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वाल्मीकि जयंती हर साल आश्विन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है। इस साल वाल्मीकि जयंती 9 अक्टूबर के दिन मनाई जाएगी। ऋषि वाल्मीकि ने रामायण महाकाव्य की रचना की थी। वाल्मीकि जयंती के शुभ अवसर पर जगह- जगह झांकी निकाली जाती है।
इस साल पूर्णिमा तिथि 9 अक्टूबर को सुबह 3:00 बजकर 40 मिनट से प्रारंभ होकर 10 अक्टूबर सुबह 2:24 मिनट पर समाप्त होगी।
वाल्मीकि आश्रम
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जब श्रीराम ने माता सीता का त्याग कर दिया था। उसके बाद किसी वर्षों तक माता सीता ऋषि वाल्मीकि के आश्रम में रही थी। जहां उनके दोनों पुत्र लव और कुश ने जन्म लिया था।
डकैत से कैसे बने संत
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार रत्नाकर पहले वन में आने वाले लोगों को लूट कर अपना और अपने परिवार का भरण पोषण करता था। एक बार उसकी मुलाकात पृथ्वी पर भ्रमण करने के लिए आएं नारद मुनि से हुई। रत्नाकर ने नारद मुनि को लुटने के इरादे से पकड़ लिया। जिसे देखकर नारद मुनि ने पूछा ‘तुम यह क्या और क्यों कर रहे हो’ जवाब में रत्नाकर ने कहा- यह मेरी आय का स्रोत है। इसकी मदद से मैं अपने परिवार का भरण पोषण करता हूं। नारद मुनि ने उससे पूछा कि तुम्हें इसके परिणाम के बारे में पता है और क्या तुम्हारे परिवार के सदस्य इस दुष्परिणामों में तुम्हारी मदद करेंगे। जिसके जवाब में रत्नाकर ने बोला – क्यों नहीं वह मेरा परिवार है और वह मेरे साथ हमेशा खड़ा रहेगा। तभी नारद मुनि ने कहा – घर जाकर अपने परिवार के सदस्यों से उनके विचार जानने की कोशिश करो।
घर पंहुचने के बाद रत्नाकर ने परिवार के सभी सदस्यों से पूछा- क्या आप लोग मेरे दुष्कर्म में मेरा साथ देंगे। परिवार के सभी सदस्यों ने साथ देने से इंकार कर दिया।
जिसके बाद रत्नाकर को अपने बुरे कामों के प्रति बहुत ग्लानि महसूस हुई। जिसके बाद रत्नाकर ने सत्कर्म का मार्ग अपनाने का मन बना लिया।
कैसे पड़ा वाल्मीकि नाम
कहा जाता है कि ऋषि वाल्मीकि ने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए और अपने पापों की क्षमा याचना करने के लिए कठोर तप किया। बाल्मीकि अपने तक में इतने लीन थे। उन्हें इस बात का भी बोध नहीं हुआ कि उनके शरीर पर दीमक की मोटी परत जम चुकी है। जिसे देखकर ब्रह्मा जी ने रत्नाकर का नाम वाल्मीकि रखा दिया।

 
 K.W.N.S,-5 अक्टूबर बुधवार को देशभर में विजयदशमी पर्व बड़े ही धूमधाम से मनाया जाएगा। हिन्दू धर्म में इस दिन को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। इस दिन भगवान श्री राम ने लंकपति रावण का वध कर बुराई पर विजय प्राप्त किया है। तब से इस दिन को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। किवदंतियों के अनुसार इस दिन मां दुर्गा ने सृष्टि में हाहाकार मचा रहे महिषासुर राक्षस का वध किया था। धार्मिक दृष्टिकोण के साथ-साथ यह दिन ज्योतिष के लिहाज से भी बहुत महत्वपूर्ण है। ज्योतिष शास्त्र में कुछ ऐसे उपाय बताए गए हैं जिन्हें विजयदशमी पर्व पर करने से व्यक्ति के सभी दुःख-दर्द दूर हो जाते हैं। आइए जानते हैं विजयदशमी पर्व के दिन किन उपायों को करने से मिलता है व्यक्ति को लाभ। जरूर करें ये आसान उपाय धन-समृद्धि के लिए विजयदशमी पर्व के दिन शाम के समय माता लक्ष्मी का ध्यान करते हुए मंदिर में झाड़ू दान करें। इससे धन और समृद्धि में वृद्धि होती है। कोर्ट-कचहरी के मामलों से मुक्ति के लिए दशहरे के दिन कोर्ट-कचहरी के मामलों से छुटकारा पाने के लिए शमी के पेड़ के नीचे दीपक जलाएं। ऐसा करने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है। नौकरी-व्यापार में बरकत के लिए नौकरी-व्यापार में आ रही परेशानी को दूर करने के लिए ‘ॐ विजयायै नम:’ मंत्र का जाप करते हुए माता का पूजन कर उन्हें 10 फल अर्पित करें और फिर उन फलों को गरीबों में बांट दें। विजय के लिए प्राप्ति के लिए अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्ति के लिए विजयदशमी पर्व के दिन नीलकंठ पक्षी के दर्शन जरूर करें। ऐसा करने से कई प्रकार के दुःख दूर हो जाते हैं। कारोबार के लिए कारोबार में हो रहे घाटे को रोकने के लिए दशहरे के दिन एक नारियल सवा मीटर पीले वस्त्र में लपेटकर एक जोड़ा जनेऊ, सवा पाव मिष्ठान्न के साथ अपने घर पास बने मंदिर में दान कर दें। आर्थिक वृद्धि के लिए आर्थिक वृद्धि के लिए दशहरे का दिन सबसे उपयोगी माना जाता है। इस दिन से 43 दिनों तक कुत्ते को प्रतिदिन बेसन के लड्डू खिलाने से लाभ मिलता है। संकटों से मुक्ति के लिए भविष्य में आने वाली सभी प्रकार के संकट और परेशानियों से मुक्ति के लिए विजयदशमी के दिन सुंदरकांड का पाठ जरूर करें।
 

 
K.W.N.S.-शारदीय नवरात्रि का आज नवां दिन है। आज मां दुर्गा के नवें स्वरूप मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाएगी। मान्यता है कि माता सिद्धिदात्री की पूजा करने से व्यक्ति को सभी सांसारिक सुखों की प्राप्ति होती है। साथ ही उसे ज्ञान, बुद्धि, धन, ऐश्वर्य इत्यादि सभी सुख-सुविधाओं की भी प्राप्ति होती है। कई लोग नवरात्र पर्व की नवमी तिथि को कन्या पूजन करके 9 दिनों से चले आ रहे व्रत का पारण करते हैं। इस दिन हवन व आरती से इस विशेष पर्व का समापन करते हैं। आइए जानते हैं माता सिद्धिदात्री का स्वरूप पूजा विधि, मंत्र और आरती। माता सिद्धिदात्री का स्वरूप पुराणों के अनुसार माता सिद्धिदात्री मां लक्ष्मी की ही भांति कमल पर विराजमान रहती हैं और माता के चार भुजाएं हैं जिनमें से प्रत्येक भुजा में शंख, चक्र और कमल का फूल विराजमान है। शास्त्रों के अनुसार माता सिद्धिदात्री सभी आठ सिद्धियों की देवी है जिन्हें अणिमा, ईशित्व, वशित्व, लघिमा, गरिमा, प्राकाम्य, महिमा और प्राप्ति के नाम से जाना जाता है। माता सिद्धिदात्री की पूजा करने से इन सभी सिद्धियों की प्राप्ति होती है।
 काल में करें माता सिद्धिदात्री की विशेष आरती और इस स्तोत्र का जाप मां सिद्धिदात्री की पूजा विधि मां सिद्धिदात्री की पूजा करने से पहले ब्रह्म मुहूर्त में स्नान-ध्यान करके पूजा स्थल की साफ सफाई करें। इसके बाद पूजा स्थल को गंगाजल से सिक्त करें। फिर मां सिद्धिदात्री को फूल, माला, सिंदूर, गंध, अक्षत इत्यादि अर्पित करें। साथ ही तिल और उससे बनी चीजों का भोग लगाएं। इस दिन आप मालपुआ, खीर, हलवा, नारियल इत्यादि भी माता को अर्पित कर सकते हैं। इसके बाद माता सिद्धिदात्री स्तोत्र का पाठ करें और धूप दीप जलाकर माता की आरती करें। आरती से पूर्व दुर्गा सप्तशती और दुर्गा चालीसा का पाठ करना ना भूले। कन्या पूजन और हवन नवरात्र महापर्व के अंतिम दिन माता को विदाई देते समय कन्या पूजन और हवन करने का विधान शास्त्रों में वर्णित किया गया है। 
मान्यता है कि हवन करने के बाद ही व्रत का फल प्राप्त होता है। इसलिए माता दुर्गा की पूजा के बाद हवन जरूर करें। ऐसा करने से सभी दुख-दर्द दूर हो जाते हैं और माता सिद्धिदात्री की कृपा सदैव अपने भक्तों पर बनी रहती है। करें इन मंत्रों का जाप * ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे । * ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा ।। * वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम् । कमलस्थितां चतुर्भुजा सिद्धीदात्री यशस्वनीम् ।। * या देवी सर्वभूतेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।
 

K.W.N.S.-देशभर में दुर्गा पूजा और नवरात्रि पर्व की धूम मची है आज यानी 3 अक्टूबर दिन सोमवार को शारदीय नवरात्रि का आठवां दिन है जो देवी दुर्गा के आठवें स्वरूप की पूजा आराधना को समर्पित है धार्मिक तौर पर नवरात्रि पर्व की अष्टमी और नवमी तिथि को बेहद ही शुभ और महत्वपूर्ण माना जाता है इन दो दिनों में माता रानी की विधिवत पूजा, जप, अनुष्ठान, सेवा, उपाय आदि करने से जीवन में खुशहाली आती है और परेशानियों व कष्टों का अंत हो जाता है ऐसे में आज दुर्गा अष्टमी के शुभ दिन पर मां महागौरी की पूजा कर कई भक्त नवरात्रि व्रत का पारण करते हैं मान्यता है कि आज के दिन अगर कुछ कार्यों को पूरी निष्ठा के साथ किया जाए तो भक्तों को नवरात्रि के नौ दिनों का अनंत फल देवी मां प्रदान करती है, तो आज हम आपको उन्हीं कार्यों के बारे में बता रहे हैं तो आइए जानते हैं। 
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नवरात्रि की अष्टमी पर संधिकाल पूजन को फलदायी मान गया है अष्टमी समाप्त होने के अंतिम 24 मिनट और नवमी तिथि के आरंभ होने के शुरुआती 24 मिनट को संधिक काल कहा जाता है इस समय माता रानी की पूजा करना शुभ होता है इस दौरान कि जाने वाली आराधना व साधना से माता बहुत प्रसन्न होती है। संधि पूजा का मुहूर्त— शाम 4 बजकर 13 मिनट से शाम 5 बजकर 1 मिनट तक ऐसा कहा जाता है कि महाष्टमी पर कन्या पूजन जरूर करें आज के दिन नौ कन्याओं का पूजन करने से व्रत पूर्ण होता है इस दिन नौ कन्याओं के साथ एक बटुक बालक को भी आमंत्रण दें और उनकी पूजा करने के बाद उन्हें माता का प्रिय भोग खिलाएं ऐसा करना शुभ माना जाता है। अगर आप आज अष्टमी पर व्रत पारण कर रहे हैं तो इस दिन देवी मां के समक्ष हवन जरूर करें वरना नवरात्रि व्रत का कोई फल प्राप्त नहीं होगा। नवरात्रि की अष्टमी पर देवी मां को लाल चुनरी और पांच तरह के फल, मिठाई और एक सिक्का रखकर जरूर अर्पित करें ऐसा करने से माता प्रसन्न होकर शुभ समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करती है।
 

 
K.W.N.S.-आज नवरात्र का सातवां दिन है। इसे महासप्तमी के नाम से भी जाना जाता है। आज के दिन मां दुर्गा के सातवें स्वरूप मां कालरात्रि की पूजा की जाती है। माना जाता है कि इस दिन इनकी पूजा करने वाले साधक का मन सहस्रार चक्र में स्थित होता है। मां कालरात्रि को यंत्र, मंत्र और तंत्र की देवी कहा जाता है। क्यों कहा जाता है कालरात्रि अब आपको बताएंगे कि आखिर मां का नाम काली क्यो पड़ा। भगवान शंकर ने एक बार देवी को काली कह दिया था, तभी से इनका एक नाम काली भी पड़ गया। इनके नाम के उच्चारण से ही भूत, प्रेत, राक्षस, दानव और सभी पैशाचिक शक्तियां भाग जाती हैं। 
मां कालरात्रि का स्वरूप काला है, लेकिन यह सदैव शुभ फल देने वाली हैं। इनके नाम से ही जाहिर है कि इनका रूप भयानक है। गले में विद्युत की तरह चमकने वाली माला है। अंधकारमय स्थितियों का विनाश करने वाली शक्ति हैं कालरात्रि। इस देवी के तीन नेत्र हैं । ये तीनों ही नेत्र ब्रह्मांड के समान गोल हैं। इनकी सांसों से अग्नि निकलती रहती है। ये गर्दभ की सवारी करती हैं। ऊपर उठे हुए दाहिने हाथ की वर मुद्रा भक्तों को वर देती है। दाहिनी ही तरफ का नीचे वाला हाथ अभय मुद्रा में है। यानी भक्तों हमेशा निडर, निर्भय रहो। बाईं तरफ के ऊपर वाले हाथ में लोहे का कांटा तथा नीचे वाले हाथ में खड्ग है। इनका रूप भले ही भयंकर हो लेकिन ये सदैव शुभ फल देने वाली मां हैं। इसीलिए इन्हें शुभकारी भी कहा जाता है। कालरात्रि की उपासना करने से ब्रह्मांड की सारी सिद्धियों के दरवाजे खुलने लगते हैं और तमाम असुरी शक्तियां उनके नाम के उच्चारण से ही भयभीत होकर दूर भागने लगती हैं।
 ऐसे करें मां कालरात्रि की पूजा? मां कालरात्रि की पूजा सुबह चार से 6 बजे तक करनी चाहिए। मां की पूजा के लिए लाल रंग के कपड़े पहनने चाहिए। माता काली को गुड़हल का पुष्प अर्पित करना चाहिए। कलश पूजन करने के उपरांत माता के समक्ष दीपक जलाकर रोली, अक्षत से तिलक कर पूजन करना चाहिए और मां काली का ध्यान कर वंदना श्लोक का उच्चारण करना चाहिए| पाठ समापन के पश्चात माता को गुड़ का भोग भी लगा सकते है या ब्राह्मण को गुड़ दान कर सकते हैं।
 

 
K.W.N.S.-नवरात्रि के महापर्व पर पूरा देश शक्ति की उपासना में डूबा हुआ है. नवरात्रि का छठा दिन मां कात्यायनी की आराधना का दिन होता है. नवरात्रि  का हर दिन श्रद्धा, भक्ति और आस्था की लहरें भक्ति रस के समंदर में उमड़ रहा है. श्रद्धालु मां की भक्ति में डूबे हुए हैं. लोगों के घर से लेकर मंदिरों तक मां के जयकारें सुनाई दे रहे हैं. श्रद्धालु माता के दर्शन कर मंगल कामना कर रहे हैं. ऐसे में हम आपको मां कात्‍यायनी की पूजा के बारे में बता रहे हैं. जो लोग अविवाहित है, उन्‍हें मां कात्‍यायनी की पूजा किस तरह करनी चाहिए ये अवश्‍य जान लीजिए. छठे दिन मां कात्यायनी की आराधना आज शारदीय नवरात्रि का छठा दिन है. नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की आराधना की जाती है. शास्त्रों के मुताबिक, कत नामक प्रसिद्ध महर्षि के कुल में ऋषि कात्यायन भगवती मां के सबसे बड़े उपासक थे।
 उन्होंने मां भगवती को प्रसन्न करने के लिए कई सालों तक घोर तपस्या की थी. कात्यायनी देवी नाम क्‍यों पड़ा? जब मां भगवती उनकी तपस्या से खुश होकर उनके सामने प्रकट हुई तो उन्होंने अपनी इच्छा जाहिर करते हुए मां भगवती को अपने घर में पुत्री के रूप में जन्म लेने को कहा. मां भगवती ने उनकी यह प्रार्थना को स्वीकार कर लिया और उनके यहां पुत्री के रूप में जन्म लिया. आपको बता दें कि कात्यायन ऋषि के घर पर जन्म होने की वजह से इनका नाम कात्यायनी पड़ गया. इस कारण देवी का यह स्वरूप कात्यायनी कहलाया. ज्योतिष का क्या कहना है? ज्योतिष बताते हैं कि मां कात्यायनी जी की पूजा करने से भक्त के भीतर अद्भुत शक्ति का संचार होता है. जन्मों के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।
 इनकी उपासना करने से परम पद की प्राप्ति होती है. मां कात्यायनी की भक्ति से लोगों को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है. विवाह का योग बनेगा मां कात्यायनी का स्वरूप बहुत ही दिव्य और सिंह की सवारी और चार भुजाओं वाला होता है. उनके बाएं हाथ कमल, तलवार और दाएं हाथ स्वस्तिक और आशीर्वाद की मुद्रा में होता है. आपको उपवास करने के बाद मां को शहद का भोग लगाना होगा. आपको बता दें कि अविवाहित कन्याएं अगर गुरुवार को मां कात्यायनी देवी की पूजा करती हैं तो उनके विवाह (Marriage) का योग जल्दी बन जाता है. अगर कन्याओं की शादी में देरी हो रही हो तो उन्‍हें मां कात्यायनी देवी के मंत्र का जप करना चाहिए।
 

 K.W.N.S.-आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि के दिन के साथ शारदीय नवरात्र का पांचवा दिन है। नवरात्र के पांचवें दिन मां दुर्गा के स्वरूप मां स्कंदमाता की पूजा अर्चना की जाती है। माना जाता है कि स्कंदमाता की विधिवत पूजा करने से सुख-समृद्धि के साथ-साथ संतान प्राप्ति होती है। जानिए नवरात्र के पांचवें दिन कैसे करें स्कंदमाता की पूजा, साथ ही जानिए शुभ मुहूर्त, भोग और मंत्र। नवरात्र की पंचमी तिथि का शुभ मुहूर्त आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि आरंभ- सुबह 12 बजकर 10 मिनट से शुरू आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि समाप्त- रात 10 बजकर 34 मिनट तक अभिजीत मुहूर्त- सुबह 11 बजकर 47 मिनट से 12 बजकर 35 मिनट तक राहुकाल- सुबह 10 बजकर 42 मिनट तक दोपहर 12 बजकर 11 मिनट तक कैसा है मां स्कंदमाता का स्वरूप स्कंदमाता की स्वरूप काफी प्यारा है। मां दुर्गा की स्वरूप स्कंदमाता की चार भुजाएं हैं, जिसमें दो हाथों में कमल लिए हैं, एक हाथ में कार्तिकेय बाल रूप में बैठे हुए हैं और एक अन्य हाथ में मां आशीर्वाद देते हुए नजर आ रही हैं। बता दें कि मां का वाहन सिंह है, लेकिन वह इस रूप में कमल में विराजमान है। स्कंदमाता का पूजा विधि नवरात्रि के पांचवें दिन मां दुर्गा की पूजा करने से पहले कलश की पूजा करें। इसके बाद मां दुर्गा और उनके स्वरूप की पूजा आरंभ करें। सबसे पहले जल से आचमन करें। इसके बाद मां को फूल, माला चढ़ाएं। इसके बाद सिंदूर, कुमकुम, अक्षत आदि लगाएं। फिर एक पान में सुपारी, इलायची, बताशा और लौंग रखकर चढ़ा दें। इसके बाद मां स्कंदमाता को भोग में फल में केला और इसके अलावा मिठाई चढ़ा दें। इसके बाद जल अर्पित कर दें। इसके बाद घी का दीपक, धूप जलाकर मां के मंत्र का जाप करें। इसके बाद दुर्गा चालीसा, दुर्गा सप्तशती का पाठ करें और अंत में दुर्गा मां के साथ स्कंदमाता की आरती करें।
 

 K.W.N.S.-नवरात्र के चौथे दिन मां दुर्गा के चौथे स्वरूप मां दुर्गा के चौथे स्वरूप मां कूष्मांडा देवी की पूजा की जाती है। माना जाता है कि मां कूष्मांडा देवी की पूजा करने से हर तरह के दुखों से छुटकारा मिल सकता है और धन संपदा की प्राप्ति होती है। अष्टभुजा वाली मां कूष्मांडा को लाल रंग काफी प्रिय है। इसलिए आज के लिए मां के चरणों में गुड़हल का फूल अवश्य चढ़ाएं। इसके साथ ही माता की पूजा करने के साथ दुर्गा चालीसा, दुर्गा सप्तशती का पाठ करने के साथ स्तुति मंत्र और आरती जरूर पढ़ लें। मां कूष्मांडा की स्तुति मंत्र या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ मां कूष्मांडा की प्रार्थना सुरासम्पूर्ण कलशं रुधिराप्लुतमेव च। दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥ मां कूष्मांडा बीज मंत्र ऐं ह्री देव्यै नम: मां ​कूष्मांडा की आरती (Maa Kushmanda Ki Aarti) कूष्मांडा जय जग सुखदानी। मुझ पर दया करो महारानी॥ पिगंला ज्वालामुखी निराली। शाकंबरी मां भोली भाली॥ लाखों नाम निराले तेरे। भक्त कई मतवाले तेरे॥ भीमा पर्वत पर है डेरा। स्वीकारो प्रणाम ये मेरा॥ सबकी सुनती हो जगदम्बे। सुख पहुंचती हो मां अम्बे॥ तेरे दर्शन का मैं प्यासा। पूर्ण कर दो मेरी आशा॥ मां के मन में ममता भारी। क्यों ना सुनेगी अरज हमारी॥ तेरे दर पर किया है डेरा। दूर करो मां संकट मेरा॥ मेरे कारज पूरे कर दो। मेरे तुम भंडारे भर दो॥ तेरा दास तुझे ही ध्याए। भक्त तेरे दर शीश झुकाए॥
 

K.W.N.S.-नवरात्रि के नौ दिवस हम माता के विभिन्न स्वरूपों की स्तुति करते है, उन्हीं में नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना का विधान है। नाम के अनुरूप मां का यह रूप हमें श्रेष्ठ आचरण की प्रेरणा देता है, अर्थात् चरित्रवान बनने पर बल देता है क्योंकि चरित्र की प्रबलता कभी भी हमें पतन के मार्ग की ओर नहीं ले जाती। ब्रह्मचारिणी माँ का वह स्वरूप दर्शाता है जो ब्रह्म में स्थित होकर आचरण करती है। यह स्वरूप हमें भी ब्रह्म का ध्यान करते हुए आचरण करने की शिक्षा देता है। 
मां ब्रह्मचारिणी तप की शक्ति पर बल देती है। वह जीवन में सादगी, सदाचार, सात्विकता एवं संयम के महत्व को उजागर करती है। तप की शक्ति जीवन में भटकाव को कम करती है और हमें सद्चरित्र बनाती है। माँ का यह विशिष्ट स्वरूप हमें दिव्य अनुभूति और असीमित ऊर्जा भी प्रदान करता है। अतः हम दु:ख की अनुभूति से दूर होकर ध्यानमग्न अवस्था में आनंद का अनुभव करते है। मां ब्रह्मचारिणी का स्वभाव सत, चित और आनंद प्रदान करना है। यदि जीवन में आचरण का अनुशासन हो तो वह हमें सफलता प्रदान करता है।
 संकल्प की दृढ़ता तो हमने प्रथम दिवस में ही माँ शैलपुत्री से प्राप्त कर ली। ध्यानमग्न होना हमारी एकाग्रता को भी बढ़ाता है और हमें जीवन में सफलता के उच्चतम स्तर पर ले जाता है। मां के हाथों में कमण्डल और जप की माला दिखाई देती है। नवरात्रि में देवी भगवती के लिए किया गया हवन हमारे शरीर को उत्तम स्वास्थ्य भी प्रदान करता है। हवन से उठने वाला धुआं हमें रोगाणु, विषाणु एवं किटाणु से मुक्त करता है। विभिन्न सामग्रियों की आहुती हमारे घर का वातावरण शुद्ध बनाती है। व्रत का विधान हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ाता है। अतः मां की आराधना हमें शरीर और मन की निर्मलता एवं शुद्धता भी प्रदान करती है। इन त्यौहारों में निहित आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक पक्षों को भी समझने का प्रयास करें। मां का अन्तर्मन से ध्यान करने का प्रयास करें जिससे जीवन में कार्यों का परिणामों में परिवर्तन निश्चित हो। अतः भावों की माला से मां के ब्रह्मचारिणी स्वरूप का ध्यान करें।
 

 
K.W.N.S.-नवरात्रि दिवस 1 अवतार शैलपुत्री पूजा, प्रसादम: यह नवरात्रि है… नवरात्रि का पहला दिन 26 सितंबर को शुरू हुआ और त्योहार 5 अक्टूबर को समाप्त होता है। नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। “शैल” का अर्थ है पर्वत और “पुत्री” का अर्थ है बेटी और शैलपुत्री का अर्थ है पहाड़ों की बेटी। देवी शैलपुत्री को मूल चक्र या मूलाधार चक्र की देवी माना जाता है। पूजा के लिए शुभ मुहूर्त: कलश स्थापना या घटस्थापना के लिए शुभ मुहूर्त सुबह 06:11 बजे से 07:51 बजे तक और घटस्थापना अभिजीत मुहूर्त 11:48 पूर्वाह्न से 12:36 बजे तक है। नवरात्रि 2022 प्रतिपदा तिथि 26 सितंबर, 2022 को सुबह 03:23 बजे शुरू होती है और 27 सितंबर, 2022 को 03:08 बजे समाप्त होती है। शैलपुत्री पूजा विधानम: सबसे पहले भगवान गणेश की पूजा करें और घी या सरसों या तिल के तेल से दीपक जलाकर वेदी पर रखें। शैलपुत्री मंत्रों का जाप करें मां शैलपुत्री पूजा मंत्र: Om देवी शैलपुत्र्यै नमः वंदे वंचितलभय चंद्राधाकृतशेखरम। वृषरुधम शुलधरम शैलपुत्रिम यशस्विनीम्॥ मां शैलपुत्री ध्यान मंत्र: या देवी सर्वभूटेशु माँ शैलपुत्री रूपेना संस्था। नमस्तास्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः शैलपुत्री आरती गीत: शैलपुत्री मां जमानत पर सवार, करे देवता जयजयकार शिव शंकर की प्रिया भवानी, तेरी महिमा किसने न जानी पार्वती तू उमा कहलावे, जो तुझे सिमरे सो सुख पावे रिद्धि सिद्धि परवन करे तू, दया करे धनवान करे तू सोमवार को शिव संग प्यारी, आरती तेरी जिसे उतरी उसकी सागर आस पूजा दो, सागर दुख तकलीफ मिला दो घी का सुंदर गहरा जलके, गोला गरी का भोग लगाके श्रद्धा भाव से मंत्र गए, प्रेम साहित्य फिर शीश झुके जय गिरिराज किशोरी अम्बे, शिवमुख चंद्र चकोरी अम्बे मनोकामना पूर्ण केरी दो, भक्त सदा सुख संपदा भर दो। पहनने के लिए रंग और नैवेद्यम: सफेद रंग के कपड़े पहनना शुभ होता है। नवरात्रि के पहले दिन देसी घी से प्रसाद बनाएं।