Browsing: धर्म आध्यात्म

पंचायत तंत्र- कोण्डागांव । कोंडागांव जिले के ग्राम आलोर स्थित प्रसिद्ध लिंगेश्वरी माता मंदिर का पट आज श्रद्धालुओं के लिए नहीं खोला गया. देश-विदेश से पहुंचे भक्तों को इसकी जानकारी नहीं थी. इस वजह से भक्तों को भटकना पड़ा. दरअसल, सालों से चली आ रही परंपरा के अनुसार इस वर्ष भी लिंगेश्वरी माता मंदिर समिति द्वारा 2 सितंबर को मंदिर खुलने का निर्णय लिया गया था. लेकिन कोरोना संक्रमण के मद्देनजर प्रशासन एवं मंदिर समिति के द्वारा निर्णय लिया गया कि इस वर्ष केवल मंदिर समिति के पदाधिकारियों के द्वारा पूजा-अर्चना किया जाएगा. क्षेत्र के ग्रामीण दूरस्थ अंचल एवं अन्य राज्य से आने वाले श्रद्धालुओं का प्रवेश निषेध होगा ।
बता दें कि यह मंदिर साल में भादो मास के शुक्ल पक्ष बुधवार को केवल एक दिन के लिए ही खुलता है. जहां पर दर्शनार्थी रात से ही कतार बद्ध खड़े होकर मां लिंगेश्वरी की दर्शन के लिए प्रतीक्षा करते हैं. यहां स्थानीय भक्तों की अलावा देश-विदेश से भी श्रधालु हजारों की संख्या में आते हैं ।
मान्यता है जिन नवदंपति को संतान की प्राप्ति नहीं होती वो यहां ककड़ी(खीरा) लेकर आते हैं, व संतान प्राप्ति का आशीर्वाद लेकर जाते हैं, पर इस वर्ष कोरोना संक्रमण के कारण किसी को भी मंदिर परिसर में आने की अनुमति समिति ने नहीं दिया है. यहां सिर्फ समिति व पुजारी ही मौजूद होंगे. समय  से पहले  सूचना नहीं होने के कारण दूरदराज से आए दर्शनार्थी इस वर्ष मां लिंगेश्वरी के दर्शन को भटक रहे ।
 
 
 
 

पंचायत तंत्र – अखंड सौभाग्यवती का पर्व हरतालिका तीज 21अगस्त, शुक्रवार को मनाया जाएगा। इस दिन महिलाएं अपने पति की दीर्घायु के लिए 24 घंटे का निर्जला व्रत रखती हैं। मान्यताओं के अनुसार, अखंड सौभाग्य और मनचाहे वर के लिए तीजा व्रत यानि हरतालिका तीज का व्रत किया जाता है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की हस्त नक्षत्र युक्त तृतीया तिथि को हरितालिका तीज का व्रत किया जाता है। इस व्रत को कुंवारी कन्याएं अपने लिए मनचाहा पति पाने और विवाहित महिलाएं अखंड (पति की लम्बी आयु के लिये) सौभाग्य पाने के लिए करती है। इस व्रत में सायं के पश्चात् चार प्रहर की पूजा करते हुए रात भर, भजन-कीर्तन, जागरण किया जाता है।
पंडित अरविंद अवस्थी ने बताया कि हरतालिका तीज व्रत को सभी व्रतों में श्रेष्ठ माना जाता है। यह बेहद ही कठिन व्रत होता है। इसे दो प्रकार से किया जाता है। एक निर्जला और दूसरा फलहारी। निर्जला व्रत में पानी नहीं पीते हैं और न ही अन्ना या फल ग्रहण करते हैं वहीं फलाहारी व्रत रखने वाले लोग व्रत के दौरान जल पी सकते हैं और फल का सेवन करते हैं।
इस वर्ष तीज 21 अगस्त को है। इस बार हरितालिका पूजा मुहूर्त सुबह 5.54 बजे से 8.30 बजे तक है प्रदोषकाल शाम 6.54 से रात 9 बजे तक बताया गया है।
दूसरे दिन सुबह सूर्योदय के समय व्रत समाप्त होता है। तब महिलाएं अपना व्रत तोड़ती हैं और अन्न-जल ग्रहण करती हैं। इस दिन शिव पार्वती जी पूजा की जाती है। कहीं-कहीं बालू के भगवान शंकर व माता पार्वती की मूर्ति बनाकर पूजन की जाती है। एक चौकी पर शुद्ध मिट्टी में गंगाजल मिलाकर शिवलिंग, रिद्धि-सिद्धि सहित गणेश, पार्वती एवं उनकी सहेली की प्रतिमा बनाई जाती है। पूजन-पाठ के बाद महिलाएं रात भर भजन-कीर्तन करती है । हर प्रहर को इनकी पूजा करते हुए बिल्व-पत्र, आम के पत्ते, चंपक के पत्ते एवं केवड़ा अर्पण करने चाहिए और आरती करनी चाहिए।
हरतालिका तीज के व्रत की कथा भगवान शिव और पार्वती से जुड़ी है। धर्म ग्रंथों में लिखा है कि अपने पिता द्वारा कराए गए यज्ञ में जब शिवजी का अपमान हुआ तो पार्वती ने यज्ञ की अग्नि में कूदकर आत्मदाह कर लिया। अगले जन्म में उन्होंने राजा हिमालय की बेटी के रूप में जन्म लिया और भगवान शंकर को मन ही मन पति मान लिया था। पिता ने पार्वती के विवाह के लिए नारदजी से सलाह ली तो उन्होंने भगवान विष्णु का नाम आगे बढ़ा दिया। इस विवाह को रोकने के लिए पार्वतीजी की सहेलियों ने उनका हरण कर लिया और जंगल में ले गईं। इसीलिए इस दिन को हरतालिका कहा जाता है। इसके बाद पार्वतीजी ने भगवान शिव की तपस्या की और उन्हें प्रसन्न किया और अपने पति के रूप में प्राप्त किया।

 
पंचायत तंत्र- रायपुर। जन्माष्टमी पवित्र और खुशियों भरा त्योहार है. बहुत से लोग इस शुभ दिन पर श्रीकृष्ण के बाल गोपाल स्वरूप की मूर्ति की घर के मंदिर में स्थापना करते हैं. उनकी ड्रेस, भोग, झुले आदि का ध्यान रखते हैं. इस दिन खासतौर पर उन्हें झुले पर बिठाकर झुला झुलाया जाता है. ऐसे में लोग उनके झुले को अलग और विशेष रूप से सजाते हैं. साथ ही लोग भगवान को खुश करने और उनकी कृपा पाने के लिए उनका अच्छे से ख्याल रखते हैं. तो चलिए आज हम आपको कुछ ऐसी वास्तु के उपाय बताते हैं, जिसे विशेषतौर पर जन्माष्टमी के दिन करके आप भगवान श्रीकृष्ण की असीम कृपा पा सकते हैं ।
खुले रखें मंदिर के द्वार
जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर अपने घर के मंदिर के दरवाजे खुले रखें. साथ ही रात के समय वहां पर दीये जलाकर अच्छे से रोशनी का प्रबंध करें ।
चांदी की बांसुरी
कृष्ण जन्माष्टमी के दिन कान्हा जी को छोटी सी चांदी की बांसुरी चढ़ाएं. उसके बाद विधिवत पूजा करें और बाद में उस बांसुरी को अपने पर्स में संभाल कर रख लें. इससे आपके जीवन की चल रही परेशानियों का हल हो तरक्की के रास्ते खुलेंगे.
मोरपंख
मोरपंख श्रीकृष्ण को अति प्रिय होने से इसे अपने घर के मंदिर में या कान्हा जी को जरूर अर्पित करें. इसे घर पर रखने से घर-परिवार में खुशहाली भरा माहौल बनता है. कलह-क्लेश दूर हो घर में सुख-शांति व समृद्धि आती है ।
ऐसी तस्वीरें और मूर्ति घर में खुशहाली और बरकत लाती है ।
– घर के मंदिर में बालरूप में कृष्णा जी की मूर्ति रखना बेहद शुभ माना जाता है. इसके साथ ही इस बात का खास ध्यान रखना चाहिए कि कान्हा जी की मूर्ति बैठी हुई मुद्रा में होनी चाहिए ।
– श्रीकृष्ण और देवी राधा की जुगल-जोड़ी की खड़ी मूद्रा में मूर्ति या तस्वीर रखने से परिवार के सदस्यों में प्यार बढ़ता है. अगर किसी प्रकार का मनमुटाव चल रहा हो तो वह दूर हो घर पर खुशियों का आगमन होता है ।
-संतान प्राप्ति के इच्छुक भक्तों को कृष्णा जी के बाल गोपाल रूप की मूर्ति को या तस्वीर को बेडरूम के पूर्व-पश्चिम दिशा में रखना शुभ होता है ।
– वासुदेव द्वारा भगवान श्रीकृष्ण को टोकरी में रख कर नदी पार करने वाले चित्र या तस्वीर को घर में लगाना शुभ होता है. इससे घर-परिवार में चल रही परेशानियां दूर होती है ।
– लड्डू गोपाल के रूप में भगवान कृष्ण को घर पर रखना और उनका अपने बच्चे की तरह ध्यान रखने से घर का वातावरण खुशनुमा रहता है ।
जन्माष्टमी के दिन करें ये काम
1. जन्माष्टमी के दिन 7 कन्याओं को खीर या मिठाई खिलाने से पैसों से जुड़ी समस्या दूर होती है.
2. जीवन में चल रही परेशानियों को दूर करने के लिए इस शुभ दिन पर बाल गोपाल जी को नारियल और बादाम का भोग लगाएं ।
3. घर पर बर्कत बनाएं रखने के लिए इस दिन पान के पत्ते पर तिलक से श्रीयंत्र बनाकर उसे अपनी तिजोरी में रखें ।
4. पीले चंदन में गुलाब की पंखुड़ियां और केसर को मिलाकर बाल गोपाल जी को तिलक कर खुद के माथे पर भी लगाएं. इससे घर में सुख-समृद्धि व खुशियों का आगमन होगा ।
5. आर्थिक परेशानी से जुझ रहें लोगों को जन्माष्टमी के शुभ दिन पर सुबह नहाकर, साफ कपड़ें पहन कर भगवान श्रीकृष्ण को माथा टेके. फिर उनकी पूजा कर पीले रंग के फूल चढ़ाए। इससे आर्थिक परेशानी से जल्द ही राहत मिलेगी ।
6. जन्माष्टमी से 6 शनिवार तक श्मशान घाट से पानी लेकर पीपल के पेड़ पर चढ़ाने से कर्ज से मुक्ति मिलती है ।
 

 
पंचायत तंत्र-आज नाग पंचमी है यानी नागों की पूजा का दिन। इस दिन भगवान शिव के आभूषण नाग की भारत की कई जगहों या यूं कहें की पूरे भारत में ही पूजा की जाती है। वैसे तो भारत में नागों के कई मंदिर मौजूद हैं लेकिन एक ऐसा मंदिर भी है जो वर्ष में केवल एक बार ही खोला जाता है। यह मंदिर है नागचंद्रेश्वर जो उज्जैन में स्थित है। यह उज्जैन के प्रसिद्ध महाकाल मंदिर की तीसरी मंजिल पर स्थित है। इस मंदिर को केवल श्रावण मास की शुक्ल पंचमी यानी नाग पंचमी के दिन ही खोला जाता है। मान्यता के अनुसार, स्वयं नागराज तक्षक इस मंदिर में रहते हैं
क्या है पौराणिक मान्यता
शिव शंकर को मनाने के लिए सर्पराज तक्षक ने घोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या के प्रसन्न शिव शंकर ने राजा तक्षक नाग को अमरत्व का वरदान दिया था। मान्यता के अनुसार, इसके बाद से ही तक्षक राजा ने भोलेनाथ के सा‍‍‍न्निध्य में वास करना शुरू कर दिया था। लेकिन राजा तक्षक चाहते थे उनके एकांत में कोई विघ्न न पड़े। अत: वर्षों से यही प्रथा है कि नागपंचमी के दिन ही वे दर्शन देते हैं। यही कारण है कि मंदिर के कपाट केवल नागपंचमी को ही खोले जाते हैं। बाकी के समय मंदिर बंद ही रहता है। मान्यता है कि अगर कोई इस मंदिर के दर्शन करता है तो वो सर्पदोष से मुक्त हो जाता है।
नागपंचमी के दिन जब मंदिर के कपाट खोले जाते हैं तो भक्तों की लंबी कतार लगती हैं। नागपंचमी पर भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन के लिए शनिवार रात 12 बजे मंदिर के कपाट खोले जाएंगे। इसके बाद रविवार नागपंचमी को रात 12 बजे मंदिर में आरती होगी और फिर कपाट बंद कर दिए जाएंगे। यहां की जाने वाली पूजा और पूरी व्यवस्था महानिर्वाणी अखाड़े के संन्यासियों द्वारा संपन्न की जाती है। हालांकि, इस बार कोरोना के चलते मंदिर बंद ही रहेगा।
कब बनी थी मूर्ति:
बताया जाता है कि यह 11वीं शताब्दी की परमारकालीन मूर्ति है। इसमें शिव-पार्वती के शीश पर छत्र रूप में फन फैलाए नाग देवता के दर्शन किए जा सकते हैं। यह मूर्ति नेपाल से लाई गई थी। बता दें कि मंदिर के दूसरे हिसेस में भगवान नागचंद्रेश्वर शिवलिंग रूप में विराजमान हैं। यह मंदिर उज्जैन, मध्य प्रदेश में स्थित है।  
 

हरियाली देता है, श्रावणी तीज सौभाग्य का फल 
 
 
पंचायत तंत्र- सावन महीने के सबसे महत्वपूर्ण पर्व में से एक हरियाली तीज है. सौंदर्य और प्रेम के इस पर्व को श्रावणी तीज भी कहते हैं. श्रावण मास की शुक्ल तृतीया (तीज) को हरियाली तीज का लोकपर्व मनाते हैं. पूरे उत्तर-भारत में तीज पर्व बड़े उत्साह और धूमधाम से मनाया जाता है. इस त्योहार को श्रावणी तीज और हरियाली तीज के नाम से भी जाना जाता है. हरियाली तीज के दिन महिलाएं अपने पति की लम्बी उम्र और सुख समृद्धि के लिए व्रत रखती है. इस दिन महिलाएं पूरी श्रद्धा से भगवान शिव-पार्वती की पूजा करती है. हरियाली तीज भगवान शिव और मां पार्वती के पुनर्मिलन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है. इस बार हरियाली तीज का ये पर्व 23 जुलाई यानी आज है. तृतीया तिथि 22 जुलाई दिन बुधवार को सायंकाल 7:05 से प्रारंभ होकर 23 जुलाई दिन गुरुवार को शाम 5:03 तक है ।
हरियाली तीज का पौराणिक महत्व
भगवान शंकर को पति के रूप में पाने के लिए माता पार्वती ने 107 बार जन्म ली थीं. मां पार्वती के कठोर तप और उनके 108वें जन्म में भगवान शिव ने देवी पार्वती को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया. तभी से इस व्रत की शुरुआत हुई. हरियाली तीज पर शिव-पार्वती जी की पूजा और व्रत किया जाता है. शिव पुराण के अनुसार इसी दिन भगवान शिव और देवी पार्वती का पुनर्मिलन हुआ था ।
हरियाली तीज पूजा विधि
संजय चौधरी, श्री फलित ज्योतिष. संपर्क करें- 9977567475
इस दिन महिलाएं सोलह श्रृंगार करके निर्जला व्रत रखती हैं और पूरी विधि-विधान से मां पार्वती और भगवान शिव की पूजा करती हैं. मान्यता है कि इस दिन विवाहित महिलाओं को अपने मायके से आए कपड़े पहनने चाहिए और साथ ही श्रृंगार में भी वहीं से आई वस्तुओं का इस्तेमाल करना चाहिए. अच्छे वर की मनोकामना के लिए इस दिन कुंवारी कन्याएं भी व्रत रखती हैं. इस दिन साफ-सफाई कर घर को तोरण-मंडप से सजायें. मिट्टी में गंगाजल मिलाकर शिवलिंग, भगवान गणेश और माता पार्वती की प्रतिमा बनाएं और पूजा के शुभ मुहूर्त में एक चौकी पर माता पार्वती, भगवान शिव तथा गणेश की प्रतिमा स्थापित करें ।
षोडशोपचार पूजन करें. सबसे पहले पूजन के आरंभ में संकल्प लिया जाता है फिर भगवान गणेश जी का पूजन करें कलश पूजन करें फिर पार्वती जी को 16 श्रृंगार की सामग्री, साड़ी, अक्षत्, धूप, दीप, गंध आदि अर्पित करें। फिर शिवजी को भांग, धतूरा, अक्षत्, बेल पत्र, श्वेत फूल, गंध, धूप, वस्त्र आदि चढ़ाएं। इसके बाद हरियाली तीज की कथा सुनें. फिर भगवान शिव और माता पार्वती की आरती करें। अखंड सौभाग्य को देने वाली माता पार्वती से हाथ जोड़ कर प्रार्थना करे ।
‘देहि सौभाग्य आरोग्यं देहि मे परमं सुखम्। रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।।’
हरियाली तीज व्रत का पूजन रातभर चलता है। इस दौरान महिलाएं जागरण और कीर्तन भी करती हैंसाथ ही झूला भी झूलती है।
श्रावण मास में घेवर, फेनी और सेवईयों का प्रचलन अधिक है। तीज से एक दिन पहले बहनों और बहुओं को सिंघारा दिया जाता है। इसमें वस्त्र, सौभाग्य सामग्री, घेवर, फेनी, फल आदि झूल-पटरी शामिल होता है। हरियाली तीज को ठाकुरजी को भी मालपुओं का भोग निवेदित किया जाता है।
हरियाली तीज का शुभ मुहूर्त –
अभिजीत मुहूर्त: 23 जुलाई को सुबह 11:44 बजे से 12:36 तक।
शुभ शाम 5: 06 से 6:45 तक तथा प्रदोषकाल।
संजय चौधरी श्री फलित ज्योतिष रायपुर 9977567475

 
 
पंचायत तंत्र – रायपुर । वट सावित्री ज्येष्ठ मास की अमावस्या के दिन मनाया जाता है. पति की लंबी आयु के लिए महिलाएं वट सावित्री का व्रत रखती हैं. इस बार अमावस्या का व्रत 22 मई को है. हिंदू पंचांग के अनुसार जेष्ठ मास की अमावस्या तिथि को शनि जयंती भी मनाई जाती है. अमावस्या तिथि 21 मई को अमावस्या लगेगी और 22 मई को अमावस्या रहेगी।
कहा जाता है कि वट सावित्री के दिन सावित्री ने यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण की रक्षा की थी. सावित्री से प्रसन्न होकर यमराज ने चने के रूप में सत्यवान ने प्राण सौपे थे चने लेकर सावित्री सत्यवान के शव के पास आई और सत्यवान में प्राण फूंक दिए इस तरह सत्यवान जीवित हो गए तभी से वट सावित्री के पूजन में चना पूजन का नियम है. वट वृक्ष को दूध और जल से सीखना चाहिए.  वट सावित्री के दिन महिलाएं सुबह सवेरे स्नान करके पूजन श्रृंगार करती हैं।
बरगद के पेड़ की विशेष पूजा
वट सावित्री व्रत में बरगद के पेड़ का महत्व अधिक है. धार्मिक मान्यता के अनुसार सनातन संस्कृति में ऐसा माना जाता है कि बरगद के पेड़ पर ब्रह्मा विष्णु और महेश तीनों देवताओं का वास होता है. इस दिन विवाहित महिलाएं वट वृक्ष पर जल चढ़ाकर उसमें कुमकुम अक्षत लगाती हैं. पेड़ में मौली लिपटी जाती है. विधि विधान के साथ वट वृक्ष की पूजा की जाती है ऐसा करने से उन महिलाओं को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
ऐसे रखा जाता है वट सावित्री का व्रत
महिलाओं के द्वारा वट सावित्री व्रत त्रयोदशी तिथि से प्रारंभ हो जाता है. हालांकि कुछ महिलाएं केवल अमावस्या के दिन व्रत रखती हैं. इस दिन वट वृक्ष की पूजा के साथ-साथ सावित्री सत्यवान की पौराणिक कथा को भी सुना जाता है. पौराणिक मान्यता के अनुसार कहा जाता है कि सावित्री वट सावित्री के नीचे ही अपने मृत पति सत्यवान को जीवित किया था. इसलिए इस व्रत का नाम वट सावित्री पड़ा।
वट सावित्री व्रत तिथि और मुहूर्त
वट सावित्री अमावस्या तिथि 22 मई 2020 शुक्रवार हो है. अमावस्या तिथि प्रारंभ 21 मई को रात्रि 9:35 से अमावस्या तिथि समाप्त 22 मई 2020 को रात्रि 11:08 तक है।
कैसे करें पूजा
व्रत के पूजन के लिए थाली में प्रसाद, जिसमें गुड़, भीगा चना, आटे से बनी मिठाई, कुमकुम, रोली, मौली, फल, पान का पत्ता, धूप, घी का दिया, लें एक लोटे में जल और एक हाथ का पंखा लेकर बरगद के पेड़ के बैठें.  इसके बाद सबसे पहले बरगद के पेड़ के जड़ पर  जल चढ़ाना चाहिए और फिर धूप, दीप जलाये इसके बाद इसकी परिक्रमा करनी चाहिए और कच्चे धागे से और मौली धागे को 7 बार बांधे और प्रार्थना करें फिर पति के पैर धोकर आशीर्वाद ले।
 

पंचायत तंत्र –   शनि देव (Shani Dev) ने 11 मई, सोमवार से अपनी चाल बदल दी। इस दिन सुबह 9 बजकर 27 मिनट पर शनि देव अपनी राशि मकर में वक्री हो गए। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, शनि पूरे 142 दिन यानी 29 सिंतबर तक इस स्थिति में रहेंगे। इसका विभिन्न राशियों पर असर पड़ेगा। मसलन, मेष राशि वालों को मन माफिक परिणाम हासिल करने के लिए ज्यादा मेहनत करना होगी। वृषभ राशि वालों को भी सजग रहने की सलाह दी जा रही है। इनकी योजनाओं में बाधाएं आ सकती हैं। हेल्थ संबंधी समस्याएं भी आ सकती हैं। पढ़िए अन्य राशियों पर कैसे असर पड़ेगा –
मेष राशि वालों के सलाह दी जाती है कि वे अपना मनोबल न गिरने दें। पूरी मेहनत के साथ कार्य में लगे रहेंगे तो सफलता अवश्य मिलेगी। अपनी वाणी पर ध्यान दें। मिथुन राशि वाले नई योजना शुरू न करें। जो काम चल रहा है, उसी पर ध्यान दें। अपने खर्च पर कंट्रोल करें।
कर्क राशि वालों के लिए अच्छा समय शुरू हो सकता है। प्रोफेशनल लाइफ में उन मौके पर फिर उम्मीद जगेगी, जो पहले छूट गए हैं। इनकम में भी बढ़ोतरी हो सकती है। हालांकि पति या पत्नी से संबंधों पर असर पड़ सकता है।
सिंह राशि वालों को इस दौरान अपनी सेहत पर ध्यान देने की जरूरत है। कर्ज बढ़ सकता है इसलिए अपना आर्थिक पक्ष मजबूत करें। पति और पत्नी के बीच संबंध मधुर होंगे। कन्या राशि वालों के काम पर असर पड़ सकता है। ऑफिस के काम में मन नहीं लगेगा और कार्यक्षमता प्रभावित होगी। सेहत का ध्यान रखें। परिवार का पूरा साथ मिलेगा।
तुला राशि वाले नए काम शुरू करेंगे और सफलता भी मिलेगी। हालांकि इस दौरान अपने खर्च पर ध्यान रखें। बजट से ज्यादा खर्च मुश्किल में डाल सकता है। वृश्चिक राशि वालों का पारिवारिक जीवन मधुर होगा। खासतौर पर भाई बहन के बीच प्यार बढ़ेगा। लंबे समय से चला आ रहा आर्थिक संकट भी दूर होगा।
धनु राशि वालों को भी आर्थिक मोर्च पर परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि किसी बिजनेस में निवेश करने के लिए समय सबसे बढ़िया बताया गया है। किस्मत के सहारे न बैठे रहें। अपनी प्लानिंग पर ध्यान दें।
यह राशि परिवर्तन मकर राशि वालों को उदार और निराशाबादी बना सकता है। ये खुद की क्षमताओं पर संदेह करने लगेंगे। सेहत भी गड़बड़ा सकती है। जो लोग जमीन या मकान के सौदे करना चाहते हैं, उनके लिए समय उत्तम है।
कुंभ राशि वालों की सेहत पर असर पड़ेगा और खर्च में भी वृद्धि होगी। अपनी सेहत पर ध्यान दें। लॉकडाउन खुलने के बाद भी जब तक बहुत जरूरी न हो, यात्रा न करें। मीन राशि वाले उन लोगों को फायदा होगा जो लेखन संबंधी कार्य करते हैं। पुरानी गलतियों में सुधार करेंगे और आगे बढ़ेंगे।
मई का महीना ग्रहों की चाल के बदलने का
मई का महीना ग्रहों की चाल बदलने के लिहाज से अहम माना जा रहा है। Shani Dev के साथ ही दो अन्य ग्रह भी अपनी स्थिति बदलने जा रहे हैं। खास बात यह है कि ग्रहों की चाल बदलने का यह योग एक के बाद एक है। ज्योतिषाचार्य बताते हैं कि 13 मई को शुक्र और 14 मई को बृहस्पति अपनी चाल बदलेंगे। शुक्र 13 मई को दिन में 12 बजकर 12 मिनट पर वृषभ राशि में वक्री हो जाएंगे और इस साल 25 जून तक इसी स्थिति में रहेंगे। वहीं बृहस्पति 14 मई को शाम 7 बजकर 58 मिनट पर वक्री होते हुए मकर राशि में प्रवेश करेंगे।

 
 
पंचायत तंत्र- । जनक नंदिनी एवं प्रभु श्रीराम की अर्द्धांगिनी सीताजी का वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को प्राकट्य हुआ था। यह दिन जानकी नवमी या सीता नवमी के रूप में देशभर में बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन सर्वमंगलदायिनी माता सीता का व्रत करने वाली महिलाओं के अंदर धैर्य, त्याग, शील, ममता और समर्पण जैसे गुण आते है साथ ही आत्मविश्वास भी बढ़ता है। महिलाओं को अपने पति की दीर्घायु और संतान के साथ पारिवारिक शांति एवं आरोग्यता के लिए भगवान श्रीराम-जानकी की पूजा जरूर करनी चाहिए । 
धर्मशास्त्रों के अनुसार इस पावन पर्व पर जो भी भगवान राम सहित माँ जानकी का व्रत-पूजन करता है उसे पृथ्वी दान का फल एवं समस्त तीर्थ भ्रमण का फल स्वतः ही प्राप्त हो जाता है एवं समस्त प्रकार के दुखों, रोगों व संतापों से मुक्ति मिलती है। सीता नवमी के दिन दान-पुण्य का विशेष महत्व होता है। कहते हैं इस दिन दिया गया दान कन्या दान और चारधाम तीर्थ के बराबर माना जाता है। सूर्य, अग्नि एवं चन्द्रमा का प्रकाश हैं सीता
सीता नवमी शुभ फलदायी है क्योंकि भगवान श्री राम स्वयं विष्णु तो माता सीता लक्ष्मी का स्वरूप हैं। सीता नवमी के दिन वे धरा पर अवतरित हुई इस कारण इस सौभाग्यशाली दिन जो भी माता सीता की पूजा अर्चना प्रभु श्री राम के साथ करता है उन पर भगवान श्री हरि और मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है। माता सीता अपने भक्तों को धन, स्वास्थ्य, बुद्धि और समृद्धि प्रदान करती हैं। माँ सीता भूमि रूप हैं,भूमि से उत्पन्न होने के कारण उन्हें भूमात्मजा भी कहा जाता है। माता सीता के स्वरूप सूर्य, अग्नि और चंद्र माने जाते हैं। चन्द्रमा की किरणें विभिन्न औषधिओं को रोग निदान का गुण प्रदान करती हैं। ये चंद्र किरणें अमृतदायिनी सीता का प्राणदायी और आरोग्यवर्धक प्रसाद है। इस दिन माता सीता और भगवान श्रीराम की पूजा के साथ चंद्र देव की पूजा भी जरूर करनी चाहिए।
माँ सीताजी ने ही हनुमानजी को उनकी सेवा-भक्ति  से प्रसन्न  होकर अष्ट सिद्धियों तथा नव निधियों का स्वामी बनाया । रामचरितमानस में तुलसी दास जी ने सीताजी की वंदना करते हुए उन्हें उत्पत्ति,पालन और संहार करने वाली,क्लेशों को हरने वाली एवं समस्त जगत का कल्याण करने वाली राम वल्लभा कहा है ।अनेकों  ग्रंथ उन्हें जगतमाता,एकमात्र सत्य,योगमाया का साक्षात स्वरुप व समस्त शक्तियों की स्त्रोत तथा मुक्तिदायनी कहकर उनकी आराधना करते हैं । सीताजी  क्रिया-शक्ति,इच्छा-शक्ति और ज्ञान-शक्ति,तीनों रूपों में प्रकट होती हैं ।
इस दिन सुहाग की वस्तुओं का करें दान
रोली,अक्षत,कुमकुम,मोली एवं लाल और पीले पुष्प व मिठाई से भगवान राम और उनकी प्राणप्रिया सीताजी की पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके भक्तिभाव से पूजा करें।इस दिन श्रीराम-जानकी की पूजा में तिल या घी का दीपक जलाना अतिशुभ फलदायक है।सीता नवमी के दिन माता सीता को सोलह श्रृंगार एवं लाल चुनरी अर्पित करने से सुख-सौभाग्य में वृद्धि होती है। साथ ही जिन्हें संतान की कामना है वह इस दिन सीता स्रोत का पाठ जरूर करें। इसके बाद सियाराम का भोग लगाकर इन मन्त्रों का जाप करें।
ॐ सीतायाः पतये नमः ।।
और  श्रीसीता-रामाय नमः।।
ऐसे प्रकट हुई देवी सीता
सीता मां के जन्म से जुड़ी कथा का रामायण में उल्लेख किया गया है। इस कथा के अनुसार एक बार मिथिला राज्य में बहुत सालों से बारिश नहीं हो रही थी। वर्षा के अभाव में मिथिला के निवासी और राजा जनक बहुत चिंतित थे। उन्होंने ऋषियों से इस विषय़ पर मंत्रणा की तो उन्होंने कहा कि यदि राजा जनक स्वयं खेत में हल चलाएं तो इन्द्र देव प्रसन्न होंगे और बारिश होगी। राजा जनक ने ऋषियों की बात मानकर हल चलाया। हल चलाते समय उनका हल एक कलश से टकराया जिसमें एक सुंदर कन्या थी। राजा निःसंतान थे इसलिए वह बहुत हर्षित हुए और उन्होंने उस कन्या का नाम सीता रखा। सीता को जानकी और मिथिलेश कुमारी इत्यादि नामों से भी जाना जाता है। इस प्रकार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को सीता प्रकट हुईं थीं।

K.W.N.S.-  आज से दीवाली त्यौहार की शुरुआत हो गई है । दिवाली अर्थात लक्ष्मी जी का त्यौहार । इस त्यौहार में सभी की प्रार्थना और कामना होती है कि लक्ष्मी जी की कृपा उनपर बरसे । इस कृपा के लिए हम तमाम जतन भी करते हैं ।

आपकी इसी कामना के ध्यान में रख कर हम आपके लिए कुछ उपाय लाये हैं जिन उपायों से आप पर लक्ष्मी जी मेहरबान हो सकती हैं । ये उपाय कोई मंत्र-तंत्र न हो कर कुछ टोटके हैं । इन टोटकों से आपकी आर्थिक समस्या दूर होगी ऐसा हमारा विश्वास है ।

1. मंदिर में झाडू का गुप्तदान करें : प्रत्येक शुक्रवार को, प्रातःकाल, “बह्म मुहूर्त” (लगभग 4 बजे से सूर्योदय के पहले का समय) मे चुपचाप किसी मंदिर में एक नई झाडू रख आएं । सिर्फ इतना ध्यान रखें कि झाडू रखते हुए आपको कोई देखे ना । इसबार शुक्रवार को “धनतेरस” पड़ रहा है । यह उत्तम तिथि है झाडू के गुप्त दान की । शुक्रवार के अलावा किसी बड़े त्योहारों, जैसे, दीवाली, दशहरा, रामनवमी, दुर्गा अष्टमी इत्यादि पर भी आप झाडू का गुप्तदान कर सकते हैं ।

2. पीपल के पत्ते अपनी तिजोरी या पैसे रखने की स्थान पर रखें : प्रत्येक शनिवार को एक पीपल का पत्ता तोड़कर, उसे साफ़ पानी से धो लें । फ़िर उसे अपनी तिजोरी, पर्स या ऐसी जगह रख दें जहां आप अपने पैसे रखते हैं । फिर दूसरे शनिवार को यही प्रक्रिया दोहराते रहें । पुराने पीपल के रखे हुए पत्ते को किसी बहती नदी में डाल दें । बहती नदी में डालना सम्भव न हो तो किसी तालाब या कुएं में डाल दें । यह काम प्रत्येक शनिवार को करने से आपकी आर्थिक समस्या, धीरे धीरे दूर हो जाएगी ।

3. लक्ष्मी जी के वाहन “उल्लू” के दर्शन : दीवाली, लक्ष्मी पूजा के दिन यदि आप “उल्लू” देख लेते हैं तो आपकी आर्थिक समस्या हमेशा के लिए दूर तो होगी ही, इसके अलावा आपको कभी भी आर्थिक समस्या नहीं होगी ।

4. कभी भी बिस्तर पर खाना ना खायें : बिस्तर पर खाना खेने से लक्ष्मी हमसे नाराज़ होकर घर छोड़ देती हैं ।

5. रोज़ सूर्य को अर्ध दे : रोज़ सुबह उठकर, नहा धोकर, सूर्योदय पर, पूर्व की ओर मुँह कर, सूर्य को अर्ध (सूर्य को पानी डालना) ज़रूर दें । पृथ्वी में सूर्य ही साक्षात जीवित देव माने जाते हैं । आजकल लोगों को देरी से उठने की आदत हो गई है । यदि देर से भी उठते हैं तो भी नहा धोकर सूर्य को अर्ध ज़रुर दे । पर याद रहे, 12 बजे के बाद सूर्य डूबने की स्तिथि में आ जाते हैं, इसलिये यदि अर्ध देते हैं तो पश्चिम की ओर मुँह करके अर्ध दें ।

6. सुबह बिस्तर से उतने के पहले करे ये : रोज़ सुबह उठकर, बिस्तर से नीचे उतरने से पहले अपनी दोनों हतेलियों को रगड़ लें । फ़िर ऊपर से गोल घूमते हुए एक चक्र लें और हतेलियों को चेहरे पर घुमाएं (जैसे हम चेहरे पर पाउडर लगते है) । यह क्रिया दो बार करें । इसके बाद ही इधर उधर या अन्य चीजें देखें ।

7. आईना बिस्तर के सामने ना हो : आपका बिस्तर कभी भी ऐसा ना हो कि आप उठते ही अपनी शक्ल उसमे देख सकें । इससे हानि होती है ।

इन सब उपायों में से कोई एक भी करें तो धीरे धीरे दूर हो जाएगी आपकी आर्थिक समस्या । ये सभी उपाय, बहुत जल्द असर करेंगे, ये तय है ।

 
गरियाबंद । देवभोग में लंकेश्वरी देवी की परिक्रमा के बाद रावण के दहन करने की परंपरा चली आ रही है. कादाडोंगर में रावण दहन की सूचना पर 84 गांव की ग्रामदेवियों को एकत्रित किया जाता है. वनांचल आदिवासी राजाओं का गढ़ होने के कारण यहां देवियों की पूजा प्राथमिकता से की जाती है. विकासखंड के अधिकांश गांवों में अपनी ग्राम देवियों की पूजा होती है और लगभग प्रत्येक गांव में देवालय होता है. इसे देवीगुढ़ी कहते हैं कहा जाता है यह इलाका खर -दूषण के राज्य वाले दण्डाकारण्य का इलाका था । 
जमीदारों के अधीन इस इलाके में प्राचीन काल से ही देवी देवताओं को विशेष दर्जा दिया जाता था. उनमें से एक थी मां लंकेश्वरी जिन्हें राज देवी का ओहदा मिला हुआ है. मां लंकेश्वरीकी पूजा अर्चना की जाती है । 
बुजुर्ग जानकारों ने बताया कि लंकेश्वरी देवी ,लंका की रक्षा करने वाली लंकनी ही है, जो लंका प्रवेश करने वाले हनुमान के साथ युद्ध में हारकर दण्डाकारण्य इलाका भाग आई थीं. जमीदारों के पूर्वजों ने दक्षिण भारत के भ्रमन के दरम्यान देवी को यंहा से 20 किंमी दूर बरही में लाकर स्थापित किया था. आज भी लंकेश्वरी की पूजा बरही में होती है. 1987 को देवभोग गांधी चौक में अवस्थी परिवार द्वारा मंदिर निर्माण कर  यंहा स्थापित किया था. देवी का पट साल में एक दिन दशहरे को खुलता है. इस दिन लंकेश्वरी रावण दहन की अनुमति भी देती हैं । 
रावण वध का संदेश मिलते ही झूम उठते है देव
यंहा से 28 किंमी दूर कांदाडोंगर का दशहरा भी अनूठा है. विजय दशमी के दिन 84 गांव की ग्राम देवी पताका व पूरे परीधान में एकत्र होती हैं, डोंगर के नीचे सभी देव एकत्र होकर देव वाद्य में नृत्य करते हैं, और दशहरा सम्पन्न होता है. डोंगर के प्रमुख पुजारी मुकेश सिंह है । 
पजारी ने बताया कि दशहरा पर देव पूजन करने वाले वे 7वीं पीढ़ी के पुजारी हैं बताया कि इस दण्डकरण्य में  असुरों का आतंक था. राम रावण का युद्ध पर सभी देव की नजर थी,विजयदशमी को रावण वध कि सूचना मिलते ही ग्रांम देवी इसी कांदाडोंगर  के नीचे एकत्रित होकर खुशियां बाटी थी. आज भी उसी रस्म को पूरा करने विजय दशमी के दिन ग्राम देवी के साथ हजारों की तादात में ग्रामीणों की भीड़ जुटती है. और सत्य की जीत की खुशियां मनाकर एक दूसरे को विजय चिन्ह के रूप में सोंनपत्ति  भेंट करने का रिवाज है ।