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 K.W.N.S.-सोमवार को अमावस्या,शनि जयंती और वट सावित्री व्रत तीन पर्व एक साथ है। इस दिन जहां महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखेंगी, वहीं शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए लोग शनि के लिए व्रत रखेंगे और पूजा के साथ उपाय करेंगे। दरअसल ज्येष्ठ शुक्ल अमावस्या तिथि पर शनिदेव का जन्म हुआ था। इसलिए इस दिन शनिदेव की विशेष पूजा अर्चना की जाती है। भगवान सूर्यदेव और छाया शनिदेव के माता पिता है। शनि न्यायप्रिय ग्रह हैं। ये कर्म के अनुसार फल देते हैं। इसलिए अगर सही में शनिदेव को प्रसन्न करना चाहते हैं तो कुछ बातों को हमेशा के लिए गांठ बांध लें। 
शनि जयंती पर शनि महादशा, साढ़ेसाती और ढैया वालों को करना चाहिए ये उपाय 1. कभी भी किसी जरुरतमंद इंसान का पैसा हड़पने की कोशिश न करें। हो सके तो उसकी मदद करें। इससे शनिदेव प्रसन्न होते हैं। 2.अपने माता-पिता का आदर करें। इसेस भी शनिदेव प्रसन्न होते हैं। गरीबों की मदद करने वाले पर भी शनिदेव कृपा बरसाते हैं। 3.शनिदेव को खुश रखना चाहते हैं तो सुबह जल्दी उठें और रात को जल्दी सोएं। अपने से अधीनिस्थ लोगों से अच्छा व्यवहार करें।
4.शनिदेव की पूजा में इस बात का खास ध्यान रखऩा चाहिए कि इनकी नजर से नजर मिलाकर पूजा नहीं करनी चाहिए। 5.शनिदेव की पूजा पीपल के पेड़ के नीचे खड़े होकर करें। इस दिन पीपल के पेड़ के नीचे दिया भी जलाएं। 6.शनि जयंती के दिन किसी बीमार व्यक्ति को दवा और भोजन का दान भी करना उत्तम रहता है। 7.अपने पितरों के निमित्त दूध और सफेद मिठाई मंदिर में पंडित जी को दें। 8, किसी सताए हुए का मजाक न बनाएं, हो सके तो उसकी मदद करें। 9.ओम शम शनैश्चराय नमः का सामर्थ्यानुसार एक माला, तीन माला, पांच माला जाप करें। 10. इस दिन सरसों का तेल दान करना भी उत्तम रहता है।
 

सोमवार के दिन पड़ने वाली अमावस्या को सोमवती अमावस्या कहा जाता है। इस बार 30 मई 2022, सोमवार को ज्येष्ठ मास की अमावस्या है। इसी दिन शनिदेव जी का भी जन्म हुआ था। इस साल इस दिन वट सावित्री पूजा भी है। इसके अलावा सोमवती अमावस्या के दिन सर्वार्थ सिद्धि योग व सुकर्मा योग भी बन रहा है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, ऐसा संयोग करीब 30 साल बाद बन रहा है। सोमवती अमावस्या के दिन पितृदोष से मुक्ति के लिए करें ये उपाय-
1. पितृ तर्पण व पिंडदान- सोमवती अमावस्या के दिन ही पितरों को जल देने से उन्हें तृप्ति मिलती है महाभारत काल से ही सोमवती अमावस्या पर तीर्थस्थलों पर पिंडदान का विशेष महत्व है।
2. दान- सोमवती अमावस्या के दिन शनि और चंद्र का दान करना चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से पितृदोष से मुक्ति मिलती है।
3. नदी स्नान- इस दिन गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान करना चाहिए। इस दिन हनुमान जी, शनिदेव, भगवान विष्णु और भगवान शिव के साथ माता पार्वती की पूजा करनी चाहिए। अगर नदी में स्नान नहीं कर पा रहे हैं तो घर में थोड़ा गंगाजल मिलाकर स्नान करें।
4. वट वृक्ष की पूजा- सोमवती अमावस्या के दिन पितृदोष से मुक्ति पाने के लिए बरगद के वृक्ष को जल चढ़ाकर परिक्रमा की जाती है।
5. इन चीजों का करें दान- सोमवती अमावस्या के दिन पितरों को प्रसन्न करने के लिए गरीबों को पानी का घड़ा, ककड़ी, खीरा, छाता आदि का दान करना चाहिए। कहते हैं कि ऐसा करने से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का बहुत अधिक महत्व होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह तिथि भगवान विष्णु को प्रिय होती है। इस दिन विधि- विधान से भगवान विष्णु की पूजा- अर्चना की जाती है। हर माह में दो बार एकादशी तिथि पड़ती है। एक कृष्ण पक्ष में और एक शुक्ल पक्ष में। साल में कुल 24 एकादशी तिथि पड़ती है। ज्येष्ठ माह कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को अपरा एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस साल 26 मई को अपरा एकादशी व्रत रखा जाएगा। अपरा एकादशी के दिन इस व्रत कथा को जरूर पढ़ना चाहिए। इस व्रत कथा को पढ़ने से व्रत का लाभ मिलता है। आगे पढ़ें एकादशी व्रत कथा-
अपरा एकादशी व्रत कथा-
भगवान विष्णु की कृपा दिलाने वाले व्रत की कथा इस प्रकार है। महीध्वज नामक एक धर्मात्मा राजा था। राजा का छोटा भाई वज्रध्वज बड़े भाई से द्वेष रखता था। एक दिन अवसर पाकर इसने राजा की हत्या कर दी और जंगल में एक पीपल के नीचे गाड़ दिया। अकाल मृत्यु होने के कारण राजा की आत्मा प्रेत बनकर पीपल पर रहने लगी। मार्ग से गुजरने वाले हर व्यक्ति को आत्मा परेशान करती। एक दिन एक ऋषि इस रास्ते से गुजर रहे थे। इन्होंने प्रेत को देखा और अपने तपोबल से उसके प्रेत बनने का कारण जाना।
ऋषि ने पीपल के पेड़ से राजा की प्रेतात्मा को नीचे उतारा और परलोक विद्या का उपदेश दिया। राजा को प्रेत योनि से मुक्ति दिलाने के लिए ऋषि ने स्वयं अपरा एकादशी का व्रत रखा और द्वादशी के दिन व्रत पूरा होने पर व्रत का पुण्य प्रेत को दे दिया। एकादशी व्रत का पुण्य प्राप्त करके राजा प्रेतयोनि से मुक्त हो गया और स्वर्ग चला गया।

वट सावित्री व्रत हर साल कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को रखा जाता है। इस साल यह तिथि काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि सालों बाद 30 मई को सोमवती अमावस्या का शुभ संयोग बन रहा है। सोमवती अमावस्या के दिन किया गया व्रत, पूजा-पाठ, स्नान व दान आदि का अक्षय फल मिलता है। वट सावित्री व्रत को कठिन व्रतों में से एक माना गया है। इस दिन सुहागिनें अपने पति की लंबी आयु के लिए व्रत रखती हैं। मान्यता है कि वट सावित्री व्रत के दौरान विधि-विधान से पूजा करने से पूजा का फल पूरा मिलता है।
वट सावित्री व्रत महत्व-
मान्यता है कि वट वृक्ष की पूजा करने से लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य का फल प्राप्त होता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन सावित्री अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस लाई थी। तभी से महिलाएं इस दिन पति की लंबी आयु के लिए व्रत रखती हैं।
वट सावित्री व्रत मुहूर्त-
अमावस्या तिथि प्रारम्भ – मई 29, 2022 को 02:54 पी एम बजे
अमावस्या तिथि समाप्त – मई 30, 2022 को 04:59 पी एम बजे
वट सावित्री व्रत पूजन सामग्री-
वट सावित्री व्रत की पूजन सामग्री में सावित्री-सत्यवान की मूर्तियां, धूप, दीप, घी, बांस का पंखा, लाल कलावा, सुहाग का समान, कच्चा सूत, चना (भिगोया हुआ), बरगद का फल, जल से भरा कलश आदि शामिल करना चाहिए।
वट सावित्री व्रत पूजा विधि-
-इस दिन प्रातःकाल घर की सफाई कर नित्य कर्म से निवृत्त होकर स्नान करें।
– इसके बाद पवित्र जल का पूरे घर में छिड़काव करें।
-बांस की टोकरी में सप्त धान्य भरकर ब्रह्मा की मूर्ति की स्थापना करें।
– ब्रह्मा के वाम पार्श्व में सावित्री की मूर्ति स्थापित करें।
– इसी प्रकार दूसरी टोकरी में सत्यवान तथा सावित्री की मूर्तियों की स्थापना करें। इन टोकरियों को वट वृक्ष के नीचे ले जाकर रखें।
– इसके बाद ब्रह्मा तथा सावित्री का पूजन करें।
– अब सावित्री और सत्यवान की पूजा करते हुए बड़ की जड़ में पानी दें।
-पूजा में जल, मौली, रोली, कच्चा सूत, भिगोया हुआ चना, फूल तथा धूप का प्रयोग करें।
-जल से वटवृक्ष को सींचकर उसके तने के चारों ओर कच्चा धागा लपेटकर तीन बार परिक्रमा करें।
-बड़ के पत्तों के गहने पहनकर वट सावित्री की कथा सुनें।
-भीगे हुए चनों का बायना निकालकर, नकद रुपए रखकर अपनी सास के पैर छूकर उनका आशीष प्राप्त करें।
-यदि सास वहां न हो तो बायना बनाकर उन तक पहुंचाएं।
-पूजा समाप्ति पर ब्राह्मणों को वस्त्र तथा फल आदि वस्तुएं बांस के पात्र में रखकर दान करें।
-इस व्रत में सावित्री-सत्यवान की पुण्य कथा का श्रवण करना न भूलें। यह कथा पूजा करते समय दूसरों को भी सुनाएं।

हिंदू धर्म में मंगलवार का दिन हनुमान जी को समर्पित माना गया है। मान्यता है कि हनुमान जी की पूजा करने से सभी संकटों से मुक्ति मिलती है। इस दिन भक्त हनुमान जी के साथ भगवान राम के भी दर्शन करते हैं। मान्यता है कि बजरंगबली की अराधना से शनिदेव प्रसन्न होते हैं। शास्त्रों में हनुमान जी को प्रसन्न करने के लिए कुछ उपाय बताए गए हैं, जानें मंगलवार के उपाय-
1. हनुमान जी  के सामने सरसों के तेल का दीपक जलाना चाहिए। हनुमान चालीसा पाठ करना चाहिए। मंगलवार के दिन गरीब व जरूरतमंदों को जरूरी चीजों का दान करना चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से धन संबंधी दिक्कतों से मुक्ति मिलती है।
2. मंगलवार के दिन कर्ज मुक्ति के लिए सुबह ओम हनुमते नमः का 108 बार मंत्र का जाप करना चाहिए। मंगलवार का व्रत रखने से हनुमान जी की विशेष कृपा भक्त पर होती है।
3. मंगलवार के दिन ऋण मोचन अंगारक स्तोत्र का पाठ करने से कर्ज से मुक्ति मिलने की मान्यता है। मान्यता है कि मंगलवार के दिन सुंदरकांड का पाठ करने से सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है।
4. मंगलवार के दिन सुबह स्नान करने के बाद गाय को रोटी खिलाने से मां लक्ष्मी की कृपा होती है। इस दिन नारियल को अपने सिर के ऊपर से सात बार घुमाएं और नारियल हनुमान मंदिर में रख आएं। मान्यता है कि इस उपाय से धन वृद्धि होती है।
5. मंगलवार के दिन 11 पीपल के पत्ते लें और उसे साफ पानी से धोने के बाद पत्तों पर चंदन से श्रीराम लिखें। फिर इन पत्तों को हनुमान जी को अर्पित कर दें। मान्यता है कि ऐसा करने से आर्थिक संकट दूर होते हैं।
6.  पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएं। दीपक में काली उड़द के कुछ दाने जरूर डालें। मान्यता कि ऐसा करने से सभी बिगड़े काम बन जाते हैं।

इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। इन्हें अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। 

द्वापर युग में श्रीकृष्ण ने भगवान विष्णु के अवतार के रूप में धरती पर जन्म लिया था। कृष्ण ने अपने मानव जीवन में कई लोगों का घमंड चकनाचूर किया था। इससे उनकी पत्नी भी वंचित नहीं है। पौराणिक कथाओं में श्रीकृष्ण की आठ पत्नियों का जिक्र है, इनमें से एक थीं सत्यभामा। सत्यभामा को एक बार अपनी सुंदरता पर घमंड हो गया। इस कथा में पढ़ें कि कैसे कृष्ण ने अपनी ही रानी का घमंड चकनाचूर किया।
एक बार श्रीकृष्ण द्वारका नगरी में अपने महल के अंदर सिंहासन पर बैठे थे। तभी उनकी रानी सत्यभामा आईं और कृष्ण से कहा कि आपने त्रेतायुग में श्रीराम का अवतार लिया था। उस समय आपकी पत्नी सीता थीं। क्या वह मुझसे भी सुंदर थीं? श्रीकृष्ण को समझ आ गया कि सत्यभामा को अपनी  सुंदरता पर घमंड हो गया है। उन्होंने तुरंत कोई जवाब नहीं दिया। वहां, पर गरुड़ और सुदर्शन चक्र भी मौजूद थे।
तभी गरुड़ ने भी अभिमान के स्वर में कहा कि प्रभु इस संसार में मुझसे ज्यादा गतिमान कोई है क्या? सुदर्शन चक्र ने भी अपने अंदर के अभिमानी रूप को जगाया और कृष्ण से कह दिया कि इस संसार में मुझसे ज्यादा ताकतवर कोई है क्या?
कृष्ण को समझ आ गया कि इन तीनों को अभिमान हो गया है। इन्हें सबक सिखाने के लिए कुछ करना पड़ेगा। तभी श्रीकृष्ण को एक युक्ति सुझी। उन्होंने गरुड़ से कहा कि तुम श्रीराम के परम भक्त हनुमान के पास जाओ और कहना कि प्रभु श्रीराम और मां सीता यहां उनका इंतजार कर रहे हैं।
श्रीकृष्ण की आज्ञा पाते ही फौरन गरुड़ हनुमान को लेने चले गए। तभी कृष्ण ने अपनी रानी सत्यभामा से कहा कि वह सीता की तरह तैयार हो जाएं। इसके बाद कृष्ण ने राम का रूप धारण कर दिया। सत्यभामा और कृष्ण, सीता और राम बनकर दरबार में बैठ गए। उन्होंने सुदर्शन चक्र से कहा कि तुम द्वारपाल बनकर खड़े हो जाओ और अंदर किसी को मत आने देना।
उधर गरुड़ हनुमान के पास पहुंचे। उन्होंने हनुमानजी से कहा कि द्वारिका नगरी में प्रभु श्रीराम और मां सीता उनका इंतजार कर रहे हैं। आपको बुलावा भेजा है। आप मेरी पीठ पर बैठ जाइए,मैं आपको ले चलूंगा। हनुमान ने गरुड़ से चलने के लिए कहा और बोला कि वह खुद वहां पहुंच जाएंगे। गरुड़ को लगा कि एक वानर मुझसे तेज कैसे चल पाएगा। इसलिए वह हनुमान को वहीं छोड़कर उड़ गए।
जैसे ही गरुड़ द्वारिका नगरी पहुंचे, तो वहां का नजारा देखकर दंग रह गए। हनुमान पहले ही दरबार में पहुंच चुके थे। गरुड़ को अपनी गति पर जो अभिमान था वह चकनाचूर हो गया। उन्हें लग गया कि वह संसार में सबसे तेज प्राणी नहीं हैं। वहीं, जब राम का रूप धारण किए हुए कृष्ण ने हनुमान से पूछा कि द्वार पर तुम्हें किसी ने रोका नहीं, तो वे बोले कि सुदर्शन चक्र ने मुझे रोका था लेकिन मैंने उसे अपने मुंह में ले लिया और अंदर आ गया।  इस तरह सुदर्शन चक्र का घमंड भी टूट गया कि वह सबसे शक्तिशाली नहीं है।
तब हनुमान की नजर सीता के रूप में बैठी सत्यभामा पर पड़ी। हनुमान ने पूछ लिया कि प्रभु सबकुछ तो ठीक है लेकिन आपके साथ ये दासी कौन बैठी है। यह बात सुनकर सत्यभामा का मुंह भी उतर गया। उन्हें भी अपनी सुंदरता पर घमंड नहीं रहा। इस तरह कृष्ण ने एक युक्ति से तीनों का घमंड चकनाचूर कर दिया।

ज्येष्ठ का महीना हनुमान जी और शनिदेव दोनों को बहुत ही प्रिय है। कहते हैं कि इस महीने में इनकी की गई अराधना बहुत ही फलदायी मानी जाती है। बड़े से बड़ा कष्ठ इस महीने में की गई हनुमान जी और शनिदेव की अराधना से कट जाता है। इस महीने में आने वाले चारों मंगलवार का विशेष महत्व है। इन मंगलवार को बड़ा मंगल, बुढ़वा मंगल कहते हैं। कहा जाता है कि इन मंगलवार को हनुमान दी श्रद्धा से की गई अराधना बहुत फलदायी होती है। इसके अलावा 30 मई को ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या के दिन शनिदेव का जन्म हुआ था। शनि जयंती पर शनि की साढ़े साती और शनि ढैया और कार्लसर्प वाले जातकों को शनिदेव की पूजा बहुत फल देती है। यह भी मान्यता है कि इसी महीने में रामभक्त हनुमान अपने आराध्य से मिले थे।
शनि देव की अराधना के लिए शनि जंयती से अच्छा कोई दिन नहीं है। शनि की साढ़ेसाती और ढैया वालों के लिए इस दिन शनि पर काला तिल, तेल आदि के उपाय बहुत ही फलदायी माने जाते हैं। इस दिन सोमवती अमावस्या भी है, इसलिए इस दिन पितृों के लिए श्राद्ध कर्म भी करना आपके जीवन में खुशहाली लाता है। इसके अलावा इस महीने में भगवान सूर्य की अराधना भी गरीबी दूर करती है। यही नहीं गर्मी में पानी के महत्व को भी इसी महीने में माना गया है। निर्जला एकादशी, गंगा दशहरा, वट सावित्री व्रत जैसे पर्व भी इसी महीने में मनाए जाते है। जिनमें पानी के महत्व को समझाया गया है। कई गुणा पुण्य इस महीने में सिर्फ जलदान करके ही कमाया जा सकता है।
हनुमान जी की पूजा के लिए इस महीने हनुमान जी को सिंदूर का लेप, चोला चढ़ाना चाहिए। वहीं शनिदेव की अराधना के लिए इस महीने शनि पर तेल का दान और काले तिल दान करने चाहिए। जल से भरा घड़ा, पंखा आदि दान करना भी इस महीने में बहुत ही श्रेष्ठ है।

गुरुवार के दिन भगवान विष्णु और बृहस्पतिदेव की पूजा की जाती है। इस दिन लोग पूरे दिन व्रत रखते हैं। कहा जाता है कि इस दिन व्रत रखने से बृहस्पति ग्रह मजबूत होते हैं।  इस व्रत में कई नियमों को भी माना जाता है। कहा जाता है कि इस दिन व्रत रखें तो पहले व्रत का संकल्प कर लें। ये व्रत 11, 16 आदि की संख्या में रख सकते हैं। इस व्रत में खास तैर पर पीले रंग के कपड़े पहनते हैं। यही नहीं भगवान को पीले रंग के फूल में भगवान को अर्पित किए जाते हैं। इस व्रत में नमक का सेवन नहीं किया जाता है। इस व्रत में मीठा ही खाया जाता है।
यहां पढ़ें गुरुवार व्रत कथा:
प्राचीन काल में एक ब्राह्‌मण रहता था, वह बहुत निर्धन था। उसके कोई सन्तान नहीं थी। उसकी स्त्री बहुत मलीनता के साथ रहती थी। वह स्नान न करती, किसी देवता का पूजन न करती, इससे ब्राह्‌मण देवता बड़े दुःखी थे। बेचारे बहुत कुछ कहते थे किन्तु उसका कुछ परिणाम न निकला। भगवान की कृपा से ब्राह्‌मण की स्त्री के कन्या रूपी रत्न पैदा हुआ। कन्या बड़ी होने पर प्रातः स्नान करके विष्णु भगवान का जाप व बृहस्पतिवार का व्रत करने लगी। अपने पूजन-पाठ को समाप्त करके विद्यालय जाती तो अपनी मुट्‌ठी में जौ भरके ले जाती और पाठशाला के मार्ग में डालती जाती। तब ये जौ स्वर्ण के जो जाते लौटते समय उनको बीन कर घर ले आती थी।
एक दिन वह बालिका सूप में उस सोने के जौ को फटककर साफ कर रही थी कि उसके पिता ने देख लिया और कहा – हे बेटी! सोने के जौ के लिए सोने का सूप होना चाहिए। दूसरे दिन बृहस्पतिवार था इस कन्या ने व्रत रखा और बृहस्पतिदेव से प्रार्थना करके कहा- मैंने आपकी पूजा सच्चे मन से की हो तो मेरे लिए सोने का सूप दे दो। बृहस्पतिदेव ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। रोजाना की तरह वह कन्या जौ फैलाती हुई जाने लगी जब लौटकर जौ बीन रही थी तो बृहस्पतिदेव की कृपा से सोने का सूप मिला। उसे वह घर ले आई और उसमें जौ साफ करने लगी। परन्तु उसकी मां का वही ढंग रहा। एक दिन की बात है कि वह कन्या सोने के सूप में जौ साफ कर रही थी। उस समय उस शहर का राजपुत्र वहां से होकर निकला। इस कन्या के रूप और कार्य को देखकर मोहित हो गया तथा अपने घर आकर भोजन तथा जल त्याग कर उदास होकर लेट गया। राजा को इस बात का पता लगा तो अपने प्रधानमंत्री के साथ उसके पास गए और बोले- हे बेटा तुम्हें किस बात का कष्ट है? किसी ने अपमान किया है अथवा और कारण हो सो कहो मैं वही कार्य करूंगा जिससे तुम्हें प्रसन्नता हो। अपने पिता की राजकुमार ने बातें सुनी तो वह बोला- मुझे आपकी कृपा से किसी बात का दुःख नहीं है किसी ने मेरा अपमान नहीं किया है परन्तु मैं उस लड़की से विवाह करना चाहता हूं जो सोने के सूप में जौ साफ कर रही थी। यह सुनकर राजा आश्चर्य में पड ा और बोला- हे बेटा! इस तरह की कन्या का पता तुम्हीं लगाओ। मैं उसके साथ तेरा विवाह अवश्य ही करवा दूंगा। राजकुमार ने उस लड की के घर का पता बतलाया। तब मंत्री उस लड की के घर गए और ब्राह्‌मण देवता को सभी हाल बतलाया। ब्राह्‌मण देवता राजकुमार के साथ अपनी कन्या का विवाह करने के लिए तैयार हो गए तथा विधि-विधान के अनुसार ब्राह्‌मण की कन्या का विवाह राजकुमार के साथ हो गया।
कन्या के घर से जाते ही पहले की भांति उस ब्राह्‌मण देवता के घर में गरीबी का निवास हो गया। अब भोजन के लिए भी अन्न बड़ी मुश्किल से मिलता था। एक दिन दुःखी होकर ब्राह्‌मण देवता अपनी पुत्री के पास गए। बेटी ने पिता की दुःखी अवस्था को देखा और अपनी मां का हाल पूछा। तब ब्राह्‌मण ने सभी हाल कहा। कन्या ने बहुत सा धन देकर अपने पिता को विदा कर दिया। इस तरह ब्राह्‌मण का कुछ समय सुखपूर्वक व्यतीत हुआ। कुछ दिन बाद फिर वही हाल हो गया। ब्राह्‌मण फिर अपनी कन्या के यहां गया और सारा हाल कहा तो लड की बोली- हे पिताजी! आप माताजी को यहां लिवा लाओ। मैं उसे विधि बता दूंगी जिससे गरीबी दूर हो जाए। वह ब्राह्‌मण देवता अपनी स्त्री को साथ लेकर पहुंचे तो अपनी मां को समझाने लगी- हे मां तुम प्रातःकाल प्रथम स्नानादि करके विष्णु भगवान का पूजन करो तो सब दरिद्रता दूर हो जावेगी। परन्तु उसकी मांग ने एक भी बात नहीं मानी और प्रातःकाल उठकर अपनी पुत्री के बच्चों की जूठन को खा लिया। इससे उसकी पुत्री को भी बहुत गुस्सा आया और एक रात को कोठरी से सभी सामान निकाल दिया और अपनी मां को उसमें बंद कर दिया। प्रातःकाल उसे निकाला तथा स्नानादि कराके पाठ करवाया तो उसकी मां की बुद्धि ठीक हो गई और फिर प्रत्येक बृहस्पतिवार को व्रत रखने लगी। इस व्रत के प्रभाव से उसके मां बाप बहुत ही धनवान और पुत्रवान हो गए और बृहस्पतिजी के प्रभाव से इस लोक के सुख भोगकर स्वर्ग को प्राप्त हुए l

हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का बहुत अधिक महत्व होता है। ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को निर्जला एकादशी के नाम से जाना जाता है। निर्जला एकादशी का महत्व सभी एकादशी में सबसे अधिक होता है। एकादशी तिथि भगवान विष्णु को अतिप्रिय होती है। इस दिन विधि- विधान से भगवान विष्णु की पूजा- अर्चना की जाती है। हिंदू पंचांग के अनुसार हर माह में दो बार एकादशी पड़ती है। साल में कुल 24 एकादशी पड़ती है।
कब है निर्जला एकादशी
इस साल 10 जून, 2022 को निर्जला एकादशी का व्रत रखा जाएगा।
इस व्रत में इस नियम का पालन किया जाता है
* निर्जला एकादशी के व्रत में पानी का सेवन भी नहीं किया जाता है। इस दिन जल का त्याग करना होता है।
* मिलता है सालभर की एकादशी व्रत करने का फल
एकादशी मुहूर्त
एकादशी तिथि प्रारम्भ – जून 10, 2022 को 07:25 ए एम बजे
एकादशी तिथि समाप्त – जून 11, 2022 को 05:45 ए एम बजे
पारण (व्रत तोड़ने का) समय – 01:44 पी एम से 04:32 पी एम
पारण तिथि के दिन हरि वासर समाप्त होने का समय – 11:09 ए एम
निर्जला एकादशी पूजा- विधि
* सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं।
* घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित करें।
* भगवान विष्णु का गंगा जल से अभिषेक करें।
* भगवान विष्णु को पुष्प और तुलसी दल अर्पित करें।
* अगर संभव हो तो इस दिन व्रत भी रखें।
 * भगवान की आरती करें।
* भगवान को भोग लगाएं। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि भगवान को सिर्फ सात्विक चीजों का भोग लगाया जाता है। भगवान विष्णु के भोग में तुलसी को जरूर शामिल करें। ऐसा माना जाता है कि बिना तुलसी के भगवान विष्णु भोग ग्रहण नहीं करते हैं।
* इस पावन दिन भगवान विष्णु के साथ ही माता लक्ष्मी की पूजा भी करें।
* इस दिन भगवान का अधिक से अधिक ध्यान करें।
निर्जला एकादशी महत्व
इस पावन दिन व्रत रखने से सभी तरह के पापों से मुक्ति मिल जाती है।
इस व्रत को करने से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एकादशी का व्रत रखने से मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है।

जानिए तिथि, महत्व और पूजन विधि
इस साल अपरा एकादशी 26 मई को मनाई जाएगी। अचला एकादशी ज्येष्ठ महीने के कृष्ण पक्ष के ग्यारहवें दिन मनाई जाती है। इस व्रत को करने से भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी प्रसन्न होते है। वह भक्तों को सभी पापों से मुक्ति मिलती है। अपरा एकादशी के दिन तुलसी, चंदन, कपूर और गंगाजल ने देवी-देवताओं की पूजा करनी चाहिए। मान्यता है कि इस व्रत को रखने से मनुष्य को मृत्यु के बाद मौक्ष की प्राप्ती होती है। इस बार अचला एकादशी के दिन रात्रि 10 बजकर 14 मिनट तक आयुष्मान योग रहेगा। इस योग को बेहद शुभ माना गया है।
अपरा एकादशी का महत्व
पौराणिक कथाओं के अनुसार अपरा एकादशी के व्रत से ब्रह्मा हत्या, भूत योनि और अन्य पाप दूर हो जाते हैं। मान्यता है कि एकादशी व्रत का पालन करने से जातकों को पापों से छुटकारा मिलता है। जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाते हैं। कार्तिक माह में पवित्र नदी में स्नान करने से अचला एकादशी व्रत समान लाभ मिलता है।
अपरा एकादशी व्रत की पूजन विधि
1. अपरा एकादशी के दिन गंगा नदी में स्नान करें। अगर ऐसा संभव नहीं है तो घर पर ही बाल्टी में गंगा जल की कुछ बूंदें मिलाकर नहाले।
2. नहाने के बाद साफ कपड़े पहनें।
3. अब भगवान के सामने घी या तेल का दीपक जलाएं।
4. भगवान विष्णु का आह्वान करें। उनके प्रार्थना करें और पूजा शुरू करने से पहले उनका आशीर्वाद लें।
5. भगवान श्रीहरि को जल, पुष्प, इत्र, दीपक, धूप और नैवेध अर्पित करते हुए ओम नमो भगवते वासुदेवाय का जाप करें।
6. अब चंदन, कुमकुम, हल्दी, अक्षत, पान, सुपारी, 5 प्रकार के फल चढ़ाएं।
7. अपरा एकादशी व्रत कथा या विष्णु सहस्ननाम का पाठ करें।
8. शाम को तेल का दीपक, अगरबत्ती जलाएं और भगवान से प्रार्थना करें।
9. भगवान विष्णु के नाम पर आरती कर पूजा का समापन करें।