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रायपुर । बुधवार सुबह करीब साढ़े 9 बजे अकोला-गुमा एनीकेट के पास एक ट्रैक्टर और बाइक में भिड़ंत हो गई। इस हादसे में बाइक सवार युवक की मौके पर ही मौत हो गई। वहीं ट्रैक्टर पर सवार तीन लोगों में से दो घायल हैं। जानकारी के अनुसार ग्राम गुमा निवासी मोतीलाल साहू अपनी बाइक क्रमांक सीजी 04 डीजेड 0751 से अकोला की तरफ  जा रहा था। विपरीत दिशा से ट्रैक्टर क्रमांक सीजी 06 बी 9066 ईंट भरकर गुमा की तरफ आ रहा था तभी एनीकेट के पास ट्रैक्टर चालक वाहन से नियंत्रण खो बैठा और सामने से आ रही बाइक को चपेट में ले लिया। इससे ट्रैक्टर पलट गया, वहीं बाइक सवार मोतीलाल साहू की मौके पर ही मौत हो गई।
ट्रैक्टर पर सवार तीन लोगों में दो गंभीर रूप से घायल हैं, जिन्हें उपचार के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती किया गया है। घटना की सूचना पर मौके पर पहुंची कुम्हारी पुलिस ने मर्ग कायम कर शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। साथ ही ट्रैक्टर चालक के खिलाफ  अपराध दर्ज कर जांच में लिया है।    

 
रायपुर । मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ईद उल फितर के मौके पर वन एवं पर्यावरण मंत्री मोहम्मद अकबर के मौहदा पारा स्थित घर पहुंचकर उन्हें ईद की मुबारकबाद दी ।  
इसके पहले मुख्यमंत्री ने ईदगाह भाठा स्थित मोहम्मद अमजद, बैरन बाजार स्थित हसन खान, हमीद हयात और नयापारा गौसिया चौक स्थित सलाम रिजवी और नाजिम निजाम के घर पहुंचकर उन्हें ईद की मुबारकबाद दी थी ।  

 
रायपुर । मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पर्यावरण को लेकर चिंता जाहिर की है. आने वाली पीढ़ी के बेहतर कल के लिए उन्होंने विश्व पर्यावरण दिवस पर उन्होंने जल, जंगल और जमीन को सुरक्षित कर पर्यावरण बचाने की शपथ लेने का आह्वान किया है।
5 जून पर्यावरण दिवस के अवसर पर सीएम ने ट्वीट कर कहा, “आइये! आज इस विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर मिलकर जल, जंगल और जमीन को सुरक्षित कर पर्यावरण को बचाने की शपथ लें. जिससे कि वर्तमान पीढ़ी के लिए हम स्वस्थ एवं सुरक्षित परिवेश सुनिश्चित कर सकें तथा आने वाली पीढ़ी के लिए एक बेहतर धरती का निर्माण कर सकें ।

 
रायपुर । मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की सभा में अपने जन्मदिन पर ड्यूटी निभा रहे एक टीआई को लाइन हाजिर की सजा तोहफे के रूप में मिली है।
टीआई का कसूर सिर्फ इतना था कि वे मुख्य सचिव सुनील कुजूर को नहीं पहचानते थे और अपनी ड्यूटी निभाते हुए टीआई ने सीएस से उनका आई कार्ड मांग लिया. इसके बाद सीएस नाराज हो गए और उन्होंने इसकी शिकायत आईजी से की, जिसके बाद टीआई को सस्पेंड कर दिया गया है।
मामला पाली ब्लॉक के ग्राम केराझरिया का है. जहां मंगलवार को सीएम की सभा थी. सभा के इंट्री गेट में दर्री थानेदार रघुनंदन प्रसाद शर्मा की ड्यूटी लगाई गई थी. सीएम की सुरक्षा को देखते हुए वहां आने-जाने वाले हर अधिकारी और व्यक्ति के आई कार्ड की जांच की जा रही थी. इसी दौरान वहां पहुंचे सुनील कुजूर से भी उन्होंने आई कार्ड मांगा, सूत्रों के मुताबिक टीआई सीएस को नहीं पहचानते थे।
सीएस सुनील कुजूर
मुख्य सचिव ने जैसे ही अपना परिचय थानेदार को दिया, उन्होंने माफी भी मांग ली. लेकिन इसके साथ ही आईजी से शिकायत भी की. जिसके बाद कार्रवाई की गई. टीआई को सस्पेंड करने की पुष्टि कोरबा एसपी जितेंद्र मीणा ने की है. Lalluram.com से बातचीत करते हुए उन्होंने सीएस की शिकायत के संबंध में तो कुछ नहीं कहा, लेकिन उन्होंने कहा कि ड्यूटी के दौरान टीआई के खिलाफ शिकायत मिली थी. जिसकी जांच कटघोरा एसडीओपी को दी गई है, जिसके बाद ही पूरा मामला स्पष्ट हो सकेगा. इस संबंध में सीएस सुनील कुजूर से भी संर्पक करने की कोशिश की गई, लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका।

रायपुर । छत्तीसगढ़ी कलाकारों को प्रदर्शन के दौरान गिरफ्तार कर लिया गया था जिन्हें गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू से मिला आश्वासन के बाद कलाकारों को छोड़ दिया गया. सेंट्रल जेल से छूटने के बाद कलाकार ताम्रध्वज साहू के बंगला पहुंचकर अपनी मांगों को लेकर चर्चा की. अब गुरुवार को बैठक होगी।
गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू का कहना है कि 6 जून को मीटिंग रखा गया है जिसमें सभी प्रकार के कलाकार, फ़िल्मकार, निर्देशक, निर्माता सभी से एक एक घंटा चर्चा कर इसके बीच का उपाय निकाला जाएगा. उसके बाद आगे क्या करना चर्चा से निकले बिंदुओं पर आधार पर कार्रवाई की जाएगी।
कलाकारों का कहना है कि ये प्रदर्शन है सरकार के ख़िलाफ़ नहीं हैं बल्कि मल्टीप्लेक्स एसोसिएशन के खिलाफ है. जो छत्तीसगढ़ी लोगों और कलाकारों को अपमानित करते हैं और कहते हैं की छत्तीसगढ़ियों का पॉपकॉर्न ख़रीदने की औक़ात नहीं है. इसलिए छत्तीसगढ़ी मूवी नहीं लगाते है. इस तरह सिनेमाघरों के मालिकों द्वारा अपमान किया जा रहा है जिसके ख़िलाफ़ आज का धरना प्रदर्शन है।
बता दें कि आज छत्तीसगढ़ी फिल्म निर्माता, निर्देशक, कलाकारों सहित फिल्म निर्माण जुड़े सभी लोग अपनी मांग को लेकर प्रदेश के अलग-अलग शहरों में प्रदर्शन कर रहे थे. राजधानी में मल्टीप्लेक्स एसोसिएशन के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले छत्तीसगढ़ी सिनेमा से जुड़े लोगों अम्बूजा माल से पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था।

रायपुर/बलौदाबाजार । एंटी करप्शन ब्यूरो ने 5 हजार रुपये घूस लेते एक पटवारी को रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया है। पटवारी जमीन की पर्ची में नाम दर्ज कराने के नाम पर ये घूस ले रहा था। पटवारी का नाम नरेंद्र बोरसे बताया जा रहा है। बलौदाबाजार जिले के पवनी गांव के स्कूल में बच्चों का आय जाति बनाने का शिविर चल रहा था। वहीं से उसे गिरफ्तार किया गया। मिली जानकारी के मुताबिक बिलाईगढ़ तहसील अंतर्गत हल्का नंबर 8 के पटवारी द्वारा पवनी गांव के किसान ओमप्रकाश से अपने खेत के पर्ची को तीन भाइयों के नाम में अलग अलग बनवाने के लिए पटवारी के पास आवेदन दिया गया था। जिसमें पटवारी नरेन्द्र बोरसे के द्वारा ग्राणीण से पहले 15 हजार का घूस मांगा था, जिस पर किसान ने पैसा देने में असमर्थता जतायी। बाद में 9 हजार में बात तय हुई। जिसमें पीडि़त किसान से 2 हजार पटवारी को दे चुका था और आज उसका दूसरा किश्त 5 हजार दिया, जिस पर एंटी करप्शन ब्यूरो ने पटवारी को रंगे हाथ घूस लेते गिरफ्तार कर लिया।

पीडि़त किसान ने बताया कि पटवारी उससे बार बार पैसे की मांग कर रहा था, और मेरा पर्ची का काम नहीं कर रहा था। तब मैने इसकी शिकायत एंटी करप्शन ब्यूरो रायपुर में किया था और आज पटवारी को रंगे हाथ घुस लेते पकड़ा गया है।

रायपुर । लोकसभा चुनावों में मिली बड़ी हार के बाद कार्यकर्ताओं की सुध लेने राजीव भवन में मंत्रियों की बैठकें शुरू हो गई हैं। मंगलवार को पहले दिन उच्च शिक्षा मंत्री उमेश पटेल ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं से मुलाकात की है। जिसमें मंत्री ने कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद करते हुए उनकी समस्याओं को ध्यान से सुना और उनका निराकरण भी किया। इस दौरान मंत्री उमेश पटेल ने कार्यकर्ताओं से खुलकर बातचीत की। उमेश पटेल ने कहा कि हमें निर्देश मिले हैं कि राजीव भवन में लगातार बीच-बीच में आना है, और उसी के तहत मैं आज यहां बैठा हूं। लोगो से मिल रहा हूं। सबसे मिलना-जुलना हो रहा है। उमेश पटेल ने कहा कि कार्यकर्ताओं से सीधे जुड़ाव के लिए इस नई पहल का पालन सभी लोग करें तो बहुत अच्छा होगा। सप्ताह में छह दिन यानी सोमवार से शनिवार को तीन घंटे के लिए एक मंत्री कांग्रेस मुख्यालय राजीव भवन में बैठेंगे। इसे कार्यकर्ताओं से सीधे जुड़ाव के लिए नई पहल बताया जा रहा है।

 
रायपुर । मठपुरैना गोलीकांड के मुख्य आरोपी को पुलिस ने भिलाई से गिरफ्तार कर लिया है. आरोपी आलम उर्फ सरफराज अंसारी  भिलाई से  बहन के घर से पकड़ा गया है. इस गोलीकांड मामले को लेकर पुलिस ने आज प्रेसकांफ्रेस की है । 
एडिशनल एसपी प्रफुल्ल ठाकुर ने जानकारी देते हुए बताया है कि आलम उर्फ सरफराज अंसारी और जावेद खान के बीच भाड़े को लेकर विवाद हुआ था. कल सोमवार की रात आलम ने देसी कट्टा से जावेद को गोली मारी थी. जिसके बाद वो वहां से फरार हो गया था जिसे आज भिलाई से उसकी बहन के घर से गिरफ्तार किया गया है. आलम उत्तरप्रदेश के इलाहाबाद से कट्टा खरीद कर लाया था. जिसके पास से 1 कट्टा और 03 जिन्दा कारतूस  बरामद किए हैं.  जावेद खान को पीठ में गोली लगी थी.वो आउट ऑफ डेंजर है. रामकृष्ण अस्पताल में उसका इलाज चल रहा है । 
जानकारी के मुताबिक आरोपी आलम टायर दुकान में और प्रार्थी जावेद पेंटर का काम करता है. एक साल पहले भी दोनों के बीच मामूली विवाद को लेकर मारपीट हुई थी. उस समय प्रार्थी जावेद ने आरोपी आलम के साथ मारपीट की गई थी.प्रार्थी और आरोपी दोनों मूलतः बिहार के रहने वाले हैं. दोनों संजय नगर में रहते थे. जावेद के पास टाटा एस गाड़ी है जिसे आलम चलाता था तो उसे एक बार किराए में लेकर गया था उसका भाड़ा उसने नही दिया उसी भाड़े का विवाद बढ़ गया. आरोपी आलम पुलिस की गिरफ्त में हैं आगे की कार्रवाई की जा रही है । 

 
रायपुर । मध्यप्रदेश से अलग राज्य बनने के 19 साल बाद मैं व्यक्तिगत तौर पर अनुभव कर पा रहा हूँ कि अब तक की चार सरकारे मैंने जो देखी है उसमें असल छत्तीसगढ़िया मुख्यमंत्री का अनुभव भूपेश बघेल में ही कर पा रहा हूँ. यह बात मैं मुख्यमंत्री की तारीफ में नहीं कह रहा हूँ बल्कि अभी तक के उनके नीति-नियत में अगर शराबबंदी को अलगकर अन्य कार्यों की ओर का ज़िक्र करूँ तो यही दिख रहा है । 
मसलन अगर छत्तीसगढ़ के चार चिन्हारी…नरवा-गरवा, घुरवा-बारी का ही अनुभव करके देखें तो यह सिर्फ नारा ही नहीं लगता बल्कि इससे एक जुड़ाव हर छत्तीसगढ़ियों को होता है. ये और बात है कि छत्तीसगढ़ की असल चिन्हारी यहाँ की बोली-भाषा है. वह बोली-भाषा जो बीते 19 सालों से अभी तक उपेक्षित रहा है. जिसे बीते सरकार ने सिर्फ राजभाषा का दर्ज दें खान-पूर्ति तक ही सीमित रखा. उसे आगे बढ़ाने का काम नहीं किया. ये और बात है कि छत्तीसगढ़ी का इस्तेमाल सरकारी विज्ञापनों में खूब हुआ, लेकिन पढ़ाई-लिखाई या सरकारी काम-काज में नहीं. क्योंकि छत्तीसगढ़ी हो या गोंडी-हल्बी या कोड़ूक-सरगुजही यह नेताओं के भाषणों की भाषा यहाँ बनकर रह गई है । 
खैर यहाँ भाषा पर बात होगी तो मैं विषय केन्द्रित नहीं रह पाऊँगा. इसलिए फिलहाल असल छत्तीसगढ़िया भूपेश बघेल क्यों मुझे लग रहा है यह बताना जरूरी है. दरअसल अभी तक यही हो रहा था कि छत्तीसगढ़िया लोग खुद को दबे-कुचले हुए पा रहे थे. अधिकारियों की तानशाही और गैर छत्तीसगढ़ियापन वाला रवैय्या इस प्रदेश में इस तरह हावी हो रहा था कि उसमें मूल छत्तीसगढ़िया खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे थे. भूपेश बघेल के मुख्यमंत्री बनने के बाद खास तौर पर गाँव के लोगों को ये लगा है कि हो न हो इस नेता में छत्तीसगढ़ियापन तो झलकता है । 
यहाँ बात भूपेश बघेल की तारीफ कि नहीं बल्कि मैंने अभी तक जो देखा वहीं लिख रहा हूँ. क्योंकि भूपेश बघेल जब बतौर मुख्यमंत्री छत्तीसगढ़ी में शपथ नहीं ले पाए थे तो उनसे पहली प्रेसवार्ता में सवाल करने वाला मैं ही था कोई और नहीं. खैर सोचने वाले जो भी सोचे लेकिन उन्हें यह बात तो माननी पड़ेगी, उन अधिकारियों की तरह जो अभी तक मंत्रालय से छत्तीसगढ़ियों को दरकिनार करके रखे थे. मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की कोशिश यही होती है कि अधिक से अधिक संवाद अपनी मातृभाषा छत्तीसगढ़ी में ही करे वैसे जब राहुल गांधी की मौजूदगी में नवा रायपुर में पहला कार्यक्रम सरकार बनने के बाद हुआ था तो उसमें बघेल से लेकर महंत तक ने छत्तीसगढ़ी में भाषण दिया था. इसके बाद यह भूपेश बघेल के छत्तीसगढ़ियापन का ही असर था कि विधानसभा के भीतर पहली बार मुख्यमंत्री से लेकर विधानसभा अध्यक्ष और नेता-प्रतिपक्ष सहित बड़ी संख्या में विधायकों ने छत्तीसगढ़ी में शपथ लिया था. उन विधायकों ने भी जिनकी मातृभाषा छत्तीसगढ़ी नहीं है. मैं यही कह रहा हूँ कि भूपेश बघेल के छत्तीसगढ़ियापन में कोई बनवाटीपन नहीं दिखता पूर्व के सरकारों की तरह.
ऐसी बात नहीं कि भूपेश बघेल ही छत्तीसगढ़ी में संवाद करते हैं कोई और नहीं. उनसे बेहतर छत्तीसगढ़ी और मीठ छत्तीसगढ़ी अजीत जोगी बोलते हैं. वैसे ये भी बात नहीं कि जोगी शासनकाल में छत्तीसगढ़ियापन न झलका हो. उस दौर में ही आंशिक रूप से छत्तीसगढ़ी में शिक्षा की शुरुआत हुई थी. वैसे भी स्वभाव और प्रभाव से जो लोकप्रियता ठेठ छत्तीसगढ़िया अंदाज वाले नेता के रूप में अजीत जोगी को प्राप्त है फिलहाल वैसा किसी को नहीं. लेकिन शासन तंत्र में छत्तीसगढ़ियापन को स्थापित जोगी नहीं कर पाए थे. और यही स्थिति तीन बार के मुख्यमंत्री रहे डॉ. रमन सिंह के साथ रही. उनके शासकाल में छत्तीसगढ़ी भाषा को राजभाषा का दर्जा तो मिला. लेकिन वे अपने 15 साल के शासनकाल में ठेठ छत्तीसगढ़ियापन नहीं ला पाए. जबकि रमन सिंह भी छत्तीसगढ़ी में बखूबी भाषण देते हैं. लेकिन एक सच्चाई जो पूर्व के सरकारों मुझे खलती है रही वह है शासन तंत्र के भीतर का छत्तीसगढ़ियापन । 
यहाँ बात छत्तीसगढ़ी योजनाओं की नहीं है. क्योंकि जोगी शासन काल में जोगी डबरी एक योजना भी चली थी और रमन सिंह भी को चावल योजना के बाद चाउर वाले बाबा का तमगा मिला था. लेकिन योजनाओं से इतर बात छत्तीसगढ़ियापन को लेकर है, प्रशासन के भीतर छत्तीसगढ़ी की महत्ता को लेकर है. उसी महत्ता का जिक्र मैं यहाँ कर रहा हूँ. कम से कम भूपेश बघेल ने तो कहा कि अधिकारी छत्तीसगढ़ी में संवाद करें. वैसे करे तक सीमित रखने से काम नहीं चलेगा बल्कि इसे करते हुए दिखाना और बताना भी पड़ेगा । 
अब बात उस पहल की ओर जहाँ से नीति और नियत को लेकर एक भरोसा मेरे भीतर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को लेकर जागा है. गढ़बो नवा छत्तीसगढ़ में एक निर्णायक कदम सरकार उठाने जा रही है यह जानकारी मिली है. जानकारी के मुताबिक सरकार नया रायपुर का नाम अब नवा रायपुर करने जा रही है. यही नहीं अब सभी जगह नया रायपुर की जगह नवा रायपुर ही लिखा जाएगा. सरकार का यह कदम छत्तीसगढ़ में पुरखों के सपनों को पूरा करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है. क्योंकि पूर्व की सरकार ने छत्तीसगढ़ के पुरखों की उपेक्षा में कहीं कोई कमी नहीं की है. ऐसे में छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वप्नदृष्टा डॉ. खूबचंद के साथ भूपेश बघेल न्याय करेंगे ऐसी उम्मीद मैं कर सकता हूँ. उम्मीद है कि छत्तीसगढ़ के महानायक वीरनारायण सिंह, गैंद सिंह, गुण्डाधूर, महाराजा प्रवीरचंद भंजदेव, गुरु घासीदास, मिनी माता, पं. सुंदरलाल शर्मा, ठा. प्यारेलाल, बैरिस्टर छेदीलाल, चंदूलाल चंद्राकर, पं. श्यामलाल के सपनों को साकार भूपेश बघेल
 करेंगे । 
उम्मीद यह भी कर सकता हूँ कि भूपेश बघेल के कदम नवा रायपुर तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि आगे बढ़ते हुए जल्द ही वे अपने, हमारे पुरखों के सपनों का छत्तीसगढ़ गढ़ेंगे.  नया रायपुर से नवा रायपुर अटल नगर के भीतर प्रतिमाओं से लेकर चौक-चौराहों के नाम भी हमें अपने पुरखों के नाम पर रखने होंगे जिन्होंने पृथक छत्तीसगढ़ का सपना देखा था.  नई पीढ़ी को उन पुरखों के बारे में बताना होगा जो अपने प्रदेश में भूला दिए गए हैं. सरकार की योजनाओं में छत्तीसगढ़ के उन विभूतियों के नाम रखने होंगे जिन्हें हमने अभी तक राष्ट्रीय पटल पर स्थापित ही नहीं किया है. वैसे सबसे बड़ी उम्मीद प्रदेश के मुखिया होने के नाते भूपेश बघेल से यह भी मेरी है कि जल्द प्रदेश के स्कूलों में मातृभाषा में पढ़ाई वे शुरू कराएंगे. जहाँ हल्बी-गोंडी, सरगुजी, कोड़ूक को सम्मान मिलेगा. जहाँ छत्तीसगढ़ी में सरकारी काम-काज होंगे. जहाँ हमारी मातृभाषा में बस्तर लेकर सरगुजा तक चौक-चौराहों के नाम लिखें होंगे. जहाँ हमारे पुरखों के पदचिन्ह हमें मिलेंगे. जहाँ हर कदम पर हम सबकों गर्व से यही एहसास होगा, भारत माँ के रतन बेटा बढ़िया अँव ग….मैं छत्तीसगढ़िया अँव ग…

 
रायपुर । मध्यप्रदेश से अलग राज्य बनने के 19 साल बाद मैं व्यक्तिगत तौर पर अनुभव कर पा रहा हूँ कि अब तक की चार सरकारे मैंने जो देखी है उसमें असल छत्तीसगढ़िया मुख्यमंत्री का अनुभव भूपेश बघेल में ही कर पा रहा हूँ. यह बात मैं मुख्यमंत्री की तारीफ में नहीं कह रहा हूँ बल्कि अभी तक के उनके नीति-नियत में अगर शराबबंदी को अलगकर अन्य कार्यों की ओर का ज़िक्र करूँ तो यही दिख रहा है । 
मसलन अगर छत्तीसगढ़ के चार चिन्हारी…नरवा-गरवा, घुरवा-बारी का ही अनुभव करके देखें तो यह सिर्फ नारा ही नहीं लगता बल्कि इससे एक जुड़ाव हर छत्तीसगढ़ियों को होता है. ये और बात है कि छत्तीसगढ़ की असल चिन्हारी यहाँ की बोली-भाषा है. वह बोली-भाषा जो बीते 19 सालों से अभी तक उपेक्षित रहा है. जिसे बीते सरकार ने सिर्फ राजभाषा का दर्ज दें खान-पूर्ति तक ही सीमित रखा. उसे आगे बढ़ाने का काम नहीं किया. ये और बात है कि छत्तीसगढ़ी का इस्तेमाल सरकारी विज्ञापनों में खूब हुआ, लेकिन पढ़ाई-लिखाई या सरकारी काम-काज में नहीं. क्योंकि छत्तीसगढ़ी हो या गोंडी-हल्बी या कोड़ूक-सरगुजही यह नेताओं के भाषणों की भाषा यहाँ बनकर रह गई है । 
खैर यहाँ भाषा पर बात होगी तो मैं विषय केन्द्रित नहीं रह पाऊँगा. इसलिए फिलहाल असल छत्तीसगढ़िया भूपेश बघेल क्यों मुझे लग रहा है यह बताना जरूरी है. दरअसल अभी तक यही हो रहा था कि छत्तीसगढ़िया लोग खुद को दबे-कुचले हुए पा रहे थे. अधिकारियों की तानशाही और गैर छत्तीसगढ़ियापन वाला रवैय्या इस प्रदेश में इस तरह हावी हो रहा था कि उसमें मूल छत्तीसगढ़िया खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे थे. भूपेश बघेल के मुख्यमंत्री बनने के बाद खास तौर पर गाँव के लोगों को ये लगा है कि हो न हो इस नेता में छत्तीसगढ़ियापन तो झलकता है । 
यहाँ बात भूपेश बघेल की तारीफ कि नहीं बल्कि मैंने अभी तक जो देखा वहीं लिख रहा हूँ. क्योंकि भूपेश बघेल जब बतौर मुख्यमंत्री छत्तीसगढ़ी में शपथ नहीं ले पाए थे तो उनसे पहली प्रेसवार्ता में सवाल करने वाला मैं ही था कोई और नहीं. खैर सोचने वाले जो भी सोचे लेकिन उन्हें यह बात तो माननी पड़ेगी, उन अधिकारियों की तरह जो अभी तक मंत्रालय से छत्तीसगढ़ियों को दरकिनार करके रखे थे. मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की कोशिश यही होती है कि अधिक से अधिक संवाद अपनी मातृभाषा छत्तीसगढ़ी में ही करे वैसे जब राहुल गांधी की मौजूदगी में नवा रायपुर में पहला कार्यक्रम सरकार बनने के बाद हुआ था तो उसमें बघेल से लेकर महंत तक ने छत्तीसगढ़ी में भाषण दिया था. इसके बाद यह भूपेश बघेल के छत्तीसगढ़ियापन का ही असर था कि विधानसभा के भीतर पहली बार मुख्यमंत्री से लेकर विधानसभा अध्यक्ष और नेता-प्रतिपक्ष सहित बड़ी संख्या में विधायकों ने छत्तीसगढ़ी में शपथ लिया था. उन विधायकों ने भी जिनकी मातृभाषा छत्तीसगढ़ी नहीं है. मैं यही कह रहा हूँ कि भूपेश बघेल के छत्तीसगढ़ियापन में कोई बनवाटीपन नहीं दिखता पूर्व के सरकारों की तरह.
ऐसी बात नहीं कि भूपेश बघेल ही छत्तीसगढ़ी में संवाद करते हैं कोई और नहीं. उनसे बेहतर छत्तीसगढ़ी और मीठ छत्तीसगढ़ी अजीत जोगी बोलते हैं. वैसे ये भी बात नहीं कि जोगी शासनकाल में छत्तीसगढ़ियापन न झलका हो. उस दौर में ही आंशिक रूप से छत्तीसगढ़ी में शिक्षा की शुरुआत हुई थी. वैसे भी स्वभाव और प्रभाव से जो लोकप्रियता ठेठ छत्तीसगढ़िया अंदाज वाले नेता के रूप में अजीत जोगी को प्राप्त है फिलहाल वैसा किसी को नहीं. लेकिन शासन तंत्र में छत्तीसगढ़ियापन को स्थापित जोगी नहीं कर पाए थे. और यही स्थिति तीन बार के मुख्यमंत्री रहे डॉ. रमन सिंह के साथ रही. उनके शासकाल में छत्तीसगढ़ी भाषा को राजभाषा का दर्जा तो मिला. लेकिन वे अपने 15 साल के शासनकाल में ठेठ छत्तीसगढ़ियापन नहीं ला पाए. जबकि रमन सिंह भी छत्तीसगढ़ी में बखूबी भाषण देते हैं. लेकिन एक सच्चाई जो पूर्व के सरकारों मुझे खलती है रही वह है शासन तंत्र के भीतर का छत्तीसगढ़ियापन । 
यहाँ बात छत्तीसगढ़ी योजनाओं की नहीं है. क्योंकि जोगी शासन काल में जोगी डबरी एक योजना भी चली थी और रमन सिंह भी को चावल योजना के बाद चाउर वाले बाबा का तमगा मिला था. लेकिन योजनाओं से इतर बात छत्तीसगढ़ियापन को लेकर है, प्रशासन के भीतर छत्तीसगढ़ी की महत्ता को लेकर है. उसी महत्ता का जिक्र मैं यहाँ कर रहा हूँ. कम से कम भूपेश बघेल ने तो कहा कि अधिकारी छत्तीसगढ़ी में संवाद करें. वैसे करे तक सीमित रखने से काम नहीं चलेगा बल्कि इसे करते हुए दिखाना और बताना भी पड़ेगा । 
अब बात उस पहल की ओर जहाँ से नीति और नियत को लेकर एक भरोसा मेरे भीतर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को लेकर जागा है. गढ़बो नवा छत्तीसगढ़ में एक निर्णायक कदम सरकार उठाने जा रही है यह जानकारी मिली है. जानकारी के मुताबिक सरकार नया रायपुर का नाम अब नवा रायपुर करने जा रही है. यही नहीं अब सभी जगह नया रायपुर की जगह नवा रायपुर ही लिखा जाएगा. सरकार का यह कदम छत्तीसगढ़ में पुरखों के सपनों को पूरा करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है. क्योंकि पूर्व की सरकार ने छत्तीसगढ़ के पुरखों की उपेक्षा में कहीं कोई कमी नहीं की है. ऐसे में छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वप्नदृष्टा डॉ. खूबचंद के साथ भूपेश बघेल न्याय करेंगे ऐसी उम्मीद मैं कर सकता हूँ. उम्मीद है कि छत्तीसगढ़ के महानायक वीरनारायण सिंह, गैंद सिंह, गुण्डाधूर, महाराजा प्रवीरचंद भंजदेव, गुरु घासीदास, मिनी माता, पं. सुंदरलाल शर्मा, ठा. प्यारेलाल, बैरिस्टर छेदीलाल, चंदूलाल चंद्राकर, पं. श्यामलाल के सपनों को साकार भूपेश बघेल
 करेंगे । 
उम्मीद यह भी कर सकता हूँ कि भूपेश बघेल के कदम नवा रायपुर तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि आगे बढ़ते हुए जल्द ही वे अपने, हमारे पुरखों के सपनों का छत्तीसगढ़ गढ़ेंगे.  नया रायपुर से नवा रायपुर अटल नगर के भीतर प्रतिमाओं से लेकर चौक-चौराहों के नाम भी हमें अपने पुरखों के नाम पर रखने होंगे जिन्होंने पृथक छत्तीसगढ़ का सपना देखा था.  नई पीढ़ी को उन पुरखों के बारे में बताना होगा जो अपने प्रदेश में भूला दिए गए हैं. सरकार की योजनाओं में छत्तीसगढ़ के उन विभूतियों के नाम रखने होंगे जिन्हें हमने अभी तक राष्ट्रीय पटल पर स्थापित ही नहीं किया है. वैसे सबसे बड़ी उम्मीद प्रदेश के मुखिया होने के नाते भूपेश बघेल से यह भी मेरी है कि जल्द प्रदेश के स्कूलों में मातृभाषा में पढ़ाई वे शुरू कराएंगे. जहाँ हल्बी-गोंडी, सरगुजी, कोड़ूक को सम्मान मिलेगा. जहाँ छत्तीसगढ़ी में सरकारी काम-काज होंगे. जहाँ हमारी मातृभाषा में बस्तर लेकर सरगुजा तक चौक-चौराहों के नाम लिखें होंगे. जहाँ हमारे पुरखों के पदचिन्ह हमें मिलेंगे. जहाँ हर कदम पर हम सबकों गर्व से यही एहसास होगा, भारत माँ के रतन बेटा बढ़िया अँव ग….मैं छत्तीसगढ़िया अँव ग…