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K.W.N.S.-मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज में होने के कारण हम पड़ोसियों आदि से चीजों का आदान–प्रदान करते हैं। लेकिन ज्योतिष कहता हैकि हमें एक–दूसरे के साथ व्यवहार करते समय भी विशेष ध्यान रखना चाहिए। क्योंकि ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुछ ऐसी चीजें हैं जो किसी को नहीं देनी चाहिए। आइए जानते हैं वो कौन सी चीजें हैं जो सूर्यास्त के बाद किसी को नहीं देनी चाहिए? धन: देवी लक्ष्मी को धन की देवी माना जाता है। सूर्यास्त के बाद या कोई व्यक्ति किसी को पैसे देने के बाद, इसका मतलब है कि वह व्यक्ति देवीको अपने घर से विदा कर रहा है। ऐसा करने से देवी उस व्यक्ति के घर से विदा हो जाती है। दूध: दूध का संबंध भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी से है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार अगर किसी को सूर्यास्त के बाद दूध दिया जाता है तो देवीलक्ष्मी क्रोधित हो जाती हैं और उस घर की वृद्धि समाप्त हो जाती है। दही: ज्योतिष के अनुसार दही शुक्र ग्रह को दर्शाता है। दही से व्यक्ति को सुख और वैभव की प्राप्ति होती है। हालांकि, अगर कोई व्यक्ति सूर्यास्तके बाद किसी को दही देता है, तो उस व्यक्ति के जीवन में सुख और वैभव की कमी होती है। हल्दी: हल्दी का संबंध शुक्र ग्रह से है। इसलिए सूर्यास्त के बाद किसी को हल्दी देने से गुरु कमजोर हो जाता है, जिससे व्यक्ति को धन–धान्य कीकमी हो जाती है। लहसुन और प्याज: ज्योतिष में लहसुन और प्याज का संबंध केतु ग्रह से और ग्रह को जादू टोना से जोड़ा गया है। इसलिए सूर्यास्त के बाद लहसुनया प्याज नहीं देना चाहिए।
 

शनि देव को प्रसन्न करने और उनकी कृपा पाने के लिए लोग कई तरह के उपाय करते हैं. शनिवार के दिन शनि देव को सरसों का तेल, काले तिल अर्पित करें उनकी पूजा करते हैं और व्रत आदि करते हैं.ताकि शनि के प्रकोप से बचा जा सके. शनिदेव व्यक्ति के कर्मों के अनुसार ही फल देते हैं. जिन लोगों की कुंडली में शनि मजबूत स्थिति में होता है उन्हें जीवन में किसी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता. और कमजोर शनि व्यक्ति को शारीरिक और आर्थिक परेशानियों से घिरे रहते हैं. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शनि की प्रिय राशियों को शनिदशा नहीं झेलनी पड़ती या फिर कम बुरे प्रभावों का सामना करना पड़ता है. आइए जानते हैं शनि की प्रिय राशियों के बारे में तुला राशि- ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इन राशि के जातकों पर शनि की विशेष कृपा रहती है. ये शनि देव की उच्च राशि मानी जाती है और शनिदेव की प्रिय राशियों में से एक है. ये लोग बहुत मेहनती होते हैं. किसी के साथ गलत बात इन्हें बिल्कुल बर्दाश्त नहीं होती. इन्हें सच्चाई के साथ खड़ा होना पसंद होता है. अन्य राशियों के मुकाबले तुला राशि के लोगों पर शनि की दशा का प्रभाव नहीं पड़ता. मकर राशि- इस राशि का स्वामी ग्रह शनि होता है. इस वजह से इसे भी शनि की प्रिय राशियों में गिना जाता है. ये लोग बहुत बुद्धिमान माने जाते हैं. इतना ही नहीं, ये अपनी मेहनत के दम पर जल्दी सफलता हासिल कर लेते हैं. मेहनती होते हैं और आसानी से हार नहीं मानते. इन पर भी शनि देवी का बुरा प्रभाव जल्द नहीं पड़ता. कुंभ राशि- ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस राशि का स्वामी ग्रह भी शनि को ही कहा जाता है. ये लोग स्वभाव से सरल होते है. धैर्यवान होते हैं. जिस काम को करने के ठान लेते हैं, उन्हें करके ही दम लेते हैं. इन लोगों की आर्थिक स्थिति भी बेहद मजबूत होती है. ये लोग जल्दी से हार नहीं मानते.
 

 
K.W.N.S.-हिंदू पंचांग के अनुसार 21 जून, मंगलवार का दिन है और यह दिन राम भक्त हनुमान और मंगलदेव को समर्पित हैं. इस दिन ​हनुमान का पूजन करने से सभी कष्टों का नाश होता है.  जिस व्यक्ति पर मंगल भारी है उसे आज के दिन मंगलदेव की उपासना करनी चाहिए. यदि भगवान हनुमान और मंगलदेव प्रसन्न हो जाएं तो जातक के जीवन में मंगल ही मंगल होगी. लेकिन मंगलवार के दिन भूलकर भी कुछ  ऐसे काम नहीं करने चाहिए ​जिनकी वजह से आपको जीवन भर पछताना पड़े। 
 मंगलवार के दिन ना करें ये काम यदि आप मंगलवार के दिन व्रत-उपवास करते हैं तो आपको भूलकर भी नमक का सेवन नहीं करना चाहिए. इससे स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है. मंगलवार के दिन पश्चिम, वायव्य और उत्तर दिशा की ओर यात्रा करने से बचना चाहिए. यदि यात्रा करना ज्यादा जरूरी है तो घर से गुड़ खाकर निकलें. मंगलवार के दिन मांस और मंदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए. यह तामसिक चीजें है और मंगलवार के दिन इनका सेवन करने से आपको कई परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। 
मंगलवार के दिन किसी को उधार नहीं देना चाहिए क्योंकि इस दिन दिया गया उधार वापस नहीं आता. उसे वापस पाने के लिए काफी जतन करने पड़ते हैं. ध्यान रखें कि मंगलवार के दिन शु्क्र और शनि से जुड़ा कोई भी काम नहीं करना चाहिए. ऐसा करने से उस काम असर उलटा ही पड़ता है. मंगलवार के दिन कभी भी अपने भाई या मित्र से विवाद नहीं करना चाहिए. क्योंकि इसकी वजह से आपको जीवन भर पछताना पड़ सकता है. मंगलवार का दिन ब्रह्मचर्य के पालन करने के लिए होता है और इस दिन प्रणय संबंध नहीं बनाने चाहिए। 
 

 
K.W.N.S.-ज्योतिष शास्त्र में घर में सुख-शांति बनाए रखने और नौकरी-बिजनेस में तरक्की के लिए ढेरों उपाय बताए गए हैं। जिन्हें अपनाकर सुख-शांति के साथ रह सकते हैं। इसी तरह ज्योतिष शास्त्र में लौंग को लेकर कई उपाय भी बताए गए हैं। लौंग का इस्तेमाल पूजा के रूप में जरूर किया जाता है। मान्यता है कि इसे अर्पित करने से देवी-देवता जल्द प्रसन्न हो जाते हैं। ज्योतिष शास्त्र में लौंग को लेकर कई उपाय बताए गए हैं जिन्हें अपनाकर व्यक्ति खुशहाल जीवन जी सकता है। 
लौंग से करें ये ज्योतिष उपाय 
नकारात्मक ऊर्जा के लिए
 घर की नेगेटिव एनर्जी दूर करने के लिए लौंग का ये सिंपल सा उपाय करना शुभ होगा। इसके लिए शनिवार या फिर रविवार के दिन 5 लौंग, 3 कपूर और 3 बड़ी इलायची लेकर जला दें। इसके बाद इसे घर के एक-एक कोने में घुमा दीजिए। इसके बाद जब पूरी तरह से जला दें। आप चाहे, तो इसकी राख में थोड़ा सा पानी मिलाकर प्रवेश द्वार में फैला दीजिए। ऐसा करने से नेगेटिव एनर्जी खत्म हो जाएगी। 
 राहु केतु के लिए 
अगर किसी जातक की कुंडली में राहु और केतु की स्थिति सही नहीं है तो शनिवार के दिन लौंग का दान करें। इसके साथ ही 40 शनिवार तक इस उपाय को अपनाते रहें। अगर किसी व्यक्ति को दान नहीं दे सकते हैं तो शिवलिंग में इन लौंग को चढ़ा दें। ऐसा करने से राहु केतु का दुष्प्रभाव कम हो जाएगा। 
उधार पैसे वापस लाने के लिए 
अगर कोई व्यक्ति आपके द्वारा दिए गए पैसे वापस करने में आनाकानी कर रहा है तो अमावस्या या फिर पूर्णिमा के दिन रात के समय 21 लौंग कपूर में रखकर जला दें और मां लक्ष्मी का ध्यान करते हुए हवन कर लें। ऐसा करने से राहु केतु का दुष्प्रभाव कम हो जाएगा। 
आर्थिक लाभ के लिए
 मेहनत करने के बावजूद फल नहीं मिल रहा है या फिर पैसों की तंगी का सामना करना पड़ रहा है तो मंगलवार या शनिवार के दिन हनुमान जी की तस्वीर या मूर्ति के सामने सरसों के तेल का दीपक जलाएं। दीपक जलाने के बाद इसमें दो लौंग भी डाल दें। इसके बाद हनुमान चालीसा का पाठ करें। ऐसा 21 मंगलवार या शनिवार करने पर आपको अवश्य सफलता प्राप्त होगी।
 

हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्व होता है। एकादशी तिथि भगवान विष्णु को समर्पित मानी गई है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु व माता लक्ष्मी की विधिवत पूजा करने से मनोकामना पूरी होती है। हिंदू पंचांग के अनुसार, आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है। पुराणों के अनुसार, इस दिन से चार महीने के लिए भगवान विष्णु योग निद्रा में रहते हैं। इस चार महीनों में मांगलिक कार्यों की मनाही होती है। कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष की एकादशी को भगवान योग निद्रा से उठते हैं। इस एकादशी को देवउठनी एकादशी कहा जाता है। इस साल देवशयनी एकादशी 10 जुलाई 2022 को पड़ रही है।
देवशयनी एकादशी 2022 शुभ मुहूर्त-
देवशयनी एकादशी तिथि 09 जुलाई 2022 को शाम 04 बजकर 39 मिनट पर प्रारंभ होगी, जो कि 10 जुलाई को दोपहर ज2 बजकर 13 मिनट पर समाप्त होगी।
देवशयनी एकादशी पूजा- विधि
* सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं।
* घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित करें।
* भगवान विष्णु का गंगा जल से अभिषेक करें।
* भगवान विष्णु को पुष्प और तुलसी दल अर्पित करें।
* अगर संभव हो तो इस दिन व्रत भी रखें।
* भगवान की आरती करें।
* भगवान को भोग लगाएं। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि भगवान को सिर्फ सात्विक चीजों का भोग लगाया जाता है। भगवान विष्णु के भोग में तुलसी को जरूर शामिल करें। ऐसा माना जाता है कि बिना तुलसी के भगवान विष्णु भोग ग्रहण नहीं करते हैं।
* इस पावन दिन भगवान विष्णु के साथ ही माता लक्ष्मी की पूजा भी करें।
* इस दिन भगवान का अधिक से अधिक ध्यान करें।
देवशयनी एकादशी महत्व
इस पावन दिन व्रत रखने से सभी तरह के पापों से मुक्ति मिल जाती है।
इस व्रत को करने से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एकादशी का व्रत रखने से मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है।

आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को योगिनी एकादशी कहा जाता है। मान्यता है कि एकादशी व्रत रखने से सभी दुखों से मुक्ति मिलती है और मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है। इतना ही नहीं योगिनी एकादशी का व्रत 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर माना गया है। इस व्रत का महत्व भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया था। एकादशी तिथि भगवान विष्णु को समर्पित मानी गई है। इस दिन माता विष्णुजी व माता लक्ष्मी की पूजा करने से शुभ फलों की प्राप्ति होती है। योगिनी एकादशी के दिन सर्वार्थ सिद्धि योग का संयोग बन रहा है। शास्त्रों के अनुसार, सर्वार्थ सिद्धि योग में किए गए कार्यों में सफलता प्राप्ति होती है।
योगिनी एकादशी 2022 कब है?
हिंदू पंचांग के अनुसार, आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का प्रारंभ 23 जून, गुरुवार को रात 09 बजकर 41 मिनट रक हो रहा है। एकादशी तिथि 24 जून, शुक्रवार को रात 11 बजकर 12 मिनट पर समाप्त होगी। उदयातिथि की मान्यता अनुसार, एकादशी व्रत 24 जून, शुक्रवार को रखा जाएगा।
योगिनी एकादशी 2022 शुभ मुहूर्त-
योगिनी एकादशी के दिन अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 56 मिनट से दोपहर 12 बजकर 51 मिनट तक रहेगा। इस दिन ज्येष्ठा नक्षत्र सुबह 06 बजकर 32 मिनट तक रहेगा। इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग सुबह 05 बजकर 24 मिनट से सुबह 08 बजकर 04 मिनट तक रहेगा। ब्रह्म मुहूर्त सुबह 04 बजकर 04 मिनट से सुबह 04 बजकर 44 मिनट तक रहेगा।
योगिनी एकादशी 2022 व्रत पारण का समय-
योगिनी एकादशी व्रत का पारण 25 जून, शनिवार को किया जाएगा। व्रत पारण का शुभ समय सुबह 05 बजकर 41 मिनट से सुबह 08 बजकर 12 मिनट के बीच रहेगा।

 
 नई दिल्ली। अंक ज्योतिष के जरिए व्यक्ति के स्वभाव और व्यक्तित्व का पता चलता है। अंक ज्योतिष में भाग्यांश के जरिए जातक के भविष्यफल का भी आकंलन किया जाता है। अंकशास्त्र के अनुसार अपने नंबर निकालने के लिए आप अपनी जन्म तिथि, महीने और वर्ष को इकाई अंक तक जोड़ें और तब जो संख्या आएगी, वही आपका भाग्यांक होगा। उदाहरण के तौर पर महीने के 2, 11 और 20 तारीख को जन्मे लोगों का मूलांक 2 होगा। जिस तरह से ग्रहों की स्थिति से हर दिन कुछ राशि वालों के लकी साबित होता है, उसी तरह से कुछ भाग्यांश भी भाग्यशाली होते हैं। जानें 16 जून को किन तारीखों में जन्मे लोगों का दिन रहेगा शुभ-
मूलांक 5- महीने की 5, 14 या 23 तारीख को जन्मे लोगों का भाग्यांश 5 होगा। 16 जून का दिन आपका दिन खुशनुमा रहेगा। कार्यक्षेत्र और व्यापार में वातावरण आपके अनुकूल रहेगा। साथियों के सहयोग से मुश्किल कार्य भी बन सकेंगे। व्यापार में अचानक लाभ के अवसर सामने आएंगे। व्यापारिक यात्रा पर जाने का कार्यक्रम बन सकता है। परिवार में खुशियों का वातावरण रहेगा। दांपत्य जीवन में मधुरता रहेगी। संतान पक्ष से शुभ समाचार की प्राप्ति हो सकती है। मौसम के बदलाव से आपका स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है।
मूलांक 9-  महीने की 9 या 27 तारीख को जन्मे लोगों का भाग्यांश 9 होगा। 16 जून का दिन आपका दिन उपलब्धियों भरा हो सकता है। कार्यक्षेत्र और व्यापार में वातावरण आपके अनुकूल रहेगा। साथियों का सहयोग मिलेगा। अधिकारियों का सानिध्य प्राप्त होगा। नई योजनाओं पर कार्य आरंभ कर सकते हैं। व्यापार में लाभ के अवसर सामने आएंगे। परिवार में खुशियों का वातावरण रहेगा। किसी धार्मिक आयोजन में शामिल होने का अवसर मिलेगा। आपका स्वास्थ्य सामान्य रहेगा।
मूलांक 7-  महीने की 7 या 25 तारीख को जन्मे लोगों का भाग्यांश 7 होगा। 16 जून के दिन आप नई योजनाओं पर कार्य आरंभ कर सकते हैं। व्यापार में अचानक लाभ के अवसर सामने आएंगे। विद्यार्थियों को प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता मिल सकती है। परिवार में खुशियों का वातावरण रहेगा। दांपत्य जीवन में मधुरता रहेगी। वाहन और मशीनरी के प्रयोग में सावधानी बरतें। नेत्र विकार आपको परेशान कर सकते हैं।

मां दुर्गा को समर्पित पर्व नवरात्रि को हिंदू धर्म में सबसे पवित्र व ऊर्जादायक माना गया है। हिंदू पंचांग के अनुसार, साल में कुल नवरात्रि आते हैं जो पौष, चैत्र, आषाढ़ और अश्विन मास में पड़ती है। जिनमें से दो गुप्त नवरात्रि शामिल हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गुप्त नवरात्रि में दस महाविद्याओं की पूजा-अर्चना की जाती है। इस दौरान तंत्र विद्या का विशेष महत्व है। आषाढ़ मास में पड़ने वाली नवरात्रि को आषाढ़ गुप्त नवरात्रि के नाम से जानते हैं। इस नवरात्रि में मां त्रिपुर भैरवी, मां धूमावती, मां बगलामुखी, मां काली, मां तारा देवी, मां त्रिपुर सुंदरी, मां भुवनेश्वरी, मां छिन्नमस्ता, मां मातंगी और कमला देवी की पूजा करते हैं।
कब से शुरू हो रहे आषाढ़ गुप्त नवरात्रि 2022?
30 जून को आषाढ़ मास की प्रतिपदा के साथ गुप्त नवरात्रि की शुरुआत हो रही है, जो कि 09 जुलाई को दशमी के साथ समाप्त होंगे।
गुप्त नवरात्रि 2022 शुभ मुहूर्त-
आषाढ़ प्रतिपदा तिथि 29 जून को सुबह 08 बजकर 22 मिनट से शुरू होगी, जो कि 30 जून को सुबह 10 बजकर 49 मिनट पर समाप्त होगी।
घटस्थापना मुहूर्त-
गुप्त नवरात्रि में अभिजीत मुहूर्त 30 जून को दोपहर 12 बजकर 03 मिनट से शुरू होगा, जो कि 12 बजकर 57 मिनट तक रहेगा। घटस्थापना का मुहूर्त 30 जून को सुबह 05 बजकर 48 मिनट से सुबह 10 बजकर 16 मिनट तक रहेगा।
मां दुर्गा की गुप्त नवरात्रि में ऐसे करें पूजा-
1. गुप्त नवरात्रि के दौरान आधी रात को मां दुर्गा की पूजा की जाती हैं।
2. मां दुर्गा की प्रतिमा या मूर्ति स्थापित कर लाल रंग का सिंदूर और चुनरी अर्पित करें।
3. इसके बाद मां दुर्गा के चरणों में पूजा सामग्री को अर्पित करें।
4. मां दुर्गा को लाल पुष्प चढ़ाना शुभ माना जाता है।
5. सरसों के तेल से दीपक जलाकर  ‘ॐ दुं दुर्गायै नमः’ मंत्र का जाप करना चाहिए।

वायु मार्ग से लंका पहुंचने के बाद हनुमान जी ने वहां की सारी सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लिया था। और मुख्य द्वार से बहुत ही सूक्ष्म शरीर बना कर प्रवेश करने लगे थे। लेकिन वहां की रक्षा करने वाली लंकिनी राक्षसी उन्हें पहचान गईं। समुद्र से उड़ते हुए हनुमान जी लंका पहुंच तो गए लेकिन उनके सामने समस्या आई कि लंका में प्रवेश कैसे किया जाए। बुद्धिमान हनुमान जी ने सबसे पहले वहां की सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लिया और उसके बाद वे जान गए कि लंका में प्रवेश करना बेहद ही कठिन है। इसके बाद उन्होंने प्रभु श्रीराम को याद करते हुए मच्छर के समान अपना सूक्ष्म शरीर किया और प्रवेश करने का निर्णय लिया।
लंकिनी ने हनुमान जी को पहचाना
लंका में मुख्य प्रवेश द्वार पर तैनात लंकिनी राक्षसी ने उन्हें इतने छोटे रुप में पहचान लिया और कहा कि मेरी आज्ञा को बिना कोई नगर में प्रवेश नहीं कर सकता। जो भी लोग चोरी करने आते हैं, मैं उन्हें अपना आहार बना लेती हूं। इसके बाद हनुमान जी ने तुरंत लंकिनी को एक जोरदार घूंसा मारा। वह बेहोश होकर गिर पड़ी। और उसके मुंह से खून आने लगा। होश में आने पर वह हनुमान जी को पहचान कर बोली आप तो श्रीराम के दूत है। अब राक्षसों के विनाश का समय आ गया है।
लंकिनी ने बताई श्रीराम के नाम की महिमा
लंकिनी ने हनुमान जी को पहचानने के बाद कहा कि अयोध्यापुरी के राजा रघुनाथ जी को ह्र्दय में रख कर आप लंका में प्रवेश कीजिए और अपने सब काम कीजिए। श्रीराम की कृपा से विष भी अमृत बन जाता है। शत्रु मित्रता करने लगते है, समुद्र गाय के खुर के समान हो जाता है। अग्नि में भी शीतलता आ जाती है। बस इतना सुनते ही हनुमान जी भगवान का स्मरण कर छोटा रुप रखते है और नगर में प्रवेश कर जाते है।
हनुमान जी ने देखी लंका की दशा
हनुमान जी ने लंका में प्रवेश करने के बाद कई प्रकार के महल देखे। उन्होंने वह महल भी देखा जहां रावण सो रहा था। लेकिन उस महल में कहीं भी जानकी जी दिखाई नहीं दे रही थीं। इसी बीच हनुमान जी की नजर एक ऐसे महल पर गई जो अलग तरह से बना हुआ था। वहां पर अलग से भगवान का मंदिर भी बना था। उस महल में भगवान श्रीराम के धनुष बाण के चिन्ह भी अंकित थे।
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि उस महल की शोभा का वर्णन नहीं किया जा सकता। उस स्थान पर तुलसी के पौधों के समूह को देखकर हनुमान जी को अत्यंत प्रसन्नता हुई। उन्होंने सोचा कि लंका तो राक्षसों का निवास स्थान है, यहां पर सज्जन पुरुष कैसे हो सकते हैं। इसी बीच विभीषण सोकर उठे और उन्होंने श्री राम के नाम का उच्चारण किया। इतना सुनते ही हनुमान जी ने विभीषण से जाकर परिचय करने का निश्चय किया।

 
K.W.N.S.-रावण द्वारा सीता माता के हरण के बाद प्रभु श्री राम अपने भाई लक्ष्मण जी के साथ जंगल में भटकते हुए उन्हें खोज रहे थे, तभी भगवान शंकर सती माता के साथ उनके दर्शन को निकले और दूर से ही उन्हें देख कर सच्चिदानंद की जय हो कह प्रणाम करते हुए आगे चल पड़े. माता सती को बहुत ही अचरज किया कि जिनकी पूरा संसार वंदना करता है, ईश्वर मानता है वे ही साधु वेश धारी दो राजकुमारों को देख कर सच्चिदानंद बोल रहे हैं. सती को इस पर संदेह हुआ पर कहा कुछ नहीं. भगवान शंकर ने सब कुछ समझ लिया और कहा कि ये ही मेरे ईष्टदेव रघुनाथ हैं जिनका कथा अगस्त्य मुनि ने सुनाई थी. इन्हीं ने श्री राम के रूप में अयोध्या में अवतार लिया है, इस पर उन्होंने सती माता से कहा कि तुम अपना संदेह दूर करने के लिए खुद ही जाकर परीक्षा ले लो. शिव जी ने सोचा होगा वही जो विधाता ने रच रखा है. इधर सती ने बार बार मन में विचार कर सीता जी का रूप रखा और उस मार्ग पर चल पड़ीं जिस पर प्रभु श्री रामचंद्र जी आ रहे थे।
अंतर्यामी श्री राम ने सती को पहचान लिया पर लक्ष्मण खा गए धोखा सीता जी का बनावटी वेश को देखकर लक्ष्मण जी चकित और भ्रमित हो गए. वे बहुत गंभीर हो गए किंतु कुछ कह नहीं सके. इधर सबके हृदय को जानने वाले प्रभु श्री राम तो सती के कपट को जान गए और सोचने लगे कि स्त्री स्वभाव का असर तो देखो कि वे उनसे (श्री राम) ही छिपाव करना चाहती हैं. श्री राम ने हंसते हुए कोमल वाणी में हाथ जोड़ कर सती को प्रणाम करते हुए अपने पिता के नाम के साथ अपना परिचय दिया और फिर पूछा कि शिवजी कहां है और इस वन में अकेले किसलिए घूम रही हैं. श्री राम के रहस्यमय वचन सुनकर सती को बहुत ही संकोच हुआ और बिना कोई जवाब दिए वे चुपचाप डरती हुई शिवजी के पास चली, अब उनके हृदय में बड़ी चिंता हो रही थी कि अब शिव जी को क्या जवाब दें।
जब सती जी ने देखा श्री राम का सच्चिदानंद रूप प्रभु श्री राम ने अंतर्मन से जान लिया कि सती जी को इस घटनाक्रम से गहरी पीड़ा हुई है. उनके मन की पीड़ा को कुछ कम करने के उद्देश्य से से प्रभु श्री राम ने यहां पर एक माया की। सती जी ने शिवजी के पास जाते हुए मार्ग में एक कौतुक देखा कि श्री रामचंद्र जी, सीता जी और लक्ष्मण जी के साथ आगे चल रहे हैं. सती ने पीछे मुड़ कर देखा तो वहां भी श्री राम पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ चले आ रहे हैं. वे जिधर भी देखतीं सुंदर वेश में वे तीनों ही नजर आते. ,ची डी ने अनेक शिव, ब्रह्मा और विष्णु देखे जो एक से बढ़कर एक प्रभाव वाले थे, उन्होंने देखा कि भांति भांति के वेश धारण किए देवता श्री राम चंद्र की चरण वंदना और सेवा कर रहे हैं. उन्होंने अनगिनत अनुपम सती, ब्राह्मणी और लक्ष्मी भी देखीं जिस जिस रूप में ब्रह्मा आदि देवता थे, उसी के अनुकूल रूप में उनकी शक्तियां भी थीं. दरअसल श्री रघुनाथ जी चाहते थे कि सती जी श्री राम के सच्चिदानंद रूप को देख लें ताकि उन्हें वियोग और दुख की जो कल्पना हुई थी उससे दूर हो वे सामान्य हो जाएं।