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रायपुर । नवरात्रि महापर्व पर माता रानी की पूजा अर्चना करने से विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है. हिंदू धर्म में बताए गए मां के 9 स्वरूपों का अपना एक विशेष महत्व होता है. आज नवरात्रि के छठवें दिन मां नव दुर्गा के कात्यानी स्वरुप की पूजा अर्चना की जाती है. धार्मिक पुराणों के अनुसार देवी मां ने महिषासुर का मर्दन किया था. देवी कात्यायनी की पूजा करने से मन की शक्ति मजबूत होती है और साधक इन्द्रियों को वश में कर सकता है  । 
मां कात्‍यायनी की पूजा विधि
नवरात्रि के छठे दिन यानी कि षष्‍ठी को स्‍नान कर लाल या पीले रंग के वस्‍त्र पहनें.
 सबसे पहले घर के पूजा स्‍थान नया मंदिर में देवी कात्‍यायनी की प्रतिमा या चित्र स्‍थापित करें.
 अब गंगाजल से छिड़काव कर शुद्धिकरण करें.
अब मां की प्रतिमा के आगे दीपक रखें
 अब हाथ में फूल लेकर मां को प्रणाम कर उनका ध्‍यान करें.
 इसके बाद उन्‍हें पीले फूल, कच्‍ची हल्‍दी की गांठ और शहद अर्पित करें.
धूप-दीपक से मां की आरती उतारें.
 आरती के बाद सभी में प्रसाद वितरित कर स्‍वयं भी ग्रहण करें.
ध्यान
वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा कात्यायनी यशस्वनीम्॥
स्वर्णाआज्ञा चक्र स्थितां षष्टम दुर्गा त्रिनेत्राम्।
वराभीत करां षगपदधरां कात्यायनसुतां भजामि॥
पटाम्बर परिधानां स्मेरमुखी नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रसन्नवदना पञ्वाधरां कांतकपोला तुंग कुचाम्।
कमनीयां लावण्यां त्रिवलीविभूषित निम्न नाभिम॥
स्तोत्र पाठ
कंचनाभा वराभयं पद्मधरा मुकटोज्जवलां।
स्मेरमुखीं शिवपत्नी कात्यायनेसुते नमोअस्तुते॥
पटाम्बर परिधानां नानालंकार भूषितां।
सिंहस्थितां पदमहस्तां कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥
परमांवदमयी देवि परब्रह्म परमात्मा।
परमशक्ति, परमभक्ति,कात्यायनसुते नमोअस्तुते॥

 K.W.N.S._ 1) पद्भमस्वामी मंदिर ( केरल ) – यह मंदिर विष्णु भगवान का सबसे विशेष मंदिर माना जाता है । यह केरल राज्य में स्तिथ है और यहां पर हर साल करोड़ो श्रद्धलु पूजा पाठ करने के लिए आते है पर इस मंदिर के नीचे 3 तहखाने है जिसमें से 2 तहखाने खोला गया तो उसमें से 2 लाख करोड़ से भी ज्यादा का खजाना मिला और तीसरा तहखाना खोलने की कोशिश की गई तो उसे बड़े – बड़े वैज्ञानिक भी नही खोल सके और जिस वैज्ञानिक ने उस तहखाने को खोलने की कोशिश की उस वैज्ञानिक की हार्ट अटैक से मृत्यु हो गई तब से इस तहखाने से खोलने की कोशिश नही की जा रही । मंदिर का तहखाना लोहे के दरवाजे से बंद है और उसमें कोई भी ताला नही है।लोगो का मानना है कि उसे अष्ट नाग मंत्र से बंद किया गया है और नाग देवता उस तहखाने की हिफाजत करते है और जो भी उसे खोलने की कोशिश करता है उसे मृत्युदंड देते है।

2) जगरनाथ मंदिर ( पूरी ) – जगरनाथ मंदिर उड़ीसा के पूरी शहर में मौजूद है यह मंदिर भगवान जगन्नाथ बलराम और देवी सुभद्रा का मंदिर है। जुलाई महीने में यहां पर रथ यात्रा का भव्य आयोजन किया जाता है और इस रथ की रस्सी को खींचने के लिए या फिर छूने के लिए विश्वास से लोग आते है, और उनका मानना है कि ऐसा करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

यह मंदिर के ऊपर लगा ध्वज हमेशा वायु के विपरीत दिशा में लहराता है। मंदिर के परिसर के अंदर आपको समुद्र की लहरों की कोई भी आवाज नही आती और आप जैसे ही मंदिर परिसर से बाहर जाते है आपको समुद्र की लहरों की आवाज सुनाई देने लगती है। जगरनाथ मंदिर के मुहाने पर स्वर्ग का द्वार माना जाता है और इसलिए यहां पर शवों को जलाया जाता है और आप जब मंदिर परिसर से बाहर निकलेंगे तो आपको शव जलने की बदबू आएगी पर जैसे ही आप जगरनाथ मंदिर परिसर के अंदर जाएंगे तो यह बदबू गायब हो जाती है।

3) शनिदेव मंदिर ( शिगणापुर ) – शनिदेव मंदिर बहुत चमत्कारी और विचित्र माना जाता है। यह एक छोटे से। शिंगणापुर के गांव में स्तिथ है और इसके पीछे एक पौराणिक कथा है कि कहा जाता है कि भगवान शनिदेव ने एक गडरिया को एक लाल पाषण दिया था, और उसे जमीन पर रखकर उसका अभिषेक तेल से करने को कहा था। ताकि उस गांव का भला हो सके और तब से लोग इस पाषण का अभिषेक तेल से करते है। आपको जानकर हैरानी होगी कि शनिदेव का यह मंदिर कोई मंदिर नही एक खुला स्थान है जहां पर शनिदेव की मूर्ति है। इस गांव में किसी के घर मे कोई दरवाजा नही है।

यहां पर लोग अपनी अलमारी में ताला भी नही लगाते है। भक्त जब आते है तो अपनी गाड़ियों में भी ताला नही लगाते क्योंकि ऐसा लोगो का मानना है कि शनिदेव उनकी रक्षा करते है। आपको जानकर हैरानी होगी कि इस गांव में एक यूको बैंक की शाखा है जहाँ पर किसी भी प्रकार का दरवाजा नही है और ना ही ताला लगाया जाता हैं पर फिर भी इस गांव में आज तक कोई चोरी नही हुई क्योंकि इस गांव की रक्षा शनिदेव स्वयं करते है।

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*गाय से जुड़ी कुछ रोचक जानकारी ।*
 
1. गौ माता जिस जगह खड़ी रहकर आनंदपूर्वक चैन की सांस लेती है । वहां वास्तु दोष समाप्त हो जाते हैं । 
      
2. जिस जगह गौ माता खुशी से रभांने लगे उस जगह देवी देवता पुष्प वर्षा करते हैं । 
 
3. गौ माता के गले में घंटी जरूर बांधे ; गाय के गले में बंधी घंटी बजने से गौ आरती होती है । 
 
4. जो व्यक्ति गौ माता की सेवा पूजा करता है उस पर आने वाली सभी प्रकार की विपदाओं को गौ माता हर लेती है । 
 
5. गौ माता के खुर्र में नागदेवता का वास होता है । जहां गौ माता विचरण करती है उस जगह सांप बिच्छू नहीं आते । 
 
6. गौ माता के गोबर में लक्ष्मी जी का वास होता है ।
 
7. गौ माता कि एक आंख में सुर्य व दूसरी आंख में चन्द्र देव का वास होता है ।
 
8. गौ माता के दुध मे सुवर्ण तत्व पाया जाता है जो रोगों की क्षमता को कम करता है। 
 
9. गौ माता की पूंछ में हनुमानजी का वास होता है । किसी व्यक्ति को बुरी नजर हो जाये तो गौ माता की पूंछ से झाड़ा लगाने से नजर उतर जाती है । 
 
10. गौ माता की पीठ पर एक उभरा हुआ कुबड़ होता है , उस कुबड़ में सूर्य केतु नाड़ी होती है । रोजाना सुबह आधा घंटा गौ माता की कुबड़ में हाथ फेरने से रोगों का नाश होता है । 
 
11. एक गौ माता को चारा खिलाने से तैंतीस कोटी देवी देवताओं को भोग लग जाता है ।
 
12. गौ माता के दूध घी मख्खन दही गोबर गोमुत्र से बने पंचगव्य हजारों रोगों की दवा है । इसके सेवन से असाध्य रोग मिट जाते हैं ।
 
13. जिस व्यक्ति के भाग्य की रेखा सोई हुई हो तो वो व्यक्ति अपनी हथेली में गुड़ को रखकर गौ माता को जीभ से चटाये गौ माता की जीभ हथेली पर रखे गुड़ को चाटने से व्यक्ति की सोई हुई भाग्य रेखा खुल जाती है । 
 
14. गौ माता के चारो चरणों के बीच से निकल कर परिक्रमा करने से इंसान भय मुक्त हो जाता है ।
 
15. गौ माता के गर्भ से ही महान विद्वान धर्म रक्षक गौ कर्ण जी महाराज पैदा हुए थे। 
 
16. गौ माता की सेवा के लिए ही इस धरा पर देवी देवताओं ने अवतार लिये हैं । 
 
17. जब गौ माता बछड़े को जन्म देती तब पहला दूध बांझ स्त्री को पिलाने से उनका बांझपन मिट जाता है । 
 
18. स्वस्थ गौ माता का गौ मूत्र को रोजाना दो तोला सात पट कपड़े में छानकर सेवन करने से सारे रोग मिट जाते हैं । 
 
19. गौ माता वात्सल्य भरी निगाहों से जिसे भी देखती है उनके ऊपर गौकृपा हो जाती है । 
20. काली गाय की पूजा करने से नौ ग्रह शांत रहते हैं । जो ध्यानपूर्वक धर्म के साथ गौ पूजन करता है उनको शत्रु दोषों से छुटकारा मिलता है । 
 
21. गाय एक चलता फिरता मंदिर है । हमारे सनातन धर्म में तैंतीस कोटि देवी देवता है ,
हम रोजाना तैंतीस कोटि देवी देवताओं के मंदिर जा कर उनके दर्शन नहीं कर सकते पर गौ माता के दर्शन से सभी देवी देवताओं के दर्शन हो जाते हैं । 
 
22. कोई भी शुभ कार्य अटका हुआ हो बार बार प्रयत्न करने पर भी सफल नहीं हो रहा हो तो गौ माता के कान में कहिये रूका हुआ काम बन जायेगा !
 
 23. गौ माता सर्व सुखों की दातार है । 
 
      *?जय श्री कृष्ण*?

*आइये आज रामायण मै मां सीता से जुडे कुछ भर्म और उनके स्पष्टीकरण पर चिंतन करें ।*
 
क्या वैज्ञानिक कोई ऐसी तकनीक बना पाए हैं, जिससे पलक झपकते ही अपनी देह, एक मानव शरीर की  प्रतिलिपियाँ बनायी जा सकें? क्या आज की उन्नत प्रयोगशालाओं में कोई ऐसी तकनीक विकसित हुई है, जिससे अपनी साकार देह को भाप और फिर उसी भाप को ठोस आकार देकर साकार बनाया जा सके? निःसंदेह, वर्तमान वैज्ञानिकों के लिए ये अभी एक पूरी-कथा ही है। बहुत संभव है कि आपको भी ये बातें कल्पना-जगत की बेलगाम दौड़रामायण लगे।
परन्तु वास्तविकता बिल्कुल अनूठी और विराट है! वास्तव में, एक क्षेत्र ऐसा है जिसके शीश पर इन परमोन्नत तकनीकों के आविष्कारों का सेहरा बंधा है।
 
 यह क्षेत्र है- अध्यात्म ज्ञान अथवा वैदिक विज्ञान का! अध्यात्म- पोषित हमारे संत-सत्गुरु और प्राचीन कालीन ऋषिगण इन विलक्षण तकनीकों के कुशल आविष्कारक एवं अनुभवी रहे हैं। वे अपनी देह को इच्छानुसार अदृश्य और प्रकट- वह भी मनचाही गिनती में कई स्थानों पर एक साथ करते रहे हैं।
 
*क्या रावण जगद्जननी मां जानकी का हरण कर सकता था ?*
 
जी नहीं ,  हरण तो बहुत दूर की बात है, उन जैसी पतिव्रता नारी को छूना तक असम्भव था। उनके सतीत्व में इतना बल था कि अगर कोई भी उनको स्पर्श तक करता तो तत्काल भस्म हो जाता। रावण ने जिनका हरण किया वो वास्तविक माता सीता ना होकर उनकी प्रतिकृति छाया मात्र थी।
 
 इसके पीछे एक गूढ रहस्य है, जिसका महर्षि बाल्मीकि कृत रामायण व गोस्वामी तुलसी कृत रामचरित मानस में स्पष्ट वर्णन है ।
पंचवटी पर निवास के समय जब श्री लक्ष्मण वन में लकडी लेने गये थे तो प्रभु श्री राम ने माता जानकी से कहा-
 
*”तब तक करो अग्नि में वासा।*
*जब तक करुं निशाचर नाशा॥”*
 
प्रभु जानते थे कि रावण अब आने वाला है, इसलिए उन्होंने कहा- हे सीते अब वक्त आ गया है, तुम कुछ वर्ष तक अग्नि में निवास करो, तब तक मैं इस राक्षसों का संहार करता हूँ..
 
यह रहस्य स्वयं लक्ष्मण भी नहीं जानते थे..
 
*”लक्ष्मनहु ये मरम न जाना।*
*जो कछु चरित रचा भगवाना॥”*
 
इसीलिए रावण वध के पश्चात जब श्री राम ने लक्ष्मन से अग्नि प्रज्वलित करने के लिए कहा कि सीता अग्नि पार करके ही मेरे पास आयेंगी.. तो सुमित्रानंदन क्रोधित हो गये कि भइया आप मेरी माता समान भाभी पर संदेह कर रहे है… मैं ऐसा नहीं होने दुंगा.. तब राम ने लक्ष्मण को सारा रहस्य बताया और कहा हे लक्ष्मण सीता और राम तो एक ही हैं.. सीता पर संदेह का अर्थ है मैं स्वयं पर संदेह कर रहा हूँ… और छायारुपी सीता की बात बताई और कहा कि रावण वास्तविक सीता को अगर छू भी लेता तो तत्काल भस्म हो जाता… 
इसके बाद स्वयं माता जानकी ने लक्ष्मण से कहा…
 
*”लक्ष्मन हो तुम धर्म के नेगी।*
*पावक प्रगट करो तुम वेगी॥”*
 
हे लक्ष्मण अगर तुमने धर्म का पालन किया है तो शीघ्रता से अग्नि उत्पन्न करो… उसके बाद छायारुप मां जानकी अग्नि में प्रविष्ट हो गई और वास्तविक सीता मां श्री राम के पास आ गई..॥
 
वैसे तो उपरोक्त वृतांत रामचरितमानस की चौपाइयों को आधार बनाकर  वर्णन किया है, फिर भी बहुत से ज्ञानी या कहूं मतिमूढ, नकली(छायारुप) सीता वाली बात पर विश्वास नहीं करेंगे… उनके लिए कुछ तथ्य व प्रमाण नीचे सादर प्रस्तुत हैं ।
 
 
आधुनिक विज्ञान ने ज़ेरोक्स (Xerox) मशीने बनायीं। एक पेपर मशीन में डालो और उसकी जितनी चाहो ज़ेरोक्स कापियाँ (प्रतिलिपियाँ) निकाल लो। आधुनिक विज्ञान ने बॉयलर, कंदैंसर और रेफ्रिज़रेटर जैसी सुविधाजनक तकनीकों को भी आयाम दिया। बॉयलर में ठोस बर्फ डालो और उसे चुटकियों में भाप में बदल दो। इसी तरह भाप को कंदैंसर और रेफ्रिज़रेटर की मदद से वापिस बर्फ में भी बदला जा सकता है।
 
परन्तु क्या वैज्ञानिक कोई ऐसी तकनीक बना पाए हैं ।
 
वर्णानानुसार देवी-सीता के लंका से लौटने पर श्री राम ने उन्हें ज्यों-का-त्यों स्वीकार नहीं किया। रूखे वचन कहकर उन्हें अपनी चारित्रिक विशुधता प्रमाणित करने को कहा। देवी सीता ने तुरंत इस चुनौती को स्वीकार किया और प्रचण्ड अग्नि से गुज़रकर ‘अग्नि परीक्षा’ दी। यह ऐतिहासिक दृष्टांत विद्वानों, समाजवादियों, खासकर तथा-कथित नारी-संरक्षकों के लिए सदा से विवाद का विषय रहा है। वे इसे नारी की अस्मिता के प्रति घोर अन्याय मानते आए हैं।
 
परन्तु ऐसा केवल इसलिए है, क्यूँकि वे इस परीक्षा के तल में छिपे वैज्ञानिक सत्य को नहीं जानते। दरअसल यह लीला एक अनुपम विज्ञान था। इसकी भूमि सीता हरण से पहले ही रची जा चुकी थी।
 
अध्यात्म रामायाण (अरण्य काण्ड, सप्तम सर्ग) में स्पष्ट रूप से वर्णित है-
 
*अथ रामः अपि —- शुभे*
 
अर्थात रावण के षड़यंत्र को समझ, प्रभु श्री राम देवी सीता से एकांत में कहते हैं- ‘है शुभे! मैं जो कहता हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो। रावण तुम्हारे पास भिक्षु रूप में आएगा। अतः तुम अपने समान आकृति वाली प्रतिबिम्ब देह कुटी में छोड़कर अग्नि में विलीन हो जाओ। एक वर्ष तक वहीं अदृश्य रूप में सुरक्षित वास करो। रावण वध के पश्चात्त तुम मुझे अपने पूर्ववत स्वरुप में पा लोगी।’ आगे (अरण्य काण्ड 23/2) में लिखा है कि प्रभु का यह सुझाव पाकर श्री सीता जी अग्नि में अदृश्य हो गयी व अपनी छायामुर्ति कुटी में पीछे छोड़ गयीं ।
 
*जबही राम ———- सुबिनीता*
 
माँ सीता के इस वास्तविक स्वरुप को पुनः प्राप्त करने के लिए ही अग्नि-परीक्षा हुई थी। सो, यही अग्नि-परीक्षा के पीछे की सच्ची वास्तविकता है।
 
 
परन्तु आज का बौधिक व युवा वर्ग इसे एक अलंकारिक अतिशयोक्ति या जादुई चमत्कार मान बैठता है। किन्तु ऐसा बिल्कुल नहीं है। दार्शनिक स्पिनोजा कहतें हैं ‘ Nothing happens in nature which is in contradiction with its Universal laws’. डॉ. हर्नाक कहते है ‘जिन्हें हम चमत्कार समझते हैं, वे घटनाएँ भी इस सृष्टि और काल के व्यापक नियमों के आधीन हैं। हाँ, यह बात अलग है कि हम उन उच्च कोटि के नियमों को नहीं जानते हों।’
 
 
ऋषि पातंजलि इस प्रतिबिम्ब शरीर को निर्माण देह, बोध शास्त्र निर्माण काया कहते हैं। 
 
*‘ एकोअहं बहुस्याम’*
 
 की ताल पर श्री कृष्ण का रासलीला के अंतर्गत अनेक स्वरूपों में प्रकट होना; कौशल्यानंदन का शयनकक्ष व रसोईघर में एक समय में ही विद्यमान होना- ये सभी योगविज्ञान के साधारण से प्रयोग हैं। विपत्ति काल में सत्गुरु अपने दीक्षित शिष्यों की पुकार पर वे एक ही समय में विश्व के अनेकों भागों में समान रूप, रंग, गुण, कौशल व अभेद देह में प्रकट होते रहे हैं और अपना विरद निभाने के लिए आगे भी यूँ ही प्रकट होते रहेंगे।
 
 
किस प्रकार यह प्रकटिकरण होता है? दरअसल, इस सृष्टि में जीव, वस्तु या किसी भी प्रकार की सत्ता के निर्माण में दो अनादी तत्त्वों का मेल चाहिए होता है।
 
 
उपादान तत्त्व- यह प्रकृति का सूक्ष्म जड़ तत्त्व है। इसके स्थूल रूप को विज्ञान ‘मैटर’ कहता है। यह तत्त्व त्रिगुण (सत्त्व, रजस, तमस) से युक्त होता है। यह एक तरह से सृष्टि की प्रत्येक सत्ता का raw material माना जाता है।
 
निमित्त तत्त्व- यह एक चैतन्य शक्ति है, जो चेतना के रूप में सम्पूर्ण सृष्टि व उसके कण-कण में समाई हुई है। इसे वैज्ञानिक शब्दावली में ‘cosmic conciousness’ भी कहा गया है।
 
इन दोनों तत्वों के परस्पर संयोग से ही ‘निर्माण’ सधता है। किस प्रकार? 
 
*आईये, इसके लिए हम एक सरसरी दृष्टि ‘Creation of Universe’ पर मंथन करें ।*
 
 जहाँ ये दोनों तत्त्व अपने शुद्धतम रूप में प्रकट थे और ‘सृष्टि निर्माण’ में विशुद्ध भूमिका निभा रहे थे।
उपादान( Matter ) + निमित्त ( Conciousness ) = सृष्टि (Universe)
 
दरअसल इस देह रचना में भी ठीक ‘सृष्टि रचना’ का ही विज्ञान काम करता है। वही दो अनादी तत्वों का प्रयोग होता है-ब्रह्मचेतना तथा प्रकृति के उपादान तत्त्व। यूँ तो चेतना प्रत्येक मनुष्य में क्रियाशील रहती है। परन्तु यह प्रगाढ़ वासनाओं, करम- संस्कारों, अविद्या, अज्ञानता से ढ़की और दबी रहती है। अध्यात्म-ज्ञान या ब्रह्मज्ञान की साधना से ये समस्त आवरण दूर होते हैं व चेतना शुद्धतम प्रखर रूप में प्रकट होती है।
 
 
पूर्ण आध्यात्मिक विभूतियों ने चेतना के इसी ब्रह्ममय स्वरुप को पाया हुआ होता है। जब भी आवश्यक होता है, ये पूर्ण चैतन्य विभूतियाँ अपनी ब्रह्ममयी चेतना को प्रकृति के उपादान-तत्त्वों पर आरूढ़ करती हैं। उनकी यह चेतना प्रकृति के परमाणुओं पर लगाम कसती है ओर उनमें विक्षोभ पैदा कर देती है। फिर अपनी इच्छानुसार परमाणुओं में आकर्षण- विकर्षन कर स्वयं अपनी आकृति की देह निर्मित्त कर लेती हैं। वह भी मनचाही संख्या में!! अंततः इस ‘निर्माण देह’ में ‘निर्माण चित्त’ को भी प्रवेश कराके उसे पूर्ण रूप से सजीव कर देती हैं।
 
 
देवी सीता के विषय में भी ठीक यही अनादी विज्ञान प्रयोग में लाया गया था। सीता स्वयं में साक्षात चेतना-स्वरूपिणी माँ भगवती थीं। उनके लिए प्रकृति के जड़- तत्त्वों से छेड़छाड़ करके एक प्रतिबिम्ब देह निर्मित कर्म दर्पण देखने के समान सहज था।
 
 
परन्तु उनके सन्दर्भ को पूरी तरह प्रकाशित करने के लिए हमें एक तथ्य और जानना होगा। वह यह की वेदों में आदिकालीन ब्रह्म-चेतना को ‘वैश्वानर अग्नि’ भी कहा गया है। ब्रह्मसूत्र में इस अग्नि के विषय में यह बताया गया की यह अग्नि न तो कोई दैविक अग्नि है, न ही भौतिक है। यह निःसंदेह आदिकाल की ब्रह्म-अग्नि ही है।
 
ऋगवेद में कहा गया है (1/58/1)
जब यह अग्नि प्रकट होती है, तो अंतरिक्ष में फैल जाती है। यह प्रकृति के परमाणुओं को सही मार्गों पर ले चलती है और उनका निर्माण कार्य में प्रयोग करती है।
 
यहीं नहीं ऋग्वेद में एक अन्य ऋषि का कहना है –
 
*केवल प्रकृति के कण-कण में ही नहीं, यह अग्नि मनुष्य के अंग-अंग में भी विद्यमान होती है। परन्तु ध्यान दें, यह अग्नि विद्यमान तो सब में होती है। लेकिन विशुद्ध रूप से प्रकट केवल विकसित आत्माओं में ही होती है ।*
(ऋग्वेद 1/1/2)
 
 यह अग्नि पूर्व (कल्प) के ऋषियों को ज्ञात थी। इस युग के ऋषियों को भी ज्ञात है। यह सभी दैव-स्वरुप आत्माओं को ज्ञात होती है।
 अब इन समस्त जानकारियों को साथ लेकर हम सीता-अग्नि-परीक्षा के प्रसंग का वैज्ञानिक विश्लेषण करते हैं।
 
देवी सीता की अग्नि-परीक्षा का वैज्ञानिक विश्लेषण :
 
ऋग्वेद (1/58/2) में वैश्वानर अग्नि की त्रि-स्तरीय भूमिका दर्शायी गई है।
 
 वैश्वानर अग्नि शाश्वत चेतना है । यह प्रकृति के परमाणुओं को 
1. Integrate – संयुक्त करती है।
2. Disintegrate पृथक भी करती है ।
3. Preserve- सुरक्षित भी रखती है।
यह तीनों वही भूमिकाएँ हैं, जो सृष्टि-निर्माण-कार्य में ब्रह्म-चेतना की थीं। और यही वे वैज्ञानिक क्रियाएँ हैं, जो सीता-अग्नि-परीक्षा में भी प्रयोग की गईं। सीता-हरण से पूर्व जब श्री राम ने देवी सीता को अपना प्रतिबिम्ब पीछे छोड़कर अग्नि में निवास करने को कहा , तो वास्तव में क्या हुआ? 
क्या वैज्ञानिक-लीला घटी ? सीता ने तत्क्षण अग्नि प्रकट की। कदाचित यह कोई लौकिक अग्नि नहीं, वैश्वानर अग्नि ही थी। अर्थात सीता ने अपनी ब्रह्म चेतना को सक्रिय किया। फिर उसके द्वारा प्रकृति के परमाणुओं में हस्तक्षेप किया। उन्हें प्रयोजनानुसार जोड़कर एक अन्य निज-देह प्रकट कर ली। यह पहली वैज्ञानिक क्रिया थी।
 
इसके पश्चात माँ सीता ने ब्रह्म-चेतना या वैश्वानर अग्नि के द्वारा अपनी वास्तविक देह के परमाणुओं को अलग-अलग कर दिया। प्रसंग के अनुसार माँ सीता कि वास्तविक देह अग्नि में विलीन हो गयी थी। अग्नि में यह विलीनता वैज्ञानिक स्तर पर वैश्वानर अग्नि द्वारा देह का उपादान तत्व में बिखर जाना अर्थात ‘disintegration of body’ ही था। यह दूसरी वैज्ञानिक क्रिया थी।
 
फिर ये पृथक तत्त्व या परमाणु एक वर्ष तक उनकी वैश्वानर अग्नि के संरक्षण में रहे। उसी वैश्वानर अग्नि अथवा ब्रह्म-चेतना के, जो सकल सृष्टि के परमाणुओं की रक्षा करती है व जिसका आह्वान कर ऋषियों ने कहा-  (ऋग्वेद 1/1/1) 
 
हे अग्नि स्वरूप ब्रह्म-चेतना! पिता स्वरुप में , अपनी संतान की तरह हमारी रक्षा करो। कहने का आशर्य यह है कि सीता सशरीर नहीं, परमाणुओं के रूप में ब्रह्माण्ड की वैश्वानर अग्नि में समाहित रहीं। यह तीसरी वैज्ञानिक प्रक्रिया थी ।
 
एक वर्ष बाद … विजय बिगुल बजे और पुनर्मिलन की बेला आई। तब पुनः यहीं विज्ञान दोहराया गया। रामायण (युद्धकाण्ड सर्ग 12/75 ) के प्रसंगानुसार 
 
राघव ने एक विशेष कार्य के लिए निर्मित मायावत सीता को देखा और अग्नि-परीक्षा देने को कहा। श्री राम का यह कथन, वास्तव में देवी सीता को पुनः उसी वैज्ञानिक प्रक्रिया का संधान करने की प्रेरणा ही थी। उस समय प्रतीकात्मक रूप में भौतिक अग्नि जलाई गयी। परन्तु सीता जी का आह्वान तो वैश्वानर अग्नि के प्रति ही था। 
(युद्धकाण्ड सर्ग 13 ) हे सर्वव्यापक! अति पावन! लोक साक्षी अग्नि !…स्पष्ट है, ये संबोधन लौकिक अग्नि के लिए नहीं हो सकते थे। अतः लौकिक अग्नि की आड़ मेंवैश्वानर-अग्नि (ब्रह्मचेतना) पुनः सक्रिय हुई। उसने सीता जी की प्रतिबिम्ब देह के परमाणुओं को बिखेर कर पुनः प्रकृति में मिला दिया। फिर वास्तविक देह के परमाणुओं को एकत्र कर पूर्ववत जोड़ दिया। देवी सीता को सुरक्षित रूप में श्री राम के समक्ष प्रकट किया। यहीं वैज्ञानिक विलास प्रतीकात्मक शैली में इस प्रकार रखा गया लोक साक्षी भगवन वास्तविक जानकी को पिता के समान गोद में बिठाए हुए प्रकट हुए और रघुनाथ जी से बोले- मेरे पितास्वरूप संरक्षण में सौंपी हुई जानकी को पुनः ग्रहण कीजिये। 
वह प्रतिबिंबरुपिणी सीता जिस कार्य के लिए रची गयी थी, उसे पूरा करके पुनः अदृश्य हो गयी है।
 
यह वचन सुनकर श्री राम ने अत्यंत प्रसन्नता से जानकी जी को स्वीकार कर लिया। उसी क्षण इस विज्ञान के ज्ञाताओं – ब्रह्मा, महेश आदि देवताओं ने आकाश से फूल बरसाए। परन्तु अवैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वालों ने उस काल से आज तक कभी सीता पर कलंक, तो कभी राम पर आक्षेप लगाए।
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 वेबडेस्क । हिंदू धर्म में नवरात्रि का काफी ज्यादा महत्व है. इस दौरान 9 दिनों तक मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है. साल में कुल 4 नवरात्र पड़ते हैं जिसमें से ज्यादातर लोग 2 नवरात्र के बारे में जानते हैं. इनमें पहली नवरात्र चैत्र महीने में आती है जिसे वासंतिक नवरात्र कहते हैं और दूसरी आश्विन माह में आती है जिसे शारदीय नवरात्रि कहते हैं. लेकिन इन दोनों नवरात्रियों के अलावा दो नवरात्रि और भी है जिनका काफी महत्व बताया गया है. इन्हें गुप्त नवरात्रि कहा जाता है. इनमें से पहला गुप्त नवरात्र माघ महीने के शुक्ल पक्ष में और दूसरा आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष में मनाया जाता है।
इस साल की दूसरी गुप्त नवरात्रि आज यानी 3 जुलाई से शुरू हो गई है और 10 जुलाई तक चलेगी. बता दें इस नवरात्रि में मां भगवती के गुप्त स्वरूपों की पूजा होती है इसलिए इसे गुप्त नवरात्रि कहा जाता है. ये नवरात्रि तंत्र विद्या को मानने वाले लोगों के लिए काफी खास होती है.  मान्यता है कि इन दिनों तांत्रिक प्रयोगों का फल मिलता है और धन प्रात्ति के रास्ते खुलते हैं।
कैसे होती है पूजा
गुप्त नवरात्रि में भी बाकी दोनों नवरात्रियों की तरह कलश स्थापना होती है और 9 दिनों तक व्रत का संकल्प लिया जाता है. तंत्र विद्या में विश्वास रखने वाले लोग इन महाविद्दाओं की पूजा करते हैं जिनमें मां काली, तारा देवी, त्रिपुर सुंदरी जैसी देवियां शामिल है।

 
रायपुर । हिंदू धर्म में पूर्णिमा और अमावस्या को विशेष तिथि माना गया है. इस बार पूर्णिमा सोमवार के दिन पड़ रही है. इसके साथ ही वट सावित्री का व्रत भी रखा जाएगा. ज्योतिषाचार्यो के अनुसार ज्येष्ठ पूर्णिमा का महत्व काफी है. ज्योतिष में अगर किसी व्यक्ति की कुंडली में सूर्य गलत भाव में है उसके मान-सम्मान में गिरावट आती है। जबकि इसके विपरीत सूर्य की शुभ स्थिति में यश बढ़ता है. सूर्य का शुभ फल प्राप्त करने के लिए पूर्णिमा पर सूर्य की विशेष पूजा करनी चाहिए ।
ज्येष्ठ पूर्णिमा पूजा विधि…
ज्येष्ठ पूर्णिमा को वट पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है. इसलिए इस दिन वट सावित्री व्रत की तरह ही पूजा की जाती है और स्त्रियां अपने सुहाग के लिए व्रत उपवास भी रखती हैं|
ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन स्नान करें और सजधजकर तैयार हो जाएं ।
फूल माला, अगरबत्ती, दीपक, सिंदूर, चावल, अनाज समेत अन्य पूजन सामग्री को एक थाली में रख लें और लाल कपड़े से ढंक लें ।
वट वृक्ष के नीचे जाएं और देवी मां की पूजा करें ।
अपने सुहाग की लंबी उम्र की कामना करहते हुए देवी मां की कथा पढ़ें|
ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन पूजा कर व्रत की कामना करें ।
घर आकर अपने पति और बुजुर्गों का आशीर्वाद लें ।
सभी को मिठाई, फल या गुड़ प्रसाद के रूप में बांटें ।
ज्येष्ठ पूर्णिमा पर शुभ मुहूर्त…
ज्येष्ठ पूर्णिमा हर साल हिंदू मास के ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है. पंचांग के अनुसार 16 जून को दोपहर 2 बजे तक चतुर्दशी की तिथि रहेगी इसके बाद पूर्णिमा की तिथि शुरू होगी.संध्या काल से लेकर रात 8 बजकर 25 मिनट तक शुभ मुहूर्त रहेगा, इस समय में आप देवी मां की आराधना करें तो अवश्य लाभ होगा. वहीं महिलाएं 17 जून को सुबह भी व्रत रखकर भी वट वृक्ष की पूजा कर सकती हैं. 17 जून दोपहर तक पूर्णिमा की तिथि रहेगी ।

वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की मासिक शिवरात्रि से शुरू होकर सोमवती अमावस्या तक रहेगा। उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान के संस्कृत साहित्याचार्य महेन्द्र कुमार पाठक के मुताबिक ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को माह की शिवरात्रि होगी। जोकि अंग्रेजी कलैंडर के अनुसार 1 जून की तारीख है। इस क्रम में रविवार को 14 तारीख के बाद 3 जून को अमावस्या होगी। उसी दिन सोमवती अमावस्या और वट सावित्री व्रत पूरा होगा।
वट में रहता है इनका वास
महेंद्र कुमार पाठक के अनुसार 3 जून को सर्वार्थसिद्धि योग रहेगा। कहा जाता है कि सावित्री ने अपने पति के जीवन के लिए बरगद के पेड़ के नीचे तपस्या की थी। और वट के वृक्ष ने सावित्री के पति सत्यवान के मृत शरीर को अपनी जटाओं के घेरे में सुरक्षित रखा ताकि जंगली जानवर शरीर को नुकसान नहीं पहुंचा सके। इसलिए इसे वट सावित्री व्रत कहा जाने लगा। इस दिन वटवृक्ष को जल से सींचकर उसमें हल्दी लगा कच्चा सूत लपेटते हुए उसकी 11, 21, 108 बार परिक्रमा की जाती है। साथ ही 11, 21 और 108 की संख्या में ही वस्तुएं भी अर्पित की जाती हैं। उन्होंने बताया कि वटवृक्ष की जड़ों में ब्रह्मा, तने में विष्णु और पत्तों पर शिव का वास होता है। इसलिए उसका पूजन कल्याणकारी होता है।
महिलाएं पहनती हैं शादी का जोड़ा
रहीनगर के कृष्णदेव चतुर्वेदी की पत्नी सुदामा ने बताया कि बीते 37 साल से वह लगातार वट सावित्री व्रत रख रही हैं। उस दिन वह शादी का जोड़ा पहनकर पूजन अनुष्ठान करती हैं। उनका विवाह 1981 में हुआ था। वह हर साल अलग-अलग वस्तुओं का संकल्प लेकर वटवृक्ष को अर्पित करती हैं। अब तक वह पान, धान, केला, मीठा बताशा, अंगूर आदि अर्पित कर चुकी हैं।
यह है सर्वार्थ सिद्धि योग का महत्व
सर्वार्थ सिद्धि योग एक शुभ और मंगल योग है, जो निश्चित वार और ग्रह नक्षत्र के संयोग से बनता है। यह सभी योग में एक बहुत ही शुभ समय है जो कि ग्रह नक्षत्र के आधार पर गणना करता है। यह योग सभी इच्छाओं तथा मनोकामनाओं को पूरा करने वाला है। इस योग में पूजापाठ करने और दान करने का विशेष महत्व है। साथ ही इस योग में पूजा करने से पितृ दोष दूर होता है और सभी कार्यों में आपको विशेष सफलता प्राप्‍त होती है।

वेबडेस्क:- अगर आपका बच्चा पढ़ता तो बहुत है लेकिन इसके बाद भी एग्जाम में उसके नंबर कम आते हैं तो शास्त्रों के अनुसार उसे पढ़ने के साथ ही एक खास मंत्र का जाप करने की भी आवश्यकता है। बच्चा अगर प्रतिदिन माता सरस्वती की पूजा करने के साथ ही इस मंत्र का जाप करें तो इससे विद्याध्ययन में आ रही रूकावटें दूर होती हैं और बच्चे का मन पढ़ाई में लगने लगता है। इसी के साथ इससे बच्चे की याददाश्त भी तेज होती है, आइए जानते हैं इस सरस्वती मंत्र के बारे में
सरस्वती मंत्रः-
या कुंदेंदु तुषार हार धवला या शुभ्र वृस्तावता ।
या वीणा वर दण्ड मंडित करा या श्वेत पद्मसना ।।
या ब्रह्माच्युत्त शंकरः प्रभृतिर्भि देवै सदा वन्दिता ।
सा माम पातु सरस्वती भगवती निःशेष जाड्या पहा ।।
मंत्र का अर्थ :-
जो विद्या की देवी भगवती सरस्वती कुन्द के फूल, चंद्रमा, हिमराशि और मोती के हार की तरह धवल वर्ण की हैं और जो श्वेत वस्त्र धारण करती हैं, जिनके, हाथ में वीणा-दण्ड शोभायमान है, जिन्होंने श्वेत कमलों पर आसन ग्रहण किया है तथा ब्रह्मा, विष्णु एवं शंकर आदि देवताओं द्वारा जो सदा पूजित हैं, वही संपूर्ण जड़ता और अज्ञान को दूर कर देने वाली माँ सरस्वती हमारी रक्षा करें और हमें विधा और बुद्धि प्रदान करें।
  

 
 
 
 
गंगोत्री एवं यमुनोत्री धाम के कपाट खुलने की सभी तैयारी पूर्ण कर ली गई है। अक्षय तृतीया के पर्व पर शुभ मुहूर्त में विधिवत पूजा अर्चना के बाद आज वैदिक मंत्रोचारण के साथ 11:30 पर गंगोत्री व 1:15 मिनट पर यमुनोत्री धाम के कपाट देश विदेश के श्रद्धालुओं के लिए खोल दिये जायेंगे। जहां आगामी छह माह तक श्रद्धालु मां गंगा व यमुना के दर्शन कर सकेंगे। मंगलवार को मां गंगा की डोली गंगोत्री धाम पहुंच चुकी है। जबकि मां यमुना की डोली खरसाली से यमुनोत्री धाम के लिए रवाना हो रही है।
इससे पहले छह माह तक अपने शीतकालीन प्रवास मुखबा गांव में निवास करने के बाद सोमवार को मां गंगा की डोली अपने शीतकालीन प्रवास स्थल गंगोत्री धाम के लिए रवाना हो गई थी। डोली को पारंपरिक रीति-रिवाज के साथ सवा मन (50 किलो) का कलेऊ, स्थानीय पकवान देकर दोपहर 12:35 पर मुखबा के ग्रामीणों ने मां गंगा को विदाई दी। सोमवार सुबह विशेष पूजा अर्चना और आरती के बाद गंगा की उत्सव डोली को सजाया गया। इसके बाद तय मुहूर्त के अनुसार 12:35 पर मां गंगा की उत्सव डोली आर्मी बैंड की धुन पर मुखबा से गंगोत्री धाम के लिए रवाना हुई। गंगा की डोली यात्रा में मुखबा के साथ ही धराली, हर्षिल समेत उपला टकनौर के ग्रामीणों तथा कई तीर्थयात्रि शामिल हुए। मार्कण्डेय पुरी स्थित दुर्गा मंदिर में पहुंचने के बाद मां गंगा के साथ भक्तों ने अल्प विश्राम किया। मुखबा के प्राचीन पैदल यात्रा पथ से होते हुए डोली शाम को भैरों घाटी पहुंची।
चारधाम यात्रा के पहले धाम यमुनोत्री के लिए मां यमुना की डोली शनिदेव की अगुवाई में मंगलवार (आज) अपने शीतकालीन प्रवास खरसाली से सुबह 9 बजे यमुनोत्री धाम के लिए प्रस्थान करेगी। जो दोपहर 11 बजे यमुनोत्री मंदिर पहुंचेगी। जहां विधिवत पूजा अर्चना एवं हवन के बाद दोपहर 1:15 बजे यमुनोत्री धाम के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए जाएंगे। इसके साथ ही प्रदेश में मंगलवार को चारधाम यात्रा का विधिवत शुरू हो जायेगी।

 
 
7 मई को वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया है. इस तिथि को अक्षय तृतीया के नाम से भी जाना जाता है. इस दिन भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम का भी जन्म हुआ था. परशुराम ऋषि जमदग्नि और रेणुका के पुत्र थे. परशुराम भगवान शिव के परमभक्त होने के साथ न्याय के देवता भी माने जाते हैं. उन्होंने क्रोध में न सिर्फ 21 बार इस धरती को क्षत्रिय विहीन किया बल्कि भगवान गणेश भी उनके गुस्से का शिकार हो चुके हैं. आइए जानते हैं परशुराम से जुड़ी ऐसी ही 5 खास बातें जो शायद ही अब तक आपने कभी सुनी होंगी.ब्रह्रावैवर्त पुराण के अनुसार, परशुराम एक बार भगवान शिव से मिलने उनके कैलाश पर्वत पहुंच गए. लेकिन वहां उन्हें रास्ते में ही उऩके पुत्र भगवान गणेश ने रोक दिया. इस बात से क्रोधित होकर उन्होंने अपने फरसे से भगवान गणेश का एक दांत तोड़ दिया था. जिसके बाद भगवान गणेश एकदंत कहलाए. त्रेतायुग में सीता स्वयंवर के दौरान टूटने वाला धनुष भगवान परशुराम का ही था. अपने धनुष के टूटने से क्रोधित परशुराम का जब लक्ष्मण के साथ संवाद हुआ तो भगवान श्री राम ने परशुराम जी को अपना सुदर्शन चक्र सौंप दिया था. यह वहीं सुदर्शन चक्र था जो द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण के पास था । 
महाभारत से जुड़ीं प्रचलित कथाओं के अनुसार भीष्म पितामह परशुराम के ही शिष्य थे. एक बार जब भीष्म ने अपने छोटे भाई से विवाह करवाने के लिए काशीराज की तीनों बेटियों अंबा, अंबिका और अंबालिका का हरण कर लिया. लेकिन जब अंबा ने भीष्म को बताया कि वह राजा शाल्व से प्रेम करती हैं, तो भीष्म ने उसे छोड़ दिया. लेकिन शाल्व ने अंबा के हरण होने के बाद उससे विवाह करन से इंकार कर दिया. अंबा ने जब यह बात परशुराम को बताई तो उन्होंने भीष्म को उससे विवाह करने का आदेश दिया. लेकिन आजीवन ब्रह्मचर्य पालन करने की प्रतिज्ञा लेने वाले भीष्म ने ऐसा करने से मना कर दिया. जिसके बाद परशुराम और भीष्म के बीच युद्ध हुआ. हालांकि बाद में अपने पितरों की बात मानकर परशुराम ने अपने अस्त्र रख दिए थे । 
भगवान परशुराम माता रेणुका और ॠषि जमदग्नि की चौथी संतान थे. परशुराम जी ने अपने पिता की आज्ञा के बाद अपनी मां का वध कर दिया था. जिसकी वजह से उन्हें मातृ हत्या का पाप भी लगा. उन्हें अपने इस पाप से मुक्ति भगवान शिव की कठोर तपस्या करने के बाद मिली. भगवान शिव ने परशुराम को  मृत्युलोक के कल्याणार्थ परशु अस्त्र प्रदान किया, यही वजह थी कि वो बाद में परशुराम कहलाए.एक बार सहस्त्रार्जुन अपनी पूरी सेना समेत भगवान परशुराम के पिता जमदग्रि मुनी के आश्रम पहुंचा. मुनि ने अपनी कामधेनु गाय के दूध से पूरी सेना का स्वागत किया लेकिन सहस्त्रार्जुन ने लालचवश मुनि की चमत्कारी कामधेनु को अपने बल का प्रयोग कर छीन लिया. जिसके बाद परशुराम ने इस बात का पता लगते ही सहस्त्रार्जुन को मौत के घाट उतार डालासहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने परशुराम से बदला लेने के लिए उनके पिता का वध कर दिया. जिसके बाद उनकी मां भी अपने पति के वियोग में उनकी चिता पर ही सती हो गईं. मां और पिता की मौत से गुस्साए परशुराम ने शपथ ली कि वह धरती से समस्त क्षत्रिय वंशों का संहार कर देंगे. उन्होंने एक या दो बार नहीं बल्कि पूरे 21 बार पृथ्वी से क्षत्रियों का विनाश कर अपनी प्रतिज्ञा पूरी की ।