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मल्टीमीडिया डेस्क । हनुमान जयंती शुक्रवार को पूरे देशभर में मनाई जा रही है। प्रायः हर घर में हनुमान चालीसा का पाठ किया जाता है। मगर, बहुत कम ही लोग इसके अर्थ को जानते होंगे। आज हम आपको हनुमान चालीसा अर्थ के साथ बता रहे हैं, ताकि आप उसके शब्दों और भावना को भी अच्छी तरह समझ सकें। इसे जानने के बाद अगली बार जब आप हनुमान चालीसा का पाठ करेंगे, तो आपको निश्चित ही अधिक आनंद मिलेगा।
श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुरु सुधारि।
बरनऊँ रघुवर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।
अर्थ- गुरु महाराज के चरण कमलों की धूलि से अपने मन रुपी दर्पण को पवित्र करके श्री रघुवीर के निर्मल यश का वर्णन करता हूं, जो चारों फल धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाला है।
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरो पवन कुमार।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार।
अर्थ- हे पवन कुमार! मैं आपको सुमिरन करता हूं। आप तो जानते ही हैं, कि मेरा शरीर और बुद्धि निर्बल है। मुझे शारीरिक बल, सदबुद्धि एवं ज्ञान दीजिए और मेरे दुःखों व दोषों का नाश कर दीजिए।
जय हनुमान ज्ञान गुण सागर, जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥1॥
अर्थ- श्री हनुमान जी! आपकी जय हो। आपका ज्ञान और गुण अथाह है। हे कपीश्वर! आपकी जय हो! तीनों लोकों, स्वर्ग लोक, भूलोक और पाताल लोक में आपकी कीर्ति है।
राम दूत अतुलित बलधामा, अंजनी पुत्र पवन सुत नामा॥2॥
अर्थ- हे पवनसुत अंजनी नंदन! आपके समान दूसरा बलवान नही है।
महावीर विक्रम बजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी॥3॥
अर्थ- हे महावीर बजरंग बली! आप विशेष पराक्रम वाले है। आप खराब बुद्धि को दूर करते है, और अच्छी बुद्धि वालो के साथी, सहायक हैं।
कंचन बरन बिराज सुबेसा, कानन कुण्डल कुंचित केसा॥4॥
अर्थ- आप सुनहले रंग, सुन्दर वस्त्रों, कानों में कुण्डल और घुंघराले बालों से सुशोभित हैं।
हाथ ब्रज और ध्वजा विराजे, काँधे मूँज जनेऊ साजै॥5॥
अर्थ- आपके हाथ मे बज्र और ध्वजा है और कन्धे पर मूंज के जनेऊ की शोभा है।
शंकर सुवन केसरी नंदन, तेज प्रताप महा जग वंदन॥6॥
अर्थ- हे शंकर के अवतार! हे केसरी नंदन! आपके पराक्रम और महान यश की संसार भर में वंदना होती है।
विद्यावान गुणी अति चातुर, राम काज करिबे को आतुर॥7॥
अर्थ- आप प्रकान्ड विद्या निधान है, गुणवान और अत्यन्त कार्य कुशल होकर श्री राम काज करने के लिए आतुर रहते हैं।
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया, राम लखन सीता मन बसिया॥8॥
अर्थ- आप श्री राम चरित सुनने मे आनंग रस लेते है। श्री राम, सीता और लखन आपके हृदय मे बसे रहते हैं।
सूक्ष्म रुप धरि सियहिं दिखावा, बिकट रुप धरि लंक जरावा॥9॥
अर्थ- आपने अपना बहुत छोटा रुप धारण करके सीता जी को दिखलाया और भयंकर रूप करके लंका को जलाया।
भीम रुप धरि असुर संहारे, रामचन्द्र के काज संवारे॥10॥
अर्थ- आपने विकराल रुप धारण करके राक्षसों को मारा और श्री रामचन्द्र जी के उदेश्यों को सफल कराया।
लाय सजीवन लखन जियाये, श्री रघुवीर हरषि उर लाये॥11॥
अर्थ- आपने संजीवनी बुटी लाकर लक्ष्मणजी को जिलाया, जिससे श्री रघुवीर ने हर्षित होकर आपको हृदय से लगा लिया।
रघुपति कीन्हीं बहुत बड़ाई, तुम मम प्रिय भरत सम भाई॥12॥
अर्थ- श्री रामचन्द्र ने आपकी बहुत प्रशंसा की और कहा की तुम मेरे भरत जैसे प्यारे भाई हो।
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं, अस कहि श्री पति कंठ लगावैं॥13॥
अर्थ- श्री राम ने आपको यह कहकर हृदय से लगा लिया की तुम्हारा यश हजार मुख से सराहनीय है।
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा, नारद,सारद सहित अहीसा॥14॥
अर्थ- श्री सनक, श्री सनातन, श्री सनन्दन, श्री सनत्कुमार आदि मुनि ब्रह्मा आदि देवता नारद जी, सरस्वती जी, शेषनाग जी सब आपका गुण गान करते है।
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते, कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥15॥
अर्थ- यमराज, कुबेर आदि सब दिशाओं के रक्षक, कवि विद्वान, पंडित या कोई भी आपके यश का पूर्णतः वर्णन नहीं कर सकते।
तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा, राम मिलाय राजपद दीन्हा॥16॥
अर्थ- आपनें सुग्रीव जी को श्रीराम से मिलाकर उपकार किया, जिसके कारण वे राजा बने।
तुम्हरो मंत्र विभीषण माना, लंकेस्वर भए सब जग जाना ॥17॥
अर्थ- आपके उपदेश का विभिषण जी ने पालन किया जिससे वे लंका के राजा बने, इसको सब संसार जानता है।
जुग सहस्त्र जोजन पर भानू, लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥18॥
अर्थ- जो सूर्य इतने योजन दूरी पर है की उस पर पहुँचने के लिए हजार युग लगे। दो हजार योजन की दूरी पर स्थित सूर्य को आपने एक मीठा फल समझ कर निगल लिया।
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहि, जलधि लांघि गये अचरज नाहीं॥19॥
अर्थ- आपने श्री रामचन्द्र जी की अंगूठी मुंह मे रखकर समुद्र को लांघ लिया, इसमें कोई आश्चर्य नही है।
दुर्गम काज जगत के जेते, सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥20॥
अर्थ- संसार में जितने भी कठिन से कठिन काम हो, वो आपकी कृपा से सहज हो जाते हैं।
राम दुआरे तुम रखवारे, होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥21॥
अर्थ- श्री रामचन्द्र जी के द्वार के आप रखवाले हैं, जिसमें आपकी आज्ञा बिना किसी को प्रवेश नही मिलता अर्थात आपकी प्रसन्नता के बिना राम कृपा दुर्लभ है।
सब सुख लहै तुम्हारी सरना, तुम रक्षक काहू को डरना॥22॥
अर्थ- जो भी आपकी शरण में आते है, उस सभी को आनंद प्राप्त होता है, और जब आप रक्षक है, तो फिर किसी का डर नही रहता।
आपन तेज सम्हारो आपै, तीनों लोक हाँक ते काँपै॥23॥
अर्थ- आपके सिवाय आपके वेग को कोई नही रोक सकता, आपकी गर्जना से तीनों लोक कांप जाते हैं।
भूत पिशाच निकट नहिं आवै, महावीर जब नाम सुनावै॥24॥
अर्थ- जहां महावीर हनुमान जी का नाम सुनाया जाता है, वहां भूत, पिशाच पास भी नहीं फटक सकते।
नासै रोग हरै सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा॥25॥
अर्थ- वीर हनुमान जी! आपका निरंतर जप करने से सब रोग चले जाते है,और सब पीड़ा मिट जाती है।
संकट तें हनुमान छुड़ावै, मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥26॥
अर्थ- हे हनुमान जी! विचार करने मे, कर्म करने मे और बोलने मे, जिनका ध्यान आपमे रहता है, उनको सब संकटो से आप छुड़ाते हैं।
सब पर राम तपस्वी राजा, तिनके काज सकल तुम साजा॥ 27॥
अर्थ- तपस्वी राजा श्री रामचन्द्र जी सबसे श्रेष्ठ हैं, उनके सब कार्यों को आपने सहज यानी सरलता से कर दिया।
और मनोरथ जो कोइ लावै, सोई अमित जीवन फल पावै॥28॥
अर्थ- जिस पर आपकी कृपा हो, वह कोई भी अभिलाषा करे तो उसे ऐसा फल मिलता है, जिसकी जीवन मे कोई सीमा नहीं होती।
चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा॥29॥
अर्थ- चारो युगों सतयुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग मे आपका यश फैला हुआ है, जगत में आपकी कीर्ति सर्वत्र प्रकाशमान है।
साधु सन्त के तुम रखवारे, असुर निकंदन राम दुलारे॥30
अर्थ- हे श्री राम के दुलारे ! आप सज्जनों की रक्षा करते हैं और दुष्टों का नाश करते हैं।
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता॥३१॥
अर्थ- आपको माता श्री जानकी से ऐसा वरदान मिला हुआ है, जिससे आप किसी को भी आठों सिद्धियां और नौ निधियां दे सकते हैं।
राम रसायन तुम्हरे पासा, सदा रहो रघुपति के दासा॥32॥
अर्थ- आप निरंतर श्री रघुनाथ जी की शरण मे रहते है, जिससे आपके पास बुढ़ापा और असाध्य रोगों के नाश के लिए राम नाम औषधि है।
तुम्हरे भजन राम को पावै, जनम जनम के दुख बिसरावै॥33॥
अर्थ- आपका भजन करने से श्री रामजी प्राप्त होते हैं, और जन्म जन्मांतर के दुःख दूर होते हैं।
अन्त काल रघुबर पुर जाई, जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई॥34॥
अर्थ-अंत समय श्री रघुनाथ जी के धाम को जाते है और यदि फिर भी जन्म लेंगे, तो भक्ति करेंगे और श्रीराम भक्त कहलायेंगे।
और देवता चित न धरई, हनुमत सेई सर्व सुख करई॥35॥
अर्थ- हे हनुमान जी! आपकी सेवा करने से सब प्रकार के सुख मिलते है, फिर अन्य किसी देवता की आवश्यकता नहीं रहती।
संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥36॥
अर्थ- हे वीर हनुमान जी! जो भी आपका सुमिरन करता रहता है, उसके सब संकट कट जाते है और सब पीड़ा मिट जाती है।
जय जय जय हनुमान गोसाईं, कृपा करहु गुरु देव की नाई॥37॥
अर्थ- हे स्वामी हनुमान जी! आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप मुझपर कृपालु श्री गुरु जी के समान कृपा कीजिए।
जो सत बार पाठ कर कोई, छुटहि बँदि महा सुख होई॥38॥
अर्थ- जो कोई इस हनुमान चालीसा का सौ बार पाठ करेगा वह सब बन्धनों से छूट जाएगा और उसे परमानन्द मिलेगा।
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा, होय सिद्धि साखी गौरीसा॥39॥
अर्थ- भगवान शंकर ने यह हनुमान चालीसा लिखवाया, इसलिए वे साक्षी है कि जो इसे पढ़ेगा उसे निश्चय ही सफलता प्राप्त होगी।
तुलसीदास सदा हरि चेरा, कीजै नाथ हृदय मँह डेरा॥40॥
अर्थ- हे नाथ हनुमान जी! तुलसीदास सदा ही श्री राम का दास है। इसलिए आप उसके हृदय मे निवास कीजिए।
पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रुप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥
अर्थ- हे संकट मोचन पवन कुमार! आप आनन्द मंगलों के स्वरुप हैं। हे देवराज! आप श्री राम, सीता जी और लक्ष्मण सहित मेरे हृदय में निवास कीजिए।
रायपुर । हिन्दू समाज में भगवान राम के जन्म स्थल के तौर पर अयोध्या का विशेष स्थान है. यहां श्रीराम की आरती अलग-अलग संप्रदाय अपने-अपने तरीके से करते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि अयोध्या की तरह ही हमारे छत्तीसगढ़ के एक मंदिर में श्रीराम की आरती की जाती है. बात हो रही है बेमेतरा जिला मुख्यालय से 22 किमी दूर स्थित चिल्फी के राम जानकी मंदिर की जहां वैष्णव परंपरा के अनुसार श्रीराम की आरती की जाती है ।
बेमेतरा-कवर्धा मार्ग पर स्थित उमरिया से दाढ़ी मार्ग पर स्थित चिल्फी में 1945 के दशक में श्रीराम जानकी मंदिर की स्थापना शीतला कुंवर ने कराई थी, जहां विराजमान राम, लक्ष्मण और सीता के विग्रह की प्राण प्रतिष्ठा वैष्णव परंपरा को मानने वाले रामानुजाचार्य सम्प्रदाय की है. मंदिर में श्रीराम की आरती अयोध्या में की जाने वाली परंपरा के अनुसार सप्त आरती सजाकर की जाती है. इसी बीच भगवान का आचमन कराने के बाद विशेष निराजन आरती की जाती है. इसमें थाली में एक दीया के साथ कपूर को जलाकर सातों आरती का जिक्र करते हुए आरती की जाती है ।
मंदिर के सरवराहकार चंद्रभूषण शुक्ला बताते हैं कि आरती की इस पूरी प्रक्रिया में 40-50 मिनट तक लगता है, लेकिन यह आरती विशेष अवसर रामनवमी एवं जन्माष्टमी पर किया जाता है. रामनवमी पर जहां दोपहर 12 बजे आरती की जाती है, वहीं जन्माष्टमी पर रात 12 बजे. सरवराहकार बताते हैं कि रामनवमी के बाद सातवें दिन छठी पर्व पर नए वस्त्र एवं षट् रस व्यंजन भगवान को भोग लगा कर आरती होती है, फिर ब्राह्मण भोजन कराया जाएगा, इसके साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होंगे. गौरतलब है कि इसी परंपरा से शिवरीनारायण स्थित राम जानकी मंदिर में भी आरती की जाती है ।
रायपुर । छत्तीसगढ़… एक ऐसा गढ़ जहां पग-पग में भगवान राम विराजमान हैं. वैसे यह कहना भी गलत नहीं होगा कि यहां हर भांजा भगवान राम हैं. इसके कारण है. लेकिन कारण से पहले आप छत्तीसगढ़ में भगवान राम और राम के रिश्तेदारों के बारे में जानिए ।
दरअसल रामायण काल में जब भगवान राम को 14 वर्ष का वनवास हुआ था तो पौराणिक कथा के मुताबिक भगवान राम के 12 बरस आज के छत्तीसगढ़ और तब के दण्यकारण्य या कहिए दक्षिण कौशल में बीते थे. भगवान राम छत्तीसगढ़ में उत्तर की सीमा कोरिया जिले माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ प्रवेश किए थे. फिर सरगुजा, रायगढ़, जांजगीर, बिलासपुर, महासमुंद, राजिम होते हुए वे दक्षिण में बस्तर के रास्ते आंध्र होते हुए श्रीलंका गए थे. भगवाम रामगमन के पुख्ता प्रमाण यहां मिलते हैं. लेकिन भगवान राम की ये कहानी तो बाद की उससे पहले की भी एक सत्य कथा है. कहानी ये कि छत्तीसगढ़ माता कौशल्या की नगरी है. माता कौशल्या का एक मात्र मंदिर पूरे विश्व में सिर्फ छत्तीसगढ़ में ही मिलते है. मतलब ये छत्तीसगढ़ राम का ननिहाल हुआ।
दूधाधारी मठ के महंत राम सुंदर बताते हैं कि छत्तीसगढ़, जिसे पुरातनकाल में दक्षिण कोसल के नाम से भी जाना जाता था. इसी दक्षिण कोसल (छत्तीसगढ़) में भगवान राम के मामा का घर और ननिहाल है. राम का ननिहाल रायपुर से 40 किलोमीटर दूर चंदखुरी गांव है. चदंखुरी गांव को माता कौशल्या की नगरी कहा जाता है. माना जाता है कि माता कौशल्या ने यहीं जन्म लिए थे. चंदखुरी में ही माता कौशल्या की प्राचीन मंदिर है. पूरे विश्व मां कौशल्या की यही एक मंदिर है. माता कौशल्या का धाम होने के चलते छत्तीसगढ़ को भगवान राम का ननिहाल कहा जाता है. मतलब भगवान का यह नाना घर, मामा घर हुआ. और यही वजह है कि लोग भगवान राम को भांजे की तरह पूजते हैं ।
वैसे भगवान राम को लेकर एक सत्य कथा इस छत्तीसगढ़ में है. एक और रिश्ता जो राम को छत्तीसगढ़ से जोड़ता है. रामायणकाल में वनवास के दौरान जिस शबरी के घर राम पहुँचे थे वो शबरीधाम इसी छत्तीसगढ़ में है. जिसे अब शिवरीनारायण के तौर पर जाना जाता है. शिवरीनारायण में ही भगवान राम ने शबरी के झूठे बेर खाए थे. इसके प्रमाण आज भी शिवरीनारायण में मिल जाएंगे. शिवरीनारायण भगवान राम और शबरी के मंदिर हैं ।
इसी तरह एक और अहम रिश्ता भगवान राम के छत्तीसगढ़ से हैं. ये रिश्ता ऋषि वाल्मिकी से जुड़ा. दरअसल इसी छत्तीसगढ़ में ऋषि वाल्मिकी का आश्रम है. वही आश्रम जहां राम के पुत्र लव और कुश का जन्म हुआ था. छत्तीसगढ़ के कसडोल तहसील में तुरतुरतिया पहाड़ है. इसी पहाड़ में वाल्मिकी का आश्रम है. माता सीता ने इसी आश्रम में शरण ली थीं ।
अब बात उस परंपरा की जो छत्तीसगढ़ के घर-घर में दिखाई देते हैं या यह भी कह सकते हैं राम के चलते ये रिश्ता निभाई जाती है. दरअसल भगवान राम का मामा घर छत्तीसगढ़ होने के नाते प्रदेशवासी राम को भांजे के रूप में भी पूजते हैं. और भगवान राम के चलते ही मामा अपने भांजों को राम की तरह ही पूजते हैं. छत्तीसगढ़ एक ऐसी जगह है मामा अपने भांजों का पैर छूकर उनसे आशीर्वाद लेते हैं ।
वैसे भगवान राम को लेकर ऐसे कितने ही प्रमाण छत्तीसगढ़ में देखने और सुनने को मिलते हैं. यही वजह है कि राम जी को लेकर छत्तीसगढ़ियों के मन में आगाध आस्था दिखती है. भगवान राम के प्रति आस्था का एक बड़ा प्रमाण जांजगीर और रायगढ़ जिले में रामनामी समुदाय के रूप में भी देखा जा सकता है. इस समूदाय के लोगों के पूरे शरीर में राम नाम गुदा हुआ रहता है. कह सकते हैं कि राम छत्तीसगढ़ के कण-कण में हैं. छत्तीसगढ़ियों के रग-रग में हैं ।
मल्टीमीडिया डेस्क । सियासत में अपने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए चुनावी अखाड़े में ( Loksabha Election 2019) जोर-आजमाइश जारी है। नेता अपनी जीत के लिए जनता के बीच से लेकर देवी-देवताओं के दरबार तक में हाजिरी दे रहे हैं। हर उम्मीदवार की ख्वाहिश बेहतर प्रदर्शन की है। हर किसी को दरकार एक अदद जीत की है। ऐसे में जीत के पैमाने को हर कसौटी पर कसा जा रहा है। जनता-जनार्दन की मान-मनौव्वल की जा रही है और मंदिरों में मत्था टेका जा रहा है,लेकिन कुछ सिद्धक्षेत्रों में इन दिनों नेताओं का तांता लगा हुआ है। देवी का एक ऐसा ही दरबार मध्य प्रदेश में उज्जैन से करीब 60 किलोमीटर दूर आगर जिले के नलखेड़ा में है। मां पीतंबरा के इस मंदिर में माता बगलामुखी की आराधना से शत्रुनाश और विजय का आशीर्वाद मिलता है।
देवी की सेवा में समर्पित पंडित आत्माराम शर्मा और पंडित सागर शर्मा ने बताया कि माता बगलामुखी के मंदिर में इन दिनों हवन की अग्नि सूर्योदय के साथ ही प्रज्वलित हो जाती है। माता के इस दरबार में रात्रि में हवन का भी प्रावधान है। वैसे तो देश विदेश से यहां लोग मनोकामना सिद्धि और सुख-समृद्धि के लिए शीश झुकाने आते हैं, लेकिन इन दिनों नेता यहां पर बड़ी संख्या में शत्रुनाश और अपनी विजय के लिए हवन करवा रहे हैं।
इस संबंध में पंडित सागर शर्मा ने बताया कि राजनेताओं के यहां आने और हवन करवाने का सिलसिला चुनाव की आहट के साथ ही शुरू हो गया था, जो नवरात्रि के दौरान अपने चरम पर है। चुनाव की वजह से यहां पर पिछले करीब एक साल से हवन करने वाले नेताओं का तांता लगा हुआ है। हवन करने वाले नेताओं में देश के हर कोने के नेता शामिल है। यदि कोई नेता अपनी पहचान छिपाना चाहता है तो वह पंडित के द्वारा या अपने प्रतिनिधि के द्वारा भी हवन का संकल्प छोड़कर हवन की प्रक्रिया को पूर्ण कर सकता है।
विजय का वरदान देती है मां बगलामुखी
पंडित आत्माराम शर्मा का कहना है कि माता बगलामुखी का त्रिशक्ति स्वरूप मंदिर भारत में इसके अलावा कहीं नहीं है। मान्यता है कि मध्य में मां बगलामुखी, दाएं मां महालक्ष्मी और बाएं मां सरस्वती विराजमान हैं। धरती पर माता बगलामुखी तीन स्थानों पर विराजमान है, जो दतिया (मध्यप्रदेश), कांगड़ा (हिमाचल) तथा नलखेड़ा (मध्यप्रदेश) में हैं।
द्वापर युगीन यह मंदिर अत्यंत चमत्कारिक है। यहां देश भर से शैव और शाक्त मार्गी साधु-संत और भक्तगण तांत्रिक अनुष्ठान के लिए आते रहते हैं। आमजन भी अपनी मनोकामना पूरी करने या किसी भी क्षेत्र में विजय प्राप्त करने के लिए यज्ञ-हवन और पूजा-पाठ करवाते हैं। कहा जाता है कि मां भगवती बगलामुखी का यह मंदिर बीच श्मशान में बना हुआ है।
दस महाविद्या में है आठवीं महाविद्या है देवी
मान्यता के अनुसार माता बगलामुखी दसमहाविद्या में आठवीं महाविद्या हैं। इनको माता पीताम्बरा भी कहते हैं। ये स्तम्भन की देवी हैं। शत्रुनाश, वाकसिद्धि, वाद विवाद में विजय के लिए इनकी आराधना की जाती है। इनकी उपासना से शत्रुओं का स्तम्भन होता है तथा जातक का जीवन निष्कंटक हो जाता है। ।
माँ बगलामुखी की चमत्कारी और सिद्ध प्रतिमा की स्थापना का कोई ऐतिहासिक प्रमाण नही मिलता है। मान्यता है की यह मूर्ति स्वयं सिद्ध स्थापित है। काल गणना के हिसाब से यह स्थान करीब पांच हजार साल से भी पहले से स्थापित है. कहा जाता है की महाभारत काल में पांडव जब विपत्ति में थे तब भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें माँ बगलामुखी के इस स्थान की उपासना करने करने के लिए कहा था। उस समय सम्राट युधिष्टिर ने लक्ष्मणा नदी, जो अब लखुंदर नदी कहलाती है के किनारे पर बैठकर मां बगलामुखी की आराधना की थी और कौरवों पर विजय प्राप्त की थी। माता पितवर्णी है इसलिए माता को पीली चीजों को समर्पित किया जाता है। पीले वस्त्र, पीले फूल, पीले मिष्ठान्न आदि।
भगवान राम के परम भक्त श्री हनुमान बल, बुद्धि और विद्या प्रदान करने वाले माने जाते हैं। भक्त बड़े प्रेम से अपने आराध्य श्री हनुमान को सिंदूर चढ़ाते है। मान्यता है कि सिंदूर चढ़ाने से बजरंग बलि प्रसन्न होते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती है।
एक कथा के अनुसार, एक दिन हनुमान जी माता सीता के कक्ष में पहुंचे थे। उन्होंने देखा कि माता सीता लाल रंग की कोई चीज अपनी मांग में सजा रही हैं। हनुमान जी ने उत्सुक हो कर माता सीता से पूछा यह क्या है, जो आप अपनी मांग में सजा रही हैं। इस पर माता सीता ने कहा कि, यह सौभाग्य का प्रतीक सिंदूर है। इसे मांग में सजाने से मुझे रामजी का स्नेह प्राप्त होता है और उनकी आयु लंबी होती है। यह सुनकर हनुमान जी से रहा न गया और उन्होंने अपने पूरे शरीर को सिंदूर से रंग लिया। हनुमान मन ही मन विचार करने लगे कि इससे तो मेरे प्रभु श्रीकाम की आयु बहुत लंबी हो जाएगी और वह मुझे भी माता सीता की तरह स्नेह करेंगे।
सिंदूर लगे हनुमान जब प्रभु राम की सभा में गए तो लोग उन्हें देखकर हैरान रह गए। प्रभु राम ने हनुमान से पूरे शरीर पर सिंदूर लगाने का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि, इससे आप अमर हो जाएंगे और मुझे भी माता सीता की तरह आपका स्नेह मिलेगा। हनुमान जी की यह बात सुनकर प्रभु राम भाव विभोर हो गए और उन्होंने हनुमान को गले लगा लिया। उसी समय से हनुमान जी को सिंदूर अति प्रिय है और सिंदूर अर्पित करने वाले पर हनुमान जी काफी प्रसन्न रहते हैं।
महिलाएं हनुमान जी पर सिंदूर न चढ़ाए। वे केवल अपने पति, पुत्र और देवी मां को ही सिंदूर लगा सकती हैं। वे सिंदूर के स्थआन पर लाल रंग के फूल चढ़ा सकती हैं। महिलाएं हनुमान जी पर चढ़ाया हुआ सिंदूर मांग में न लगाकर अपनी चूड़ियों में लगाएं। बता दें कि, हनुमान जी को सिंदूर और चमेली का तेल लगाने से रोग, शोक और ग्रह दोष समाप्त हो जाते हैं।
जब भी किसी जरूरी काम से बाहर जाए तो हनुमान जी के चरणों का सिंदूर अवश्य अपने माथे पर लगाएं। इससे आपकी बुद्धि कुशाग्र होगी और अनचाहे संकट टल जाएंगे। मंगल ग्रह को अपने अनुकुल करने के लिए हनुमान जी को सिंदूर अर्पित करें।
मल्टीमीडिया डेस्क। नौ शक्तियों के मिलन को ही नवरात्रि कहते हैं। ज्यादातर लोग चैत्र और शारदीय नवरात्रि के बारे में जानते हैं और उस दौरान पूजा व व्रत करते हैं। मगर, इसके अलावा दो गुप्त नवरात्रि भी साल में होती हैं, जिनमें खासतौर पर गुप्त सिद्धियां पाने के लिए पूजा-अर्चना की जाती है। माघ और आषाढ़ में मनाई जाने वाली इन दोनों गुप्त नवरात्रि में साधक विशेष साधना करते हैं। माना जाता है कि गुप्त नवरात्रि में पूजा अर्चना करने से अपार सफलता मिलती है।
गुप्त नवरात्रि की प्रमुख देवियां
आम तौर पर जहां नवरात्र में जहां नौ देवियों की विशेष पूजा का प्रावधान है, वहीं गुप्त नवरात्र में 10 महाविद्या की साधना की जाती है। गुप्त नवरात्र में पूजी जाने वाली 10 महाविद्याओं में मां काली, मां तारा देवी, मां त्रिपुर सुंदरी, मां भुवनेश्वरी, मां छिन्नमस्ता, मां त्रिपुर भैरवी, मां धूमावती, मां बगलामुखी, मां मातंगी और मां कमला देवी हैं। इस नवरात्र में में तंत्र और मंत्र दोनों के माध्यम से भगवती की पूजा की जाती है।
ऐसे करें शक्ति की साधना
गुप्त नवरात्र में मां भगवती की साधना गुप्त रूप से देर रात में की जाती है। तन और मन से पवित्र होकर माता की विधि-विधान से फल-फूल आदि चढ़ाने के बाद सरसों के तेल का दीपक जलाकर ॐ दुं दुर्गायै नमः मंत्र का जाप करें। आद्या शक्ति की इस साधना में लाल रंग के फूल, लाल सिंदूर और लाल रंग की चुनरी का प्रयोग करें। इससे जुड़ी साधना-आराधना को भी लोगों से गुप्त रखा जाता है। मान्यता है कि साधक जितने गुप्त तरीके से देवी की साधना करता है, उस पर भगवती की उतनी ही कृपा बरसती है।
इन मंत्रों का करें जाप
‘ऊं ऐं हीं क्लीं चामुण्डाये विच्चे नम:’
‘ऊं ऐं महाकालाये नम:’
‘ऊं हीं महालक्ष्मये नम:’
‘ऊं क्लीं महासरस्वतये नम:’
गुप्त नवरात्रि के दौरान न करें ये काम
इन दिनों में नाखून, बाल और दाढ़ी बनवाएं न बनवाएं।
कन्याओं को झूठा भोजन न दें। मांस-मदिरा से बचे।
झूठ नहीं बोलें और किसी का अपमान नहीं करें।
मल्टीमीडिया डेस्क। हिंदू धर्मशास्त्रों के अनुसार मानव जीवन को सोलह संस्कारों में पिरोया गया है। पहला संस्कार गर्भाधान संस्कार है जिसके जरिए मानव जीवन की प्रक्रिया प्रारंभ होती है। इसी तरह दूसरे संस्कारों को उम्र के हिसाब से पूरा करता हुआ मानव जीवन सोलहवे संस्कार यानी अंतिम संस्कार की ओर बढ़ता है और आत्मा के शरीर छोड़ने के साथ ही मानव जीवन का अंतिम संस्कार पूरा हो जाता है।
लेकिन इहलोक से परलोक में प्रस्थान करने के बाद भी इंसान को विधिपूर्वक अंतिम विदाई दी जाती है। इसमें सबसे प्रमुख है दाह संस्कार या नश्वर शरीर का पंचतत्व में विलिन होना। इसके शास्त्रों में नियम दिए गए हैं उन नियमों के अनुसार अग्निदाह करने पर मानव सभी तरह के मोहमाया और जीवन के जंजाल से मुक्त होकर श्रीहरी के चरणों में जगह पा जाता है।
गरुड़ पुराण के अनुसार मानव की मृत्यु किसी भी समय हो सकती है यह परमात्मा के हाथ में है, लेकिन उसका अंतिम संस्कार सिर्फ दिन के समय यानी सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक ही किया जा सकता है। दिन ढलने के बाद यानी रात में मृत्यु होने पर अंतिम संस्कार के लिए सूर्योदय का इंतजार करना चाहिए।
गरुड़ पुराण के अनुसार यदि अंतिम संस्कार सूर्यास्त के बाद किया जाता है तो मरने वाले को परलोक में कष्ट भोगने पड़ते और अगले जन्म में उसके अंगों में खराबी हो सकती है या कोई दोष हो सकता है। इसी कारण सूर्यास्त के बाद दाह संस्कार उचित नहीं माना गया है। मोक्ष के लिए और मृतात्मा की मुक्ति के लिए दिन में अंतिम संस्कार का विधान है।
धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि दिन ढलने के साथ ही स्वर्ग के कपाट बंद हो जाते हैं और नर्क के खुल जाते हैं। इसलिए दिन में अंतिम संस्कार करने पर मृतात्मा को स्वर्ग की प्राप्ति होती है और रात के समय अंतिम संस्कार करने पर नर्क की प्राप्ति होती है।
शास्त्रों में यह भी विधान है कि सूर्यास्त के बाद यदि किसी का निधन होता है तो मृत शरीर को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए। क्योंकि मृत व्यक्ति की आत्मा वहीं पर भटकती रहती है और अपनों के नजदीक रहकर उनको देखती रहती है। यह भी कहा जाता है कि मृत्यु के बाद शरीर से आत्मा प्रस्थान कर जाती है और खाली शरीर में कोई बुरी आत्मा प्रवेश न कर ले इसलिए मृतक को रात को अकेला नहीं छोड़ा जाता है। और विधि अनुसार मृत शरीर को तुलसी के पौधे के पास रखने का भी प्रावधान है।
इस तरह से विधि-विधान से अंतिम संस्कार करने पर आत्मा परमात्मा में विलिन होकर देवलोक में स्थान पाती है।
मल्टीमीडिया डेस्क। हिंदू धर्म में एकादशी का व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशियां होती हैं। अधिकमास में इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। पद्मपुराण में एकादशी का बहुत ही महात्मय बताया गया है एवं उसकी विधि विधान का भी उल्लेख किया गया है।
इसी में से एक है माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी, जिस दिन को षटतिला एकादशी मनाई जाती है और व्रत किया जाता है। इस बार 31 जनवरी को गुरुवार के दिन यह एकादशी मनाई जाएगी।
षटतिला एकादशी पर तिल के द्वारा भगवान विष्णु की पूजा अर्चना की जाती है। षटतिला एकादशी पर तिल का इस्तेमाल स्नान, प्रसाद, भोजन, दान, तर्पण आदि सभी चीजों में किया जाता है। इस दिन व्यक्ति को सुबह स्नान करके भगवान विष्णु की तिलों से पूजा करनी चाहिए।
भगवान विष्णु को पीले फल, फूल, वस्त्र अर्पण करने चाहिए। मान्यता है कि इस दिन तिल का प्रयोग करने से व्यक्ति को पुण्य की प्राप्ति होती है और मन की इच्छा भी पूरी होती हैं। कहा जाता है तिल में महा लक्ष्मी का वास होता है, इसलिए बच्चों की पढ़ाई, ज्ञान और धन में लाभ होता है।
षठतिला एकादशी की कथा
नारद मुनि त्रिलोक भ्रमण करते हुए भगवान विष्णु के धाम वैकुण्ठ पहुंचे। वहां पहुंच कर उन्होंने विष्णु भगवान को प्रणाम करके उनसे प्रश्न किया कि प्रभु षट्तिला एकादशी की क्या कथा है और इस एकादशी को करने से कैसा पुण्य मिलता है। तब लक्ष्मीपति भगवान विष्णु ने कहा प्राचीन काल में पृथ्वी पर एक ब्राह्मणी रहती थी। वह मुझमें बहुत ही श्रद्धा एवं भक्ति रखती थी। यह स्त्री मेरे निमित्त सभी व्रत रखती थी।
परंतु यह स्त्री कभी ब्राह्मण एवं देवताओं के निमित्त अन्न दान नहीं करती थी। अत: मैंने सोचा कि यह स्त्री बैकुण्ड में रहकर भी अतृप्त रहेगी अत: मैं स्वयं एक दिन भिक्षा लेने पहुंच गया। उसने एक मिट्टी का पिण्ड उठाकर मेरे हाथों पर रख दिया। मैं वह पिण्ड लेकर अपने धाम लौट आया। कुछ दिनों पश्चात वह स्त्री भी देह त्याग कर मेरे लोक में आ गई।
यहां उसे एक कुटिया और आम का पेड़ मिला। खाली कुटिया को देखकर वह स्त्री घबराकर मेरे समीप आई और बोली मैं तो धर्मपरायण हूं फिर मुझे खाली कुटिया क्यों मिली? तब मैंने उसे बताया कि यह अन्नदान नहीं करने तथा मुझे मिट्टी का पिण्ड देने से हुआ है। मैंने फिर उस स्त्री से बताया कि जब देव कन्याएं आपसे मिलने आएं तब आप अपना द्वार तभी खोलना जब वे आपको षट्तिला एकादशी के व्रत का विधान बताएं।
स्त्री ने ऐसा ही किया और जिन विधियों को देवकन्या ने कहा था उस विधि से ब्रह्मणी ने षट्तिला एकादशी का व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उसकी कुटिया अन्न धन से भर गई। इसलिए हे नारद जो व्यक्ति इस एकादशी का व्रत करता है और तिल एवं अन्न दान करता है उसे मुक्ति और वैभव की प्राप्ति होती है।
षठतिला एकादशी का फल
इस व्रत में तिल का छ: रूप में दान करना उत्तम फलदायी होता है। कहते हैं कि जो व्यक्ति जितने रूपों में तिल का दान करता है उसे उतने हजार वर्ष स्वर्ग में स्थान प्राप्त होता है। ऋषिवर ने जिन 6 प्रकार के तिल दान की बात कही है वह इस प्रकार हैं 1. तिल मिश्रित जल से स्नान 2. तिल का उबटन 3. तिल का तिलक 4. तिल मिश्रित जल का सेवन 5. तिल का भोजन 6. तिल से हवन।
इन चीजों का स्वयं भी प्रयोग करें और किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को बुलाकर उन्हें भी इन चीजों का दान दें। इस प्रकार जो षट्तिला एकादशी का व्रत रखते हैं, भगवान उनको अज्ञानता पूर्वक किए गए सभी अपराधों से मुक्त कर देते हैं और पुण्य दान देकर स्वर्ग में स्थान प्रदान करते हैं।
मल्टीमीडिया डेस्क। 29 जनवरी, मंगलवार को भीष्म पितामह जयंती है। धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, माघ मास के कृष्ण पक्ष की नवमी को भीष्म पितामह की जयंती मनाई जाती है। भीष्म पितामह छः महीने तक वाणों की शैय्या पर लेटे थे। शैय्या पर लेटे-लेटे वे सोच रहे थे कि मैंने कौन-सा पाप किया है जो मुझे इतने कष्ट सहन करने पड़ रहे हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने तब उन्हें उनके उस पाप के बारे में बताया था, जिसके कारण उन्हें यह कष्ट झेलना पड़ा। पढ़िए इसी बारे में –
भगवान कृष्ण जब भीष्म के पास आए तो उन्होंने पूछा, मैंने ऐसे कौन-से पाप किए हैं कि वाणों की शैय्या पर लेटा हूं, पर प्राण नहीं निकल रहे हैं। भगवान कृष्ण ने कहा कि आप अपने पुराने जन्मों को याद करो और सोचो कि आपने कौन-सा पाप किया है। भीष्म बहुत ज्ञानी थे। उन्होंने कृष्ण से कहा कि मैंने अपने पिछले जन्म में रतीभर भी पाप नहीं किया है।
कृष्ण ने उन्हें बताते हुए कहा कि पिछले जन्म में जब आप राजकुमार थे और घोडे पर सवार होकर कहीं जा रहे थे। उसी दौरान आपने एक नाग को जमीन से उठाकर फेंक दिया तो कांटों पर लेट गया था, पर 6 माह तक उसके प्राण नहीं निकले थे। उसी कर्म का फल है जो आप 6 महीने तक बाणों की शैय्या पर लेटे हैं।
महाभारत में भीष्म के कारण ही कृष्ण ने उठाया था हथियार
महाभारत में कौरव और पांडवों के बीच हो रहे युद्ध में कौरवों की सेना का प्रतिनिधित्व कर रहे भीष्म पितामह ने पांडवों की सेना का कत्लेआम करना शुरू किया। पांडव सेना में हाहाकार मच गया। श्रीकृष्ण ने जब देखा कि पांडव सेना मुसीबत में है तो हथियार न उठाने का वचन देने के बावजूद वे स्वयं रथ का पहिया हाथ में थामकर भीष्म पितामह की ओर दौड़ पड़े। श्रीकृष्ण को शस्त्र उठाते देखकर भीष्म पितामह ने अपना शस्त्र नीचे रख दिया।
भगवान श्रीकृष्ण जो भी करते थे, उसके पीछे एक उद्देश्य होता था। महाभारत में भी कई कहानियां हैं जहां लोगों को उनके काम समझ नहीं आए, लेकिन जब अंतिम परिणाम आया तो आभास हुआ कि कान्हा क्या सोच रहे थे। ऐसी ही एक कहानी जरासंध को लेकर भी है। आप भी पढ़िए –
कंस की मृत्यु के पश्चात उसका ससुर जरासंध बहुत ही क्रोधित था। उसने कृष्ण और बलराम को मारने के लिए मथुरा पर 17 बार आक्रमण किया।
जरासंध जब भी आक्रमण करता, उसे हार का मुंंह देखना पड़ता। वह फिर सेना जुटाता और ऐसे राजाओं को अपने साथ जोड़ता जो श्रीकृष्ण के खिलाफ थे, और फिर हमला बोल देता। हर बार श्रीकृष्ण पूरी सेना को मार देते, लेकिन जरासंध को छोड़ देते। बड़े भाई बलराम को यह बात अजीब लगती।
आखिर में एक युद्ध के बाद बलराम से रहा नहीं गया और उन्होंने श्रीकृष्ण से पूछ ही लिया – “बार-बार जरासंध हारने के बाद पृथ्वी के कोनों-कोनों से दुष्टों को अपने साथ जोड़ता है और हम पर आक्रमण कर देता है और तुम पूरी सेना को मार देते हो किन्तु असली खुराफात करने वाले को ही छोड़ दे रहे हो। ऐसे क्यों
तब हंसते हुए श्री कृष्ण ने बलराम को समझाया, “हे भ्राता श्री, मैं जरासंध को बार-बार जानबूझकर इसलिए छोड़ दे रहा हूं ताकि वह जरासन्ध पूरी पृथ्वी से दुष्टों को अपने साथ जोड़े और मेरे पास लाता रहे और मैं आसानी से एक ही जगह रहकर धरती के सभी दुष्टों को मार दे रहा हूं। नहीं तो मुझे इन दुष्टों को मारने के लिए पूरी पृथ्वी का चक्कर लगाना पड़ता। दुष्टदलन का मेरा यह कार्य जरासंध ने बहुत आसान कर दिया है।”
जब सभी दुष्टों को मार लूंगा तो सबसे आखिरी में इसे भी खत्म कर ही दूंगा ” चिन्ता न करो भ्राता श्री