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हिंदू धर्म में हर महीने आने वाली पूर्णिमा व अमावस्या का विशेष महत्व होता है। हिंदू पंचांग के अनसार, हर माह में एक अमावस्या तिथि आती है। ऐसे में पूरे साल में कुल 12 अमावस्या पड़ती हैं। सोमवार के दिन पड़ने वाली अमावस्या को सोमवती अमावस्या कहा जाता है। 2022 की आखिरी सोमवती अमावस्या के दिन सुकर्मा व धृति योग का शुभ संयोग बन रहा है। खास बात यह है कि इस दिन वट सावित्री व्रत भी रखा जाएगा।
सोमवती अमावस्या 2022 कब है?
सोमवती अमावस्या 30 मई, सोमवार को पड़ रही है। इस दिन सुबह 11 बजकर 39 मिनट तक सुकर्मा योग रहेगा। इसके बाद धृति योग शुरू होगा। ज्योतिष शास्त्र में इन दोनों योगों को बेहद शुभ माना जाता है।
सुकर्मा योग का महत्व-
ज्योतिष शास्त्र में सुकर्मा योग को शुभ योगों में गिना जाता है। मान्यता है कि इस योग में किए गए कार्यों में सफलता जरूर मिलती है। इस योग को खासकर नौकरी बदलने व मांगलिक कार्य करने के लिए शुभ माना जाता है।
धृति योग का महत्व-
सोमवती अमावस्या के दिन धृति योग रहेगा। धृति योग किसी भवन एवं स्थान का शिलान्यास, भूमि पूजन या नींव पत्थर रखने के लिए उत्तम माना गया है। इस योग में रखा गया नींव पत्थर आजीवन सुख-सुविधाएं प्रदान करता है।
सोमवती अमावस्या 2022 शुभ मुहूर्त-
ब्रह्म मुहूर्त- 04:03 ए एम से 04:43 ए एम
अभिजित मुहूर्त- 11:51 ए एम से 12:46 पी एम
विजय मुहूर्त- 02:37 पी एम से 03:32 पी एम
गोधूलि मुहूर्त- 07:00 पी एम से 07:24 पी एम
सर्वार्थ सिद्धि योग- 07:12 ए एम से 05:24 ए एम, मई 31

K.W.N.S.-ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि के दिन हिंदू धर्म में वट सावित्री का व्रत रखा जाता है. इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुखमय जीवन के लिए व्रत रखती हैं और विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना करती हैं. इस दिन वट के वृक्ष की पूजा का विधान है. इस दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है. और वट के वृक्ष की परिक्रमा कर पति की लंबी आयु की प्रार्थना करते हैं। 
बता दें कि इस साल वट सावित्री का व्रत 30 मई, 2022 को मनाया जाएगा. इस दिन वट सावित्री का व्रत सोमवार के दिन पड़ रहा. साथ ही, इस दिन सोमवती अमावस्या भी पड़ रही है. ये इस साल की आखिरी सोमवती अमावस्या है. आइए जानें वट सावित्री व्रत की तिथि, पूजा विधि और मुहूर्त के बारे में. वट सावित्री व्रत तिथि 2022 वट सावित्री का व्रत इस साल 30 मई सोमवार के दिन मनाया जाएगा. इस दिन अखंड सौभाग्य, संतान प्राप्ति और पति की लंबी आयु के लिए सुहागिन महिलाएं वट सावित्री का व्रत रखती हैं. इस दिन पूजा आदि से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। 
वट सावित्री व्रत- सोमवार, 30 मई, 2022 अमावस्या तिथि प्रारंभ: 29 मई, 2022 दोपहर 02:54 बजे से शुरू होकर, अमावस्या तिथि का समापन: 30 मई, 2022 को शाम 04:59 बजे होगा. वट सावित्री व्रत का महत्व इस दिन विधि-विधान के साथ बरगद के पेड़ की पूजा की जाती है. मान्यता है कि बरगद के पेड़ में सभी देवी-देवताओं का वास होता है. इस दिन सुहागिन महिलाएं वृक्ष की 7 बार परिक्रमा करती हैं और उस पर कच्चा सूत का धागा लपेटती हैं. इस दिन बरगद के पेड़ की पूजा करने से अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है. और घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। 
 

K.W.N.S.-सनातन धर्म में बहुत से पेड़-पौधे ऐसे हैं, जिनमें देवी-देवताओं का वास होता है और उनकी पूजा करने से भगवान की कृपा प्राप्त होती है. इन पौधों में तुलसी, शमी का पौधा, बरगद का पेड़, पीपल का पेड़ आदि पेड़ शामिल हैं. आज हम जानेंगे पीपल के पेड़ के बारे में. मान्यता है कि पीपल के पेड़ में तीन देवता ब्रह्मा, विष्णु, महेशा का वास होता है. साथ ही, शनि देव और मां लक्ष्मी की भी कृपा बरसती है। 
 ऐसे ही ज्योतिष शास्त्र में पीपल के पेड़ के कुछ उपायों के बारे में बताया गया है. अपनी समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए इनके उपाय बहुत कारगार साबित होते हैं. साथ ही भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है. व्यक्ति को धन संबंधी समस्याओं से छुटकारा मिलता है. आइए जानें पीपल के पत्तों के उपायों के बारे में. पीपल के पत्तों से कर लें ये उपाय मंगलवार और शनिवार के दिन पीपल के पेड़ से पत्ता तोड़कर गंगाजल से धो लें और फिर हल्दी और दही से अनामिका उंगली की मदद से “हीं” लिखें. इसके बाद इस पत्ते को दिखा कर पर्स में रख लें. इस विधि को हर शनिवार दोहराने से समस्याओं से छुटकारा मिलता है और धन संबंधी समस्याएं दूर होती हैं। 
ऐसे ही ज्योतिष शास्त्र में पीपल के पेड़ के कुछ उपायों के बारे में बताया गया है. अपनी समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए इनके उपाय बहुत कारगार साबित होते हैं. साथ ही भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है. व्यक्ति को धन संबंधी समस्याओं से छुटकारा मिलता है. आइए जानें पीपल के पत्तों के उपायों के बारे में. पीपल के पत्तों से कर लें ये उपाय मंगलवार और शनिवार के दिन पीपल के पेड़ से पत्ता तोड़कर गंगाजल से धो लें और फिर हल्दी और दही से अनामिका उंगली की मदद से “हीं” लिखें. इसके बाद इस पत्ते को दिखा कर पर्स में रख लें. इस विधि को हर शनिवार दोहराने से समस्याओं से छुटकारा मिलता है और धन संबंधी समस्याएं दूर होती हैं। 
पीपल के 11 पत्तों के ये उपाय कारगार पीपल के साथ बिना टूटे 11 पत्ते लेकर उन्हें धो लें. इसके बाद इन पत्तों पर कुमकुम, अष्टगंध या चंदन मिलाकर श्री राम का नाम लिखें. ये कार्य करते समय हनुमान चालीसा का पाठ करते रहें. इसके बाद इन पत्तों की माला बनाएं और हनुमान मंदिर में जाकर उन्हें अर्पित कर दें. ऐसा करने से आपके सभी कार्य सिद्ध होने लगेंगे. पीपल के पत्तों से शिवलिंग पूजा धार्मिक ग्रंथों में पीपल के पेड़ के नीचे शिवलिंग की स्थापना का विशेष महत्व बताया गया है. इस पेड़ के नीचे स्थापित हुए शिवलिंग की जो भी नियमित रूप से पूजा करता है, उसे सभी समस्याओं से छुटकारा मिलता है। 
 

वैसे तो भारत में कई प्राचीन मंदिर हैं, जो अपनी बेजोड़ वास्तुकला और भव्यता के लिए जाने जाते हैं। दक्षिण भारत में भी कई रहस्यमयी मंदिर मौजूद हैं। जो लोगों की आस्था का केंद्र होने के साथ ही आम लोगों के लिए रहस्य बने हुए हैं। ऐसा ही एक मंदिर आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले के लेपाक्षी में स्थित है। इसका नाम है वीरभ्रद स्वामी मंदिर। इसे हैंगिंग पिलर टेंपल यानी लटकते हुए खंभे वाला मंदिर भी कहा जाता है। विजयनगर वास्तुकला शैली में बने इस मंदिर में एक हवा में झूलता हुआ खंभा है, जो श्रद्धालुओं के साथ-साथ इंजीनियरों के लिए भी रहस्य का विषय बना हुआ है।
लेपाक्षी मंदिर का इतिहास
लेपक्षी मंदिर वीरभद्र स्वामी को समर्पित है। इसका निर्माण सोलहवीं शताब्दी में विजयनगर साम्राज्य में हुआ था। इस मंदिर का निर्माण विरुपन्ना नायक और विरन्ना ने करवाया था। ये दोनों भाई थे और विजयनगर सामग्राज्य में राजा अच्युतार्य के गर्वनर थे। हालांकि, इस मंदिर का इतिहास सदियों पुराना है। स्कंद पुराण में भी इस मंदिर का जिक्र मिलता है, इसे भगवान शिव के दिव्यक्षेत्रों में से एक माना जाता है।
मंदिर की दीवारों पर कई कलाकृतियां बनी हुई हैं। जिनमें शिव के अलग-अलग रूपों को चित्रित किया गया है। वीरभद्र स्वामी को शिव का ही रूप माना जाता है। मंदिर में अन्य कई देवी-देवताओं की मूर्तियां भी मौजूद हैं।
लेपाक्षी मंदिर का हैंगिंग पिलर
लेपाक्षी मंदिर में कई खंभे हैं। इनमें से एक खंभा ऐसा भी है जो हवा में झूल रहा है। दरअसल, ये खंभा जमीन से जुड़ा हुआ नहीं है। इसके नीचे थोड़ी खाली जगह है, जिसमें से कोई पतला कपड़ा आसानी से निकल जाता है। देखने पर ऐसा लगता है कि ये खंभा में हवा में झूल रहा है।
लेपाक्षी मंदिर में मौजूद इस हैंगिंग पिलर का असली कारण तो आज तक पता नहीं चल पाया है। लोगों के लिए ये अब भी रहस्य बना हुआ है। हालांकि, स्थानीय लोगों का मानना है कि ब्रिटिश काल में एक इंजीनियर ने ये जानने की कोशिश की थी कि ये मंदिर खंभों पर कैसे टिका हुआ है। इसके लिए उसने एक खंभे को खिसकाया था, उसके बाद से वह हवा में झूल गया।
मंदिर में आने वाले दर्शनार्थी इस खंभे के नीचे से कपड़ा आरपार निकालते हैं। श्रद्धालुओं का मानना है कि ऐसा करने पर घर में सुख और समृद्धि आती है।

 

प्रेम, आकर्षण, कला , सौंदर्य, सौभाग्य , वैभव, सुख , संपन्नता के कारक ग्रह शुक्र  मित्र ग्रह शनि देव की राशि मकर से शनि देव की दूसरी राशि कुम्भ में चैत्र कृष्ण पक्ष चतुर्दशी तिथि 31 मार्च 2022 दिन गुरुवार की सुबह 9:50 बजे से प्रवेश करेंगे तथा 28 अप्रैल 2022 दिन गुरुवार की सुबह 7:30 बजे तक शुक्र कुम्भ राशि मे रहेंगे । 
स्वतंत्र भारत की कुण्डली वृष लग्न एवं कर्क राशि की है। लग्नेश- षष्टेष होकर दशम अर्थात राज्य भाव मे जा रहे है। शुक्र यहां पर उच्चाभिलाषी होकर गोचर करेंगे। शुक्र के इस परिवर्तन का व्यापक प्रभाव भारतीय सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक एवं आर्थिक व्यवस्था पर पड़ेगा। 
मेष:- धनेश एवं सप्तमेश होकर लाभ भाव में।
धनागम, वाणी व्यवसाय से धन लाभ सम्भव
अध्ययन अध्यापन के क्षेत्र में प्रगति
प्रेम संबंध एवं जीवनसाथी से लाभ 
साझेदारी के कार्यों में लाभ की स्थिति 
संतान के क्षेत्र से लाभ की स्थिति बनेगी
व्यापारिक लाभ की स्थिति बनेगी
उपाय :- गाय की सेवा करते रहें।
वृष  :- लग्नेश एवं रोगेश होकर दशम भाव में ।
प्रतियोगिता में विजय व भाग्य का साथ प्राप्त होगा
पिता का सहयोग, सानिध्य प्राप्त होगा। 
पराक्रम एवं राज्य सम्मान में वृद्धि
गृह एवं वाहन के सुखों में वृद्धि
नयी योजनाओं की शुरूआत हो सकती है
आर्थिक गतिविधियों में सकारात्मक प्रगति
उपाय :- ओपल या हीरा रत्न धारण करें।
मिथुन :- व्ययेश-पंचमेश होकर भाग्य भाव में। 
धनागम के स्रोत एवं पारिवारिक वृद्धि
संतान पक्ष से लाभ एवं चिंता से मुक्ति संभव
पढ़ाई, अध्ययन-अध्यापन में रुचि बढ़ेगी
परिवार में नया कार्य, अचानक खर्च वृद्धि
भाई बंधुओं मित्रों के सहयोग सानिध्य में वृद्धि
उपाय :- विधवा स्त्री एवं गाय की सेवा करें।
कर्क :- लाभेश एवं सुखेश होकर अष्टम भाव में।
धनागम एवं पारिवारिक कार्यों में वृद्धि
प्रेम संबंध एवं जीवनसाथी के प्रति चिंता संभव
गृह एवं वाहन सुखों को लेकर खर्च वृद्धि संभव 
मनोबल को संतुलित रखकर कार्य करें
माता के स्वास्थ्य को लेकर चिंता संभव
उपाय :- शनिवार को शिवलिंग पर शमी पत्र चढ़ाए।
सिंह :- राज्येश- पराक्रमेश होकर सप्तम भाव में। 
पराक्रम एवं सम्मान में वृद्धि होगी
कार्यो में प्रगति एवं परिश्रम में वृद्धि होगी
साझेदारी के कार्यों में प्रगति एवं धनागम होगा
दांपत्य जीवन एवं प्रेम संबंधों में सकारात्मक प्रगति
व्यक्तित्व एवं आकर्षण में वृद्धि संभव
उपाय :- बहन बुआ का सम्मान करें। माँ दुर्गा की आराधना करें।
कन्या:- भाग्य एवं धन के कारक होकर षष्ठ भाव में।
भौतिक संसाधनोंकी प्राप्ति एवं भोग विलास बढ़ेगा
अचानक धार्मिक अथवा व्यापारिक यात्रा पर खर्च
आंतरिक रोग कर्ज एवं शत्रु से कष्ट संभव
पारिवारिक कार्यों को लेकर के तनाव की स्थिति
पिता के स्वास्थ्य,पैतृक सुखों एवं भाग्य में अवरोध
उपाय :- मूल कुण्डली के अनुसार ओपल या हीरा रत्न धारण करें।
तुला :– लग्न एवं अष्टम का कारक होकर पंचम भाव में।
पद प्रतिष्ठा एवं वर्चस्व में वृद्धि होगी
गृह एवं वाहन सहित सभी सुखों में वृद्धि
मनोबल उच्च एवं कार्य क्षमता में वृद्धि
संतान,मातृ एवं पितृ सुखों में वृद्धि की संभावना
सरकारी लाभ एवं नौकरी में दायित्व वृद्धि
अध्ययन अध्यापन एवं लाभ में वृद्धि होगी
उपाय :- ओपल या हीरा रत्न मूल कुंडली के अनुसार धारण करें।
वृश्चिक :- व्ययेश एवं सप्तमेश होकर सुख भाव में।
पराक्रम एवं सामाजिक दायरे में वृद्धि
जीवन साथी से लाभ की संभावना बनेगी
माता का सहयोग सानिध्य प्राप्त होगा
गृह वाहन एवं भौतिक संसाधनों पर खर्च संभव
 नौकरी व्यवसाय से जुड़े लोगों को लाभ होगा
उपाय :- माँ दुर्गा का पूजा उपासना करते रहे।
धनु  :- रोगेश एवं लाभेश होकर पराक्रम भाव में।
धन वृद्धि के नये अवसर प्राप्त होंगे
भाई बंधुओं मित्रों से लाभ की स्थिति बनेगी
भाग्य वर्धक कार्यों में प्रगति के आसार अच्छे
राजनैतिक क्षेत्र से जुड़े लोगों को लाभ
व्यापारिक विस्तार का भी योग अच्छा बनेगा
उपाय :- गाय की सेवा करते रहे।
मकर :- राज्येश एवं पंचमेश होकर धन भाव में। 
व्यक्तित्व, आकर्षण में अच्छी वृद्धि होगी
दाम्पत्य जीवन एवं प्रेम संबंधों मे प्रगति
पारिवारिक एवं संतान की प्रगति से मन प्रसन्न रहेगा
कार्य क्षमता, सामाजिक पद व प्रतिष्ठा में वृद्धि
अध्ययन अध्यापन एवं बौद्धिक क्षमता में वृद्धि
मन मे सकारात्मक विचार एवं समझ बढ़ेगी
उपाय :- ओपल या हीरा धारण करना लाभदायक होगा।
कुम्भ :- सुखेश एवं भाग्येश होकर लग्न भाव में। 
सुख के साधनों की प्राप्ति अच्छी होगी
जीवन साथी एवं प्रेम संबंध के पक्ष से मन प्रसन्न 
 दैनिक आय एवं साझेदारी के कार्यों में वृद्धि
माता के स्वास्थ्य एवं सुख में वृद्धि होगी
जमीन जायदाद एवं वाहन को लेकर मन प्रसन्न में
व्यापारिक या धार्मिक यात्रा का पूर्ण संयोग
उपाय :- माता दुर्गा की आराधना करते रहें।
मीन :- पराक्रमेश एवं अष्टमेश होकर द्वादश भाव में। 
आंतरिक रोग एवं अति घनिष्ठ मित्र द्वारा कष्ट
भाई बंधुओं मित्रों पर खर्च बढ़ेगा
पराक्रम एवं सामाजिक कार्यों को लेकर तनाव
 भोग विलास एवं सुख के साधनों पर खर्च 
पुरानी बीमारी का इलाज इस अवधि में संभव
उपाय :- माँ दुर्गा के मंदिर में सफेद मिष्ठान चढ़ाये।

ज्योतिष शास्त्र की तरह अंक ज्योतिष से भी जातक के भविष्य, स्वभाव और व्यक्तित्व का पता लगता है। जिस तरह हर नाम के अनुसार राशि होती है उसी तरह हर नंबर के अनुसार अंक ज्योतिष में नंबर होते हैं। अंकशास्त्र के अनुसार अपने नंबर निकालने के लिए आप अपनी जन्म तिथि, महीने और वर्ष को इकाई अंक तक जोड़ें और तब जो संख्या आएगी, वही आपका भाग्यांक होगा। उदाहरण के तौर पर महीने के 2, 11 और 20 तारीख को जन्मे लोगों का मूलांक 2 होगा। आइए जानते हैं आने वाला सप्ताह किन लोगों के लिए शुभ रहने वाला है…
मूलांक 1- इस सप्ताह घरेलू परेशानियों के योग बन रहे हैं। दूसरों को अपनी समस्या का कारण मानने से बचें, एकाग्रता का अभाव रहेगा। कपटियों से सावधान रहने की सख्त जरूरत है, धैर्य से अच्छे समय की प्रतीक्षा करें। खून से संबंधित रोग होने के योग बन रहे हैं। आपकर कानूनी मुकदमा थोपा जा सकता है। आफिस में अधिकारियों से मनमुटाव हो सकता है, कुल मिलाकर काफी संभलकर कार्य करने की जरूरत है।
मूलांक 2- आपका सप्ताह अच्छा रहेगा। व्यापार को लेकर आपका आर्थिक संकट दूर होगा, हालांकि कोई भी निवेश सोच समझकर करें। जोड़ों के दर्द से परेशान होना पड़ सकता है। निर्णय लेने में जल्दबाजी नही करें, वरिष्ठों से सलाह लेकर ही कार्य करें। विशेष तौर पर अपरिचित महिलाओं से न उलझें। आपके मित्र आपकी परेशानियों को बढ़ा सकते हैं, आप बुरे लोगों की संगत में आ सकते हैं। आप अपना मानसिक संतुलन न खोएं।
मूलांक 3- आपके मान-सम्मान में वृद्धि होगी। खर्च में कमी करना जरूरी है। इस सप्ताह आप निराशावादी मानसिकता को काबू में लाने का प्रयास करें। आधी-अधूरी जानकारी को अपडेट कर लें। स्वास्थ्य अच्छा रहेगा, व्यापार में नई दिशा में ध्यान केंद्रित करें। यह सप्ताह कारोबार के लिहाज से अच्छा है लेकिन लेनदेन में सावधानी बरतने की जरूरत है। किसी पुराने मित्र से मुलाकात हो सकती है।
मूलांक 4- कार्यस्थल पर अच्छा वातावरण रहेगा, रुका हुआ पैसा मिलेगा। वाद-विवाद, किसी प्रकार की बहस से बचें। पुरानी बातें परेशानी का सबब बन सकती हैं। स्वास्थ्य अच्छा रहेगा, पुराने रोग खत्म होंगे। आर्थिक तंगी से विचलित होने सें बचें। आमदनी सामान्य रहेगी। परिवार के साथ कहीं तीर्थ स्थान पर जाने का अवसर पड़ सकता है। छात्र हैं तो प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता की संभावना है।
मूलांक 5- इस हफ्ते आपको आपका रुका हुआ पैसा वापस मिल सकता है। इसके इतर अपने काम पर ध्यान दें, मेहनत करें, लाभ होगा। लेन-देन के मामलों को पहले निपटाएं। कार्यक्षेत्र में उम्मीद से ज्यादा सफलता मिलेगी। कला के प्रति रुझान बढ़ेगा। व्यापार के लिए समय अच्छा है। स्वास्थ्य विकार संभव हैं, सचेत रहें। आफिस में मान सम्मान में वृद्धि होगी, अधिकारी प्रसन्न रहेंगे। आपको आर्थिक लाभ होने की आशा है। आपको कोई शुभ समाचार मिल सकता है।
मूलांक 6- कलात्मक अभिव्यक्ति की क्षमता बढ़ेगी। किसी पुराने मित्र से भेंट होगी, आपके निर्णय सही होंगे। कई बार परिणाम आपको वैसा नहीं मिलता जैसा आप चाहते हैं। जीवनसाथी के स्वास्थ्य की चिंता रहेगी। इस सप्ताह किसी को उधार देने से बचें, उधारी न करें तो ही अच्छा है। स्वास्थ्य सामान्य रहेगा। सबसे अहम बात यह कि आपको स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं आ सकती हैं, जिससे आज आप सुस्त हो सकते हैं।
 मूलांक 7- सेहत के प्रति सावधान रहें। किसी बड़े निर्णय लेने से पहले घर-परिवार या दोस्तों से चर्चा कर लें। इस सप्ताह व्यापार में जोखिम लेने से बचें, हालांकि बाद में सब होगा। घर परिवार में किसी बुजुर्ग को स्वास्थ्य विकार हो सकते हैं। कोई शुभ समाचार मिल सकता है। परिवार के साथ कहीं घूमने फिरने के लिए बाहर जा सकते हैं। आफिस में मान-सम्मान में वृद्धि होगी, अधिकारी प्रसन्न रहेंगे।
मूलांक 8- इस सप्ताह क्रोध और आवेश पर संयम रखें, ऐसा न करने से बड़ी परेशानी खड़ी हो सकती है। हालांकि आर्थिक लाभ होने की संभावना है। पुराने मित्रों से मुलाकात हो सकती है। नौकरीपेशा लोगों के प्रमोशन के अवसर पैदा होंगे। सेहत अच्छी रहेगी। यदि विद्यार्थी हैं तो आपको खेलकूद में बड़ी सफलता मिल सकती है। आपकी आर्थिक स्थिति मजबूत हो सकती है, परिवार के साथ स्नेह बढ़ सकता है।
मूलांक 9-  व्यापार और कार्यस्थल पर आपकी किस्मत साथ नहीं देगी, रुके हुए काम और टलेंगे। हालांकि आलोचनाएं आपको सफल होने में बल प्रदान करेंगीं। किसी बड़े निवेश से बचें। इस हफ्ते जीवन साथी के साथ अच्छे संबंध बनेंगे, सेहत भी अच्छी रहेगी। आपकी आर्थिक स्थिति मजबूत होगी, आप भू-संपत्ति का सौदा कर सकते हैं, खरीद-बिक्री में आपको लाभ हो सकता है।
 

चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि यानी आज 2 अप्रैल से शुरू हो रहे हैं। सूर्य अपने क्रांति वृत पर रेवती नक्षत्र में रहेंगे। जिससे नवरात्रि रेवती नक्षत्र में मनाए जाएंगे। ज्योतिषियों की मानें  इस नक्षत्र में पूजा करने से अराधना धन-धान्य एवं सुख-समृद्धि देनेवाली होगी। नवरात्र में मां दुर्गा की पूजा जीवन में सुख समृद्धि और शांति लाती है।पूजा के बाद आरती करने का भी विशेष विधान है। पूजा के आखिर में क्षमा याचना के साथ दुर्गा जी की आरती करनी चाहिए। आरती का उच्चारण खुद से ही करना चाहिए और शंख और घंटी को भी बजाना चाहिए।  नवरात्र में कलश स्थापना, जौ बोने, दुर्गा सप्तशती का पाठ करना का बहुत ही अधिक महत्व है।
दुर्गा जी की आरती
जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ।
तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥
मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को ।
उज्ज्वल से दोउ नैना, चंद्रवदन नीको ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥
कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै ।
रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजै ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥
केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी ।
सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥
कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती ।
कोटिक चंद्र दिवाकर, सम राजत ज्योती ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥
शुंभ-निशुंभ बिदारे, महिषासुर घाती ।
धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥
चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे ।
मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥
ब्रह्माणी, रूद्राणी, तुम कमला रानी ।
आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥
चौंसठ योगिनी मंगल गावत, नृत्य करत भैरों ।
बाजत ताल मृदंगा, अरू बाजत डमरू ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥
तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता,
भक्तन की दुख हरता । सुख संपति करता ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥
भुजा चार अति शोभित, खडग खप्पर धारी ।
मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥
कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती ।
श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योती ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥
श्री अंबेजी की आरति, जो कोइ नर गावे ।
कहत शिवानंद स्वामी, सुख-संपति पावे ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥
जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ।

सनातन धर्म में शीतला सप्तमी व्रत रखा जा रहा है। इस साल शीतला सप्तमी 24 मार्च, गुरुवार और शीतला अष्टमी का त्योहार 25 मार्च को मनाया जाएगा। इस त्योहार को बसौड़ा या बसोरा भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन ठंडा भोजन करने से बीमारियां नहीं होती हैं। ऐसा कहा जाता है कि शीतला अष्टमी से ही ग्रीष्मकाल की शुरुआत होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शीतला माता की पूजा करने से चेचक, नेत्र विकार आदि रोग होने का भय नहीं रहता है। कहा जाता है कि शीतला माता की विधिवत पूजा करने वाली संतानहीन महिलाओं को आशीर्वाद प्राप्त होता है।
शीतला सप्तमी 2022 शुभ मुहूर्त-
ब्रह्म मुहूर्त- 04:46 ए एम से 05:34 ए एम।
अभिजित मुहूर्त- 12:03 पी एम से 12:52 पी एम।
विजय मुहूर्त- 02:30 पी एम से 03:19 पी एम।
गोधूलि मुहूर्त- 06:22 पी एम से 06:46 पी एम।
अमृत काल- 09:12 ए एम से 10:43 ए एम।
निशिता मुहूर्त- 12:03 ए एम, मार्च 25 से 12:50 ए एम, मार्च 25।
रवि योग- 06:21 ए एम से 05:30 पी एम।
शीतला सप्तमी का महत्व-
शीतला सप्तमी का व्रत करने से शीतला माता प्रसन्न होती हैं। इस व्रत की विशेषता है कि शीतला देवी को भोग लगाने वाले सभी भोजन को एक दिन पूर्व की बना लिया जाता है। दूसरे दिन शीतला माता को भोग लगाया जाता है। इसलिए इस व्रत को बसोरा भी कहते हैं। मान्यता है कि इस दिन घरों में चूल्हा नहीं जलता है।
शीतला सप्तमी कथा-
किसी गांव में एक महिला रहती थी। वह शीतला माता की भक्त थी तथा शीतला माता का व्रत करती थी। उसके गांव में और कोई भी शीतला माता की पूजा नहीं करता था। एक दिन उस गांव में किसी कारण से आग लग गई। उस आग में गांव की सभी झोपड़ियां जल गई, लेकिन उस औरत की झोपड़ी सही-सलामत रही। सब लोगों ने उससे इसका कारण पूछा तो उसने बताया कि मैं माता शीतला की पूजा करती हूं। इसलिए मेरा घर आग से सुरक्षित है। यह सुनकर गांव के अन्य लोग भी शीतला माता की पूजा करने लगे।
शीतला सप्तमी पूजन विधि-
इस दिन लोग सूर्योदय से पहले उठकर ठंडे जल से स्नान करते हैं। इसके बाद शीतला माता के मंदिर में जाकर देवी को ठंडा जल अर्पित करके उनकी विधि-विधान से पूजा करते हैं। श्रीफल अर्पित करते हैं और एक दिन पूर्व पानी में भिगोई हुई चने की दाल चढ़ाते है। शीतला माता को ठंडे भोजन का नैवेद्य लगता है इसलिए भोजन एक दिन पहले रात में बनाकर रख लिया जाता है। शीतला सप्तमी की कथा सुनने के बाद घर आकर मुख्य प्रवेश द्वार के दोनों ओर हल्दी से हाथ के पांच पांच छापे लगाए जाते हैं। जो जल शीतला माता को अर्पित किया जाता है उसमें से थोड़ा सा बचाकर घर लाते हैं और उसे पूरे घर में छींट देते हैं। इससे शीतला माता की कृपा बनी रहती है और रोगों से घर की सुरक्षा होती है। शीतला सप्तमी के दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता है।

 
वे मुझे मार सकते हैं, लेकिन मेरे विचारों को नहीं मार सकते हैं। वे मेरे शरीर को कुचल सकते हैं, लेकिन वे मरी आत्‍मा को कुचल नहीं पाएंगे। यह विचार कहने वाले भारत माता के अमर सपूत शहीद भगत सिंह हमेशा देशवासियों के दिलों में जिंदा रहेंगे। 23 मार्च 1931 को हमारे देश के तीन नायकों भगत सिंह, शिवराम राजगुरु और सुखदेव थापर को अंग्रेजों ने फांसी दी थी। यह तीनों अमर वीर भारत के युवाओं के लिए हमेशा प्रेरणा स्रोत रहेंगे। 
23 मार्च का दिन भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की शहादत के रूप में जाना जाता है। इस दिन भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने हंसकर फांसी के फंदे को अपने गले से लगा लिया था। 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग हत्याकांड ने भगत सिंह के मन पर गहरा प्रभाव डाला था। 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह के साथ सेंट्रल असेम्बली में हमला करने के दौरान राजगुरु भी मौजूद थे। इतिहासकार बताते हैं कि तीनों को फांसी देने के लिए 24 मार्च 1931 का दिन तय किया गया था, लेकिन अंग्रेजों ने तय तारीख से एक दिन पहले उन्हें फांसी दे दी। अंग्रेजों को डर था कि फांसी वाले दिन लोग उग्र न हो जाएं। 
भगत सिंह का जन्म 27 सितंबर 1907 को लायलपुर जिले के बंगा में हुआ था। उनके पिता का नाम किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती था। सुखदेव का पूरा नाम सुखदेव थापर था। उनका जन्म 15 मई 1907 को लुधियाना में हुआ था। राजगुरु का पूरा नाम शिवराम हरि राजगुरु था। उनका जन्म 24 अगस्त 1908 को पुणे के खेड़ा गांव में हुआ था। राजगुरु 16 साल की उम्र में हिंदुस्तान रिपब्ल‍िकन आर्मी में शामिल हो गए थे। भगत सिंह ने 23 साल की उम्र में देश की आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। फांसी के समय भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के चेहरे पर मुस्कान थी। उन्होंने अपने मुकदमे के समय बचाव के लिए कोई पेशकश नहीं की थी। 23 मार्च 1931 को लाहौर जेल में उन्हें फांसी दे दी गई। उनका अंतिम संस्कार सतलज के तट पर किया गया। 
 

होली के आठवें दिन शीतला अष्टमी मनाई जाती है। उत्तर भारत में इस त्योहार का खासा महत्व है। हिन्दू पंचांग के मुताबिक चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को शीतला अष्टमी मनाया जाता है। इस दिन शीतला माता की पूजा की जाती है। शीतला अष्टमी को बसौड़ा के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि इस दिन शीतला माता को बासे भोजन का भोग लगाया जाता है। शास्त्रों में शीतला माता को आरोग्य प्रदान करने वाली देवी बताया गया है। माना जाता है कि इस दिन जो महिला माता का व्रत रखती है और उनका श्रद्धापूर्वक पूजन करती हैं, उनका परिवार और बच्चे निरोगी रहते हैं। उन्हें बुखार, खसरा, चेचक, आंखों के रोग आदि समस्याएं नहीं होतीं।
कब है मुहूर्त?
इस बार बसौड़ा का पर्व 25 मार्च 2022, दिन शुक्रवार को मनाया जाएगा। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 24 मार्च 2022, गुरुवार की रात 12:09 बजे से शुरु होगी और 25 मार्च 2022, शुक्रवार को रात 10:04 बजे खत्म होगी। उदया तिथि के मुताबिक सूर्योदय 25 मार्च को होगा, इसलिए इसी दिन शीतला माता की पूजा होगी।
क्या चढ़ायें भोग?
इसमें लोग सप्तमी की रात में ही मातारानी के लिए हलवा और पूड़ी का भोग तैयार कर लेते हैं और अष्टमी के दिन ये माता रानी को ये बासा भोजन ही अर्पित किया जाता है। इस दिन माता शीतला को खासतौर पर मीठे चावलों का भोग लगाया जाता है। ये चावल, गुड़ या गन्ने के रस से बनाए जाते हैं। कहीं-कहीं माता को चावल और घी का भी भोग लगाया जाता है। इस दिन घरों में खाना नहीं बनाया जाता है, बल्कि माता को चढ़ाये प्रसाद को ही ग्रहण किया जाता है।
क्यों चढ़ता है बासा भोजन?
शीतला माता को शीतलता प्रदान करने वाली माता कहा गया है। इसलिए उनको समर्पित भोजन वो पूरी तरह शीतल रहे, इसलिए उसे रात में ही बनाकर रख लिया जाता है। माता के भक्त भी प्रसाद स्वरूप ठंडा भोजन ही अष्टमी के दिन ग्रहण करते हैं। इस दिन घरों में चूल्हा जलाना भी वर्जित होता है। माना जाता है कि शीतला अष्टमी के बाद गर्मी बढ़ने लगती है और इसे बासी भोजन ग्रहण करने का आखिरी दिन माना जाता है। क्योंकि इसके बाद गर्मी की वजह से भोजन खराब होने लगता है। शीतला अष्टमी के दिन मातारानी को सप्तमी को बने बासे भोजन का भोग लगाकर संदेश दिया जाता है कि आज के बाद पूरे ग्रीष्म काल में ताजा भोजन ही ग्रहण करना है।
कैसे करें पूजन?
सप्तमी की शाम को रसोई की साफ सफाई करने के बाद माता के लिए भोग और घर वालों के लिए भोजन तैयार करें। अष्टमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर मां शीतला के समक्ष हाथ में पुष्प, अक्षत, रोली, जल और दक्षिणा लेकर व्रत का संकल्प लें। इसके बाद विधि-विधान से माता का पूजन करें. उन्हें रोली, अक्षत, जल, पुष्प, दक्षिणा, वस्त्र, प्रसाद आदि अर्पित करें। बासी हलवा पूड़ी और खीर आदि का भोग लगाएं। शीतला स्त्रोत का पाठ करें, व्रत कथा पढ़ें और मातारानी से परिवार को निरोगी रखने की प्रार्थना करें। मान्यता के मुताबिक शीतला अष्टमी तिथि के दिन घर में चूल्हा नहीं जलाना चाहिए।