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K.W.N.S.-होली का पर्व हर साल पूरे देश ही नहीं बल्कि दुनियाभर में आनंद और ख़ुशी से मनाया जाता है। फाल्गुन पूर्णिमा के दिन शुभ मुहूर्त में होलिका का दहन किया जाता है। अगर आप होली के दिन कुछ नियमों का पालन नहीं करते हैं तो आपको जीवन में कई बार परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसीलिए होली के दिन कुछ बातों का और रीति रिवाजों का पालन जरुर करें। जिससे आप जीवन में आने वाली परेशानियों और संकटों से दूर रही बने रहें। तो आइए जानते इस बार होली के दिनक्या करें और क्या ना करें।
होली के दिन क्या करें और क्या ना करें होली के दिन घर में अपशब्द का प्रयोग न करें ऐसा करने से घर की शांति भंग होती है और दरिद्रता का घर में वास हो जाता है। होली के दिन लोगों का सम्मान करें और उनसे अच्छा बर्ताव करें। होली का उत्सव प्रेम से और मिलकर ही मनाये। होली के दिन घर में साफ सफाई करें और भगवन की पूजा भी करें। होली के दिन भूलकर भी देर तक ना सोये, ऐसा करने से घर में नकारात्मक शक्ति का बसेरा हो जाए और घर में जो शांति और जो सुख है उसका नाश हो जाएगा।
होली के दिन घर में मीठे पकवान पकाए और मिठाई आदि से भगवान को भोग लगाकर ही उन्हें ग्रहण करें। होली के दिन भूलकर भी मांस -मदिरा का सेवन ना करें ऐसा करने से घर में भगवान आपसे प्रसन्न नहीं होंगे और आपको कई परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। होली के जलने पर उसमें से थोड़ी अग्नि अपने घर लेकर आयें और घर में बनाई गई होलिका को भी उस अग्नि से जला दीजिये और उसमे नारियल की गरी और गेहू की बाली भुन लें और उसका सेवन करें। ऐसा करने से आपको दीर्घायुष और मन सम्मान मिलेगा।
होली के दिन अपने मन में किसी भी व्यक्ति के प्रति शत्रुता या जलन न रखें और होली के दिन अपने सभी संबधी को होली की शुभकामनाएं दें। होली जलने के बाद भोर के समय अपने घर के बीच एक चौकोर टुकड़ा साफ़ करके रख दें और उसमे ”कली ” लिख दें और उसमे कामदेव का पूजन करें। कामदेव को पांच अलग अलग रंग के फूल चढ़ाये। इससे आपके घर में सुख और शांति आएगी। होली के दिन भूलकर भी कर्ज या पैसों का लेनदेन ना करें ऐसा करने आपके घर में जो मां लक्ष्मी है वो नाराज हो जाती हैं और आपके घर में गरीबी आती है। होली के दिन अपने घर में जो धन है उसकी पूजा करें और होली जलने के बाद उसकी राख अपने तिजोरी में रखे। होली के दिन भूलकर भी न बाल कटवाए और ना शेविंग करें ऐसा करने से आपको कई पीड़ा और बीमारियों का समना करना पड़ेगा।

महाशिवरात्रि पर इस साल शुभ योग का निर्माण हो रहा है। भगवान शिव की महाशिवरात्रि पर विधिवत पूजा करने पर भक्तों की मन की मुरादें पूरी होने की मान्यता है। महाशिवरात्रि के दिन सात राशि के लोग अति भाग्यशाली रहने वाले हैं। अगर आप भी महाशिवरात्रि पर भगवान शंकर को करना चाहते हैं प्रसन्न, तो जानिए महाशिवरात्रि के दिन शिवलिंग पर किन तीन चीजों को करना चाहिए अर्पित-
पंचामृत- महाशिवरात्रि के दिन भगवान शंकरको पंचामृत से स्नान कराएं। भगवान शिव का पंचामृत से अभिषेक करें। मान्यता है कि ऐसा करने से भगवान शिव की कृपा से मनोकामना पूरी होती है और भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
बेलपत्र- महाशिवरात्रि के दिन 11 बेलपत्र पर गाय का घी लगाकर भगवान शंकर को अर्पित करें। इस दौरान ऊँ नम: शिवाय मंत्र का जाप करें। मान्यता है कि ऐसा करने से भगवान शिव की कृपा से मनोकामना पूरी होती है।
धतूरा- भगवान शिव को धतूरा अतिप्रिय है। महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव को धतूरा अर्पित करें। मान्यता है कि सच्चे मन से ऐसा करने वाले भक्त की मुराद खाली नहीं जाती है।
इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। इन्हें अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।
महाशिवरात्रि का त्योहार इस साल 1 मार्च, मंगलवार को मनाया जाएगा। भगवान शिव को समर्पित यह त्योहार इस साल बेहद खास होने वाला है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, महाशिवरात्रि पर इस साल दो शुभ संयोग बन रहे हैं। महाशिवरात्रि के दिन इस साल पंचग्रही योग का भी निर्माण हो रहा है। मान्यता है कि इस शुभ संयोग में भगवान शिव की पूजा करने से भक्तों को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।
महाशिवरात्रि पर ग्रहों का शुभ योग-
12वें भाव में मकर राशि में पंचग्रही योग का निर्माण होगा। इस राशि में मंगल और शनि के अलावा बुध, शुक्र और चंद्रमा भी विराजमान होंगे। लग्न में कुंभ राशि में सूर्य और गुरु की युति बनेगी। वृषभ राशि के चौथे भाव में राहु और वृश्चिक राशि के दसवें भाव में केतु विराजमान रहेंगे।
बनेंगे ये खास योग-
महाशिवरात्रि पर इस साल धनिष्ठा योग का निर्माण होगा। धनिष्ठा योग के बाद शतभिषा नक्षत्र रहेगा। इसके बाद शिव योग लग जाएगा। मान्यता है कि इस योग में भगवान शिव की पूजा करने से कार्यों में सफलता मिलती है।

panchayattantra24.com,मकर संक्रांति का उत्सव कई स्थानों पर 15 जनवरी को मनाया जाएगा. ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक सूर्य का मकर राशि में प्रवेश हो चुका है. मकर राशि के स्वामी शनि देव हैं. मकर संक्रांति पर्व का शनि देव से भी कनेक्शन है. अरअसल संक्रांति से अगले एक महीने तक सूर्य अपने पुत्र शनि के साथ रहते हैं. मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन सूर्य अपने पुत्र से मिलने आते हैं. कहते हैं कि इस दिन सूर्यदेव ने शनि को एक वरदान दिया था. आगे जानते हैं पौराणिक कथा
सूर्य देव को मिला श्राप
शनि के काले होने के कारण उनके पिता सूर्यदेव उन्हें पसंद नहीं करते थे. जिस कारण उन्होंने शनि को उनकी माता छाया से अलग कर दिया. इससे दुखी होकर छाया ने सूर्यदेव को कुष्ट रोगी होने का श्राप दे दिया. जिसके बाद सूर्य कुष्ट रोग से पीड़ित हो गए. करते हैं कि तब सूर्य देव की दूसरी पत्नी के पुत्र यमराज ने अपने तप से पिता के स्वस्थ कर दिया।
सूर्य देव ने जला दिया शनिदेव का घर
कुष्ठ रोग से मुक्त होने के बाद सूर्य देव ने गुस्सा होकर शनि और छाया के घर कुंभ को जला दिया. जिस कारण छाया और शनि देव बहुत दुख. वहीं दूसरी ओर यमराज ने सूर्य देव को छाया और शनि देव के साथ ऐसा व्यवहार न करने की सलाह दी. इधर जब सूर्य देव का क्रोध शांत हुआ. तब एक दिन सूर्य देव अपने पुत्र शनि और पत्नी छाया के घर गए।
शनिदेव को मिला वरदान
सूर्य देव ने देखा छाया के घर सब कुछ जलकर खाक हो गया है. शनि देव के घर केवल काला तिल ही बचा था. ऐसे में शनि देव ने काले तिल से भी अपने पिता का स्वागत किया. ऐसा देखकर सूर्य देव प्रसन्न हुए और उन्हें दूसरा घर मकर प्रदान किया. साथ ही यह भी वरदान दिया कि जब वे मकर संक्रांति पर मकर राशि में आएंगे तो उनका घर धन-धान्य से परिपूर्ण हो जाएगा. जो मनुष्य इस दिन काले तिल से सूर्य की पूजा करेगा, उसके सारे कष्ट शीघ्र दूर हो जाएंगे।
मकर संक्रांति हिंदुओं का प्रमुख त्योहार है। पौष मास में इस दिन सूर्य उत्तरायण होकर मकर राशि में प्रवेश करता है। इस साल मकर संक्रांति 14 जनवरी को मनाई जाएगी। इस वर्ष संक्रांति का पुण्य काल दोपहर 02.43 बजे से शाम 06.04 बजे तक है। मकर संक्रांति पर स्नान और दान जैसे कार्यों का विशेष महत्व माना जाता है। यह त्योहार अलग-अलग शहरों में अलग नामों से मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन किए गए दान का फल बाकी दिनों की तुलना में कई गुना अधिक होता है। वह जातकों को शनि और राहु की पीड़ा से भी मुक्ति मिलती है। आइए जानते हैं किन चीजों का दान करना शुभ है।खिचड़ी
मकर संक्रांति पर खिचड़ी का दान करना शुभ होता है। वहीं इस दिन खिचड़ी खाना भी शुभ माना गया है।
गुड़
इस दिन गुड़ दान करना शुभ है। मान्यता है कि इसके दान से सूर्यदेव प्रसन्न होते है।
तेल
मकर संक्रांति के दिन तेल का दान करना शुभ माना गया है। मान्यता है कि तेल दान से शनि देव की कृपा मिलती है।
तिल
इस दिन तिल का दान करना चाहिए। इससे शनि की पीड़ा से मुक्ति मिलती है।
घी
मकर संक्रांति पर घी का दान करने से करियर में तरक्की होती है।
अनाज
इस दिन पांच तरह के अनाज दान करना चाहिए। इससे सभी मनोकामना पूरी होती है।
कंबल
मकर संक्रांति के दिन काले कंबल दान करना चाहिए। इससे शनि और राहु के दोष से मुक्ति मिलती है।

panchayattantra24.com,मां लक्ष्मी की कृपा जिस घर पर होती है वहां कोई कष्ट कभी नहीं आता है. मां लक्ष्मी को धन वैभव और ऐश्वर्य की देवी माना जाता है. मां लक्ष्मी अपनी कृपा से व्यक्ति के जीवन में सुख-समृद्धि बनाती हैं. अगर मां लक्ष्मी किसी घर से रुष्ट हो जाएं तो घर में दुख और दरिद्रा का वास हो जाता है. इसलिए हर किसी की कोशिश यही होती है कि मां लक्ष्मी की कृपा बनी रही. मां लक्ष्मी को खुश करने के लिए लोग तरह तरह की पूजा अर्चना भी करते हैं।
रसोई में भी मां अन्नपूर्णा का वास माना जाता है. वास्तु शास्त्र में कुछ ऐसी चीजों को बारे में बताया गया है, जिन्हें रसोई में कभी भी पूरी तरह से खत्म नहीं होने देना चाहिए. बताया गया है कि अगर रसोई में ये चीजें खत्म हो जाती है तो नकारात्मकता बढ़ती है और मां लक्ष्मी रुष्ट होती हैं. आइए जानते हैं कि कौन सी हैं वो चीजें-
आटा
आटा के बिना हर एक रसोई अधूरी रहती है. लेकिन कई बार ऐसा हो जाता है कि घर का पूरा आटा खत्म हो जाता है, लेकिन वास्तु के अनुसार आटा खत्म होने से पहले ही लाकर रख देना चाहिए. कहते हैं कि आटे के बर्तन को खाली नहीं रखना चाहिए, क्यों इससे आपके घर में अन्न और धन की की होने लगती है व मान-सम्मान की हानि भी हो सकती है।
हल्दी
हल्दी का उपयोग सबसे ज्यादा कारगार माना जाता है. तमाम चीजों को बनाने में भी हल्दी का ही ही उपयोग किया जाता है. हल्दी का शुभ कार्यों और देव पूजा में भी इस्तेमाल किया जाता है. हल्दी का संबंध गुरु ग्रह से माना गया है. ऐसे में कहा जाता है कि इसकी कमी गुरु दोष होती है. अगल किचम में पूरी तरह से हल्दी खत्म हो जाती है तो सुख-समृद्धि की कमी हो सकती व शुभ कार्यों में व्यवधान हो जाती है।
चावल
कई बार हम लोगों ने देखा है कि चावल में कीड़े ना पड़ जाएं इस कारण से पूरे खत्म होने के बाद ही मंगवाते हैं, जबकि ये सब गलत होता है.चावल को शुक्र का पदार्थ माना गया है और शुक्र को भौतिक सुख सुविधा का कारक माना जाता है. घर में हमेशा चावल के खत्म होने के पहले ही मंगवा लें।
नमक
नमक एक ऐसी चीज है जो हर एक घर में होती है, क्योंकि नमक के बिना खाने का हर एक स्वाद अधूरा सा रहता है. ऐसे में आपको बता दें कि चाहें कुछ भी हो जाए घर में नमक का डिब्बा पूरी तरह से खाली नहीं होना चाहिए.अगर घर में नमक का डिब्बा खाली रहता है तो आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ जाता है. इसके साथ ही कभी भी दूसरे के घर से नमक नहीं मांगना चाहिए।
panchayattantra24.com,रायपुर। श्री दुर्गा का सप्तम रूप माँ कालरात्रि हैं. ये काल का नाश करने वाली हैं, इसलिए कालरात्रि कहलाती हैं. नवरात्रि के सप्तम दिन इनकी पूजा और अर्चना की जाती है. इस दिन साधक को अपना चित्त भानु चक्र (मध्य ललाट) में स्थिर कर साधना करनी चाहिए. संसार में कालो का नाश करने वाली देवी कालरात्री ही है. भक्तों द्वारा इनकी पूजा के उपरांत उसके सभी दुःख, संताप भगवती हर लेती है।
मां दुश्मनों का नाश करती है और मनोवांछित फल प्रदान कर उपासक को संतुष्ट करती हैं. इनके शरीर का रंग घने अंधकार की भाँति काला है, बाल बिखरे हुए, गले में विद्युत की भाँति चमकने वाली माला है. इनके तीन नेत्र हैं जो ब्रह्माण्ड की तरह गोल हैं, जिनमें से बिजली की तरह चमकीली किरणें निकलती रहती हैं. इनकी नासिका से श्वास, निःश्वास से अग्नि की भयंकर ज्वालायें निकलती रहती हैं।
इनका वाहन ‘गर्दभ’ (गधा) है. दाहिने ऊपर का हाथ वरद मुद्रा में सबको वरदान देती हैं, दाहिना नीचे वाला हाथ अभयमुद्रा में है. बायीं ओर के ऊपर वाले हाथ में लोहे का कांटा और निचले हाथ में खड्ग है. माँ का यह स्वरूप देखने में अत्यन्त भयानक है किन्तु सदैव शुभ फलदायक है, उसकी समस्त विघ्न बाधाओं और पापों का नाश हो जाता है और उसे अक्षय पुण्य लोक की प्राप्ति होती है।
कालरात्रि की पूजा विधि
देवी का यह रूप ऋद्धि सिद्धि प्रदान करने वाला है. दुर्गा पूजा का 7वां दिन तांत्रिक क्रिया की साधना करने वाले भक्तों के लिए अति महत्वपूर्ण होता है. दुर्गा पूजा में सप्तमी तिथि का काफी महत्व बताया गया है. इस दिन से भक्तजनों के लिए देवी मां का दरवाजा खुल जाता है और भक्तगण पूजा स्थलों पर देवी के दर्शन हेतु पूजा स्थल पर जुटने लगते हैं।
सप्तमी की पूजा सुबह में अन्य दिनों की तरह ही होती परंतु रात्रि में विशेष विधान के साथ देवी की पूजा की जाती है. इस दिन अनेक प्रकार के मिष्ठान और कहीं कहीं तांत्रिक विधि से पूजा होने पर मदिरा भी देवी को अर्पित कि जाती है. सप्तमी की रात्रि सिद्धियों की रात भी कही जाती है. कुण्डलिनी जागरण हेतु जो साधक साधना में लगे होते हैं, आज सहस्त्रसार चक्र का भेदन करते हैं. पूजा विधान में शास्त्रों में जैसा वर्णित हैं उसके अनुसार पहले कलश की पूजा करनी चाहिए फिर नवग्रह, दशदिक्पाल, देवी के परिवार में उपस्थित देवी देवता की पूजा करनी चाहिए फिर मां कालरात्रि की पूजा करनी चाहिए।
देवी की पूजा से पहले उनका ध्यान करना चाहिए
देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्तया,
निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां,
भक्त नता: स्म विदधातु शुभानि सा नः
देवी कालरात्रि के मंत्र
या देवी सर्वभूतेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
मंत्र- ॐ ह्रीं ऐं ज्वल-ज्वल कालरात्रि देव्यै नमः।।
भगवती कालरात्रि का ध्यान, कवच, स्तोत्र का जाप करने से ‘भानुचक्र’ जागृत होता है. इनकी कृपा से अग्नि भय, आकाश भय, भूत पिशाच स्मरण मात्र से ही भाग जाते हैं. कालरात्रि माता भक्तों को अभय प्रदान करती है।
देवी कालरात्रि का महत्व
दुर्गा सप्तशती के प्रधानिक रहस्य में बताया गया है कि जब देवी ने इस सृष्टि का निर्माण शुरू किया और ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रकटीकरण हुआ उसस पहले देवी ने अपने स्वरूप से तीन महादेवीयों को उत्पन्न किया. सर्वेश्वरी महालक्ष्मी ने ब्रह्माण्ड को अंधकारमय और तामसी गुणों से भरा हुआ देखकर सबसे पहले तमसी रूप में जिस देवी को उत्पन्न किया वह देवी ही कालरात्रि हैं. देवी कालरात्रि ही अपने गुण और कर्मों द्वारा महामाया, महामारी, महाकाली, क्षुधा, तृषा, निद्रा, तृष्णा, एकवीरा, एवं दुरत्यया कहलाती हैं।
अपने महा विनाशक गुणों से शत्रु और दुष्ट लोगों का संहार करने वाली सातवीं दुर्गा का नाम कालरात्रि है. विनाशिका होने के कारण इसका नाम कालरात्रि पड़ गया. आकृति और सांसारिक स्वरूप में यह कालिका का अवतार यानी काले रंग रूप की अपनी विशाल केश राशि को फैलाकर चार भुजाओं वाली दुर्गा है. यह वर्ण और वेश में अर्द्धनारीश्वर शिव की ताण्डव मुद्रा में नजर आती है. इसकी आंखों से अग्नि की वर्षा होती है।
एक हाथ से शत्रुओं की गर्दन पकड़कर दूसरे हाथ में खड़क तलवार से युद्ध स्थल में उनका नाश करने वाली कालरात्रि सचमुच ही अपने विकट रूप में नजर आती है. इसकी सवारी गधर्व यानी गधा है जो समस्त जीव जन्तुओं में सबसे अधिक परिश्रमी और निर्भय होकर अपनी अधिष्ठात्री देवी कालरात्रि को लेकर इस संसार में विचरण कर रहा है. कालरात्रि की पूजा नवरात्र के सातवें दिन की जाती है. इसे कराली भयंकरी कृष्णा और काली माता का स्वरूप भी प्रदान है लेकिन भक्तों पर उनकी असीम कृपा रहती है और उन्हें वह हर तरफ से रक्षा ही प्रदान करती है।
कालरात्रि की उपासना करने से ब्रह्मांड की सारी सिद्धियों के दरवाजे खुलने लगते हैं और तमाम असुरी शक्तियां उनके नाम के उच्चारण से ही भयभीत होकर दूर भागने लगती हैं. इसलिए दानव, दैत्य, राक्षस और भूत-प्रेत उनके स्मरण से ही भाग जाते हैं. यह ग्रह बाधाओं को भी दूर करती हैं और अग्नि, जल, जंतु, शत्रु और रात्रि भय दूर हो जाते हैं. इन की कृपा से भक्त हर तरह के भय से मुक्त हो जाता है. नवरात्री में दुर्गा सप्तशती पाठ किया जाता हैं।

panchayattantra24.com,रायपुर। नवरात्रि में माँ दुर्गा जी के तीसरे शक्तिरूप का नाम ‘‘चंद्रघंटा” है. इनके मस्तक में घण्टे के आकार का अर्धचंद्र है, इस कारण माता के इस रूप का नाम चंद्रघंटा पड़ा. इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है. इनके दस हाथ हैं और सभी हाथों में खड्ग आदि शस्त्र तथा बाण आदि अस्त्र विभूषित है. इनका वाहन सिंह है. इनकी मुद्रा यु़द्ध के लिए उद्यत रहने की होती है. इनके घण्टे की भयानक चण्डध्वनि से अत्याचारी दानव-दैत्य-राक्षस सदैव प्रकम्पित रहते हैं।
‘अग्नि’ तत्व की तेजोमयी मूर्ति ‘मां चंद्रघंटा’ अमृतमयी, स्वब्रह्मामयी रूपिणी है. चंद्र में प्रकाश सूर्य द्वारा प्रकाशित है. चंद्र अर्थात सोमरस प्रदान करने वाली, श्रेष्ठमयी, घण्टा अर्थात ‘अग्नि’शब्द ध्वनि का परिचायक है, भगवती का अग्निमय, क्रियात्मक स्वरूप है. घण्टे से ‘ब्रह्मनाद’व अनहत नाद स्वरूपिणी हैं. घण्टे की ध्वनि से प्रेत-बाधादि से रक्षा होती है।
इनकी आराधना से होने वाला एक बहुत बड़ा सद्गुण यह भी है कि वीरता-निर्भयता के साथ सौम्यता एवं विनम्रता का भी विकास होता है. माता के इस रूप की साधना करने से समस्त सांसारिक कष्टों से विमुक्त होकर सहज ही परमपद प्राप्त होता है. नवरात्रि उपासना में तीसरे दिन परम शक्तिदायक और कल्याणकारी स्वरूप की आराधना की जाती है।
ये है मंत्र
पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता।।
कैसे होता मां चंद्रघंटा का रूप
माता का तीसरा रूप मां चंद्रघंटा शेर पर सवार हैं. दसों हाथों में कमल और कमडंल के अलावा अस्त-शस्त्र हैं. माथे पर बना आधा चांद इनकी पहचान है. इस अर्ध चांद की वजह से इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है।
इस रंग के कपड़े पहन सकते हैं
मां चंद्रघंटा की पूजा में उपासक को सुनहरे या पीले रंग के वस्त्र पहनने चाहिए आप मां को खुश करने के लिए सफेद कमल और पीले गुलाब की माला अर्पण करें।

panchayattantra24.com,फरसगांव। ब्लॉक से लगभग 8 किमी दूर पश्चिम से बड़ेडोंगर मार्ग पर ग्राम आलोर स्थित है. ग्राम से लगभग 2 किमी दूर उत्तर पश्चिम में एक पहाड़ी है जिसे लिंगई गट्टा लिंगई माता के नाम से जाना जाता है।
इस छोटी से पहाड़ी के ऊपर विस्तृत फैला हुई चट्टान के ऊपर एक विशाल पत्थर है. बाहर से अन्य पत्थर की तरह सामान्य दिखने वाला यह पत्थर स्तूप-नुमा है. इस पत्थर की संरचना को भीतर से देखने पर ऐसा लगता है कि मानो कोई विशाल पत्थर को कटोरानुमा तराश कर चट्टान के ऊपर उलट दिया गया है. लिंगई माता मंदिर के दक्षिण दिशा में एक सुरंग है जो इस गुफा का प्रवेश द्वार है. द्वार इनता छोटा है कि बैठकर या लेटकर ही यहां प्रवेश किया जा सकता है. गुफा के अंदर 25 से 30 आदमी बैठ सकते हैं. गुफा के अंदर चट्टान के बीचों-बीच निकला शिवलिंग है, जिसकी ऊंचाई लगभग दो फुट होगी. श्रद्धालुओं का मानना है कि इसकी ऊंचाई पहले बहुत कम थी समय के साथ यह बढ़ गई।
जाने किस दिन खुलेगा मंदिर
परंपरा और लोक मान्यता के कारण इस प्राकृतिक मंदिर में प्रतिदिन पूजा अर्चना नहीं होती है. लेकिन मंदिर का पट वर्ष में एक बार खुलता है और इसी दिन यहां मेला भरता है. यह पट इस साल 15 सितंबर को खुलेगा. समिति ने बैठक में निर्णय लिया है कि कोरोना को देखते हुए इस बार पुजारी ही पूजा करेंगे. भक्तों को एंट्री नहीं मिलेगी. मंदिर के पुजारी ने कहा कि कोरोना संक्रमण के कारण मंदिर का पट दो साल बाद खुलेगा।
इस मंदिर से जुड़ीं हैं दो मान्यताएं
लिंगई माता मंदिर के इस धाम से जुड़ी दो विशेष मान्यताएं प्रचलित हैं. पहली मान्यता संतान प्राप्ति के बारे में है. यहां आने वाले अधिकांश श्रद्धालु संतान प्राप्ति की मन्नत मांगने आते है. यहां मनौती मांगने का तरीका अनूठा है. संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले दंपत्ति को खीरा चढ़ाना होता है. प्रसाद के रूप में चढ़े खीरे को पुजारी, पूजा के बाद दंपति को वापस लौटा देता है. इसके बाद दंपत्ति को शिवलिंग के सामने ही इस ककड़ी को अपने नाखून से चीरा लगाकर दो टुकड़ों में तोड़कर इस प्रसाद को दोनों को ग्रहण करना होता है. चढ़ाए हुए खीरे को नाखून से फाड़कर शिवलिंग के समक्ष ही (कड़वाभाग सहित) खाकर गुफा से बाहर निकलना होता है।
ये है दूसरी मान्यता
यहां प्रचलित दूसरी मान्यता भविष्य के अनुमान को लेकर है. एक दिन की पूजा के बाद मंदिर बंद कर दिया जाता है. बाहरी सतह पर रेत बिछा दी जाती है. अगले साल इस रेत पर जो चिन्ह मिलते हैं, उससे पुजारी भविष्य का अनुमान लगाते हैं. उदाहरण स्वरूप यदि कमल का निशान हो तो धन संपदा में बढ़ोत्तरी होती है, हाथी के पांव के निशान हो तो उन्नति, घोड़ों के खुर के निशान हों तो युद्ध, बाघ के पैर के निशान हो तो आतंक तथा मुर्गियों के पैर के निशान होने पर अकाल होने का संकेत माना जाता है।

panchayattantra24.com,-पुराणों और शास्त्रों में शनि देव को न्याय और दण्ड का देवता माना गया है। मान्यता है कि शनि देव व्यक्ति को उसके कार्यों के आधार पर दण्ड प्रदान करते हैं। शनि देव इसी दण्डाधिकारी रूप के कारण सभी उनसे डरते हैं। लेकिन शनि देव और भगवान कृष्ण के बीच एक अनूठा संबंध है, इस कारण शनि देव कृष्ण भक्तों को कभी परेशान नहीं करते हैं। देश में शनिदेव और भगवान कृष्ण का एक ऐसा पौराणिक मंदिर है जहां भगवान कृष्ण ने कोयल के रूप में शनिदेव को दर्शन दिए थे। इस मंदिर में शनिदेव का दर्शन करने और उन्हें सरसों का तेल चढ़ाने से शनि की साढ़े साती और ढैय्या से मुक्ति मिलती है । आइए जानते हैं शनिदेव के इस अनूठे मंदिर के बारे में…
कोकिला वन मदिंर भगवान कृष्ण की नगरी के रूप में प्रसिद्ध मथुरा जनपद के कोसी कलां नामक स्थान पर शनि देव का एक अनूठा मंदिर है। इस मंदिर को कोकिला वन के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर में शनि देव के साथ भगवान कृष्ण और राधा का भी पूजन किया जाता है। मान्यता है कि जो भी व्यक्ति शनि की साढे साती या ढैय्या से परेशान हो उन्हे इस मंदिर में आ कर शनि देव को सरसों का तेल चढ़ाना चाहिए। शनि मंत्रों का पाठ करते हुए मंदिर की परिक्रमा की जाती है। ऐसा करने से शनि देव की महादशा से मुक्ति मिलती है।
कोकिला वन की पौराणिक कथा शनिदेव बाल्यकाल से ही भगवान कृष्ण के अनन्य भक्त हैं। शनि देव में न्याय प्रियता, सच्चाई, इमानदारी और अनुसाशन का गुण भगवान कृष्ण की भक्ति से ही प्राप्त किया है। एक बार शनि देव ने भगवान कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप किया था। शनिदेव की तपस्या से प्रसन्न हो कर भगवान कृष्ण ने उन्हें इसी वन में कोयल के रूप में शनि देव को दर्शन दिए थे। इसलिए इस वन को कोकिला वन के नाम से जाना जाता है। डिसक्लेमर ‘इस लेख में निहित किसी भी जानकारी/सामग्री/गणना की सटीकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों से संग्रहित कर ये जानकारियां आप तक पहुंचाई गई हैं। हमारा उद्देश्य महज सूचना पहुंचाना है, इसके उपयोगकर्ता इसे महज सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त, इसके किसी भी उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता की ही रहेगी।’