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हिंदू धर्म में हर महीने आने वाली पूर्णिमा व अमावस्या का विशेष महत्व होता है। हिंदू पंचांग के अनसार, हर माह में एक अमावस्या तिथि आती है। ऐसे में पूरे साल में कुल 12 अमावस्या पड़ती हैं। सोमवार के दिन पड़ने वाली अमावस्या को सोमवती अमावस्या कहा जाता है। 2022 की आखिरी सोमवती अमावस्या के दिन सुकर्मा व धृति योग का शुभ संयोग बन रहा है। खास बात यह है कि इस दिन वट सावित्री व्रत भी रखा जाएगा।
सोमवती अमावस्या 2022 कब है?
सोमवती अमावस्या 30 मई, सोमवार को पड़ रही है। इस दिन सुबह 11 बजकर 39 मिनट तक सुकर्मा योग रहेगा। इसके बाद धृति योग शुरू होगा। ज्योतिष शास्त्र में इन दोनों योगों को बेहद शुभ माना जाता है।
सुकर्मा योग का महत्व-
ज्योतिष शास्त्र में सुकर्मा योग को शुभ योगों में गिना जाता है। मान्यता है कि इस योग में किए गए कार्यों में सफलता जरूर मिलती है। इस योग को खासकर नौकरी बदलने व मांगलिक कार्य करने के लिए शुभ माना जाता है।
धृति योग का महत्व-
सोमवती अमावस्या के दिन धृति योग रहेगा। धृति योग किसी भवन एवं स्थान का शिलान्यास, भूमि पूजन या नींव पत्थर रखने के लिए उत्तम माना गया है। इस योग में रखा गया नींव पत्थर आजीवन सुख-सुविधाएं प्रदान करता है।
सोमवती अमावस्या 2022 शुभ मुहूर्त-
ब्रह्म मुहूर्त- 04:03 ए एम से 04:43 ए एम
अभिजित मुहूर्त- 11:51 ए एम से 12:46 पी एम
विजय मुहूर्त- 02:37 पी एम से 03:32 पी एम
गोधूलि मुहूर्त- 07:00 पी एम से 07:24 पी एम
सर्वार्थ सिद्धि योग- 07:12 ए एम से 05:24 ए एम, मई 31


वैसे तो भारत में कई प्राचीन मंदिर हैं, जो अपनी बेजोड़ वास्तुकला और भव्यता के लिए जाने जाते हैं। दक्षिण भारत में भी कई रहस्यमयी मंदिर मौजूद हैं। जो लोगों की आस्था का केंद्र होने के साथ ही आम लोगों के लिए रहस्य बने हुए हैं। ऐसा ही एक मंदिर आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले के लेपाक्षी में स्थित है। इसका नाम है वीरभ्रद स्वामी मंदिर। इसे हैंगिंग पिलर टेंपल यानी लटकते हुए खंभे वाला मंदिर भी कहा जाता है। विजयनगर वास्तुकला शैली में बने इस मंदिर में एक हवा में झूलता हुआ खंभा है, जो श्रद्धालुओं के साथ-साथ इंजीनियरों के लिए भी रहस्य का विषय बना हुआ है।
लेपाक्षी मंदिर का इतिहास
लेपक्षी मंदिर वीरभद्र स्वामी को समर्पित है। इसका निर्माण सोलहवीं शताब्दी में विजयनगर साम्राज्य में हुआ था। इस मंदिर का निर्माण विरुपन्ना नायक और विरन्ना ने करवाया था। ये दोनों भाई थे और विजयनगर सामग्राज्य में राजा अच्युतार्य के गर्वनर थे। हालांकि, इस मंदिर का इतिहास सदियों पुराना है। स्कंद पुराण में भी इस मंदिर का जिक्र मिलता है, इसे भगवान शिव के दिव्यक्षेत्रों में से एक माना जाता है।
मंदिर की दीवारों पर कई कलाकृतियां बनी हुई हैं। जिनमें शिव के अलग-अलग रूपों को चित्रित किया गया है। वीरभद्र स्वामी को शिव का ही रूप माना जाता है। मंदिर में अन्य कई देवी-देवताओं की मूर्तियां भी मौजूद हैं।
लेपाक्षी मंदिर का हैंगिंग पिलर
लेपाक्षी मंदिर में कई खंभे हैं। इनमें से एक खंभा ऐसा भी है जो हवा में झूल रहा है। दरअसल, ये खंभा जमीन से जुड़ा हुआ नहीं है। इसके नीचे थोड़ी खाली जगह है, जिसमें से कोई पतला कपड़ा आसानी से निकल जाता है। देखने पर ऐसा लगता है कि ये खंभा में हवा में झूल रहा है।
लेपाक्षी मंदिर में मौजूद इस हैंगिंग पिलर का असली कारण तो आज तक पता नहीं चल पाया है। लोगों के लिए ये अब भी रहस्य बना हुआ है। हालांकि, स्थानीय लोगों का मानना है कि ब्रिटिश काल में एक इंजीनियर ने ये जानने की कोशिश की थी कि ये मंदिर खंभों पर कैसे टिका हुआ है। इसके लिए उसने एक खंभे को खिसकाया था, उसके बाद से वह हवा में झूल गया।
मंदिर में आने वाले दर्शनार्थी इस खंभे के नीचे से कपड़ा आरपार निकालते हैं। श्रद्धालुओं का मानना है कि ऐसा करने पर घर में सुख और समृद्धि आती है।


चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि यानी आज 2 अप्रैल से शुरू हो रहे हैं। सूर्य अपने क्रांति वृत पर रेवती नक्षत्र में रहेंगे। जिससे नवरात्रि रेवती नक्षत्र में मनाए जाएंगे। ज्योतिषियों की मानें इस नक्षत्र में पूजा करने से अराधना धन-धान्य एवं सुख-समृद्धि देनेवाली होगी। नवरात्र में मां दुर्गा की पूजा जीवन में सुख समृद्धि और शांति लाती है।पूजा के बाद आरती करने का भी विशेष विधान है। पूजा के आखिर में क्षमा याचना के साथ दुर्गा जी की आरती करनी चाहिए। आरती का उच्चारण खुद से ही करना चाहिए और शंख और घंटी को भी बजाना चाहिए। नवरात्र में कलश स्थापना, जौ बोने, दुर्गा सप्तशती का पाठ करना का बहुत ही अधिक महत्व है।
दुर्गा जी की आरती
जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ।
तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥
मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को ।
उज्ज्वल से दोउ नैना, चंद्रवदन नीको ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥
कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै ।
रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजै ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥
केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी ।
सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥
कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती ।
कोटिक चंद्र दिवाकर, सम राजत ज्योती ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥
शुंभ-निशुंभ बिदारे, महिषासुर घाती ।
धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥
चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे ।
मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥
ब्रह्माणी, रूद्राणी, तुम कमला रानी ।
आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥
चौंसठ योगिनी मंगल गावत, नृत्य करत भैरों ।
बाजत ताल मृदंगा, अरू बाजत डमरू ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥
तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता,
भक्तन की दुख हरता । सुख संपति करता ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥
भुजा चार अति शोभित, खडग खप्पर धारी ।
मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥
कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती ।
श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योती ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥
श्री अंबेजी की आरति, जो कोइ नर गावे ।
कहत शिवानंद स्वामी, सुख-संपति पावे ॥
ॐ जय अम्बे गौरी..॥
जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ।
सनातन धर्म में शीतला सप्तमी व्रत रखा जा रहा है। इस साल शीतला सप्तमी 24 मार्च, गुरुवार और शीतला अष्टमी का त्योहार 25 मार्च को मनाया जाएगा। इस त्योहार को बसौड़ा या बसोरा भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन ठंडा भोजन करने से बीमारियां नहीं होती हैं। ऐसा कहा जाता है कि शीतला अष्टमी से ही ग्रीष्मकाल की शुरुआत होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शीतला माता की पूजा करने से चेचक, नेत्र विकार आदि रोग होने का भय नहीं रहता है। कहा जाता है कि शीतला माता की विधिवत पूजा करने वाली संतानहीन महिलाओं को आशीर्वाद प्राप्त होता है।
शीतला सप्तमी 2022 शुभ मुहूर्त-
ब्रह्म मुहूर्त- 04:46 ए एम से 05:34 ए एम।
अभिजित मुहूर्त- 12:03 पी एम से 12:52 पी एम।
विजय मुहूर्त- 02:30 पी एम से 03:19 पी एम।
गोधूलि मुहूर्त- 06:22 पी एम से 06:46 पी एम।
अमृत काल- 09:12 ए एम से 10:43 ए एम।
निशिता मुहूर्त- 12:03 ए एम, मार्च 25 से 12:50 ए एम, मार्च 25।
रवि योग- 06:21 ए एम से 05:30 पी एम।
शीतला सप्तमी का महत्व-
शीतला सप्तमी का व्रत करने से शीतला माता प्रसन्न होती हैं। इस व्रत की विशेषता है कि शीतला देवी को भोग लगाने वाले सभी भोजन को एक दिन पूर्व की बना लिया जाता है। दूसरे दिन शीतला माता को भोग लगाया जाता है। इसलिए इस व्रत को बसोरा भी कहते हैं। मान्यता है कि इस दिन घरों में चूल्हा नहीं जलता है।
शीतला सप्तमी कथा-
किसी गांव में एक महिला रहती थी। वह शीतला माता की भक्त थी तथा शीतला माता का व्रत करती थी। उसके गांव में और कोई भी शीतला माता की पूजा नहीं करता था। एक दिन उस गांव में किसी कारण से आग लग गई। उस आग में गांव की सभी झोपड़ियां जल गई, लेकिन उस औरत की झोपड़ी सही-सलामत रही। सब लोगों ने उससे इसका कारण पूछा तो उसने बताया कि मैं माता शीतला की पूजा करती हूं। इसलिए मेरा घर आग से सुरक्षित है। यह सुनकर गांव के अन्य लोग भी शीतला माता की पूजा करने लगे।
शीतला सप्तमी पूजन विधि-
इस दिन लोग सूर्योदय से पहले उठकर ठंडे जल से स्नान करते हैं। इसके बाद शीतला माता के मंदिर में जाकर देवी को ठंडा जल अर्पित करके उनकी विधि-विधान से पूजा करते हैं। श्रीफल अर्पित करते हैं और एक दिन पूर्व पानी में भिगोई हुई चने की दाल चढ़ाते है। शीतला माता को ठंडे भोजन का नैवेद्य लगता है इसलिए भोजन एक दिन पहले रात में बनाकर रख लिया जाता है। शीतला सप्तमी की कथा सुनने के बाद घर आकर मुख्य प्रवेश द्वार के दोनों ओर हल्दी से हाथ के पांच पांच छापे लगाए जाते हैं। जो जल शीतला माता को अर्पित किया जाता है उसमें से थोड़ा सा बचाकर घर लाते हैं और उसे पूरे घर में छींट देते हैं। इससे शीतला माता की कृपा बनी रहती है और रोगों से घर की सुरक्षा होती है। शीतला सप्तमी के दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता है।

होली के आठवें दिन शीतला अष्टमी मनाई जाती है। उत्तर भारत में इस त्योहार का खासा महत्व है। हिन्दू पंचांग के मुताबिक चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को शीतला अष्टमी मनाया जाता है। इस दिन शीतला माता की पूजा की जाती है। शीतला अष्टमी को बसौड़ा के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि इस दिन शीतला माता को बासे भोजन का भोग लगाया जाता है। शास्त्रों में शीतला माता को आरोग्य प्रदान करने वाली देवी बताया गया है। माना जाता है कि इस दिन जो महिला माता का व्रत रखती है और उनका श्रद्धापूर्वक पूजन करती हैं, उनका परिवार और बच्चे निरोगी रहते हैं। उन्हें बुखार, खसरा, चेचक, आंखों के रोग आदि समस्याएं नहीं होतीं।
कब है मुहूर्त?
इस बार बसौड़ा का पर्व 25 मार्च 2022, दिन शुक्रवार को मनाया जाएगा। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 24 मार्च 2022, गुरुवार की रात 12:09 बजे से शुरु होगी और 25 मार्च 2022, शुक्रवार को रात 10:04 बजे खत्म होगी। उदया तिथि के मुताबिक सूर्योदय 25 मार्च को होगा, इसलिए इसी दिन शीतला माता की पूजा होगी।
क्या चढ़ायें भोग?
इसमें लोग सप्तमी की रात में ही मातारानी के लिए हलवा और पूड़ी का भोग तैयार कर लेते हैं और अष्टमी के दिन ये माता रानी को ये बासा भोजन ही अर्पित किया जाता है। इस दिन माता शीतला को खासतौर पर मीठे चावलों का भोग लगाया जाता है। ये चावल, गुड़ या गन्ने के रस से बनाए जाते हैं। कहीं-कहीं माता को चावल और घी का भी भोग लगाया जाता है। इस दिन घरों में खाना नहीं बनाया जाता है, बल्कि माता को चढ़ाये प्रसाद को ही ग्रहण किया जाता है।
क्यों चढ़ता है बासा भोजन?
शीतला माता को शीतलता प्रदान करने वाली माता कहा गया है। इसलिए उनको समर्पित भोजन वो पूरी तरह शीतल रहे, इसलिए उसे रात में ही बनाकर रख लिया जाता है। माता के भक्त भी प्रसाद स्वरूप ठंडा भोजन ही अष्टमी के दिन ग्रहण करते हैं। इस दिन घरों में चूल्हा जलाना भी वर्जित होता है। माना जाता है कि शीतला अष्टमी के बाद गर्मी बढ़ने लगती है और इसे बासी भोजन ग्रहण करने का आखिरी दिन माना जाता है। क्योंकि इसके बाद गर्मी की वजह से भोजन खराब होने लगता है। शीतला अष्टमी के दिन मातारानी को सप्तमी को बने बासे भोजन का भोग लगाकर संदेश दिया जाता है कि आज के बाद पूरे ग्रीष्म काल में ताजा भोजन ही ग्रहण करना है।
कैसे करें पूजन?
सप्तमी की शाम को रसोई की साफ सफाई करने के बाद माता के लिए भोग और घर वालों के लिए भोजन तैयार करें। अष्टमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर मां शीतला के समक्ष हाथ में पुष्प, अक्षत, रोली, जल और दक्षिणा लेकर व्रत का संकल्प लें। इसके बाद विधि-विधान से माता का पूजन करें. उन्हें रोली, अक्षत, जल, पुष्प, दक्षिणा, वस्त्र, प्रसाद आदि अर्पित करें। बासी हलवा पूड़ी और खीर आदि का भोग लगाएं। शीतला स्त्रोत का पाठ करें, व्रत कथा पढ़ें और मातारानी से परिवार को निरोगी रखने की प्रार्थना करें। मान्यता के मुताबिक शीतला अष्टमी तिथि के दिन घर में चूल्हा नहीं जलाना चाहिए।