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 panchayattantra24.com,-भगवान विष्णु के शेषावतार बलराम का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार इसी माह की अष्टमी तिथि के दिन विष्णु जी के आठवें अवतार भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था। बलराम ने भगवान कृष्ण के बड़े भाई के रूप जन्म लिया था। बलराम जी को हलधर मतलब हलधारण करने वाले के रूप में भी जाना जाता है। इसलिए उनकी जयंती को हल षष्ठी के नाम से भी मनाया जाता है। इस दिन हल की जुताई से उगे हुए अनाज नहीं खाए जाते हैं। इस साल बलराम जंयती 28 अगस्त, दिन शनिवार को पड़ रही है। आइए जानते हैं भगवान बलराम के जन्म की पौराणिक कथा के बारे में…. 
बलराम जी के जन्म की पौराणिक कथा 
भागवत पुराण के अनुसार बलराम या संकर्षण को भगवान विष्णु का शेषावतार माना जाता है। मान्यता है कि भगवान विष्णु का अंश माने जाने वाले शेषनाग, उनके हर अवतार के साथ अवश्य धरती पर आते हैं। भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्री कृष्ण के बड़े भाई के रूप में शेषनाग ने बलराम जी के नाम से अवतार लिआ था। कथा के अनुसार जब मथुरा नरेश कंस अपनी बहन देवकी और उनके पति वासुदेव को विदा कर रहा था, उसी समय आकाशवाणी हुई। आकाशवाणी में देवकी और वासुदेव की आंठवी संतान को कंस का काल बताया था। 
 माता रोहणी के गर्भ से बलराम का जन्म 
इसलिए कंस ने देवकी और वासुदेव को कारगार में कैद कर दिया था। कंस ने एक-एक करके उनकी छह सांतानों को मार दिया था। लेकिन जब सांतवी संतान के रूप में शेषवतार भगवान बलराम गर्भ में स्थापित हुए। तो श्री हरि ने योग माया से उन्हें माता रोहणी के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया था। इसलिए उनका जन्म भगवान कृष्ण के बड़े भाई के रूप में नंदबाबा के यहां हुआ। बलराम मल्लयुद्ध, कुश्ती और गदायुद्ध में पारंगत थे तथा हाथ में हल धारण करते थे। इसलिए उन्हे हलधर भी कहा जाता है। इनके जन्म को हल षष्ठी के रूप में मनाया जाता है।
 

 
panchayattantra24.com,- रक्षाबंधन का पावन पर्व 22 अगस्त, रविवार को मनाया जाएगा। इस पावन दिन बहन अपने भाई की कलाई पर रक्षा बांधती है और भाई बहन को उपहार देता है। हर साल सावन मास की पूर्णिमा तिथि पर रक्षाबंधन का पावन पर्व मनाया जाता है। धार्मिक कथाओं के अनुसार सबसे पहले मां लक्ष्मी ने राजा बलि को राखी बांधी थी। महाभारत में द्रोपदी ने भगवान श्री कृष्ण को राखी बांधी थी और भगवान श्री कृष्ण ने द्रोपदी की लाज रखी थी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भाई को राखी शुभ मुहूर्त में ही बांधी जाती है। भद्रा के समय राखी नहीं बांधनी चाहिए। 
इस साल रक्षा बंधन पर नहीं रहेगा भद्रा का साया इस समय तक बांध लें राखी 22 अगस्त, रविवार को सुबह 6:15 बजे से शाम 5:31 बजे के बीच कभी भी राखी बांधी जा सकती है। इन बातों का रखें ध्यान- राखी बंधवाते समय भाई का मुख पूरब दिशा में और बहन का पश्चिम दिशा में होना चाहिए। इस मंत्र को पढ़ें- राखी बांधते समय यह मंत्र पढ़ना चाहिए ताकि इसका शुभ परिणाम मिल सके। इस रक्षा सूत्र का वर्णन महाभारत में भी आता है। मंत्र : ॐ येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:। तेन त्वामभि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल। सबसे पहले भगवान को राखी बांधें सबसे पहले भगवान को राखी बांधें। भगवान को राखी बांधने के बाद ही भाई को राखी बांधें।
 

panchayattantra24.com,रविवार, 22 अगस्त को रक्षाबंधन का पावन पर्व मनाया जाएगा। हर साल सावन मास में पूर्णिमा तिथि पर भाई- बहन का यह पवित्र त्योहार मनाया जाता है। इस दि बहन भाई को राखी बांधती है और भाई बहन को उपहार देता है और जीवनभर बहन की रक्षा करने का वचन भी देता है। धार्मिक कथाओं के अनुसार रक्षाबंधन के पावन पर्व को मनाने की शुरुआत माता लक्ष्मी ने की थी। सबसे पहले माता लक्ष्मी ने ही अपने भाई को राखी बांधी थी। आइए जानते हैं रक्षाबंधन की पौराणिक कथा…
धार्मिक कथाओं के अनुसार जब राजा बलि ने अश्वमेध यज्ञ करवाया था तब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर राजा बलि से तीन पग धरती दान में मांग ली थी। राजा ने तीन पग धरती देने के लिए हां बोल दिया था। राजा के हां बोलते ही भगवान विष्णु ने आकार बढ़ा कर लिया है और तीन पग में ही पूरी धरती नाप ली है और राजा बलि को रहने के लिए पाताल लोक दे दिया। तब राजा बलि ने भगवान विष्णु से एक वरदान मांगा कि भगवन मैं जब भी देखूं तो सिर्फ आपको ही देखूं। सोते जागते हर क्षण मैं आपको ही देखना चाहता हूं। भगवान ने राजा बलि को ये वरदान दे दिया और राजा के साथ पाताल लोक में ही रहने लगे। 
भगवान विष्णु के राजा के साथ रहने की वजह से माता लक्ष्मी चिंतित हो गईं और नारद जी को सारी बात बताई। तब नारद जी ने माता लक्ष्मी को भगवान विष्णु को वापस लाने का उपाय बताया। नारद जी ने माता लक्ष्मी से कहा कि आप राजा बलि को अपना भाई बना लिजिए और भगवान विष्णु को मांग लिजिए। नारद जी की बात सुनकर माता लक्ष्मी राजा बलि के पास भेष बदलकर गईं और उनके पास जाते ही रोने लगीं। राजा बलि ने जब माता लक्ष्मी से रोने का कारण पूछा तो मां ने कहा कि उनका कोई भाई नहीं है इसलिए वो रो रही हैं। राजा ने मां की बात सुनकर कहा कि आज से मैं आपका भाई हूं। माता लक्ष्मी ने तब राजा बलि को राखी बांधी और उनके भगवान विष्णु को मांग लिया है। ऐसा माना जाता है कि तभी से भाई- बहन का यह पावन पर्व मनाया जाता है।
 

 
panchayattantra24.com,   मुहर्रम के महीने से इस्लामिक साल की शुरुआत होती है. 9 अगस्त की शाम चांद के बाद मुहर्रम माह की शुरूआत हो चुकी है और ये महीना 7 सितंबर तक चलेगा. इस महीने को शोक का महीना माना जाता है. इस महीने में ही इराक के कर्बला मैदान में यजीद के सैनिक और पैंगम्बर मोहम्मद साहब के नवासे हज़रत इमाम हुसैन के बीच लड़ाई हुई थी. महीने के दसवें दिन इमाम हुसैन समेत उनके 72 साथी शहीद हो गए थे. हर साल मु​हर्रम के महीने के 10वें दिन रोज-ए-आशूरा होता है। 
इस दिन हजरत इमाम हुसैन सहित कर्बला के 72 शहीदों की शहादत को याद करते हुए मातम मनाया जाता है. इस बार मुहर्रम आशूरा 19 अगस्त गुरुवार को है. इस दिन शिया मुसलमान हुसैन की याद में मातम करते हैं और काले कपड़े पहनकर जुलूस निकालते हैं. इसके साथ ही इमाम हुसैन के इंसानियत के पैगाम को लोगों तक पहुंचाते हैं. हालांकि इस बार कोरोना के खतरे को देखते हुए यूपी, बिहार और झारखंड समेत तमाम राज्यों ने मुहर्रम को लेकर गाइडलाइन जारी कर दी हैं और ताजिया व अलम सार्वजनिक रूप से स्थापित करने की बजाय घरों में स्थापित करने के निर्देश दिए हैं. यहां जानिए मातम के इस पर्व से जुड़ी खास बातें। 
1. मुहर्रम माह के दसवें दिन पैगंबर हज़रत मोहम्मद के नवासे हज़रत इमाम हुसैन अपने 72 साथियों समेत एक धर्मयुद्ध में शहीद हुए थे और इस्लाम धर्म को नया जीवन प्रदान किया था. 2. कई लोग इस माह में पहले 10 दिनों के रोजे रखते हैं. जो लोग पूरे 10 दिनों को रोजे नहीं रख पाते, वो 9वें और 10वें दिन रोजे रखते हैं. 3. इस दिन पूरे देश में शिया मुसलमानों की अटूट आस्था का समागम देखने को मिलता है. जगह-जगह पानी के प्याऊ और शरबत की शबील लगाई जाती है. लोगों को इंसानियत का पैगाम दिया जाता है. 4. मुहर्रम का महीना शुरू होने से लेकर आशूरा के दिन तक दस दिन इमाम हुसैन के शोक में मनाए जाते हैं. इसलिए इसे मातम का पर्व माना जाता है. 5. इसी महीने में पैगंबर हजरत मुहम्मद साहब, मुस्तफा सल्लाहों अलैह व आलही वसल्लम ने पवित्र मक्का से पवित्र नगर मदीना में हिजरत किया था। 
 

panchayattantra24.com,-आज सावन महीने का आखिरी चौथा सोमवार है. 22 अगस्‍त को रक्षाबंधन पर्व मनाने के साथ शिव जी की आराधना का यह खास महीना खत्‍म हो जाएगा. सावन सोमवार पर हम आज एक ऐसे शिव मंदिर के बारे में जानते हैं जो दिन में 2 बार समुद्र (Sea) में डूब जाता है. मंदिर के इस तरह डूबने और कुछ घंटे बाद फिर प्रकट होने की घटना को देखने के लिए विदेशों से भी पर्यटक आते हैं. यह मंदिर गुजरात के वडोदरा शहर के पास कावी-कंबोई नाम के गांव में है। 
जलस्‍तर घटने पर ही होते हैं दर्शन इस प्राचीन मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं को भगवान के दर्शन करने के लिए समुद्र के जलस्‍तर के घटने का इंतजार करना पड़ता है. समुद्र में आने वाले ज्‍वार-भाटे दिन में 2 बार इस मंदिर को अपने जल में समाहित कर लेते हैं और कुछ देर बाद फिर से शिवलिंग नजर आने लगता है. यह मंदिर अरब सागर (Arabian Sea) के बीच कैम्बे तट पर बना हुआ है भगवान शिव के पुत्र ने बनाया था स्‍तंभेश्‍वर महादेव मंदिर के नाम से विख्‍यात इस तीर्थ के बारे में श्री महाशिवपुराण की रुद्र संहिता में उल्‍लेख किया गया है. इसके मुताबिक यह मंदिर भगवान शिव के बेटे कार्तिकेय ने बनाया था. शिव भक्‍त ताड़कारसुर का वध करने के बाद कार्तिकेय बहुत बैचेन थे, तब अपने पिता के कहने पर उन्‍होंने ताड़कासुर के वध स्‍थल पर यह मंदिर बनाया था. इस मंदिर का शिवलिंग करीब 4 फीट ऊंचा और 2 फीट चौड़ा है. मंदिर की इस चमत्‍कारिक घटना के अलावा लोग खूबसूरत अरब सागर का नजारा देखने के लिए भी यहां आते हैं। 
 

 
panchayattantra24.com,- पूर्णिमा के हिसाब से सावन का अंतिम सोमवार 16 अगस्त को है। जिन्होंने संक्रांति के हिसाब से भी सोमवार का व्रत रखा है उनके लिए 16 अगस्त का सोमवार सावन का अंतिम सोमवार है। इस साल सावन के अंतिम सोमवार पर शिवजी की ऐसी कृपा हुई है कि एक नहीं दो-दो शुभ संयोग बने हैं। सावन के अंतिम सोमवार पर सर्वार्थ सिद्धि योग सावन के सोमवार पर सुबह से ही सर्वार्थ सिद्धि योग बना है। इस योग में शिवजी की पूजा के अलावा आप कोई भी नया काम या कारोबार शुरू कर सकते हैं। जो लोग वाहन खरीदना चाह रहे हैं उनके लिए भी यह शुभ योग है। सर्वार्थ सिद्धि योग में आप सरकरी क्षेत्र से संबंधित काम भी कर सकते हैं। 
रवियोग में सावन का अंतिम सोमवार सर्वार्थ सिद्धि योग के अलावा सावन के अंतिम सोमवार के अवसर पर रवि योग का भी शुभ संयोग बना है। रवियोग के बारे में शास्त्रों में कहा गया है कि इस योग में किसी मंत्र की साधना अधिक फलदायी होती है। सावन के अंतिम सोमवार के अवसर पर इस योग में मनोकामना सिद्धि और आरोग्य सुख के लिए महामृत्युंजय मंत्र का जप बेहद लाभकारी रहेगा। इसलिए 16 अगस्त को अंतिम सावन सोमवार 16 अगस्त के बाद सोमवार 23 अगस्त को आएगा। लेकिन इससे पहले 22 अगस्त को सावन पूर्णिमा लग जाने के कारण 23 अगस्त से भाद्र कृष्ण पक्ष आरंभ हो जाएगा। इसलिए पूर्णिमा के हिसाब से 16 अगस्त ही सावन का अंतिम सोमवार है। जबकि भाद्र संक्रांति 17 अगस्त को लग जाने के कारण 16 अगस्त का सोमवार ही संक्रांति के हिसाब से अंतिम सोमवार हुआ है।
 

हर माह में दो बार चतुर्थी तिथि पड़ती है। एक शुक्ल पक्ष में और एक कृष्ण पक्ष में। ये दोनों तिथियां भगवान गणेश को समर्पित होती हैं। शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली चतुर्थी तिथि को विनायक चतुर्थी और कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली चतुर्थी तिथि को संकष्टी चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। वैशाख के पावन माह में पड़ने वाली संकष्टी चतुर्थी को विकट संकष्टी चतुर्थी भी कहा जाता है। कल यानी 30 अप्रैल, शुक्रवार को विकट संकष्टी है। इस पावन दिन भगवान गणेश की विधि- विधान से पूजा- अर्चना की जाती है। आइए जानते हैं विकट संकष्टी चतुर्थी पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, महत्व…
पूजा विधि…
* इस पावन दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं।
* साफ- स्वच्छ वस्त्र पहन लें। 
* इसके बाद घर के मंदिर में दीपक प्रज्वलित करें।
* इसके बाद भगवान गणेश और सभी देवी- देवताओं को स्नान करवाएं।
* भगवान गणेश को दूर्वा अर्पित करें। 
* भगवान गणेश का अधिक से अधिक ध्यान करें।
* भगवान गणेश को भोग अवश्य लगाएं। इस बात का ध्यान रखें कि भगवान को सिर्फ सात्विक चीजों का भोग लगाया जाता है। आप मोदक या लड्रडुओं का भोग भी लगा सकते हैं।
* भगवान गणेश की आरती करें।
* रात में चंद्रमा के दर्शन व अर्घ्य देने के बाद व्रत खोलें।
शुभ मुहूर्त
* चतुर्थी तिथि प्रारंभ – 29 अप्रैल 2021 रात 10 बजकर 9 मिनट से
* चतुर्थी तिथि समाप्त – 30 अप्रैल 2021 को 7 बजकर 9 मिनट तक
* चंद्रोदय का समय – रात 10 बजकर 48 मिनट
संकष्टी चतुर्थी तिथि महत्व
 * इस दिन भगवान गणेश की पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।
* भगवान गणेश की कृपा से सभी कार्य आसानी से पूरे हो जाते हैं।
* कार्यों में विघ्न नहीं आता है।
* इस पावन दिन चंद्रमा के दर्शन करने का भी बहुत अधिक महत्व होता है। 

panchayattantra24.com,रायपुर। नवरात्रि के पर्व में प्रत्येक दिन मां के अलग-अलग स्वरूप की विधि पूर्वक पूजा की जाती है. नवरात्रि के छठवां दिन मां कात्यायनी की पुजा कि जाती है. नवरात्रि का छठा दिन मां कात्यायनी को समर्पित होता है. पंचांग के अनुसार 18 अप्रैल रविवार को चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि है. इस दिन नक्षत्र आद्रा रहेगा. चंद्रमा इस दिन मिथुन राशि पर रहेगा. नवरात्रि का पर्व बहुत ही पावन और पवित्र माना जाता है. मां दुर्गा के इन स्वरूपों का जीवन में विशेष महत्व है।
मां कात्यायनी करती हैं विवाह में आने वाली दिक्कतों को दूर
मान्यता है कि मां कात्यायनी विवाह में आने वाली बाधाओं को भी दूर करती हैं. नवरात्रि में विधि पूर्वक पूजा करने से विवाह संबंधी दिक्कत दूर हो जाती हैं. एक कथा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण को पति रूप में प्राप्त करने के लिए बृज की गोपियों ने माता कात्यायनी की पूजा की थी. माना जाता है कि माता कात्यायनी की पूजा से देवगुरु बृहस्पति प्रसन्न होते हैं और कन्याओं को अच्छे पति का वरदान देते हैं।
गोधुलि बेला में करें मां कात्यायनी पूजा
नवरात्रि की षष्ठी तिथि को मां कात्यायनी की पूजा गोधुलि बेला यानि शाम के समय में करना उत्तम माना गया है. मां कात्यायनी की पूजा विधि पूर्वक करने से सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है और शत्रुओं का नाश होता है. रोग से भी मुक्ति मिलती है।
पूजा की विधि
मां कत्यायनी की पूजा में नियमों का विशेष ध्यान रखा जाता है. मां की पूजा आरंभ करने से पूर्व एक लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर मां को स्थापित करें. पूजा में पांच प्रकार के फल, पुष्प, मिष्ठान आदि का प्रयोग करें. आज के दिन पूजा में शहद का विशेष प्रयोग किया जाता है. छठे दिन माता कात्यायनी को पीले रंगों से श्रृंगार करना चाहिए।
मां कात्यायनी का मंत्र
ॐ देवी कात्यायन्यै नमः॥
 

स्कंदमाता के आर्शीवाद से नि:संतान महिलाओं को होती है संतान की प्राप्ति, 
 
panchayattantra24.com,रायपुर। नवरात्रि का पर्व 9 दिनों तक मनाया जाता है. नवरात्रि में हर दिन मां दुर्गा के अलग-अलग अवतारों की पूजा की जाती है. नवरात्रि के 5वें दिन आदिशक्ति के स्कंदमाता की पूजा का विधान है. नवरात्रि का 5वें दिन स्कंदमाता को समर्पित होता है. इन्हें पद्मासनादेवी भी कहते हैं। 
कुमार कार्तिकेय की माता होने के कारण इनका नाम स्कंदमाता पड़ा. इस दिन स्कंदमाता की पूजा करने से जीवन मे सुख और शांति आती है. स्कंदमाता मोक्ष प्रदान करने वाली देवी हैं. माता का स्वरूप चार भुजाऔं वाला हैं. इनके दाहिनी तरफ की नीचे वाली भुजा ऊपर की ओर उठी हुई है, उसमें कमल पुष्प है. बाईं तरफ की ऊपर वाली भुजा में वरमुद्रा में तथा नीचे वाली भुजा जो ऊपर की ओर उठी है, उसमें भी कमल पुष्प ली हुई हैं। 
इनका वर्ण पूर्णतः शुभ्र है. ये कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं. माना जात है कि स्कंदमाता अपने भक्तों से बहुत जल्द प्रसन्न हो जाती है. ऐसी मान्यता है कि स्कंदमाता की पूजा करने से मोक्ष के द्वार खुल जाते हैं. वहीं नि:संतान को माता के आर्शीवाद से संतान प्राप्ति होती है. मां स्कंदमाता को केले का भोग लगाया जाता है। 
मां स्कंदमाता पूजा विधि
नवरात्रि के पांचवें दिन स्नान आदि से निवृत हो जाएं और फिर इस दिन पीले रंगे के कपड़े पहनकर माता की पूजा करें, स्कंदमाता का स्मरण करें. इसके पश्चात स्कंदमाता को अक्षत्, धूप, गंध, पुष्प अर्पित करें. उनको बताशा, पान, सुपारी, लौंग का जोड़ा, किसमिस, कमलगट्टा, कपूर, गूगल, इलायची आदि भी चढ़ाएं. फिर स्कंदमाता की आरती करें. माना जाता है स्कंदमाता की पूजा करने से भगवान कार्तिकेय भी प्रसन्न होते हैं। 
मां स्कंदमाता मंत्रः
या देवी सर्वभूतेषु मां स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता.
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:.
 

 
panchayattantra24.com, रायपुर।  नवरात्रि का पावन पर्व देशभर में मनाया जा रहा है. नवरात्रि के नौ दिनों में मां के नौ रूपों की पूजा की जाती है. नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माता चंद्रघंटा को राक्षसों की वध करने वाली कहा जाता है. ऐसा माना जाता है मां ने अपने भक्तों के दुखों को दूर करने के लिए हाथों में त्रिशूल, तलवार और गदा रखा हुआ है। 
मां चंद्रघंटा का यह रूप सुंदर, मोहक और अलौकिक है. माँ चंद्रघंटा की कृपा से अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं, दिव्य सुगंधियों का अनुभव होता है तथा विविध प्रकार की दिव्य ध्वनियाँ सुनाई देती हैं. माता चंद्रघंटा के मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र बना हुआ है, जिस वजह से भक्त मां को चंद्रघंटा कहते हैं. इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है. इनके दस हाथ हैं. इनके दसों हाथों में खड्ग आदि शस्त्र तथा बाण आदि अस्त्र विभूषित हैं. इनका वाहन सिंह है. इनकी मुद्रा युद्ध के लिए उद्यत रहने की होती है. आइए जानते हैं नवरात्रि के तीसरे दिन की पूजा विधि और मंत्र के बारे में…
मां चंद्रघंटा की पूजा विधि 
नवरात्र के तीसरे दिन देवी चंद्रघंटा की आराधना करने के लिए सबसे पहले पूजा स्थान पर देवी की मूर्ति की स्थापना करें. इसके बाद इन्हें गंगा जल से स्नान कराएं. इसके बाद धूप-दीप, पुष्प, रोली, चंदन और फल-प्रसाद से देवी की पूजा करें. अब वैदिक और संप्तशती मंत्रों का जाप करें. मां के दिव्य रुप में ध्यान लगाएं. ध्यान लगाने से आप अपने आसपास सकारात्मक उर्जा का संचार करते हैं। 
मां चंद्रघंटा मंत्र
पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकेर्युता.
प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता॥
ध्यान मंत्र:
वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखरम्.
सिंहारूढा चंद्रघंटा यशस्वनीम्॥
मणिपुर स्थितां तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम्.
खंग, गदा, त्रिशूल,चापशर,पदम कमण्डलु माला वराभीतकराम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्.
मंजीर हार केयूर,किंकिणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम॥
प्रफुल्ल वंदना बिबाधारा कांत कपोलां तुगं कुचाम्.
कमनीयां लावाण्यां क्षीणकटि नितम्बनीम्॥
स्तोत्र पाठ:
आपदुध्दारिणी त्वंहि आद्या शक्तिः शुभपराम्.
अणिमादि सिध्दिदात्री चंद्रघटा प्रणमाभ्यम्॥
चन्द्रमुखी इष्ट दात्री इष्टं मन्त्र स्वरूपणीम्.
धनदात्री, आनन्ददात्री चन्द्रघंटे प्रणमाभ्यहम्॥
नानारूपधारिणी इच्छानयी ऐश्वर्यदायनीम्.
सौभाग्यारोग्यदायिनी चंद्रघंटप्रणमाभ्यहम्॥