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ज्योतिष के अनुसार ग्रहण को अशुभ घटना माना गया है. अतः इस दौरान किसी भी प्रकार के शुभ और मांगलिक कार्यों को करने से मना किया जाता है. इस दिन मंदिरों में पूजा भी करने की मनाही है. लेकिन ग्रहण के दौरान एक स्थान पर बैठकर भगवान का स्मरण और मंत्र जाप करने से कई गुना ज्यादा फल की प्राप्ति होती है. वहीं, शास्त्रों में इस दौरान बहुत सी ऐसी चीजों के बारे में बताया गया है, जिन्हें करने से परहेज किया जाता है. चंद्र ग्रहण का सूतक काल 9 घंटे पहले शुरू हो जाता है. ऐसे में ग्रहण के साथ ज्योतिष में सूतक काल में भी बहुत-सी चीजों को न करने की सलाह दी गई है. अगर इस दौरान जरा-सी लापरवाही की जाए, तो व्यक्ति को लेने के देने पड़ सकते हैं. 
कल 8 नवंबर को पूर्णिमा तिथि पर साल का आखिरी चंद्र ग्रहण लगने जा रहा है. इसका सूतक सुबह से ही शुरू हो जाएगा और ग्रहण के समाप्त होने तक रहेगा. आइए जानते हैं सूतक के दौरान किन कार्यों को नहीं करना चाहिए. ग्रहण के समय क्या करना चाहिए – खग्रास चंद्र ग्रहण के दौरान पूजा-पाठ, दान और जाप आदि का विशेष महत्व होता है. इस दिन पवित्र नदियों या सरोवरों में स्नान करना लाभदायी होता है. मंत्रों का जाप किया जाता है. इस समय मंत्र जाप से जल्द सिद्धि प्राप्त होती है. – इस दौरान धर्म से जुड़े लोगों को अपनी राशि के अनुसार या किसी योग्य ब्रह्माण से सलाह लेकर दान करना चाहिए. इस दिन गरीबों और जरूरतमंदों की ज्यादा से ज्यादा मदद करनी चाहिए. सूतक में न करें ये कार्य – ज्योतिष शास्त्र में कहा गया है कि ग्रहण के समय या सूतक के समय भगवान की मूर्ति को भूलकर भी स्पर्श नहीं करना चाहिए. – इस दौरान खाना-पीना, सोना, नाखून काटना, भोजन बनाना, तेल लगाना आदि कार्य करने से भी मना किया जाता है. – सूतक काल में किसी से झूठ बोलना, छल-कपट, बेकार का वार्तालाप और मूत्र विसर्जन आदि से भी परहेज करने की सलाह दी जाती है. – कहते हैं कि सूतक शुरू होने से पहले ही आचार, मुरब्बा, दूध, दही और अन्य खाद्य पदार्थों में कुशा तृण डाल दें, जिससे ये दूषित न हों. कुशा न होने पर तुलसी का पत्ता भी डाला जा सकता है. – कहते हैं कि सूतक के दौरान की गर्भवती महिलाएं पेट पर गोबर का लेप कर लें. इस दौरान चाकू, सुई आदि से कोई कार्य न करें. इस दौरान टहलने और सोने से भी परहेज करें.
 

 
 K.W.N.S.-देव दीपावली का पर्व कार्तिक मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन शिव की नगरी काशी में अलग ही रौनक देखने को मिलती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन देवता धरती पर दीपावली मनाने आते हैं। घाटों के शहर बनारस इस दिन दीपक की रोशनी से जगमगा उठता है। कहा जाता है कि दीयों की रोशनी से देवता धरती की ओर आकर्षित होते हैं। देव दीपावली के दिन दीपदान का विशेष महत्व है। इस दिन प्रातः काल उठकर गंगा में स्नान करना चाहिए। जिसके बाद सूर्य को जल अर्पित करें। 
इस दिन भगवान शिव और विष्णु की पूजा करना बेहद शुभ माना जाता है। भक्तगण दूर- दूर से गंगा स्नान करने और काशी की देव दीपावली देखने के लिए आते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन प्रदोष काल में गंगा में दीपदान करने से व्यक्ति को शत्रुओं का भय नहीं रहता। ऐसा करने से जीवन मे सुख- समृद्धि और परिवार में खुशहाली बनी रहती है। देव दीपावली के दिन सभी देवताओं और अपने इष्ट देव को याद कर दीए पर कुमकुम, हल्दी और पुष्प अर्पित करें। प्रदोष काल में 11, 21, 51 या 101 आटे के दिए बनाकर नदी में दीपदान करें।
 

 
K.W.N.S.-हिंदू धर्म में माता लक्ष्मी को धन वैभव और सुख समृद्धि की देवी माना गया है इनकी पूजा अर्चना करने से खुशहाली और धन प्राप्ति की इच्छा पूर्ण होती है ऐसे में हर कोई चाहता है कि उस पर माता लक्ष्मी की कृपा हमेशा बनी रहे और घर में कभी भी धन की कमी न हो। इसके लिए लोग खूब प्रयास भी करते हैं अगर आप भी चाहते हैं कि माता लक्ष्मी हमेशा आपसे प्रसन्न रहे तो इसके लिए पूजा पाठ के साथ साथ कुछ उपायों को भी करना जरूरी है धार्मिक शास्त्रों में कुछ ऐसे काम बताए गए है जिन्हें रोजाना सुबह उठकर करने से माता लक्ष्मी प्रसन्न होकर अपनी कृपा बरसाती है तो आज हम आपको अपने इस लेख द्वारा उन्हीं कार्यों के बारे में बता रहे हैं तो आइए जानते हैं। धार्मिक तौर पर तुलसी को बेहद पवित्र और शुभ माना जाता है यह माता लक्ष्मी का ही रूप है श्री हरि विष्णु को भी तुलसी बेहद प्रिय है ऐसे में तुलसी जी की पूजा करने से धन की देवी प्रसन्न हेती है अगर कोई रोजाना सुबह उठकर तुलसी जी को जल अर्पित करें तो उसके जीवन के तमाम कष्टों का अंत हो सकता है और मां लक्ष्मी की कृपा से धन संकट भी दूर हो जाता है। रोजाना तुलसी जी को जल अर्पित करते वक्त इस मंत्र का जाप करें महाप्रसाद जननी, सर्व सौभाग्यवर्धिनी, आधि व्याधि हरा नित्यं, तुलसी त्वं नमोस्तुते। इसका जाप अपने जीवन के सभी कष्टों को दूर कर सकता है इसके जाप मात्र से सौभाग्य, संतान सुख, कारोबर में तरक्की, सुखी दांपत्य जीवन का आशीर्वाद मिलता है। रोजाना प्रदोष काल में शाम के वक्त तुलसी जी की पूजा करने के बाद नीचे घी का दीपक जलाना भी अच्छा माना जता है ऐसा करने से कार्यों में सफलता मिलती है और लक्ष्मी जी भी प्रसन्न हो जाती है। तुलसी पूजन के बाद जिस लोटे से आप जल चढ़ा रही है उसमें थोड़ा जल बचाकर तुलसी के पत्ते डलकर इससे पूरे घर में छिड़काव करें मान्यता है ऐसा करने से घर में बरकत बनी रहती है और नकारात्मकता का भी प्रवेश नहीं होता है।
 

 
K.W.N.S.-सनातन धर्म में 4 युगों के बारे में बारे में वर्णन किया गया है. इसमें पहला सत्य युग, दूसरा द्वापर युग, तीसरा त्रेता युग और चौथा कलयुग  है. फिलहाल चौथा और अंतिम कलयुग चल रहा है. कलयुग को चारों युगों में सबसे निकृष्ट माना गया है. इस युग में सत्य और धर्म की काफी हानि होगी और अनाचार चरम पर पहुंच जाएगा. इस दौर में मानवता की रक्षा के लिए भगवान विष्णु  कल्कि अवतार  के रूप में सामने आएंगे. आज आपको बताते हैं कि कलयुग के कितने साल बीत चुके हैं और इस युग का अंत कब होगा. कलयुग खत्म होने में अभी इतने वर्ष बाकी पुराणों के मुताबिक पृथ्वी पर कलयुग  का इतिहास 4 लाख 32 हजार वर्षों का होगा. कलयुग का आरंभ तब हुआ था, जब मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि ग्रह मेष राशि पर जीरो डिग्री पर हो गए थे. आधुनिक काल गणना के अनुसार, यह समय वर्ष 3102 ईसा पूर्व का था. ईसा मसीह के जन्म के बाद 2022 साल और बीत चुके हैं. यानी कि कलयुग शुरू हुए अब तक 5124 वर्ष गुजर चुके हैं. 
ऐसे में अगर 4 लाख 32 हजार वर्षों में से 5124 वर्ष घटाएं तो 4,26,876 वर्ष शेष बच जाते हैं. दूसरे शब्दों में आप कह सकते हैं कि कलयुग खत्म होने में अभी काफी लंबा समय बाकी है और तब तक दुनिया वालों को काफी कुछ देना पड़ सकता है. महर्षि वेदव्यास पहले ही कर चुके हैं भविष्यवाणी दुनिया का सबसे बड़ा महाकाव्य महाभारत लिखने वाले महर्षि वेदव्‍यास ने हजारों साल पहले ही कलयुग (Kalyug) के बारे में अहम भविष्‍यवाणी कर दी थी. महर्षि वेदव्यास के मुताबिक, जैसे-जैसे कलयुग (Kalyug) आगे बढ़ेगा, पृथ्वी पर अनाचार और अत्याचारों में बढ़ोतरी होती चली जाएगी. राजा लोग शूद्र तुल्य होते चले जाएंगे और ब्राह्मणों में संस्कारों का नाश हो जाएगा. राष्ट्र में अधीरता बढ़ेगी और वीरता-संपन्नता खत्म हो जाएगी. शिष्य अपने गुरुओं का पालन नहीं करेंगे. विवाह को संस्कार नहीं माना जाएगा. लोग वेदों का पालन नहीं करेंगे. हत्या-लूट की घटनाएं बढ़ेंगी. वर्ण और आश्रम की पद्धतियां खत्म हो जाएंगी. 
भगवान विष्णु लेंगे कल्कि अवतार जब दुनिया में अत्याचार-अनाचार चरम पर पहुंच जाएंगे और जनता त्राहि-त्राहि कर रही होगी, तब मानवता की रक्षा के लिए भगवान विष्णु (Lord Vishnu) एक बार फिर पृथ्वी पर अवतार लेंगे. वे कलयुग (Kalyug) में कल्कि अवतार के रूप में सामने आएंगे और सफेद घोड़े पर सवार होकर असुर रूप धारी बुरे लोगों का संहार करके दुनिया से भय-आतंक को खत्म करेंगे. जिससे दुनिया में फिर से सत्य युग की स्थापना होगी. हालांकि भगवान विष्णु के इस अवतार में अभी कई हजार वर्षों का समय बाकी है. इसके बावजूद आमजन में अभी से कल्कि अवतार (Kalki Avatar) की चर्चा, उनकी पूजा और आरती होती रहती है.
 

 
K.W.N.S.-नवंबर महीने में कई ग्रहों का राशि परिवर्तन होना है। यही कारण है कि इस महीने को ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति के लिहाज से खास माना जा रहा है। नवंबर में कई बड़े ग्रह एक साथ राशि परिवर्तन करने जा रहे हैं। बुध व मंगल ग्रह का राशि परिवर्तन एक ही दिन में हो रहा है। इन दोनों ग्रहों का प्रभाव कुछ राशियों पर शुभ साबित हो सकता है। 13 नवंबर 2022 को मंगल वृषभ राशि और बुध वृश्चिक राशि में प्रवेश करेंगे। 
जानें मंगल व बुध के राशि परिवर्तन से किन राशियों की चमकेगी किस्मत-
 1. वृषभ- नवंबर महीने में मंगल और बुध ग्रह के राशि परिवर्तन से वृषभ राशि वालों को लाभ होगा। बुध आपकी राशि के दूसरे व पांचवें भाव और मंगल सातवें और बाहरवें भाव के स्वामी हैं। बुध देव के प्रभाव से आपको करियर में जबरदस्त लाभ मिलेगा। व्यापारियों को मुनाफा होगा। अविवाहितों का विवाह तय हो सकता है। 
2. कर्क- कर्क राशि वालों के लिए बुध व मंगल का राशि परिवर्तन विशेष लाभकारी रहने वाला है। छात्रों के लिए यह समय शुभ रहने वाला है। इस अवधि में आपको आर्थिक उन्नति मिल सकती है। मनमुताबिक फलों की प्राप्ति होगी।
 3. सिंह- सिंह राशि वालों के लिए ग्रहों का गोचर शुभ रहने वाला है। आपकी राशि के नौवें और त्रिकोण भाव में मंगल गोचर करने जा रहे हैं। वहीं बुध दूसरे व एकादश भाव के स्वामी हैं। इस समय आप नए वाहन खरीद सकते हैं। करियर में नए अवसरों की प्राप्ति हो सकती है। 
4. धनु- धनु राशि वालों को इस अवधि में यात्रा पर जाना पड़ सकता है। बुध गोचर से व्यापारियों को लाभ होगा। करियर में सफलता हासिल होगी। इस अवधि में शत्रु आपको नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन आपका कुछ बिगाड़ नहीं पाएंगे। 
5. मकर- मकर राशि के लिए मंगल चौथे व एकादश भाव के स्वामी हैं। बुध छठवें व नौवें भाव के स्वामी हैं। इस अवधि में शोध कार्यों में जुड़े लोगों को सफलता हासिल हो सकती है। मेहनत का पूरा फल मिलेगा। छात्रों के लिए यह समय बेहद लाभकारी रहने वाला है।
 

 
K.W.N.S.-महाभारत काल के पितामह भीष्म के नाम पर मनाए जाने वाला पर्व भीष्म पंचक कार्तिक शुक्ल एकादशी से प्रारंभ होकर कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा को पूर्ण होता है. योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने इस पर्व की स्थापना की थी. यह सर्व पाप नाशक तथा अक्षय फलदायक व्रत है. इस बार यह 4 नवंबर 2022 को पड़ेगा. व्रत कथा महाभारत का युद्ध समाप्त होने पर भीष्म पितामह सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा शरशैया पर लेटकर कर रहे थे, तभी भगवान श्रीकृष्ण को लेकर पांचों पांडव उनके पास पहुंचे. उपयुक्त अवसर जान धर्मराज युधिष्ठिर ने भीष्म पितामह से उपदेश देने की प्रार्थना की. युधिष्ठिर के आग्रह पर पितामह ने पांच दिनों तक राजधर्म, वर्णधर्म, मोक्षधर्म पर महत्वपूर्ण उपदेश दिए. इस पर श्रीकृष्ण बहुत प्रसन्न हुए और कहा कि पितामह ने कार्तिक शुक्ल एकादशी से शुरू कर पूर्णिमा तक जो धर्ममय उपदेश दिया है, वह लोक कल्याणकारी है. उन्होंने इसकी स्मृति में भीष्म पंचक व्रत की स्थापना करने की घोषणा करते हुए कहा कि जो लोग इसका पालन करेंगे, वह संसार में कई प्रकार के कष्टों से मुक्त हो जाएंगे. उन्हें पुत्र, पौत्र, धन और धान्य की कोई कमी नहीं रहेगी और संसार में सुख भोगकर मोक्ष को प्राप्त होंगे. व्रत की विधि कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन स्नान करने के बाद घर के आंगन या नदी के तट पर चार दरवाजों वाला मंडप बनाकर उसे गोबर से लीप देना चाहिए. बाद में वहां वेदी बनाकर तिल भरकर कलश की स्थापना करनी चाहिए. इसके बाद ओम नमो भगवते वासुदेवाय नमः मंत्र से भगवान वासुदेव की पूजा करनी चाहिए. पांच दिनों तक लगातार घी का दीपक जलाकर और मौन होकर मंत्र का जाप करना चाहिए. इसके बाद ॐ विष्णवे नमः स्वाहा मंत्र से घी, तिल और जौ की 108 आहुतियां देकर हवन संपन्न करना चाहिए. पांचों दिन काम, क्रोधाग्नि का त्याग कर ब्रह्मचर्य, क्षमा, दया और उदारता धारण करनी चाहिए. देश में अधिकांश महिलाएं एकादशी व द्वादशी को निराहार, त्रयोदशी को शाकाहार, चतुर्दशी और पूर्णिमा को फिर से निराहार रहकर प्रतिपदा को प्रातः काल ब्राह्मण दंपती को भोजन कराने के बाद खुद भी भोजन ग्रहण करती हैं.
 

 
K.W.N.S.-देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु चार माह की योगनिद्रा के बाद जाग जाते हैं। इस दिन से शुभ और मांगलिक कार्य शुरू हो जाते हैं। इसके साथ ही इस दिन भगवान विष्णु के स्वरूप शालिग्राम और तुलसी जी का विवाह भी किया जाता है। माना जाता है कि इस दिन पूजा करने से सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। माना जाता है कि इस दिन तुलसी विवाह करने कन्यादान के बराबर पुण्य की प्राप्ति होती है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, देवउठनी एकादशी के दिन तुलसी के पौधे पर कुछ चीजें चढ़ाने से सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त होता है। आइए जानते हैं कि इस दिन तुलसी के पौधे में कौन सी चीज चढ़ाने से धन वैभव की प्राप्ति होगी। चढ़ाएं चुनरी तुलसी के पौधे में लाल रंग की चुनरी जरूर अर्पित करना चाहिए। 
इसके साथ ही चुनरी अर्पित करते समय इस मंत्र को बोले- ‘महाप्रसाद जननी सर्व सौभाग्यवर्धिनी आधि व्याधि हरा नित्यं, तुलसी त्वं नमोस्तुते। माना जाता है कि इस तरह से चुनरी चढ़ाने से देवी तुलसी के साथ भगवान शालिग्राम भी जल्द प्रसन्न हो जाते हैं और सुख-शांति और धन-वैभव की प्राप्ति होती है। तुलसी विवाह संबंधी अन्य उपाय चढ़ाएं दूध तुलसी विवाह के दिन तुलसी के पौधे में थोड़ा सा कच्चा दूध अर्पित करें। इसके साथ ही इस मंत्र को बोले- ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नम:’ ऐसा करने से देवी तुलसी के साथ भगवान विष्णु का भी आशीर्वाद प्राप्त होता है।
 जलाएं दीपक चढ़ाएं पीला धागा तुलसी विवाह के दिन एक पीला रंग का धागा लेकर अपने शरीर की लंबाई के बराबर नाप कर काट लें। इसके बाद इसमें 108 गांठ लगा दें और फिर तुलसी के पौधे के नीचे बांध दें। इसके साथ ही अपनी मनोकामना कहें। जब आपकी मनोकामना पूर्ण हो जाए, तो इस धागे को खोलकर जल में प्रवाहित कर दें। बांधे लाल धागा देव उठनी एकादशी के दिन तुलसी के पौधे में लाल रंग का धागा यानी कलावा बांधना भी शुभ माना जाता है। माना जाता है कि ऐसा करने से भगवान विष्णु के साथ-साथ मां लक्ष्मी भी प्रसन्न होती हैं।
 

 
K.W.N.S.-काली मिर्च हर घर की रसोई में आसानी से मिल जाती है। यह डिश को स्वादिष्ट बनाने के साथ-साथ सेहत के लिए भी काफी अच्छा माना जाता है। लेकिन मसाले के तौर पर इस्तेमाल की जाने वाली काली मिर्च इंसान को अमीर भी बना सकती है। जी हां, आप ज्योतिष में बताए गए काली मिर्च से जुड़ी कुछ रेसिपी को फॉलो कर सकते हैं। इन उपायों को करने से रुका हुआ धन वापस मिलेगा, आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। इससे हर कार्य में सफलता मिलेगी। जानिए काली मिर्च से कौन से उपाय होंगे फायदेमंद। काली मिर्च से करें ये उपाय धन लाभ के लिए अगर आप लगातार पैसों की कमी से परेशान रहते हैं और अपनी जेब में पैसे की मात्रा कम करना चाहते हैं, तो 5 काली मिर्च लें और इसे अपने ऊपर 7 बार रोल करें और चार को चौराहे पर फेंक दें और बाकी को आसमान की तरफ फेंक दें। आपको इससे फायदा होगा। 
कार्य में सफलता के लिए अगर आप किसी काम में सफलता पाने के लिए घर से बाहर जा रहे हैं तो घर से निकलने से पहले मुख्य दरवाजे पर काली मिर्च डालकर उस पर कदम रखें। 
शत्रु को नष्ट करने के लिए मास्य या पुण्य के दिन काली मिर्च से ‘m स्वच्छ’ बीज मंत्र का जाप करें। इसके बाद अपने परिवार के मुखिया से वार कर घर के बाद दक्षिण दिशा की ओर फेंक दें। ऐसा करने से आपके शत्रु शांत होंगे। नकारात्मक ऊर्जा को कम करने के लिए अगर आपके घर में बहुत अधिक नकारात्मक ऊर्जा है तो काली मिर्च का उपयोग करना फायदेमंद हो सकता है। इसके लिए काली मिर्च के 7-8 बीज लेकर घर के किसी कोने में दीये पर जला दें। ऐसा करने से घर में सुख-समृद्धि आती है।
 

छठ पूजा, सूर्य भगवान को समर्पित चार दिवसीय त्योहार है। आज छठ का तीसरा दिन है। आज व्रती तालाब, नदी आदि पानी के स्रोत में खड़े होकर डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देंगे। जानें- छठ पूजा के दौरान संध्या अर्घ्य कब दिया जाएगा। क्या है शुभ मुहूर्त, पूजा की विधि और कैसे तैयार किया जाता है संध्या अर्घ्य का प्रसाद।
छठ पूजा 2022: संध्या अर्घ्य समय
संध्या अर्घ्य के दिन सूर्यास्त का समय शाम लगभग 5:37 बजे होगा, जिसके दौरान भगवान सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा।
संध्या आर्य के अनुष्ठान
प्रसाद की वस्तुओं से भरे बांस से बने सूप और टोकरियों को घाट पर ले जाया जाता है जहां सूर्य देव और छठी मैय्या को संध्या अर्घ्य दिया जाता है। इस दिन भक्त न कुछ खाते हैं और न ही जल पीते हैं। निर्जला व्रत छठ के चौथे या अंतिम दिन के सूर्योदय तक जारी रहता है जब सूर्य भगवान और छठी मैय्या को उषा अर्घ्य दिया जाता है। छठ के अंतिम दिन अर्घ्य के बाद, बांस की टोकरियों से प्रसाद पहले व्रतियों द्वारा खाया जाता है और फिर परिवार के सभी सदस्यों और व्रतियों के साथ वितरित किया जाता है।
छठ पूजा के तीसरे दिन संध्या अर्घ्य का प्रसाद
छठ पूजा के चार दिवसीय त्योहार के तीसरे दिन, डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है और इसे संध्या अर्घ्य या पहला अर्घ्य के रूप में जाना जाता है। छठ प्रसाद को तैयार करने के लिए एक खास तैयारी की जाती है जो त्योहार के तीसरे दिन से शुरू होने वाले त्योहार में बहुत महत्व रखता है।
व्रती और उनके परिवार के सदस्य दिन में जल्दी स्नान करते हैं और प्रसाद रखने के लिए बांस के नए सूप और टोकरियां खरीदते हैं। चावल, गन्ना, ठेकुआ/पकवान/टिकरी, ताजे फल, सूखे मेवे, पेड़ा, मिठाई, गेहूं, गुड़, मेवा, नारियल, घी, मखाना, अरुवा, धान, नींबू, गगल, सेब, संतरा, बोडी, इलायची, हरी अदरक और सूप में तरह-तरह के सात्विक खाद्य पदार्थ रखे जाते हैं।
ठेकुआ छठ पूजा का सबसे महत्वपूर्ण प्रसाद माना जाता है जो मैदा, चीनी या गुड़ से बना होता है। आटे में गुड़ या चीनी और पानी का घोल मिलाकर एक आटा गूंथ लें जो बहुत अधिक सूखा या नरम न हो। जो लोग प्रसाद बना रहे हैं, वे आटे की लोई निकाल कर बेल कर ठेकुए के सांचे पर दबाते हैं, ताकि ठेकुआ का आकार आ जाए। फिर इसे पहले से गरम घी या तेल से भरी कड़ाही में डाल कर सुनहरा होने तक तल लिया जाता है। व्रती और परिवार के अन्य सदस्य सभी प्रसाद बनाने की रस्म में भाग लेते हैं।
छठ पूजा के चार दिन
इस वर्ष छठ उत्सव 28 अक्टूबर को नहाय खाय (चतुर्थी) के साथ शुरू हुआ, जहां भक्त गंगा के पवित्र जल में डुबकी लगाते हैं, उसके बाद 29 अक्टूबर को खरना (पंचमी) या लोहंडा में डुबकी लगाते हैं, जहां एक दिन का निर्जला उपवास (बिना भोजन और पानी के) होता है। भक्तों द्वारा सूर्योदय से सूर्यास्त तक मनाया जाता है। खरना के दिन, रसिया के प्रसाद के साथ उपवास तोड़ा जाता है – अरवा चावल, गुड़ और दूध से बनी पारंपरिक खीर, जो सबसे पहले भगवान सूर्य को अर्पित की जाती है। 36 घंटे के कठिन उपवास से पहले यह अंतिम भोजन है और छठ पूजा (31 अक्टूबर) के अंतिम या चौथे दिन तक जारी रहता है – जब सूर्य भगवान को उषा अर्घ्य या दूसरा अर्घ्य दिया जाता है।
कब मनाई जाती है छठ
यह त्योहार कार्तिक माह की शुक्ल षष्ठी को पड़ता है और बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल राज्यों में बहुत उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता है। छठ साल में दो बार मनाया जाता है। जबकि चैती छठ या छोटा छठ ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार मार्च या अप्रैल के महीनों में गर्मियों में मनाया जाता है, कार्तिकी छठ दिवाली के छठे दिन पड़ता है और आमतौर पर अक्टूबर और नवंबर के बीच आता है।

इस साल भाई दूज 26 अक्टूबर 2022, बुधवार को है। हिंदू पंचांग के अनुसार, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितिया तिथि पर भाई दूज का त्योहार मनाया जाता है। यह पर्व भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक है। इस दिन भाई बहन के घर जाता है और बहन भाई का तिलक करती है और भोजन भी खिलाती है। धार्मिक कथाओं के अनुसार सबसे पहले यमराज अपनी बहन यमुना के घर आए थे और यमुना ने यमराज का तिलक कर आरती उतारी थी। तब से ही ये परंपरा चली आ रही है। जानें भाई दूज का शुभ मुहूर्त और पूजा- विधि…
भाई दूज पर तिलक करने की विधि-
इस दिन भाई को घर बुलाकर तिलक लगाकर भोजन कराने की परंपरा है।
भाई के लिए पिसे हुए चावल से चौक बनाएं।
भाई के हाथों पर चावल का घोल लगाएं।
भाई को तिलक लगाएं।
तिलक लगाने के बाद भाई की आरती उतारें।
भाई के हाथ में कलावा बांधें।
भाई को मिठाई खिलाएं।
मिठाई खिलाने के बाद भाई को भोजन कराएं।
भाई को बहन को कुछ न कुछ उपहार में जरूर देना चाहिए।
भाई दूज 2022 शुभ मुहूर्त-
भाई दूज पर तिलक करने का शुभ मुहूर्त दोपहर 01 बजकर 12 मिनट से दोपहर 03 बजकर 27 मिनट तक रहेगा।
अवधि – 02 घंटे 14 मिनट
द्वितीया तिथि प्रारम्भ – अक्टूबर 26, 2022 को 02:42 पी एम बजे।
द्वितीया तिथि समाप्त – अक्टूबर 27, 2022 को 12:45 पी एम बजे।