न होकर ही ब्रह्मा जी ने उसे वरदान दिया कि तुम्हें दैत्य, दानव, यक्ष कोई भी नहीं परास्त कर सकेगा, इसीलिए भगवान विष्णु ने नर रूप में श्रीराम बनकर अवतार लिया और वानरों की सहायता से रावण तथा उसके कुल का नाश किया. ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के बाद भी रावण राक्षसी आचरण से सराबोर था. अहंकार उस पर इस हद तक हावी था कि अपने आराध्य भोले शंकर के अवतार हनुमान जी को सामने देखकर भी नहीं पहचान सका। 
 

 K.W.N.S.-इस साल नवरात्रि बहुत ही हर्षोल्लास के साथ मनाई जाने वाली है। यह नौ दिनों तक चलने वाला शुभ त्योहार है और इन दिनों के दौरान, भक्त उपवास रखते हैं और मां दुर्गा की पूजा करते हैं। नवरात्रि 26 सितंबर से शुरू होकर 5 अक्टूबर को खत्म होगी. प्रतिदिन मां दुर्गा के नौ अवतारों की पूजा की जाएगी। यहां देवी दुर्गा के नौ अवतारों की सूची दी गई है। मां शैलपुत्री माँ ब्रह्मचारिणी माँ चंद्रघंटा माँ कुष्मांडा मां स्कंदमाता माँ कात्यायनी माँ कालरात्रि माँ महागौरी माँ सिद्धिदात्री 
मां शैलपुत्री: भक्त पहले दिन देवी शैलपुत्री की पूजा करते हैं। ऐसा माना जाता है कि उनके दो हाथ हैं और दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का फूल है। शैल का अर्थ है पर्वत और इसलिए देवी को पर्वत की पुत्री शैलपुत्री के नाम से जाना जाता है। 
मां ब्रह्मचारिणी: नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। इनके भी दो हाथ हैं और इनके दाहिने हाथ में जप माला और बाएं हाथ में कमंडल है। लोगों का मानना ​​​​है कि भगवान मंगल जो सभी अच्छे भाग्य प्रदान करते हैं, देवी ब्रह्मचारिणी द्वारा शासित होते हैं। 
मां चंद्रघंटा: नवरात्रि के तीसरे दिन भक्त मां चंद्रघंटा की पूजा करते हैं। ऐसा माना जाता है कि वह अपने माथे पर एक अर्ध-गोलाकार चंद्रमा पहनती है जो एक घंटी की तरह दिखता है। तो, उसे चंद्र-घण्टा कहा जाता है और वह बाघिन पर बैठती है। 
माँ कुष्मांडा: मां कुष्मांडा को अष्टभुजा देवी के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि उनके आठ हाथ हैं। वह सूरज के अंदर रह सकती है और माना जाता है कि उसके शरीर की चमक और चमक सूरज की तरह चमकती है। 
मां स्कंदमाता: मां स्कंदमाता को चार हाथों से चित्रित किया गया है और उनके ऊपरी दो हाथों में कमल के फूल हैं। वह अपने दाहिने हाथ में एक बच्चा मुरुगन रखती है, जिसे कार्तिकेय भी कहा जाता है, और दूसरा दाहिना हाथ अभय मुद्रा में रखता है। 
माँ कात्यायनी: नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा की जाती है। उसके चार हाथ हैं और वह सिंह पर सवार है। वह अपने बाएं हाथ में कमल का फूल और तलवार भी रखती है और अपने दाहिने हाथ को अभय और वरद मुद्रा में रखती है।
 माँ कालरात्रि: सातवें दिन, भक्त देवी कालरात्रि की पूजा करते हैं, जिन्हें देवी शुभांकरी के नाम से भी जाना जाता है। उसका रंग गहरा काला है और वह गधे पर सवार है।
 माँ महागौरी: आठवें दिन मां महागौरी की पूजा की जाती है। ऐसा कहा जाता है कि सोलह वर्ष की आयु में देवी शैलपुत्री अत्यंत सुंदर थीं और उन्हें गोरे रंग का वरदान प्राप्त था। इसलिए, उन्हें देवी महागौरी के रूप में जाना जाता है। वह श्वेतांबरधारा के नाम से भी जानी जाती हैं क्योंकि उन्होंने केवल सफेद कपड़े पहने थे।
 मां सिद्धिदात्री: माँ सिद्धिदात्री अर्धनारीश्वर का एक रूप है क्योंकि वह भगवान शिव के बाएं आधे भाग से प्रकट हुई थीं। उसके चार हाथ हैं और वह कमल पर विराजमान है।
 

 K.W.N.S.-ज्योतिष शास्त्र में हर एक रत्न के साथ-साथ धातुओं का भी काफी अधिक महत्व है। सोना,चांदी, कांसा, लोहा से लेकर अष्टधातु का भी काफी महत्व माना जाता है। हिंदू धर्म में अष्टधातु को काफी अच्छा माना जाता है क्योंकि यह पूरी आठ तरह की धातु से मिलकर बना होता है। आमतौर पर हिंदू और जैन धर्म में अष्टधातु से मूर्तियों का निर्माण किया जाता है। क्योंकि यह काफी पवित्र और शुभ माना जाता है। वहीं ज्योतिष शास्त्र की बात करें, तो अष्टधातु का इस्तेमाल करके व्यक्ति राहु की दशा को काफी हद तक कम करने के साथ किस्मत को भी चमका सकता है। अष्टधातु से बनी अंगूठी या फिर कड़ा पहनने से काफी लाभ मिलता है। 
बता दें कि अष्टधातु आठ तरह की धातुओं से मिलकर बनती हैं जो सोना, चांदी, तांबा, सीसा, जस्ता, टिन, लोहा और पारा होता है। जानिए किन लोगों को अष्टधातु धारण करने से लाभ मिलेगा। इन लोगों को पहनना चाहिए अष्टधातु अगर किसी जातक की कुंडली में राहु की स्थिति काफी खराब है, तो वह उसे जीवन में कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में राहु के दुष्प्रभावों को कम करने के लिए अष्टधातु से बना हुआ कड़ा पहनना चाहिए। इससे काफी हद तक लाभ मिलेगा। 
मानसिक और शारीरिक तनाव को कम करने के लिए अष्टधातु से बनी हुई अंगूठी या फिर कड़ा धारण कर लें। इससे व्यक्ति को हर तरह की परेशानी से निजात मिलेगी। कुंडली में मौजूद ग्रहों के दुष्प्रभावों को कम करने के लिए एक बार ज्योतिषी से सलाह लेकर अष्टधातु धारण करना लाभकारी होगा। अगर किसी जातक को किसी भी तरह के निर्णय लेने में काफी समस्या होती है, तो वह अष्टधातु धारण कर सकता है। लंबे समय से नौकरी में समस्या चल रही है या फिर प्रमोशन नहीं हो रहा है, तो अष्टधातु से बनी अंगूठी या फिर कड़ा धारण करना लाभकारी होगा। अगर आपकी किस्मत लगातार आपके रूठी हुई है, तो अष्टधातु से बना कड़ा या अंगूठी पहन लें। इससे लाभ मिलेगा।

 
K.W.N.S.-दीपावली के अगले दिन अर्थात कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा का विधान है. यह पर्व भी लीलाधर भगवान श्रीकृष्ण की एक लीला का ही हिस्सा है. शास्त्र कहते हैं कि जो भक्त गिरिराज जी महाराज के दर्शन करता है और गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करता है, उसे कई तीर्थों और तप करने से भी हजारों गुना अधिक पुण्य प्राप्त होता है. गोवर्धन पूजा की कथा द्वापर युग में ब्रज के रहने वाले देवराज इंद्र के डर से उनकी छप्पन भोगों से पूजा किया करते थे. ऐसे समय में श्रीकृष्ण ने गोप और ग्वालों को इंद्र की पूजा करने के लिए प्रेरित किया और इतना ही नहीं इंद्र के भोग को स्वयं ही गोवर्धन के रूप में प्रकट होकर ग्रहण कर लिया. इंद्र ने इसे अपना अपमान समझा और क्रोधित होकर देवराज ने ब्रज में इतनी अधिक वर्षा की कि पूरा ब्रज पानी से डूबने लगा। 
 वहां रहने वाले सभी लोग अपना जीवन बचाने को व्याकुल हो गए. सभी लोग श्रीकृष्ण के पास आए और बोले कि अब तुम्ही बताओ हम क्या करें, कैसे बचें, क्योंकि तुम्हारे कहने पर ही हमने इंद्र की पूजा बंद की है. इस पर श्रीकृष्ण ने अपने हाथ की सबसे छोटी अंगुली पर गोवर्धन पर्वत को धारण किया और सभी ब्रज वासियों को उसके नीचे आने के लिए कहा. ऐसा करके श्रीकृष्ण ने इंद्र के प्रकोप और अतिवृष्टि से होने वाली जनधन की हानि को भी रोकने का काम किया. इंद्र ने इसके बाद भी वर्षा जारी रखी, किंतु जब देखा कि किसी का कोई नुकसान नहीं हो रहा है, क्योंकि सभी ने श्रीकृष्ण की शरण ले रखी है तो उनका अभिमान भी चूर- चूर हो गया। 
 इंद्र ने भी आकर श्रीकृष्ण की शरण ली और अपनी गलती मानी और पूरे गांव में श्रीकृष्ण का गुणगान किया. इस पर पूरे ब्रज में उत्सव मनाया गया. ऐसे की जाती है पूजा तभी से कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष में प्रतिपदा के दिन गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण का और गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाकर पूजन किया जाता है. साथ ही गौ माता की भी पूजा की जाती है. वास्तव में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं भी गोवर्धन पर्वत की पूजा कर यह संदेश दिया कि अहंकार और दुराचार के अंत के लिए सबको मिलकर प्रयास करना होगा। 
 

 
 
   K.W.N.S.-  जीवन में खुश होने और स्वस्थ होने के साथ ही ये सही भी हो सकते हैं. डेटा नकारात्‍व में बदलने के लिए. यदि ये वास्‍तु टिप्‍स और ऐस्‍ट्रो टिप्‍स फॉलो किए जाएं तो कुछ ही दिन में इसका असर आपकी आय, तरक्‍की और आर्थिक स्थिति पर साफ दिखने लगते है. धन पाने के ऐसे ही कुछ वास्‍तु और एस्‍ट्रो टिप्‍स हैं, जिन्‍हें रोज रात में सोने से पहले फॉलो करने से बहुत प्रभावी नतीजे मिलते हैं. साथ ही ये उपाय घर में ही काम करेंगे और खुश भी होंगे। धन के लिए रात में सोने से पहले करें ये काम घर के अंदर का हरिश्‍व पूर्ण. ये दिन, मौसम, घर का मौसम . इस स्थिति में सुधार करने की स्थिति में सुधार किया जा सकता है। – हवा को टीवी से पहली बार प्रसारण में एक बाल से भर कर दर्ज करें। दोषपूर्ण वातावरण में रहने वाले लोग हैं। मौसम की तरह – प्रदूषण के मामले में ऐसा नहीं है. रात में पानी भरकर. ️ सके  परिवार में सभी प्रकार के बच्चे नहीं होते हैं। – किचन को सपने में उम्मीदें साफ करें। मां अन्नपूर्णा प्रसन् रहने वाले हैं और हमेशा धन-धान्‍य से रहते हैं। – दिन शाम को सूर्यास्‍त के बाद घर के मुख्‍य पर दीपक जलाएं। सके
 

 
K.W.N.S.-हर साल आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जीवित्पुत्रिका व्रत रखा जाता है। इस व्रत को जुउतिया और जितिया व्रत भी कहते हैं। इस दिन माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और उज्जलव भविष्य के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। इस साल जितिया व्रत 18 सितंबर को पड़ा है। जानिए जीवित्पुत्रिका व्रत का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और पारण का समय। जीवित्पुत्रिका व्रत 2022 की सही तिथि हिंदू पंचांग के अनुसार, आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन जितिया व्रत रखा जाता है। इस बार अष्टमी तिथि 17 सितंबर को दोपहर 02 बजकर 14 मिनट से लेकर अगले दिन 18 सितंबर को शाम 04 बजकर 32 मिनट तक है। ऐसे में उदयातिथि 18 सितंबर को है। इसी कारण इस दिन ही व्रत रखा जाएगी और 19 सितंबर को व्रत का पारण किया जाएगा। 
जीवित्पुत्रिका व्रत का शुभ मुहूर्त सिद्धि योग- 18 सितंबर सुबह 06 बकर 34 मिनट तक अभिजीत मुहूर्त – सुबह 11 बजकर 51 मिनट से दोपहर 12 बजकर 40 मिनट तक जीवित्पुत्रिका व्रत का लाभ और अमृत मुहूर्त- सुबह 09 बजकर 11 मिनट से दोपहर 12 बजकर 15 मिनट तक उत्तम मुहूर्त- दोपहर 01 बजकर 47 मिनट से दोपहर 03 बजकर 19 मिनट तक जीवित्पुत्रिका व्रत पारण का समय 19 सितंबर को जीवित्पुत्रिका व्रत का पारण किया जाएगा। पारण का सबसे अमृत मुहूर्त- सुबह 06 बजकर 08 मिनट से 07 बजकर 40 मिनट तक है। पारण का शुभ उत्तम मुहूर्त- सुबह 09 बजकर 11 मिनट से सुबह 10 बजकर 43 मिनट तक जीवित्पुत्रिका व्रत 2022 की पूजा विधि इस दिन माताएं ब्रह्म मुहूर्त में उठकर सभी कामों से निवृत्त होकर स्नान आदि करके साफ-सूथरे वस्त्र धारण कर लें। इसके बाद व्रत का संकल्प लें और पारण करने तक निर्जला व्रत रखें। इसके बाद शाम के समय प्रदोष काल में जीमूतवाहन की मूर्ति कुश से बना लें। 
फिर एक जलपात्र में उसे स्थापित करें । इसके बाद उनको लाल और पीली रुई अर्पित करें। वंश की सुरक्षा एवं वृद्धि के लिए जीमूतवाहन को धूप, दीप, बांस के पत्ते, अक्षत, फूल, माला, सरसों का तेल और खल्ली अर्पित करें। अब गाय के गोबर और मिट्टी से मादा सियार और मादा चील की मूर्ति बनाएं। उनको सिंदूर, खीरा और भींगे हुए केराव चढाएं। चील और सियारिन को चूड़ा-दही भी अर्पित करें। इसके बाद चिल्हो-सियारो की कथा या गंधर्व राजकुमार जीमूतवाहन और पक्षीराज गरुड़ की कथा सुनें। फिर पूजा के अंत में आरती करें। पूजा मंत्र कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्। सदा बसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि।। अगले दिन प्रात: काल स्नान आदि करके दैनिक पूजा करें। फिर सूर्योदय के बाद पारण करके जितिया व्रत खोल लें।
 

K.W.N.S.-वैदिक ज्योतिष शास्त्र में शुक्र राशि परिवर्तन का विशेष महत्व है।शुक्र को सुख-संपदा, धन, ऐश्वर्य और वैभव आदि का कारक माना गया है। शुक्र ग्रह वृषभ और तुला राशि के स्वामी माने गए हैं। मीन इनकी उच्च राशि व कन्या नीच की राशि मानी गई है। शुक्रदेव 24 सितंबर को रात 08 बजकर 51 मिनट पर कन्या राशि में गोचर करेंगे। इस गोचर का कुछ राशियों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। जानें किन राशियों को होगा लाभ- वृषभ- शुक्र आपकी राशि के स्वामी हैं। ऐसे में शुक्र राशि परिवर्तन आपके लिए लाभकारी साबित होने वाला है। इस अवधि में पारिवारिक समस्याओं से मुक्ति मिलेगी। आर्थिक स्थिति में सुधार होगा। मान-सम्मान में वृद्धि होगी। अटके हुए धन की प्राप्ति हो सकती है। मिथुन- मिथुन राशि के स्वामी ग्रह बुध देव हैं। बुध और शुक्र ग्रह के बीच मित्रता का भाव है। ऐसे में मिथुन राशि वालों के लिए शुक्र राशि परिवर्तन लाभकारी रहने वाला है। इस दौरान धन लाभ के योग बनेंगे। पारिवारिक जीवन में सुख-शांति व खुशहाली रहेगी। यात्रा पर जाने के योग बनेंगे। कन्या- कन्या राशि वालों के लिए शुक्र गोचर शुभ साबित हो सकता है। इस दौरान कन्या राशि वालों को शुभ समाचार की प्राप्ति हो सकती है। आर्थिक जीवन में उन्नति मिल सकती है। लंबे समय से अटके धन की प्राप्ति हो सकती है। जीवन में चल रही परेशानियों से छुटकारा मिलेगा। आत्म-सम्मान में वृद्धि होगी।
 

K.W.N.S.-हिंदू धर्म में पीपल के पेड़ को पवित्र वृक्ष माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि पीपल के पेड़ की पूजा करने से शनि की साढ़े साती और ढैय्या से छुटकारा मिल जाता है। इसके साथ ही सभी देवी-देवताओं का आशीर्वाद मिलता है और अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। पीपल के वृक्ष में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का भी वास माना गया है इसलिए पीपल की पूजा करने से न केवल पुण्य की प्राप्ति होती है बल्कि पितरों का भी आशीर्वाद मिलता है। जानिए आखिर क्यों हिंदू धर्म में पीपल के पेड़ को पूजना शुभ माना जाता है। पुराणों में क्या है पीपल का महत्व? स्कंद पुराण में पीपल के पेड़ के बारे में बताया गया है कि आखिर वह इतना महत्वपूर्ण क्यों है। मूले विष्णु: स्थितो नित्यं स्कन्धे केशव एव च। नारायणस्तु शारवासु पत्रेषु भगवान् हरि:।। फलेऽच्युतो न सन्देह: सर्वदेवै: समन्व स एवं ष्णिुद्र्रुम एव मूर्तो महात्मभि: सेवितपुण्यमूल:। यस्याश्रय: पापसहस्त्रहन्ता भवेन्नृणां कामदुघो गुणाढ्य:।। इस श्लोक का अर्थ है कि पीपल के पेड़ की जड़ में विष्णु जी, तने में केशव, शाखओं में नारायण, पत्तों में भगवान हरि और फलों में सभी देवता निवास करते हैं। पीपल का वृक्ष भगवान विष्णु स्वरूप है। महात्मा इस वृक्ष की सेवा करते हैं और यह वृक्ष मनुष्यों के पापों को नष्ट करने वाला है। इसके साथ ही पीपल में पितरों और तीर्थों का निवास होता है। पीपल के पेड़ की पूजा करने से लाभ पितृदोष से मिलेगी मुक्ति पितरों का आशीर्वाद पाने के लिए रोजाना पीपल की जड़ में जल अर्पित करना लाभकारी होगा। इसके साथ ही पीपल के पौधे लगाना शुभ होगा। रोजाना पीपल के पेड़ की पूजा करने से पितृदोष से मुक्ति मिल जाती है। शनि दोष से मिलेगी मुक्ति शनिवार के दिन पीपल के पेड़ में जल चढ़ाने और तेल का दीपक जलाने से शनि की साढ़े साती और ढैय्या से भी छुटकारा मिल जाता है। इसके साथ ही पीपल के पेड़ की परिक्रमा जरूर करें। देवी-देवताओं का मिलता है आशीर्वाद रोजाना पीपल के पेड़ की पूजा करने से देवी-देवताओं का आशीर्वाद मिलता है। क्योंकि इस वृक्ष में सभी देवी-देवताओं का वास होता है। इसके साथ ही अक्षय पुष्ण की प्राप्ति होती है।
 

K.W.N.S.-ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जातक की जन्मकुंडली में किसी ग्रह के कमजोर होने पर परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे व्यक्ति को रत्नों के जानकार या कुंडली के अनुसार रत्न धारण करने की सलाह दी जाती है। मान्यता है कि रत्न धारण करने से जातक के जीवन की समस्याएं कम होती हैं। आज हम आपको बता रहे हैं एक ऐसे रत्न के बारे में जिसे धारण करने से नौकरी व व्यापार में आ रही परेशानियों से छुटकारा पाया जा सकता है- टाइगर रत्न करें धारण- रत्न ज्योतिष के अनुसार, नौकरी व व्यापार में दिक्कतों को दूर करने के लिए टाइगर रत्न पहनने की सलाह दी जाती है। इस रत्न को नौ रत्नों में शामिल नहीं किया गया है लेकिन नौकरी व व्यापार में इस रत्न के चमत्कारिक परिणाम देखने को मिलते हैं। कैसा होता है टाइगर रत्न- टाइगर रत्न पीले और काले रंग की धारियों वाला होता है। मान्यता है कि इसे सही ज्योतिषीय सलाह से धारण करने पर शुभ फलों की प्राप्ति होती है। किस अंगुली में करना चाहिए धारण- टाइगर रत्न को किसी भी महीने की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को तर्जनी या अनामिका अंगुली में धारण करना चाहिए। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, टाइगर रत्न करियर में शीघ्र तरक्की दिलाने में मदद करता है। व्यापारियों के व्यापार को गति मिलती है। मान्यता है कि जिन जातकों को यह रत्न सूट कर जाता है, उनका भाग्योदय होता है। इस रत्न को धारण करने से मान-सम्मान में भी वृद्धि होती है। टाइगर रत्न पहनने के लाभ- टाइगर स्टोन पहनने से लोगों का आत्मविश्वास ऊंचा होता है। जातक की जन्म कुंडली में सूर्य और चंद्रमा मजबूत होता है। कहा जाता है कि टाइगर रत्न सोमवार के दिन धारण करना शुभ होता है।